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संदेश

उपनिवेशवाद आज भी जिंदा है

कभी-कभी मेरे मन में एक बहुत साधारण-सा प्रश्न उठता है। मान लीजिए मैं भारत में बैठा हूँ। मैं भारत का नागरिक हूँ, भारत के कानूनों का पालन करता हूँ और भारत की संसद में अपने प्रतिनिधियों को चुनता हूँ। फिर दुनिया के किसी दूसरे कोने में स्थित कोई देश ऐसा कानून बनाता है, जिसका प्रभाव मेरे देश की किसी कंपनी, बैंक या मेरे जैसे किसी व्यक्ति पर भी पड़ने लगता है। तो मेरा प्रश्न है— जिस देश की संसद के लिए मैंने वोट नहीं दिया, जिस देश में मैं रहता नहीं हूँ और जिसके कानून बनाने में मेरी कोई भूमिका नहीं है, उसके कानून का प्रभाव मुझ पर क्यों पड़े? पहली नजर में यह प्रश्न अटपटा लग सकता है। लेकिन आज की दुनिया में यह केवल कल्पना नहीं है। अमेरिकी sanctions, FATCA, यूरोपीय संघ का GDPR और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं की नीतियाँ हमें यह सोचने के लिए मजबूर करती हैं कि राष्ट्रीय सीमाओं और राष्ट्रीय कानूनों के बीच पुराना संबंध क्या अब बदल रहा है? और उससे भी बड़ा प्रश्न है— क्या आधुनिक दुनिया में उपनिवेशवाद समाप्त हो गया है, या उसने केवल अपना रूप बदल लिया है? कभी सेना सीमा पार करती थी उपनिवेशवाद का पुराना चेहरा ब...
हाल की पोस्ट

युवा पीढ़ी पुरानी पीढ़ी से अलग ढंग से सोचती है

  कॉकरोच जनता पार्टी, युवा और लोकतंत्र में मेरा फिर जागता विश्वास काफी दिनों से मैं आज के युवाओं और उनकी समस्याओं को लेकर कुछ लिखने की सोच रहा था। कॉकरोच जनता पार्टी के नाम से शुरू हुए एक युवा आंदोलन ने मुझे इस विषय पर लिखने के लिए और अधिक प्रेरित किया। शायद इस विषय को देखने का मेरा नजरिया कुछ अलग है। मैंने अपने जीवन के पाँच वर्ष शिक्षक के रूप में बिताए हैं और उसके बाद लगभग 34 वर्ष प्रशासनिक सेवा में। इसलिए छात्र आंदोलनों को मैंने केवल अखबारों की खबरों के रूप में नहीं देखा। शिक्षक के रूप में छात्रों के बीच रहते हुए उनकी बेचैनी और उनके सपनों को समझने का अवसर मिला। बाद में प्रशासनिक सेवा में रहते हुए आंदोलनों का दूसरा पक्ष भी देखा—सरकार और प्रशासन के सामने खड़ी जनता, उनकी माँगें, उनका आक्रोश और कभी-कभी उस आक्रोश को नियंत्रित करने की प्रशासनिक मजबूरियाँ। किसानों के आंदोलन भी मैंने देखे हैं। किसान जब अपनी माँग लेकर सड़क पर आता है तो उसके पीछे केवल राजनीतिक विचारधारा नहीं होती। उसके पीछे उसकी जमीन, उसकी फसल, उसके परिवार और आने वाली पीढ़ी की चिंता होती है। प्रशासन के लिए वह कानून-व्यवस्थ...

मिल बांट कर

आधे दिन हों आधी रात  आधी चुप्पी आधी बात  आधा आधा सब बाटेंगे  खुशियां हों या संघात।  कम खाएंगे कम बोलेंगे  अपने अपने गम खोलेंगे 

गोगा वीर / गोगापीर

भारत में इतिहास लेखन कितना वैज्ञानिक है और कितना ये लोककथाओं से प्रभावित होता है, इसका एक अच्छा उदाहरण आप आल्हाऊदल के सम्बन्ध में लोकगीतों में देख सकते हैं। आल्हा और ऊदल चंदेल राजाओं (बुंदेलखंड के एक भाग के शाशको)के वीर सैनिक थे जिनके यशगान में आल्हाखण्ड लिखा गया। इसे पढ़ / सुनकर लगता है कि वे तो गज़ब के पराक्रमी लोग थे जब कि इतिहास में उनका बहुत संक्षिप्त उल्लेख मिलता है। ऐसे ही एक महान देवता हैं जो मात्र डेढ़ हजार वर्ष पहले किसी छोटी सी रियासत के राजा थे- गोगा, उनके बारे में इतिहास में बहुत कुछ नहीं मिलता लेकिन उन्हें एक विशाल जन समुदाय एक देवता की तरह आज भी पूजता है। गोगा पीर या गोगा चौहान (गोगाजी) हैं, जो विशेष रूप से राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में लोकदेवता के रूप में पूजे जाते हैं। इन्हें जहार वीर और जहार पीर के नाम से भी पुकारा जाता है। गोगाजी का जन्म 10वीं या 11वीं शताब्दी में चौहान वंश में हुआ था। उनके पिता जीवराज चौहान और माता बच्छल देवी थीं। वे वर्तमान राजस्थान के गोगामेड़ी (हनुमानगढ़) क्षेत्र के शासक थे। उनके जन्म के समय यह भविष्यवाणी की गई थी क...

पर्यावरण पर झूठी चिंता

जलवायु परिवर्तन: जब अपराधी नियम बनाते हैं और दुनिया सज़ा भुगतती है जलवायु परिवर्तन को अब भी यदि “प्राकृतिक संकट” कहा जाता है, तो यह एक सुविधाजनक झूठ से अधिक कुछ नहीं। यह संकट प्राकृतिक नहीं, बल्कि योजनाबद्ध, लाभ-केन्द्रित और सत्ता-संरक्षित मानवीय गतिविधियों का परिणाम है। इसके बावजूद, विडंबना यह है कि जिन देशों और उद्योगों की भूमिका इस विनाश में निर्णायक रही है, वही आज वैश्विक मंचों पर सबसे अधिक नैतिक भाषण देते दिखाई देते हैं — और वास्तविक प्रतिबंधों से उतनी ही कुशलता से बच निकलते हैं। बीते एक शताब्दी में औद्योगिक समृद्धि का जो मॉडल विकसित हुआ, वह सस्ते संसाधनों, असीमित उपभोग और पर्यावरणीय लागत की उपेक्षा पर आधारित था। इस विकास का लाभ कुछ मुट्ठी भर देशों और कॉरपोरेट घरानों को मिला, लेकिन इसकी कीमत पूरी पृथ्वी चुका रही है। समुद्र का बढ़ता स्तर, असामान्य मौसम, सूखा, बाढ़ और खाद्य असुरक्षा — ये सब उस ‘विकास’ के दुष्परिणाम हैं, जिसे अब भी सफलता की कहानी की तरह प्रस्तुत किया जाता है। अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरणीय संगठन इस वास्तविकता से अनभिज्ञ नहीं हैं। रिपोर्टें लिखी जाती हैं, चेतावनियाँ दी ...

पहलगाम पर भारत का गुस्सा

अभी दो दिन पूर्व मैंने भी पहलगाम की दुर्घटना पर गुस्से में प्रतिक्रिया दी थी। लेकिन आज मैं शांत मन से सोच पा रहा हूँ कि विवेकपूर्ण प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिए, गुस्सा एक भावुक वातावरण पैदा करता है, नकारात्मक वातावरण। लेकिन आज मैं इस पर गहराई से अपना विमर्श कर सकता हूँ। इस घटना को अंजाम देने वालों का उद्देश्य क्या था ? अगर ये मैं और आप सोच पाएं तो हम ये भी पहचान पाएंगे कि इस घटना को अंजाम देने वाले लोग कौन थे? कौन हैं वो लोग, जिन्हें इस घटना के परिणामों से लाभ होने की संभावना हो सकती है। क्या कोई कश्मीरी मुस्लिम इस से लाभान्वित हो सकता है? पिछले पांच वर्षों में कश्मीर में जैसी शांति और पर्यटन का विकास हुआ है , कश्मीरी लोगों की पर्यटन से आय में वृद्धि हुई है उससे इतना तो समझ में आता है कि पर्यटन से लाभ कमाने वाले आम कश्मीरी तो ऐसी घटना को अंजाम नहीं दे सकते जो उनकी रोजी रोटी पर खतरा पैदा कर दे। सिरफिरे ब्रैनवॉश कर दिए गए ऐसे लोग, जिनके दिमाग में ये भर दिया गया हो कि गैर मुस्लिमों की हत्या एक सबाब का काम है और ऐसा करने से इस्लाम में उन्हें जन्नत का हकदार माना जाएगा,भी जन्नत और हूरों क...

न्याय क्या और कैसे, किसके द्वारा

भारतीय संविधान की दृष्टि से “न्याय” एक मूलभूत सिद्धांत है, जो संविधान की प्रस्तावना में कहा गया है: “हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व-संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए… सभी नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए…” इससे यह स्पष्ट होता है कि भारतीय संविधान तीन प्रकार के न्याय की गारंटी देता है: 1. सामाजिक न्याय (Social Justice): सभी को समाज में बराबरी का स्थान मिले। छुआछूत, जातीय भेदभाव, लैंगिक असमानता आदि को समाप्त करना। कमजोर वर्गों को संरक्षण देना (जैसे आरक्षण प्रणाली) 2. आर्थिक न्याय (Economic Justice): सभी को संसाधनों तक बराबर पहुंच मिले। गरीबों को अवसर और सहायता मिलें। शोषण, बेरोजगारी और असमान संपत्ति के वितरण को रोकना। 3. राजनीतिक न्याय (Political Justice) हर नागरिक को वोट देने और चुनाव लड़ने का समान अधिकार। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कानून के समक्ष समानता। जनतंत्र में सभी की भागीदारी सुनिश्चित करना। भारतीय संविधान में न्याय सुनिश्चित करने लिए ९ प्राविधान किए गए हैं- १. मूल अधिकार (Part III): ज...

धर्म का सार

सनातन धर्म में समय समय पर सुधार के लिए इसी धर्म के अनुयायियों में से कुछ प्रबुद्ध लोगों ने अपने अनुभवों के आधार पर कुछ शिक्षाएं दीं ,  इन शिक्षाओं से प्रभावित लोगों ने एक अलग कल्ट शुरू किया जो बाद में एक नए धर्म के रूप में विकसित और प्रचलित हो गया।  भारत में सनातन धर्म में समय-समय पर सुधार लाने के लिए कई धार्मिक व्यक्तित्वों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इन्होंने समाज में व्याप्त अंधविश्वास, जाति-भेद, कुप्रथाओं को दूर करने के साथ ही धार्मिक और आध्यात्मिक सुधार किए। इनमें से कुछ प्रमुख धार्मिक सुधारक निम्नलिखित हैं: 1. महावीर स्वामी (599–527 ई.पू.) जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी ने कर्म, अहिंसा और सत्य की शिक्षा दी। उन्होंने ईश्वर की पारंपरिक अवधारणा को चुनौती देते हुए आत्मज्ञान, मोक्ष, और आत्मा की शुद्धता पर बल दिया। महावीर स्वामी ने समाज में व्याप्त हिंसा, बलि प्रथा, और जाति-प्रथा के खिलाफ आवाज उठाई। 2. गौतम बुद्ध (563–483 ई.पू.) गौतम बुद्ध ने बौद्ध धर्म की स्थापना की। उन्होंने अंधविश्वास, बलि-प्रथा, और जाति-व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाई और लोगों को "अष्टांगिक मार्ग...

पुरुषों पर घरेलू हिंसा या बलात्कार के लिए क़ानून

 भारत में घरेलू हिंसा और यौन अपराधों से संबंधित अधिकांश कानूनों का फोकस महिलाओं की सुरक्षा पर है। हालांकि, यह कहना गलत होगा कि पुरुषों के लिए कोई संरक्षण या उपाय उपलब्ध नहीं है, परंतु मौजूदा कानूनों में विशेष रूप से पुरुषों को पीड़ित मानकर बनाए गए प्रावधानों की कमी है। घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 में महिलाओं को सुरक्षा दी जाती है और यह महिलाओं को पुरुषों के खिलाफ शिकायत दर्ज करने का अधिकार देता है।  भारतीय  न्याय संहिता (BNS) में घरेलू हिंसा के मामले में विशेष रूप से पुरुषों को पीड़ित मानने वाले प्रावधान का अभाव है। महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाए गए घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 अब भी महिलाओं को घरेलू हिंसा से सुरक्षा प्रदान करता है। हालांकि, घरेलू हिंसा के मामलों में पुरुषों के लिए कोई विशेष प्रावधान न होने के कारण, पुरुष BNS के अन्य प्रावधानों का सहारा लेकर अपने उत्पीड़न की शिकायत दर्ज करा सकते हैं। भारतीय न्याय संहिता, 2023 में धारा 69 और धारा 70 के अंतर्गत बलात्कार और यौन शोषण के मामले दर्ज किए जा सकते हैं, लेकिन यह विशेष रूप से महिलाओं पर होने वाले यौन अपराधों को कवर क...

तरह तरह के आवरण

दुनिया भर में हर बुरे काम को ढकने के लिए अच्छे आवरण इस्तेमाल किये जाते रहे हैं। और ये तरीका आज भी अपनाया जा रहा है.  लोगों के विश्वास को अपने हित में इस्तेमाल करके अपने अपराधों और पापों या अनैतिक कार्यों को ढकने का ये काम वे करते हैं जिन्हें हम कभी अपराधी मान ही नहीं सकते क्यों कि हमें विश्वास है कि  कोई राष्ट्रवादी भ्रष्ट नहीं हो सकता, देश के साथ गद्दारी नहीं कर सकता।  कोई धार्मिक वेशभूषा धारण करने वाला या धार्मिक प्रवचन देने वाला व्यक्ति कभी अधार्मिक, या अनैतिक कार्य नहीं कर सकता।  लेकिन ये सच नहीं है।  राष्ट्रवाद और धर्म कुछ अपराधियों के लिए केवल एक पर्दा है जिसके पीछे वे अपने अनैतिक कार्यों को छिपा लेने में सफल हो जाते हैं।  आपने बहुत सी गाड़ियों पर प्रेस, विधायक, जज, प्रशासन, जैसे स्टीकर लगे देखे होंगे, ऐसा लोग क्यों लिखते हैं क्यों कि वे लोग भी इन पर्दों के पीछे अपना वास्तविक चरित्र छिपा लेते हैं। पुलिस वाले या छोटे चोर इन स्टिकर्स को देखकर सहम जाते हैं और इन वाहनों के साथ छेड़छाड़ नहीं करते। कुछ वर्ष पहले। .....प्रदेश सरकार लिखे वाहन या मंत्री। .....प्र...

सच्ची कहानी, नायिका की जुबानी

डिस्क्लेमर:- प्रस्तुत कहानी में संयोग से किसी की जिंदगी से कोई घटनाएं या नाम , मेल खा सकती हैं, दिए गए नाम और स्थान सब असल दुनिया में हैं, लेकिन जरुरी नहीं कि ये इस कहानी में लिखे पात्रों की असल जिंदगी हो। कहानी का उद्देश्य केवल आज के उत्तर भारत के गाँवों की महिलाओं के एक पहलू पर प्रकाश डालना है।  + "मैं तब सोलह बरस की थी, दसवीं की बोर्ड की परीक्षा सर पर थी।  गाँव में अडोसी पडोसी नहीं होते, बल्कि चाची ताई, भैया भाभी होते हैं। मतलब सब एक ही खानदान के लोग होते हैं तो रिश्तेदार ही होते हैं, शहर की तरह हम यहाँ किसी के नाम या पद से नहीं , रिश्ते से एक दूसरे से सम्बोधित करते हैं। तो ऐसे ही हमारी एक चाची थीं जो उम्र में मुझ से ४ या ५ साल बड़ी थीं, उनकी शादी को साल भर ही हुआ था. बड़ी हंसमुख थीं, मेरी उनसे खूब पटती  थी, वो मुझे चिड़िया बुलाती थीं क्योंकि मैं चिड़िया की तरह हर समय चूं चूं करती फुदकती फिरती थी, हालांकि मेरे पापा मुझे गुड़िया बुलाते थे, वैसे मेरा नाम सुषमा है। चाची जी की एक बड़ी बहन थीं जिनका बेटा हरी, चाची की ही उम्र का था, और  १२वीं में पढता था और उसके भी बोर्ड की प...

कृषि विपणन की भारत सरकार की नीति की घोषणा

फिर वही ढाक के तीन पात -  हाल ही में, केंद्र सरकार ने कृषि विपणन पर एक नई राष्ट्रीय नीति का मसौदा जारी किया है, जिसका उद्देश्य कृषि उत्पादों की खरीद-बिक्री के तरीकों में सुधार करना है। इस मसौदे में निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने, डिजिटल ट्रेडिंग और ई-मार्केट सिस्टम को प्रोत्साहित करने, और राष्ट्रीय स्तर पर एकीकृत कृषि बाजार बनाने जैसे प्रावधान शामिल हैं। प्रमुख विशेषताएं: बाजार पहुंच का विस्तार: किसानों को पारंपरिक मंडियों के अलावा निजी खरीदारों, निर्यातकों और उपभोक्ताओं को सीधे अपनी उपज बेचने की अनुमति देने का प्रस्ताव है। साथ ही, गोदामों और शीत भंडारण सुविधाओं में निजी निवेश को प्रोत्साहित किया जाएगा। डिजिटल ट्रेडिंग और ई-मार्केट प्लेटफॉर्म को बढ़ावा देकर पारदर्शिता और दक्षता में सुधार का लक्ष्य है। सशक्त कृषि विपणन सुधार समिति का गठन: GST परिषद की तर्ज पर राज्य कृषि विपणन मंत्रियों की एक सशक्त समिति के गठन का प्रस्ताव है, जो राज्यों के बीच एकीकृत कृषि बाजार की दिशा में आम सहमति बनाने में सहायक होगी। मूल्य बीमा योजना: प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) की तर्ज पर एक मूल्य बी...

सहअस्तित्व

  ये सृष्टि संतुलन और सह-अस्तित्व के कारण टिकी हुई है। इसमें हर जीव असंख्य जीवों के साथ सहअस्तित्व के कारण ही टिका हुआ है। मनुष्य शरीर में लगभग 39 ट्रिलियन (39 लाख करोड़) सूक्ष्म जीव (microorganisms) पाए जाते हैं। ये मुख्य रूप से बैक्टीरिया , वायरस , फंगस , और आर्किया होते हैं। इन्हें सामूहिक रूप से माइक्रोबायोम (Microbiome) कहा जाता है। जब जब प्रकृति में सह-अस्तित्व के समायोजन का संतुलन बिगड़ता है, बवंडर आ जाता है। आंधी, तूफ़ान, सुनामी, भूकंप, अतिवृष्टि, भूस्खलन ,  हिमस्खलन ऐसे प्राकृतिक बवंडर हैं जो हमें चौंका देते हैं। हमारे शरीर में भी ऐसे बवंडर होते रहते हैं। इन शारीरिक बवंडरों को हम रक्तचाप ,  ज्वर ,  एलर्जी ,  इन्फ्लमेशन, आदि नामों से जानते हैं।   समाज में भी जाने अनजाने ऐसे बवंडर उठते रहते हैं, उन्हें समाजशास्त्रियों ने आंदोलन ,  दंगे ,  हिंसा, युद्ध और क्रांति जैसे नाम दे रखे हैं। आखिर में जब सब संतुलित हो जाता है, सब में सामंजस्य हो जाता है ,  सब सहअस्तित्व को स्वीकार कर लेते हैं तो व्यक्ति ,  समाज और सृष्टि स्वस्थ हो जात...

विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों में अंतर

 हर चिकित्सा पद्धति की अपनी विशिष्ट दृष्टिकोण और दर्शन होती है। आइए होमियोपैथी, यूनानी, आयुर्वेद और एलोपैथी के मौलिक अंतर को समझें: 1. होमियोपैथी (Homeopathy) फिलोसॉफी : "समान ही समान को ठीक करता है" (Like cures like)। शरीर की आत्म-चिकित्सा क्षमता को उत्तेजित करना। उपचार का आधार : रोगी के संपूर्ण लक्षणों को समझकर उपचार करना। अत्यधिक पतले और न्यूनतम मात्रा में दवाओं का उपयोग। लक्षण : दवाएं प्राकृतिक स्रोतों से बनती हैं। दवाएं व्यक्ति के शारीरिक और मानसिक पहलुओं को ध्यान में रखकर दी जाती हैं। 2. यूनानी चिकित्सा (Unani Medicine) फिलोसॉफी : ग्रीक चिकित्सा से उत्पन्न और "चार तत्वों" (आग, पानी, हवा, और मिट्टी) और "चार सजीव रसों" (खून, बलगम, पित्त, कफ) का संतुलन बनाए रखना। स्वास्थ्य और रोग शरीर के रसों के असंतुलन के कारण होते हैं। उपचार का आधार : रोगी के प्रकृति और शरीर के रसों का विश्लेषण। हर्बल औषधियों और प्राकृतिक तत्वों का उपयोग। लक्षण : आहार, जीवनशैली, और प्राकृतिक औषधियों पर जोर। रोग की जड़ तक पहुंचने का प्रयास। 3. आयुर्वेद (Ayurveda) फिलोसॉफी : "त्रिद...

एंगर मैनेजमेंट

“क्रोध” को हमारे संत महात्माओं ने छ: विकारों में गिना है। शेष पाँच विकारों के नाम हैं, काम, लोभ, मोह, भय और अहंकार। कुछ लोग पाँच विकार गिनाते हैं, वे अहंकार को विकारों में नहीं गिनते , अपितु अहं के पाँच दरबारियों के रूप में काम, क्रोध, लोभ, मोह और भय की गिनती करते हैं । कामना पूर्ण न हो तो क्रोध का जन्म होता है। हम चाहते हैं कि सब कुछ हमारे मन मुताबिक ही हो । मन मुताबिक न होने पर हमे क्रोध आ जाता है । लोभ पूरा न हो तब भी क्रोध आ सकता है। मोह भंग हो जाये तो भी क्रोध आ सकता है। कई बार कुछ खोने का भय प्रतिक्रियात्मक रूप में क्रोध की तरह व्यक्त हो जाता है। इस प्रकार पांचों विकार एक दूसरे को सपोर्ट करते हैं। आजकल विज्ञान का युग है और शरीर विज्ञान की एक शाखा में क्रोध का भी अध्ययन किया गया है, इसके अनुसार  क्रोध का मुख्य जनक अमिगडाला (Amygdala) नामक मस्तिष्क का भाग है। यह मस्तिष्क के लिम्बिक सिस्टम का हिस्सा है, जो हमारी भावनाओं और विशेष रूप से फाइट-या-फ्लाइट प्रतिक्रिया को नियंत्रित करता है। जब व्यक्ति किसी खतरे या तनाव का अनुभव करता है, तो अमिगडाला सक्रिय हो जाता है और शरीर में कई शा...