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गोगा वीर / गोगापीर

भारत में इतिहास लेखन कितना वैज्ञानिक है और कितना ये लोककथाओं से प्रभावित होता है, इसका एक अच्छा उदाहरण आप आल्हाऊदल के सम्बन्ध में लोकगीतों में देख सकते हैं। आल्हा और ऊदल चंदेल राजाओं (बुंदेलखंड के एक भाग के शाशको)के वीर सैनिक थे जिनके यशगान में आल्हाखण्ड लिखा गया। इसे पढ़ / सुनकर लगता है कि वे तो गज़ब के पराक्रमी लोग थे जब कि इतिहास में उनका बहुत संक्षिप्त उल्लेख मिलता है। ऐसे ही एक महान देवता हैं जो मात्र डेढ़ हजार वर्ष पहले किसी छोटी सी रियासत के राजा थे- गोगा, उनके बारे में इतिहास में बहुत कुछ नहीं मिलता लेकिन उन्हें एक विशाल जन समुदाय एक देवता की तरह आज भी पूजता है। गोगा पीर या गोगा चौहान (गोगाजी) हैं, जो विशेष रूप से राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में लोकदेवता के रूप में पूजे जाते हैं। इन्हें जहार वीर और जहार पीर के नाम से भी पुकारा जाता है। गोगाजी का जन्म 10वीं या 11वीं शताब्दी में चौहान वंश में हुआ था। उनके पिता जीवराज चौहान और माता बच्छल देवी थीं। वे वर्तमान राजस्थान के गोगामेड़ी (हनुमानगढ़) क्षेत्र के शासक थे। उनके जन्म के समय यह भविष्यवाणी की गई थी क...

पर्यावरण पर झूठी चिंता

जलवायु परिवर्तन: जब अपराधी नियम बनाते हैं और दुनिया सज़ा भुगतती है जलवायु परिवर्तन को अब भी यदि “प्राकृतिक संकट” कहा जाता है, तो यह एक सुविधाजनक झूठ से अधिक कुछ नहीं। यह संकट प्राकृतिक नहीं, बल्कि योजनाबद्ध, लाभ-केन्द्रित और सत्ता-संरक्षित मानवीय गतिविधियों का परिणाम है। इसके बावजूद, विडंबना यह है कि जिन देशों और उद्योगों की भूमिका इस विनाश में निर्णायक रही है, वही आज वैश्विक मंचों पर सबसे अधिक नैतिक भाषण देते दिखाई देते हैं — और वास्तविक प्रतिबंधों से उतनी ही कुशलता से बच निकलते हैं। बीते एक शताब्दी में औद्योगिक समृद्धि का जो मॉडल विकसित हुआ, वह सस्ते संसाधनों, असीमित उपभोग और पर्यावरणीय लागत की उपेक्षा पर आधारित था। इस विकास का लाभ कुछ मुट्ठी भर देशों और कॉरपोरेट घरानों को मिला, लेकिन इसकी कीमत पूरी पृथ्वी चुका रही है। समुद्र का बढ़ता स्तर, असामान्य मौसम, सूखा, बाढ़ और खाद्य असुरक्षा — ये सब उस ‘विकास’ के दुष्परिणाम हैं, जिसे अब भी सफलता की कहानी की तरह प्रस्तुत किया जाता है। अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरणीय संगठन इस वास्तविकता से अनभिज्ञ नहीं हैं। रिपोर्टें लिखी जाती हैं, चेतावनियाँ दी ...