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सहअस्तित्व

  ये सृष्टि संतुलन और सह-अस्तित्व के कारण टिकी हुई है। इसमें हर जीव असंख्य जीवों के साथ सहअस्तित्व के कारण ही टिका हुआ है। मनुष्य शरीर में लगभग 39 ट्रिलियन (39 लाख करोड़) सूक्ष्म जीव (microorganisms) पाए जाते हैं। ये मुख्य रूप से बैक्टीरिया , वायरस , फंगस , और आर्किया होते हैं। इन्हें सामूहिक रूप से माइक्रोबायोम (Microbiome) कहा जाता है। जब जब प्रकृति में सह-अस्तित्व के समायोजन का संतुलन बिगड़ता है, बवंडर आ जाता है। आंधी, तूफ़ान, सुनामी, भूकंप, अतिवृष्टि, भूस्खलन ,  हिमस्खलन ऐसे प्राकृतिक बवंडर हैं जो हमें चौंका देते हैं। हमारे शरीर में भी ऐसे बवंडर होते रहते हैं। इन शारीरिक बवंडरों को हम रक्तचाप ,  ज्वर ,  एलर्जी ,  इन्फ्लमेशन, आदि नामों से जानते हैं।   समाज में भी जाने अनजाने ऐसे बवंडर उठते रहते हैं, उन्हें समाजशास्त्रियों ने आंदोलन ,  दंगे ,  हिंसा, युद्ध और क्रांति जैसे नाम दे रखे हैं। आखिर में जब सब संतुलित हो जाता है, सब में सामंजस्य हो जाता है ,  सब सहअस्तित्व को स्वीकार कर लेते हैं तो व्यक्ति ,  समाज और सृष्टि स्वस्थ हो जात...

विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों में अंतर

 हर चिकित्सा पद्धति की अपनी विशिष्ट दृष्टिकोण और दर्शन होती है। आइए होमियोपैथी, यूनानी, आयुर्वेद और एलोपैथी के मौलिक अंतर को समझें: 1. होमियोपैथी (Homeopathy) फिलोसॉफी : "समान ही समान को ठीक करता है" (Like cures like)। शरीर की आत्म-चिकित्सा क्षमता को उत्तेजित करना। उपचार का आधार : रोगी के संपूर्ण लक्षणों को समझकर उपचार करना। अत्यधिक पतले और न्यूनतम मात्रा में दवाओं का उपयोग। लक्षण : दवाएं प्राकृतिक स्रोतों से बनती हैं। दवाएं व्यक्ति के शारीरिक और मानसिक पहलुओं को ध्यान में रखकर दी जाती हैं। 2. यूनानी चिकित्सा (Unani Medicine) फिलोसॉफी : ग्रीक चिकित्सा से उत्पन्न और "चार तत्वों" (आग, पानी, हवा, और मिट्टी) और "चार सजीव रसों" (खून, बलगम, पित्त, कफ) का संतुलन बनाए रखना। स्वास्थ्य और रोग शरीर के रसों के असंतुलन के कारण होते हैं। उपचार का आधार : रोगी के प्रकृति और शरीर के रसों का विश्लेषण। हर्बल औषधियों और प्राकृतिक तत्वों का उपयोग। लक्षण : आहार, जीवनशैली, और प्राकृतिक औषधियों पर जोर। रोग की जड़ तक पहुंचने का प्रयास। 3. आयुर्वेद (Ayurveda) फिलोसॉफी : "त्रिद...

एंगर मैनेजमेंट

“क्रोध” को हमारे संत महात्माओं ने छ: विकारों में गिना है। शेष पाँच विकारों के नाम हैं, काम, लोभ, मोह, भय और अहंकार। कुछ लोग पाँच विकार गिनाते हैं, वे अहंकार को विकारों में नहीं गिनते , अपितु अहं के पाँच दरबारियों के रूप में काम, क्रोध, लोभ, मोह और भय की गिनती करते हैं । कामना पूर्ण न हो तो क्रोध का जन्म होता है। हम चाहते हैं कि सब कुछ हमारे मन मुताबिक ही हो । मन मुताबिक न होने पर हमे क्रोध आ जाता है । लोभ पूरा न हो तब भी क्रोध आ सकता है। मोह भंग हो जाये तो भी क्रोध आ सकता है। कई बार कुछ खोने का भय प्रतिक्रियात्मक रूप में क्रोध की तरह व्यक्त हो जाता है। इस प्रकार पांचों विकार एक दूसरे को सपोर्ट करते हैं। आजकल विज्ञान का युग है और शरीर विज्ञान की एक शाखा में क्रोध का भी अध्ययन किया गया है, इसके अनुसार  क्रोध का मुख्य जनक अमिगडाला (Amygdala) नामक मस्तिष्क का भाग है। यह मस्तिष्क के लिम्बिक सिस्टम का हिस्सा है, जो हमारी भावनाओं और विशेष रूप से फाइट-या-फ्लाइट प्रतिक्रिया को नियंत्रित करता है। जब व्यक्ति किसी खतरे या तनाव का अनुभव करता है, तो अमिगडाला सक्रिय हो जाता है और शरीर में कई शा...

एक देश एक साथ सारे चुनाव

 भारत एक देश है और एक देश में एक सरकार है तो हर पांच साल में चुनाव से सरकार चुन ही ली जाती है। पांच साल से पहले यदि सरकार गिर जाए और संसद उन्हीं चुने हुए सांसदों में से किसी एक को अपना बहुमत का नेता न चुन पाए तो मध्यावधि चुनाव की व्यवस्था भी संविधान ने कर राखी है।  भारत एक संघ है, राज्यों का संघ। तो हर राज्य की भी एक सरकार है और उस सरकार का भी हर पांच साल में चुनाव करने की ठीक वैसी ही व्यवस्था है जैसी केंद्र की सरकार के लिए है।  भारत सरकार में बैठे नेताओं को लगता है कि केंद्र सरकार और राज्य सरकारें के बीच नीतिगत और प्रणालीगत एक रूपता होनी चाहिए। यानि दोनों सरकारें एक ही पार्टी की होनी चाहिए तब ही विकास को गति मिलेगी और इसी लिए डबल इंजिन की सरकार का जुमला प्रचलन में आया।  अब अगर केंद्र सरकार के गठन और राज्य सरकार के गठन के लिए चुनावों के समय में इतना अंतर हो कि राज्य सरकार के काम काज से या केंद्र सरकार के काम काज से मतदाता नाराज हो क्योंकि मतदाता तो दोनों सरकारों का एक ही है, तो वह कभी केंद्र की नीतियों से या राज्य की नीतियों या कामकाज से नाराज हो सकता है, तो वह अपनी ...

मेरी पहचान क्या है ?

 आजकल कांवड़ियों के रास्ते में पड़ने वाले मार्गों पर स्थित दुकानों/रेस्तरां या भोजनालयों /ठेले वालों/खोमचे वालों आदि को दूकान के मालिकों का नाम और दूकान में काम करने वालों के नाम सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करने के सरकारी आदेश की बड़ी चर्चा है।  उत्तर प्रदेश सरकार का एक आदेश मुख्य रूप से कांवड़ियों यानि कथित हिन्दू तीर्थयात्रियों को, मुस्लिमों (कथित अपवित्र लोगों)से होने वाली शुचिता भंग की आशंका से बचाने के लिए दिया गया बताया जा रहा है। इससे किसी का तो हित हो ही रहा होगा वर्ना ऐसा आदेश क्यों लाया गया होता। या तो प्रशासनिक हित में या किसी राजनैतिक दल के हित  में या फिर किसी व्यापारी वर्ग के हित में ये आदेश हुआ है।  लेकिन क्या इस से देश का हित होता है? क्या इससे सामजिक सद्भाव बढ़ेगा ? क्या इससे जातीय/साम्प्रदायिक/धार्मिक एकता मजबूत होगी ? ये प्रश्न बुद्धिजीवियों के सामने उपस्थित हो गए हैं. इन पर गंभीर चिंतन किया जा सकता है, इन पर टीवी पर नयी  बहसें आयोजित कराई जा सकती हैं। क्या अब अपनी दुकानों / व्यापारिक संस्थानों के मालिकों को अपने संस्थानों के बड़े बड़े साईन बोर्ड्स पर...

Message on May Day

हे मेहनतकश इंसानों, हे दुनिया के मजदूरों।  अपनी कीमत पहचानो। न तो कोई पूँजी, और न कोई मशीन, बिना तुम्हारी मदद के कभी कोई बदलाव ला सकती है। लेकिन तुम ला सकते हो।  नेता और पूंजीपतियों की सांठगांठ तुम्हे बहलाने फुसलाने की हर कोशिश करती है ताकि तुम उन्हें सुख सुविधा के सारे साधन मुहैया कराते रहो। वे तुम्हें मरने भी नहीं देंगे, तुम्हें राशन देंगे, तुम्हे मुफ्त बिजली पानी, मुफ्त शिक्षा, मुफ्त चिकित्सा और भी न जाने क्या क्या देंगे लेकिन इफरात में कुछ भी नहीं देंगे, तुम्हें जिन्दा रहने लायक खाना देंगे, कुछ यूनिट की बिजली और कुछ लीटर पानी देंगे, अक्षर ज्ञान लायक शिक्षा देंगे और बस काम चलाऊ दवाएं देंगे। और खुद रोज खाना, बिजली , पानी, पेट्रोल, उतना बर्बाद करेंगे जितना तुमको देते हैं। इनके घरों में कई कई AC चलेंगे जिनमे एक दिन में  इतनी बिजली खर्च हो जायेगी जितनी आपको महीने भर में मुफ्त में देने का वादा करेंगे , इनके कार धोने और लॉन को सींचने में इतना पानी खर हो जाएगा जितना तुम्हे ये मुफ्त देने का वादा करेंगे, इनके बच्चों की एक महीने के स्कूल के फीस इतनी होगी जितनी आपके सारे बच्चों क...

व्यापार संसार को लील रहा है

सोशल मीडिया एक बहुत बड़ा मंच है। ये बड़ा इसलिए है कि यहां कोई भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पूरा पूरा लाभ उठा सकता है और उठा रहा है। इन मंचों के संचालकों ने आत्मानुशासन के लिए कुछ रेस्ट्रिक्शन्स रखी हुई हैं लेकिन ये रेस्ट्रिक्शन्स तभी काम में लाइ जाती हैं, जब कोई इन पर आपत्ति  दर्ज कराता है।  और ये जरुरी नहीं है कि हर आपत्ति पर मंच संचालक रेस्ट्रिक्शन लागू ही करे। कई बार उनका आपत्ति करने वाले को जवाब आता है कि उनके स्टैंडर्ड्स के अनुसार कंटेंट आपत्तिजनक नहीं पाया गया।  अब ये स्टैण्डर्ड कौन बनाता है। हर देश/प्रदेश/समाज के अपने अपने स्टैंडर्ड्स होते हैं, अपने अपने सामजिक नियम और परम्पराएं होती हैं। मंच संचालक जिस देश में बैठे हैं, वे उस देश के स्टैंडर्ड्स को दुनिया भर में थोप रहे होते हैं।  ये सांस्कृतिक आक्रमण/अतिक्रमण जैसा समझिये। अमेरिका में बैठे लोग अपने स्टैंडर्ड्स सारी दुनिया पर थोप रहे हैं क्यों कि फेसबुक, ट्विटर/x , व्हाट्सप्प, इंस्टाग्राम, टेलीग्राम सब का सञ्चालन अमेरिका से हो रहा है।  अच्छा लगता है कि हमें अपनी अभिव्यक्ति के लिए एक बड़ा मंच मिल जाता है और ...

सर्वोच्च निर्णय की आलोचना तो हो सकती है लेकिन पालन करना जरुरी है

आम तौर पर जब भी किसी न्यायालय, विशेषकर सर्वोच्च न्यायालय से कोई निर्णय आता है तो परंपरागत रूप से सभी, और विशेषकर उच्च पदासीन लोग अपनी प्रतिक्रिया यही कहा कर देते हैं कि "हम न्यायालय के आदेश/निर्णय का सम्मान करते हैं।" लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तो विकास पुरुष हैं, वे परम्पराओं को तोड़ने का साहस रखते हैं। इसलिए उन्होंने कहा," जो लोग आज इलेक्टोरल बांड्स की व्यवस्था को गलत बताकर खुश हो रहे हैं, जल्द ही पछतायेंगे। "  अब उनका ये सन्देश किस के लिए है और किस भावना से जारी किया गया है , ये तो वही जानें। लेकिन कुछ भक्त टाइप लोग इसे याचिका डालने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं / प्रशांतभूषण जैसे वकीलों, न्यायालय में निर्णय देने वाली बेंच के सदस्यों, यहाँ तक कि मुख्य न्यायाधीश को भी सम्बोधित मान रहे हैं और इंतजार कर रहे हैं कि भगवान राम के तरकश से तीर किस पर चलेगा।  मुख्य न्यायाधीश एक वक्तव्य में खुद कह चुके हैं कि जब न्यायालय कोई निर्णय जारी करता है तो वह निर्णय पब्लिक प्रॉपर्टी बन जाता है। और जनता को उस निर्णय की समीक्षा करने, उस पर अपनी राय देने का हक़ होता है। निर्णय का पालन ...

भारत सरकार की CAA नियमावली

भारत में राज्यों को किसी को नागरिकता प्रदान करने का अधिकार नहीं है। नागरिकता प्रदान करना भारत सरकार का अधिकार है। इसलिए ममता बनर्जी का ये कहना कि वह बंगाल में CAA लागू नहीं होने देंगी, मूर्खतापूर्ण राजनैतिक बयानबाजी से अधिक कुछ नहीं है। भारत में कुछ पडोसी देशों से आये शरणार्थीगण को नागरिकता प्रदान करना भारत सरकार के चुनावी घोषणाओं का लंबित विषय था, जिसे उसने अब पूरा कर दिया। इसके राजनैतिक उद्देश्य कुछ भी हों लेकिन ये एक समस्या का समाधान है, इसलिए इसका स्वागत है। यद्यपि कुछ लोग दुष्प्रचार करेंगे कि ये एक संप्रदाय की नागरिकता छीनने की और पहला कदम है. लेकिन घोषित नागरिकता नियमावली केवल बाहर से आने वालों को नागरिकता देने की प्रक्रिया तय करती है न कि भारत में रह रहे भारत के पूर्व से नागरिकों के लिए। इसलिए भारतीय मुस्लिमों को ऐसे दुष्प्रचार के प्रभाव में नहीं आना चाहिए।  भारत का संविधान धर्म और जाति के आधार पर भेदभाव की अनुमति नहीं देता, इसलिए इस नियमावली/अधिनियम पर भेदभाव का आरोप भी लगेगा। अच्छा होता कि धार्मिक पहचान और कुछ देशों के नाम इस एक्ट / नियमावली में न होते और सिर्फ ये प्राविधा...

परिवर्तन ही सृष्टि का मूल स्वभाव है

वास्तव में चेतना ही सारी सृष्टि का मूल है। समस्त जड़ पदार्थ (जो प्रत्यक्ष में जड़ प्रतीत होते हैं) में भी चेतना है, यह विज्ञान प्रमाणित कर चुका है। हर जड़ पदार्थ जिन अणुओं / परमाणुओं से बना है, उनमें भी भीतर ही भीतर गति होती रहती है। परमाणुओं और अणुओं का संयोग होता रहता है, नए यौगिक बनते रहते हैं। गति का मापन केवल परिवर्तन के माध्यम से होता है। इसका सीधा सा तात्पर्य है कि चेतना का प्रभाव निरंतर परिवर्तन है। अगर परिवर्तन नहीं होगा तो हम चेतना को नाप नहीं पाएंगे।  समस्त ब्रह्माण्ड में हर पिंड, चाहे वो इलेक्ट्रॉन जितना सूक्ष्म पिंड हो या किसी गृह या आकाशगंगा जैसा कोई विशाल पिंड, सभी गतिमान हैं और परिवर्तन के अधीन हैं। इसलिए आप भी चाहे अनचाहे परिवर्तन के अधीन हैं। एक शिला जो नदी के बीच में खड़ी है, देखने में अडिग लग सकती है, परिवर्तन से अप्रभावित लग सकती है। लेकिन जो लोग जानते हैं कि रसरी आवत जात से सिल पर पडत निसान, वे ये भी जानते हैं कि बहती हुई जल धारा नदी में खड़ी शिला को भी धीरे धीरे चिकना कर रही है , धीरे धीरे सरका रही है। हमारे भूमण्डल पर तैरते हुए द्वीप और महाद्वीप भी एक विशालकाय शि...

किसानों से सहानुभूति रखिये

कुछ किसानों को आंदोलन में बड़े ट्रैक्टर्स या उम्दा कारों के साथ आते देख कर उनसे ईर्ष्या करने वालों को यह भी जानना जरुरी है कि २०२१ में हुए एक सर्वे के अनुसार भारत के अधिकतर किसानों की औसत आय १०२१८ रूपये प्रति माह है यानि १२२६१६ रूपये सालाना, जबकि भारत के लोगों की कुल औसत आय 138417 रूपए सालाना है. इस प्रकार  औसत किसान की औसत आय कुल भारतीयों की औसत आय से कम है।  क्या किसानों को समृद्ध और सुविधा संपन्न जीवन जीने का हक़ नहीं है? क्या उन्हें अपनी मेहनत का उचित मूल्य मांगने का हक़ नहीं है? आप प्रोसेस्ड फ़ूड खरीदते हैं, उसका मुनाफा प्रसंस्करण उद्योग में लगे उद्योगपतियों या फिर लॉजिस्टिक सेवा प्रदान करने वाली कंपनियों को होता है, किसान को क्यों नहीं होना चाहिए, दो रुपये का आलू जब चिप्स के पैकेट में बदलता है तो वह बीस रुपये का बिकता है। दस रुपये का गेहूं जब ब्रेड में बदल कर आपके पास पहुँचता है तो उसकी कीमत 50 रुपये हो जाती है। किसान और आपकी प्लेट के बीच चालीस रुपये कौन ले जाता है ? सोचिये और किसान की मांगों का समर्थन कीजिये। नहीं कर सकते तो कोई बात नहीं, कम से कम मंहगाई के लिए किसान को जिम...

Be Positive 1

एक भावना है, जिसे दम्भ, अहंकार, घमंड, गर्व,  दर्प, मान, अभिमान कई नामों से जाना जाता है। कुछ लोग गर्व और अभिमान को सकारात्मक मानते हैं लेकिन सच्चाई यही है कि नाम कुछ भी हो,  इन सभी की अभिव्यक्ति, देर सबेर  उद्दंडता में ही होती  है, इस लिए ये एक नकारात्मक भावना है । इस भावना के कारण मनुष्य एकाकी हो जाता है, वह मित्र नहीं बना पाता, और जो मित्र या रिश्तेदार होते भी हैं, वे धीरे धीरे दूर होने लगते हैं, ये भावना जिस मनुष्य में होती है वह अपने आसपास के वातावरण को भी संक्रमित करती है। उस व्यक्ति के साथ रहने को विवश लोग भी उसी भावना से ग्रसित होने लगते हैं, इस प्रकार ये एक संक्रामक रोग की तरह हानिकारक है। बच्चों पर ऐसी भावना का प्रभाव सबसे ज्यादा पड़ता है क्योंकि उनका विवेक तब तक विकसित नहीं हुआ होता कि वे इस भावना को और इसके दुष्परिणामों को समझ सकें। वे केवल अनुकरण करना जानते हैं। उनकी शिक्षा का मूल आधार उस उम्र में निरीक्षण और अनुकरण ही होता है, इस लिए बच्चे अपने माता पिता का अनुकरण करते हुए इस भावना को अंगीकार कर लेते हैं, ऐसे बच्चों के कोई मित्र नहीं बन पाते । इस भावना से...

किसान को सुनिए सरकार

दुनिया भर के आधा दर्जन से अधिक लोकतान्त्रिक देशों में किसान आंदोलनरत हैं और अपने ट्रैक्टर्स तथा अन्य उपकरणों के साथ, अपने परिवारों और चूल्हा चौके के साथ सड़कों पर हैं। लेकिन उन किसानों के साथ जैसा सुलूक भारत में हो रहा है, वैसा दुनिया में और कहीं नहीं हो रहा। किसान आंदोलनकारियों द्वारा पहले भी और अब भी जो प्रदर्शन किया है वह शांतिपूर्ण ही कहा जाएगा, हालांकि कभी कभी कुछ अराजक तत्व हर आंदोलन में घुस जाते हैं और कभी कभी सरकार रणनीति के तहत आंदोलनकारियों को बदनाम करने और आम जनता में आंदोलनकारियों के प्रति सहानुभूति को तोड़ने के लिए आंदोलनकारियों में छद्म उपद्रवी भी घुसा देती है।  आंदोलन अच्छा है या बुरा है, ये छोड़िये, आंदोलन की नौबत आती ही क्यों है।  किसान आंदोलन में प्रमुख मांग उनकी फसल का सही दाम मिलने, उपज की लागत कम करने के लिए इनपुट्स(बीज, उर्वरक, पेस्टीसिड्स, सिंचाई और डीजल व् बिजली ) की कीमतें नियंत्रित करने अथवा अनुदानित करने की ही रहती है। किसान बड़े गर्व से खाद्य सुरक्षा प्रदान करने के लिए अपनी पीठ ठोकती रहती है कि देश में किसी को भूखा नहीं रहने दिया जाता, देश के अस्सी करोड़...

Dirty Journalism

ये गलत पत्रकारिता है कि बलात्कार जैसे जुर्म से पीड़ित या जुर्म  करने वाले अत्याचारी की जाति या धर्म या उसकी राजनैतिक विचारधारा का उल्लेख किया जाए।  हर धर्म, हर जाति, हर राजनैतिक दल में आपराधिक मानसिकता के लोग हो सकते हैं। जब कोई कहता है कि अमुक जाति की लड़की के साथ बलात्कार हुआ, अपराधी अमुक जाति के बताये जाते हैं। तो ऐसा कहने वाले लोग चाहे वो पत्रकार हों, पुलिस या प्रशासनिक अधिकारी हों या राजनेता हों, मुझे वे सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने वाले नजर आते हैं। ऐसे लोग जातिगत, सम्प्रदायगत, और राजनीतिगत वैमनस्य बढ़ाने का सामाजिक और राष्ट्रीय  अपराध करते हैं और सत्ताधारी दल जो चाहे २०१४ से पहले के हों या बाद के, ऐसे अपराध को नजरअंदाज करते हैं।  मेरी राय है कि प्रिंट मीडिया और दृश्य श्रव्य मीडिया, तथा राजनेताओं और पुलिस व् प्रशासनिक अधिकारीयों को इस बात का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए कि घटना का प्रस्तुतीकरण किस प्रकार किया जाए ताकि अपराधी को किसी वर्ग का समर्थन न मिले, किसी वर्ग को अपमानित न महसूस होना पड़े।  जातीय और सांप्रदायिक हिंसा को छोड़ कर ज्यादातर अपराध व्यक्तिगत होते हैं ले...

Keep quiet

"चुप बैठो"  अगर आप अपने बच्चों को ये निर्देश देने की आदत पाल बैठे हैं तो इसे तुरंत बदल डालिये। पहले हम बच्चे को बोलना सिखाते हैं। जब वो माँ , मामा, म्मा या पा, पापा बोलता है तो हम बहुत खुश होते हैं। हम बार बार उसे बोलने को प्रेरित करते हैं। फिर हम उसे दो पैरों पर चलना सिखाते हैं, ऊँगली पकड़ कर चलवाते हैं, मेज के सहारे से चलवाते हैं उसके लिए वॉकर, गडूलना लाते हैं, किसी प्रकार उसे चलने का अभ्यास करवाते हैं।  बच्चे जब बोलना और चलना सीख जाते हैं तो उनकी जिज्ञासा जागृत हो जाती है वो हर वस्तु को पहुँच में लाना चाहता है, हर शब्द को दोहराना चाहता है और जब वो आपकी तरह हर वस्तु तक पहुँच कर उसे पकड़ कर देखना चाहता है तो अपनी उपलब्धि पर बहुत प्रसन्न भी होता है। वो आपके शब्द दोहराता है। अगर आप गाली के शब्दों का प्रयोग करता है तो वो भी वैसा ही बोलता है या बोलने की कोशिश करता है। शुरू शुरू में आप को भी मजा आता है। लेकिन जैसे जैसे वो बड़ा होता जाता है , आपको उसका ज्यादा चलना और ज्यादा बोलना अखरने लगता है। तो आप की डांट के दो शब्द उसे हतप्रभ कर देते हैं, डरा देते हैं, यही वे शब्द हैं "चुप ब...

Life एंड Universe

एक नाभिक(nucleus) है, उसके चारों ओर कुछ सूक्ष्म पिंड चक्कर काट रहे हैं, उस चक्कर वाले रस्ते को ऑर्बिट कहते हैं। एक को अनेक से बदल दीजिये। अनेक नाभिक हैं, और हर नाभिक के चारों ओर अनेकों सूक्ष्म पिंड अलग अलग ओर्बिट्स में घूम रहे हैं। परमाणु से लेकर सूर्य तक के बारे में अभी तक लोग इस तथ्य को स्वीकार कर चुके हैं। लेकिन सूर्य भी तो किसी सिस्टम का हिस्सा है, उस सिस्टम को आप गैलेक्सी (आकाश गंगा )का नाम दे सकते हैं। वो गैलेक्सी एक अकेली गैलेक्सी नहीं हैं, ऐसी अनगिनत गैलेक्सीज हैं।  और हर गैलेक्सीज में असंख्य तारे हैं जैसे कि आकाश गंगा के अनगिनत तारों में से एक तारा सूर्य है। और हर तारे के चारों ओर घूमने वाले जाने कितने ग्रह हैं जैसे कि सूर्य के चारों और घूमने वाले पृथ्वी सहित कम से कम नौ ग्रहों की पहचान मनुष्य ने भी कर रखी है। हर ग्रह के चारों ओर भी कितने ही उपग्रह घूम रहे हैं. शनि ग्रह के उपग्रहों की तो सही से अभी गिनती भी नहीं हुई है। तो हर पिंड एक नाभिक है, उसके चारों ओर घूमने वाले अनेकों अन्य पिंड हैं। और ये सूक्ष्म स्तर पर हमारे ज्ञान की सीमा में परमाणु से लेकर सूर्य तक ही हमें ज्ञात ...