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सहअस्तित्व

  ये सृष्टि संतुलन और सह-अस्तित्व के कारण टिकी हुई है। इसमें हर जीव असंख्य जीवों के साथ सहअस्तित्व के कारण ही टिका हुआ है। मनुष्य शरीर में लगभग 39 ट्रिलियन (39 लाख करोड़) सूक्ष्म जीव (microorganisms) पाए जाते हैं। ये मुख्य रूप से बैक्टीरिया , वायरस , फंगस , और आर्किया होते हैं। इन्हें सामूहिक रूप से माइक्रोबायोम (Microbiome) कहा जाता है। जब जब प्रकृति में सह-अस्तित्व के समायोजन का संतुलन बिगड़ता है, बवंडर आ जाता है। आंधी, तूफ़ान, सुनामी, भूकंप, अतिवृष्टि, भूस्खलन ,  हिमस्खलन ऐसे प्राकृतिक बवंडर हैं जो हमें चौंका देते हैं। हमारे शरीर में भी ऐसे बवंडर होते रहते हैं। इन शारीरिक बवंडरों को हम रक्तचाप ,  ज्वर ,  एलर्जी ,  इन्फ्लमेशन, आदि नामों से जानते हैं।   समाज में भी जाने अनजाने ऐसे बवंडर उठते रहते हैं, उन्हें समाजशास्त्रियों ने आंदोलन ,  दंगे ,  हिंसा, युद्ध और क्रांति जैसे नाम दे रखे हैं। आखिर में जब सब संतुलित हो जाता है, सब में सामंजस्य हो जाता है ,  सब सहअस्तित्व को स्वीकार कर लेते हैं तो व्यक्ति ,  समाज और सृष्टि स्वस्थ हो जात...

विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों में अंतर

 हर चिकित्सा पद्धति की अपनी विशिष्ट दृष्टिकोण और दर्शन होती है। आइए होमियोपैथी, यूनानी, आयुर्वेद और एलोपैथी के मौलिक अंतर को समझें: 1. होमियोपैथी (Homeopathy) फिलोसॉफी : "समान ही समान को ठीक करता है" (Like cures like)। शरीर की आत्म-चिकित्सा क्षमता को उत्तेजित करना। उपचार का आधार : रोगी के संपूर्ण लक्षणों को समझकर उपचार करना। अत्यधिक पतले और न्यूनतम मात्रा में दवाओं का उपयोग। लक्षण : दवाएं प्राकृतिक स्रोतों से बनती हैं। दवाएं व्यक्ति के शारीरिक और मानसिक पहलुओं को ध्यान में रखकर दी जाती हैं। 2. यूनानी चिकित्सा (Unani Medicine) फिलोसॉफी : ग्रीक चिकित्सा से उत्पन्न और "चार तत्वों" (आग, पानी, हवा, और मिट्टी) और "चार सजीव रसों" (खून, बलगम, पित्त, कफ) का संतुलन बनाए रखना। स्वास्थ्य और रोग शरीर के रसों के असंतुलन के कारण होते हैं। उपचार का आधार : रोगी के प्रकृति और शरीर के रसों का विश्लेषण। हर्बल औषधियों और प्राकृतिक तत्वों का उपयोग। लक्षण : आहार, जीवनशैली, और प्राकृतिक औषधियों पर जोर। रोग की जड़ तक पहुंचने का प्रयास। 3. आयुर्वेद (Ayurveda) फिलोसॉफी : "त्रिद...

एंगर मैनेजमेंट

“क्रोध” को हमारे संत महात्माओं ने छ: विकारों में गिना है। शेष पाँच विकारों के नाम हैं, काम, लोभ, मोह, भय और अहंकार। कुछ लोग पाँच विकार गिनाते हैं, वे अहंकार को विकारों में नहीं गिनते , अपितु अहं के पाँच दरबारियों के रूप में काम, क्रोध, लोभ, मोह और भय की गिनती करते हैं । कामना पूर्ण न हो तो क्रोध का जन्म होता है। हम चाहते हैं कि सब कुछ हमारे मन मुताबिक ही हो । मन मुताबिक न होने पर हमे क्रोध आ जाता है । लोभ पूरा न हो तब भी क्रोध आ सकता है। मोह भंग हो जाये तो भी क्रोध आ सकता है। कई बार कुछ खोने का भय प्रतिक्रियात्मक रूप में क्रोध की तरह व्यक्त हो जाता है। इस प्रकार पांचों विकार एक दूसरे को सपोर्ट करते हैं। आजकल विज्ञान का युग है और शरीर विज्ञान की एक शाखा में क्रोध का भी अध्ययन किया गया है, इसके अनुसार  क्रोध का मुख्य जनक अमिगडाला (Amygdala) नामक मस्तिष्क का भाग है। यह मस्तिष्क के लिम्बिक सिस्टम का हिस्सा है, जो हमारी भावनाओं और विशेष रूप से फाइट-या-फ्लाइट प्रतिक्रिया को नियंत्रित करता है। जब व्यक्ति किसी खतरे या तनाव का अनुभव करता है, तो अमिगडाला सक्रिय हो जाता है और शरीर में कई शा...