भारत में ऐतिहासिक सामाजिक परिस्थितियों के उद्धरण देकर भारत में बहुत से क़ानून बनाये गए हैं जो मनुष्य मनुष्य में जाति और लिंग के आधार पर भेद भाव करते हैं। महिलाओं और कथित दलित वर्ग को सदा से पीड़ित पक्ष की तरह प्रस्तुत करने का फैशन सा बन गया है। इन बेचारों के साथ सदियों से होते आ रहे अन्याय से मुक्त करना एक बहुत अच्छा सामाजिक आंदोलन हो सकता था जो अभी तक नहीं हो पाया है। लेकिन इनकी अत्यधिक संख्या को वोट बैंक समझने वाले हमारे नेता इनको लुभाने के लिए या इनके दबाब में आकर ऐसे क़ानून बना देते हैं जिनसे ऐसा लगता है कि जैसे सदियों से इनके पूर्वजों पर जो अत्याचार पुरुष या सवर्णों ने किये हैं उनका बदला अत्याचारियों के उत्तराधिकारियों से लेने की व्यवस्था कर दी गयी है। जैसे एक भेड़िया और एक मैमने की कहानी में सुना जाता है कि मैं तुझे इस लिए खाऊंगा कि तेरे दादा ने मेरे दादा को गाली दी थी। आज कथित दलित वर्ग या किसी महिला की और से यदि पुलिस में शिकायत की जाए कि अमुक व्यक्ति ने उसे गाली दी, या उसकी और गन्दा इशारा किया या थप्पड़ दिखाया तो पुलिस की पहली जिम्मेदारी है कि महिला एयर दलित वर्ग के व्यक्ति की...