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सितंबर, 2023 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

भाषा पर मेरी पकड़

 हमारे एक प्रतिष्ठित पत्रकार श्री शम्भुनाथ शुक्ल जी , बड़े बिंदास किस्म के व्यक्ति हैं, उनसे बहतु कुछ सीखने को मिलता है, अभी हाल ही में उन्होंने विभिन्न भाषाओं पर अपनी पकड़/समझ पर एक पोस्ट डाली तो मुझे भी लगा कि ये विषय भी अच्छा है, और उनसे प्रेरित होकर मैं भी आज भाषा सम्बन्धी अपनी समझ के बारे में ये पोस्ट लिखने का साहस कर रहा हूँ।  मेरा जन्म हस्तिनापुर और कुरुक्षेत्र के बीच स्थित वार्नावृत (आजकल इसे बरनावा कहते हैं) के आसपास के क्षेत्र में हुआ था, इस इलाके की भाषा खड़ी हिंदी में भी सबसे खड़ी मानी जाती है। साधारण बातचीत में भी लोग ऐसे बात करते हैं कि सुनने वाला यही समझे कि ये लड़ रहे हैं। इसका एहसास मुझे दो बार हुआ। एक बार इलाहाबाद विश्विद्यालय में जब रैगिंग के दौरान मुझे से अपने इलाके की बोली में बात करने को कहा गया और दूसरे जब मेरी पत्नी ने मेरे गाँव में पहली बार हम लोगों को हाई टोन  में बात करते सुना और घबरा गयी।  तो तात्पर्य ये कि मैं हिंदी भाषी हूँ और हिंदी की खड़ी बोली को ठीक से समझता हूँ। लखनऊ, बलिया, इलाहाबाद, कानपूर, इटावा, झांसी, आगरा, हाथरस, मुरादाबाद आदि स्थानो...

Knowledge is One, people see it divided

भारत सहित बहुत से देशों में , ज्ञान को विभाजित करके देखने की प्रथा सी बन गयी है। आर्ट स्ट्रीम, साइंस स्ट्रीम, मैथमेटिक्स स्ट्रीम, बायो स्ट्रीम, मेडिकल साइड, इंजीनियरिंग साइड, वगैरा वगैरा नाम से बच्चों को विषय चुनने के लिए दिए जाते हैं। जब कि ज्ञान एक समुच्चय है सब का मिला जुला। लेकिन अफ़सोस हमारे देश में तो विषय भेद भी लिंग भेद और व्यवसाय भेद यहाँ तक कि आर्थिक स्तर के भेदभाव का शिकार होते हैं। व्यक्ति कितना भी मेधावी हो लेकिन अगर वो गरीब है तो वो डॉक्टर बनने या इंजिनियर बनने की सोच भी नहीं सकता। कोचिंग व्यवसाय में भी इतनी मुश्किलें हैं कि कोचिंग कराने वाले भी छात्र की आर्थिक हैसियत को ध्यान में रखकर उसे सलाह देते हैं कि वो पुलिस में सिपाही, या फ़ौज का सिपाही बनने की तैयारी करे या क्लेरिकल जॉब को अपना सपना बनाये। गाँव में रहने वाले अधिकांश युवा बड़ा सपना इसीलिए नहीं देख सकते कि उनके घरवाले आर्थिक रूप से सक्षम नहीं हैं।  गाँवों में जो लोग दसवीं पास कर लेते हैं ( यद्यपि विषयों का चयन कक्षा ९ से ही शुरू हो जाता है और अधिकांश लड़कियों को गणित के लिए अक्षम मान कर उन्हें कक्षा ९ में गणित से द...

माता-पिता और बच्चे

हमारे बच्चे जिन्हें हम बड़े लाड प्यार से पालते हैं उनकी हर जरूरत का ध्यान रखते हैं, बीमार हो कर भी हम कभी उनके सामने लाचार या असहाय नहीं प्रदर्शित करते। हर संकट को मैनेज करके उनके सामने एक आदर्श स्थापित करते हैं , तो हमारे बच्चों की नज़र में हम दुनिया के सबसे अच्छे माँ या सबसे अच्छे बाप बन जाते हैं।  हमारे बच्चों को लगता है कि हम जीवन भर उनके लिए उसी प्रकार प्रोटेक्शन देते रहेंगे जैसे देते आये हैं, हम उनकी नज़र में साहसी, आत्मनिर्भर, खुद्दार, जूझने वाले बन जाते हैं जो किसी भी मुसीबत का सामना आसानी से कर लेता है।  लेकिन समय तो अपना असर दिखाता है।  हम बूढ़े हो जाते हैं , परिस्थितियों वश हमारे बच्चे उस समय तक दूर हो चुके होते हैं लेकिन उनकी नज़र में हम अभी भी आत्मनिर्भर, साहसी, खुद्दार और कुशल प्रबंधक बने रहते हैं और केयरिंग भी।  इसलिए यदि कभी हमारे बच्चों को कभी अपने पारिवारिक दिक्क्तों में (अपने बच्चे पालने में, घर की देखभाल में , अपनी नौकरी के समय प्रबंधन में) हमारी याद आती है तो सिर्फ इसीलिए कि उन्हें अभी भी हमारी क्षमताओं पर भरोसा ज्यों का त्यों बना हुआ है, उन्होंने हमा...

न्यायालयों की टिप्पणियां

 हाल ही में एक उच्च न्यायलय ने एक निर्णय में टिप्पणी की "लिवइन रिलेशनशिप शादी जैसी सामाजिक संस्था को बर्बाद कर रहा है" किसी भी मामले में जब न्याय का द्वार खटखटाया जाता है तो उसमे मामले की कानूनी पड़ताल करना और क़ानून के दायरे में फैसला प्राप्त करना ही अपेक्षित होता है। लेकिन न्याय की पीठ पर बैठे लोग हैं तो इंसान ही, इंसान होने के नाते उनकी व्यक्तिगत रुचियाँ और धारणाएं भी होंगी। लेकिन एक अच्छा न्यायाधीश वही है जो अपने निर्णयों को व्यक्तिगत रुचियों और धारणाओं से प्रभावित न होने दे।  मेरी दृष्टि में माननीय न्यायाधीश द्वारा उपर्युक्त टिप्पणी बिलकुल अनावश्यक थी।  ऐसी अनेकों टिप्पणियां आप लोग भी सुनते रहे होंगे, जैसे राजस्थान के एक जज साहब ने एक बार मोर-मोरनी के गर्भ धारण के लिए एक हास्यास्पद  और अनावश्यक टिप्पणी कर दी थी, मोरनी मोर के आंसू पी कर गर्भवती हो जाती है। चाहे ऐसा हो या न हो, ये लोगों का विश्वास हो सकता है लेकिन ये बिलकुल अनावश्यक टिप्पणी थी।  सर्वोच्च न्यायालय को सभी न्यायाधीशों को ऐसी सलाह जरूर देनी चाहिए कि वे अपनी व्यक्तिगत धारणाओं और रुचियों को न्यायिक क...

आप प्रतिक्रिया क्यों नहीं देते, क्योंकि आप वो हैं ही नहीं

 जो था नहीं उसे पूजा गया, जो है नहीं उसे पूछा गया ———————————————————— रिपोर्टर उस आदमी से पूछ रहा था कि भाई, किसी शुक्ला जी ने आपके सिर पर पेशाब कर दिया तो आपको वो वीडियो देख कर बुरा नहीं लगा?  “क्यों लगेगा? जब मैं वो हूं ही नहीं, जो वीडियो में है तो मुझे बुरा क्यों लगेगा?” “आप वो नहीं हैं?” “मुझे तो बिल्कुल याद नहीं कि वो मैं हूं या किसी ने मेरे सिर पर कभी पेशाब किया था।” “फिर सरकार ने आपको अपने घर बुला कर आपके पांव पखारे। आपकी तस्वीर देश भर में जारी की गई। कहा गया कि अब सिर पर पेशाब का पाप धुल गया है। सुना कि आपको कुछ इनाम वगैरह भी मिला है। फिर वो क्या था?” “साहब, हमें नहीं मालूम। वो तो एसपी साहब, कलेक्टर साहब ने मुझे बताया कि वो तुम्हीं हो जिसके सिर पर शुक्ला ने पेशाब किया था। तुम चलो सरकार के बंगले पर। तुम्हारा सम्मान किया जाएगा। तुम्हें इनाम मिलेगा। तुम मशहूर हो जाओगे, तो मैं चला गया।” कमाल है, आदमी ही बदल दिया गया। और वाहवाही लूट ली गई? सरकार के लिए कुछ भी बदल देना कौन-सी बड़ी बात है।  छोड़िए ये तो उस युवक के एक टीवी इंटरव्यू का हिस्सा है, जिसे मध्य प्रदेश में सिर ...

अरे सत्ताधारियों , मतदाताओं का अपमान मत करो

 भारत के मतदाता अंधे और बहरे समझ लिए गए हैं।  उन्हें बताया जाता है कि कांग्रेस एक परिवार की पार्टी है, इस परिवारवादी को भ्रष्टाचार का भी स्रोत बताया जाता है।  भारत के लोग नहीं जानते कि बीजेपी में कोई नेता ऐसा भी हो सकता है, जिसके माता, पिता, बहन, भाई, पति, पत्नी आदि कोई भी रिश्तेदार राजनीती में हो, क्योंकि बीजेपी तो परिवारवाद के विरुद्ध है।  भारत के लोग नहीं जानते कि इलेक्टोरल बांड की व्यवस्था ऐसी बनायी गयी है कि कोई भी कम्पनी कितना भी चंदा किसी पार्टी को दे सकती है और उसे उस पार्टी का नाम या दी गयी धनराशि प्रकट नहीं किया जाएगी। भारत के लोग नहीं जानते कि देश के एक अकेले बीजेपी दल को अन्य सभी दलों को कुल मिले चंदे से तीन गुने से भी अधिक चंदा मिलता है। और भारत के लोग ये भी नहीं जानते कि सत्ताधारियों को मिलने वाला चंदा कोई कम्पनी क्यों देती है और बदले में क्या पाती है। 

नेपोटिस्म इन इंडिया

 क्या भारतीय उपमहाद्वीप में आप किसी व्यक्ति को परिवारवाद से मुक्त मान सकते हैं? क्या इस उप महाद्वीप में भ्रष्टाचार वास्तव में कोई मुद्दा है? क्या इस महाद्वीप में स्त्री हो या पुरुष, बेटा , बहु, सास ससुर, दामाद, भाई बहन, अडोसी पडोसी सब एक दूसरे की तुष्टिकरण के लिए संकल्पबद्ध नहीं ? मोदी जी पता नहीं क्यों भारतीय मानसिकता को नहीं समझ पा रहे हैं? असल में वो सीधे सीधे नाम लेने से बचते हैं, वो कहना ये चाहते हैं कि नेहरू, इंदिरा, राजीव, और अब राहुल को पार्टी में मुख्य चेहरा समझने वाली पार्टी यानि कांगेस एक परिवार की पार्टी है, और भ्रष्टाचार तथा मुस्लिमों और दलितों को तुष्टिकरण की नीतियों से रिझा कर बरसों से सत्ता पर काबिज रही है।  इसलिए मोदी जी के अनुयायी गण  भ्रमित न हों, उन्हें बीजेपी में शामिल नेताओं के परिवारवादी होने, या भ्रष्ट होने अथवा अपने वोटबैंक के लिए तुष्टिकरण की नीतियां अपनाने में कोई ऐतराज न था और न होगा।  उनके भाषणों से कुछ विरोधी लोग बेकार ही चिल पों मचाने लगते हैं, इसलिए मैंने उनको समझने के लिए ये पोस्ट लिख दी है। आप जब चाहे बीजेपी ज्वाइन कर लें, आप से नहीं...

यूनिफार्म सिविल कोड बनाम हिन्दू कोड बिल

१९५५ में हिन्दू कोड बिल पारित होने से पहले के हिन्दू परिवारों में पुरुषों को बहुपत्नी रखने पर कोई प्रतिबंध नहीं था। हिन्दू कोड बिल को तैयार करने में डॉक्टर भीम राव आंबेडकर की बड़ी भूमिका रही थी, उन्होंने स्वयं हिन्दू धर्म में खुद पर और अनेकों महिलाओं पर हुए भेदभाव को महसूस किया था इसलिए वे इसमें बड़े बदलाव के पक्षधर थे, लेकिन हिन्दू महासभा और कांग्रेस के भी कई वरिष्ठ नेता डॉ  आंबेडकर द्वारा प्रस्तावित हिन्दू कोड बिल के विरोध में थे. डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद, श्यामा प्रसाद मुखर्जी , सरदार पटेल, इस विरोध में अधिक मुखर थे और जवाहर लाल नेहरू इस कोड के पक्ष में होते हुए भी सबको साथ लेकर चलने की कोशिश में इस कोड को थोड़ा कमजोर रखने के पक्ष में थे इस बात से नाराज डॉ आंबेडकर ने कानून मंत्री के पद से इस्तीफ़ा भी दे दिया।  आज यूनिफार्म सिविल कोड की चर्चा जोर पकड़ रही है, नेहरू की ही तरह मोदी जी की भी परीक्षा है, हिन्दू कोड बिल की चर्चा ने हिन्दुओं के कमजोर वर्ग यानि महिलाओं और दलितों में नेहरू की लोकप्रियता बढ़ा दी थी, और पहले आम चुनाव में उन्हें इतना मजबूत नेता बना दिया था कि उन्होंने हिन्दू क...