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फ़रवरी, 2024 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

किसानों से सहानुभूति रखिये

कुछ किसानों को आंदोलन में बड़े ट्रैक्टर्स या उम्दा कारों के साथ आते देख कर उनसे ईर्ष्या करने वालों को यह भी जानना जरुरी है कि २०२१ में हुए एक सर्वे के अनुसार भारत के अधिकतर किसानों की औसत आय १०२१८ रूपये प्रति माह है यानि १२२६१६ रूपये सालाना, जबकि भारत के लोगों की कुल औसत आय 138417 रूपए सालाना है. इस प्रकार  औसत किसान की औसत आय कुल भारतीयों की औसत आय से कम है।  क्या किसानों को समृद्ध और सुविधा संपन्न जीवन जीने का हक़ नहीं है? क्या उन्हें अपनी मेहनत का उचित मूल्य मांगने का हक़ नहीं है? आप प्रोसेस्ड फ़ूड खरीदते हैं, उसका मुनाफा प्रसंस्करण उद्योग में लगे उद्योगपतियों या फिर लॉजिस्टिक सेवा प्रदान करने वाली कंपनियों को होता है, किसान को क्यों नहीं होना चाहिए, दो रुपये का आलू जब चिप्स के पैकेट में बदलता है तो वह बीस रुपये का बिकता है। दस रुपये का गेहूं जब ब्रेड में बदल कर आपके पास पहुँचता है तो उसकी कीमत 50 रुपये हो जाती है। किसान और आपकी प्लेट के बीच चालीस रुपये कौन ले जाता है ? सोचिये और किसान की मांगों का समर्थन कीजिये। नहीं कर सकते तो कोई बात नहीं, कम से कम मंहगाई के लिए किसान को जिम...

Be Positive 1

एक भावना है, जिसे दम्भ, अहंकार, घमंड, गर्व,  दर्प, मान, अभिमान कई नामों से जाना जाता है। कुछ लोग गर्व और अभिमान को सकारात्मक मानते हैं लेकिन सच्चाई यही है कि नाम कुछ भी हो,  इन सभी की अभिव्यक्ति, देर सबेर  उद्दंडता में ही होती  है, इस लिए ये एक नकारात्मक भावना है । इस भावना के कारण मनुष्य एकाकी हो जाता है, वह मित्र नहीं बना पाता, और जो मित्र या रिश्तेदार होते भी हैं, वे धीरे धीरे दूर होने लगते हैं, ये भावना जिस मनुष्य में होती है वह अपने आसपास के वातावरण को भी संक्रमित करती है। उस व्यक्ति के साथ रहने को विवश लोग भी उसी भावना से ग्रसित होने लगते हैं, इस प्रकार ये एक संक्रामक रोग की तरह हानिकारक है। बच्चों पर ऐसी भावना का प्रभाव सबसे ज्यादा पड़ता है क्योंकि उनका विवेक तब तक विकसित नहीं हुआ होता कि वे इस भावना को और इसके दुष्परिणामों को समझ सकें। वे केवल अनुकरण करना जानते हैं। उनकी शिक्षा का मूल आधार उस उम्र में निरीक्षण और अनुकरण ही होता है, इस लिए बच्चे अपने माता पिता का अनुकरण करते हुए इस भावना को अंगीकार कर लेते हैं, ऐसे बच्चों के कोई मित्र नहीं बन पाते । इस भावना से...

किसान को सुनिए सरकार

दुनिया भर के आधा दर्जन से अधिक लोकतान्त्रिक देशों में किसान आंदोलनरत हैं और अपने ट्रैक्टर्स तथा अन्य उपकरणों के साथ, अपने परिवारों और चूल्हा चौके के साथ सड़कों पर हैं। लेकिन उन किसानों के साथ जैसा सुलूक भारत में हो रहा है, वैसा दुनिया में और कहीं नहीं हो रहा। किसान आंदोलनकारियों द्वारा पहले भी और अब भी जो प्रदर्शन किया है वह शांतिपूर्ण ही कहा जाएगा, हालांकि कभी कभी कुछ अराजक तत्व हर आंदोलन में घुस जाते हैं और कभी कभी सरकार रणनीति के तहत आंदोलनकारियों को बदनाम करने और आम जनता में आंदोलनकारियों के प्रति सहानुभूति को तोड़ने के लिए आंदोलनकारियों में छद्म उपद्रवी भी घुसा देती है।  आंदोलन अच्छा है या बुरा है, ये छोड़िये, आंदोलन की नौबत आती ही क्यों है।  किसान आंदोलन में प्रमुख मांग उनकी फसल का सही दाम मिलने, उपज की लागत कम करने के लिए इनपुट्स(बीज, उर्वरक, पेस्टीसिड्स, सिंचाई और डीजल व् बिजली ) की कीमतें नियंत्रित करने अथवा अनुदानित करने की ही रहती है। किसान बड़े गर्व से खाद्य सुरक्षा प्रदान करने के लिए अपनी पीठ ठोकती रहती है कि देश में किसी को भूखा नहीं रहने दिया जाता, देश के अस्सी करोड़...

Dirty Journalism

ये गलत पत्रकारिता है कि बलात्कार जैसे जुर्म से पीड़ित या जुर्म  करने वाले अत्याचारी की जाति या धर्म या उसकी राजनैतिक विचारधारा का उल्लेख किया जाए।  हर धर्म, हर जाति, हर राजनैतिक दल में आपराधिक मानसिकता के लोग हो सकते हैं। जब कोई कहता है कि अमुक जाति की लड़की के साथ बलात्कार हुआ, अपराधी अमुक जाति के बताये जाते हैं। तो ऐसा कहने वाले लोग चाहे वो पत्रकार हों, पुलिस या प्रशासनिक अधिकारी हों या राजनेता हों, मुझे वे सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने वाले नजर आते हैं। ऐसे लोग जातिगत, सम्प्रदायगत, और राजनीतिगत वैमनस्य बढ़ाने का सामाजिक और राष्ट्रीय  अपराध करते हैं और सत्ताधारी दल जो चाहे २०१४ से पहले के हों या बाद के, ऐसे अपराध को नजरअंदाज करते हैं।  मेरी राय है कि प्रिंट मीडिया और दृश्य श्रव्य मीडिया, तथा राजनेताओं और पुलिस व् प्रशासनिक अधिकारीयों को इस बात का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए कि घटना का प्रस्तुतीकरण किस प्रकार किया जाए ताकि अपराधी को किसी वर्ग का समर्थन न मिले, किसी वर्ग को अपमानित न महसूस होना पड़े।  जातीय और सांप्रदायिक हिंसा को छोड़ कर ज्यादातर अपराध व्यक्तिगत होते हैं ले...