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समलैंगिकता और विवाह पर प्रचलित बहस

 समलैंगिकता और विवाह  सर्वोच्च न्यायालय में उपर्युक्त विषय पर बहस के कारण यह विषय अन्य मंचों पर भी बहस के केंद्र में आ गया है. प्रचलित कानून, संविधान, धर्म और समाज इन चार के नजरिए से इस पर चर्चा की जा सकती है. इस समय भारत में प्रचलित कानून केवल विपरीत लिंगियों को ही विवाह की अनुमति देता है. इसीलिए कानून में संशोधन की मांग होमोसेक्सुअल तथा उभय लिंगियों द्वारा की गई है. कानून बनाने का अधिकार संसद के पास है और कानून की संविधान सम्मत समीक्षा का अधिकार न्यायालय के पास . संविधान लोगों को, विशेषकर वयस्क लोगों को साथ रहने, और वैयक्तिक गोपनीयता को सुरक्षा का अधिकार देता है. इस नाते कोई भी दो या अधिक वयस्क समलिंगी, उभयलिंगी यदि साथ रहना चाहें तो इसमें कोई बाधा नहीं है. बाधा उनके साथ रहने को विवाह का नाम देने पर है . विवाह एक सामाजिक संस्था है और अनेकों धार्मिक क्रिया कलापों में इस संस्था के कारण संबंधित लोगों के कर्तव्य और अधिकार वर्णित किए गए हैं. इनमें दो पक्ष पुरुष और स्त्री के रूप में इंगित हैं. सर्वोच्च न्यायालय में बहस इसे किस नतीजे पर ले जाएगी, ये देखना दिलचस्प होगा.

Caste system in India is a curse

 जाति क्या होती है, क्यों होती है, भारतीय उपमहाद्वीप के बाहर भी होती है क्या? वर्ण के बारे में भी हमें भ्रम होता रहा है। वर्णभेद को हम कलर डिस्क्रिमिनेशन समझते हैं। श्वेत वर्ण, गौर वर्ण, श्याम वर्ण, ताम्रवर्ण, रक्तवर्ण, पीतवर्ण - ऐसे लोग दुनिया के अलग अलग देशों में पाए जाते हैं। बाद में लोगों ने समझाया कि पश्चिमी जगत के रेसिज्म और भारत के वर्णभेद में अंतर है। भारत के वर्ण कथित ईश्वर के अलग अलग अंगों से उत्पन्न नस्लों को कहा जाता है, जिन्हें अलग अलग कार्य करने का निर्देश ईश्वर से ही प्राप्त है। किसी को सिर्फ मुंह और जबान चलाना है। किसी दूसरे को हाथ पैर यानी लात घूंसे चलाने है। किसी तीसरे को बस पेट भरना है और ला ला करना है और चौथे वर्ण को बाकी तीन के फैलाए रायते को समेटना है। चलो रंगभेद या वर्णभेद आधा अधूरा समझ लें या बिना समझे ही हां में हां मिला दें। लेकिन जातियां - इन्हें समझना मेरे तो बस की बात नहीं । कोई बता रहा था कि पैतृक व्यवसाय को औलादों द्वारा अपनाने से जातियां बन गईं। अब समस्या ये है कि व्यवसाय निरंतर बढ़ते जा रहे हैं और जातियों की सीमा, आई मीन, संख्या सरकार ने गजट से निर...