हमारे एक प्रतिष्ठित पत्रकार श्री शम्भुनाथ शुक्ल जी , बड़े बिंदास किस्म के व्यक्ति हैं, उनसे बहतु कुछ सीखने को मिलता है, अभी हाल ही में उन्होंने विभिन्न भाषाओं पर अपनी पकड़/समझ पर एक पोस्ट डाली तो मुझे भी लगा कि ये विषय भी अच्छा है, और उनसे प्रेरित होकर मैं भी आज भाषा सम्बन्धी अपनी समझ के बारे में ये पोस्ट लिखने का साहस कर रहा हूँ। मेरा जन्म हस्तिनापुर और कुरुक्षेत्र के बीच स्थित वार्नावृत (आजकल इसे बरनावा कहते हैं) के आसपास के क्षेत्र में हुआ था, इस इलाके की भाषा खड़ी हिंदी में भी सबसे खड़ी मानी जाती है। साधारण बातचीत में भी लोग ऐसे बात करते हैं कि सुनने वाला यही समझे कि ये लड़ रहे हैं। इसका एहसास मुझे दो बार हुआ। एक बार इलाहाबाद विश्विद्यालय में जब रैगिंग के दौरान मुझे से अपने इलाके की बोली में बात करने को कहा गया और दूसरे जब मेरी पत्नी ने मेरे गाँव में पहली बार हम लोगों को हाई टोन में बात करते सुना और घबरा गयी। तो तात्पर्य ये कि मैं हिंदी भाषी हूँ और हिंदी की खड़ी बोली को ठीक से समझता हूँ। लखनऊ, बलिया, इलाहाबाद, कानपूर, इटावा, झांसी, आगरा, हाथरस, मुरादाबाद आदि स्थानो...