सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

लिंग और वर्ग के आधार पर कानूनों में भेदभाव असंवैधानिक हैं

भारत में ऐतिहासिक सामाजिक परिस्थितियों के उद्धरण देकर भारत में बहुत से क़ानून बनाये गए हैं जो मनुष्य मनुष्य में जाति और लिंग के आधार पर भेद भाव करते हैं। महिलाओं और कथित दलित वर्ग को सदा से पीड़ित पक्ष की तरह प्रस्तुत करने का फैशन सा बन गया है। इन बेचारों के साथ सदियों से होते आ रहे अन्याय से मुक्त करना एक बहुत अच्छा सामाजिक आंदोलन हो सकता था जो अभी तक नहीं हो पाया है। लेकिन इनकी अत्यधिक संख्या को वोट बैंक समझने वाले हमारे नेता इनको लुभाने के लिए या इनके दबाब में आकर ऐसे क़ानून बना देते हैं जिनसे ऐसा लगता है कि जैसे सदियों से इनके पूर्वजों पर जो अत्याचार पुरुष या सवर्णों ने किये हैं उनका बदला अत्याचारियों के उत्तराधिकारियों से लेने की व्यवस्था कर दी गयी है। जैसे एक भेड़िया और एक मैमने की कहानी में सुना जाता है कि मैं तुझे इस लिए खाऊंगा कि तेरे दादा ने मेरे दादा को गाली दी थी। 

आज कथित दलित वर्ग या किसी महिला की और से यदि पुलिस में शिकायत की जाए कि अमुक व्यक्ति ने उसे गाली दी, या उसकी और गन्दा इशारा किया या थप्पड़ दिखाया तो पुलिस की पहली जिम्मेदारी है कि महिला एयर दलित वर्ग के व्यक्ति की और से प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करे और आरोपी को तुरंत गिरफ्तार करे और जेल भेजे तथा इसके बाद जांच शुरू करे। जांच में कितना भी समय लगे आरोपी को सलाखों के पीछे रहना ही होगा। ऐसे अधिकतर मामलों में आरोप लगाने वाले का बयान ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना जाता है, भले ही और कोई साक्ष्य  मिले या न मिले। न्यायपालिका के लोग भी आरोपी के प्रति कोई सहानुभूति  रखते और वादी की  बात को ही सच मान कर जमानत देने से भी इंकार कर देते हैं। 

अनुसूचित वर्गों के शिकायत कर्ताओं को एक सुविधा क़ानून की और से प्रदान की गयी है कि उनका मुकदमा लड़ने के लिए तथा हुई किसी भी मानसिक, शारीरिक सामाजिक क्षति के लिए एफ आई आर दर्ज होते ही उन्हें सरकार की और से मुआवजा मिल जाता है। मुआवजे की कुल प्रतिभूति राशि का ५० प्रतिशत मुकदमा दर्ज होते ही मिल जाता है। यह रकम भी २५०००, ५००००, या लाख रूपये भी हो सकती है। शेष धनराशि मुक़दमे का परिणाम आरोपी को सजा मिलने पर अवमुक्त की जाती है। और यदि आरोप सिद्ध नहीं भी हो पाते हैं तो भी आरोप लगाते समय मिली धनराशि तो शिकायतकर्ता की सुरक्षित रहती ही है, उसे वापस नहीं मांगा जाता। इसी प्रकार महिलाओं द्वारा घरेलू हिंसा या बलात्कार या छेड़छाड़ की शिकायत पर भी आरोपी और उसके परिवार से सौदे बाजी कराने में पुलिस और वकील सक्रिय भूमिका निभाते हैं। बदनामी और अदालत के चक्कर लगाते रहने के डर से लोग मोटी रकम देकर मामला रफा दफा करने में जुट जाते हैं भले ही उन पर झूठे आरोप लगाए गए हों। कुछ लोग तो महिलाओं और उनके पक्षकारों की  प्रताड़ना से तंग आकर आत्महत्या या हत्या कर बैठते हैं। 

सर्वोच्च न्यायलय को जाति, वर्ग और लिंग के आधार पर भेदभाव करने वाले कानूनों को असंवैधानिक करार देना चाहिए। जब एडल्टरी का क़ानून रद्द किया जा सकता है तो भेदभावपूर्ण क़ानून क्यों नहीं रद्द या संसोधित नहीं किये जा सकते। 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

युवा पीढ़ी पुरानी पीढ़ी से अलग ढंग से सोचती है

  कॉकरोच जनता पार्टी, युवा और लोकतंत्र में मेरा फिर जागता विश्वास काफी दिनों से मैं आज के युवाओं और उनकी समस्याओं को लेकर कुछ लिखने की सोच रहा था। कॉकरोच जनता पार्टी के नाम से शुरू हुए एक युवा आंदोलन ने मुझे इस विषय पर लिखने के लिए और अधिक प्रेरित किया। शायद इस विषय को देखने का मेरा नजरिया कुछ अलग है। मैंने अपने जीवन के पाँच वर्ष शिक्षक के रूप में बिताए हैं और उसके बाद लगभग 34 वर्ष प्रशासनिक सेवा में। इसलिए छात्र आंदोलनों को मैंने केवल अखबारों की खबरों के रूप में नहीं देखा। शिक्षक के रूप में छात्रों के बीच रहते हुए उनकी बेचैनी और उनके सपनों को समझने का अवसर मिला। बाद में प्रशासनिक सेवा में रहते हुए आंदोलनों का दूसरा पक्ष भी देखा—सरकार और प्रशासन के सामने खड़ी जनता, उनकी माँगें, उनका आक्रोश और कभी-कभी उस आक्रोश को नियंत्रित करने की प्रशासनिक मजबूरियाँ। किसानों के आंदोलन भी मैंने देखे हैं। किसान जब अपनी माँग लेकर सड़क पर आता है तो उसके पीछे केवल राजनीतिक विचारधारा नहीं होती। उसके पीछे उसकी जमीन, उसकी फसल, उसके परिवार और आने वाली पीढ़ी की चिंता होती है। प्रशासन के लिए वह कानून-व्यवस्थ...

सहअस्तित्व

  ये सृष्टि संतुलन और सह-अस्तित्व के कारण टिकी हुई है। इसमें हर जीव असंख्य जीवों के साथ सहअस्तित्व के कारण ही टिका हुआ है। मनुष्य शरीर में लगभग 39 ट्रिलियन (39 लाख करोड़) सूक्ष्म जीव (microorganisms) पाए जाते हैं। ये मुख्य रूप से बैक्टीरिया , वायरस , फंगस , और आर्किया होते हैं। इन्हें सामूहिक रूप से माइक्रोबायोम (Microbiome) कहा जाता है। जब जब प्रकृति में सह-अस्तित्व के समायोजन का संतुलन बिगड़ता है, बवंडर आ जाता है। आंधी, तूफ़ान, सुनामी, भूकंप, अतिवृष्टि, भूस्खलन ,  हिमस्खलन ऐसे प्राकृतिक बवंडर हैं जो हमें चौंका देते हैं। हमारे शरीर में भी ऐसे बवंडर होते रहते हैं। इन शारीरिक बवंडरों को हम रक्तचाप ,  ज्वर ,  एलर्जी ,  इन्फ्लमेशन, आदि नामों से जानते हैं।   समाज में भी जाने अनजाने ऐसे बवंडर उठते रहते हैं, उन्हें समाजशास्त्रियों ने आंदोलन ,  दंगे ,  हिंसा, युद्ध और क्रांति जैसे नाम दे रखे हैं। आखिर में जब सब संतुलित हो जाता है, सब में सामंजस्य हो जाता है ,  सब सहअस्तित्व को स्वीकार कर लेते हैं तो व्यक्ति ,  समाज और सृष्टि स्वस्थ हो जात...

एंगर मैनेजमेंट

“क्रोध” को हमारे संत महात्माओं ने छ: विकारों में गिना है। शेष पाँच विकारों के नाम हैं, काम, लोभ, मोह, भय और अहंकार। कुछ लोग पाँच विकार गिनाते हैं, वे अहंकार को विकारों में नहीं गिनते , अपितु अहं के पाँच दरबारियों के रूप में काम, क्रोध, लोभ, मोह और भय की गिनती करते हैं । कामना पूर्ण न हो तो क्रोध का जन्म होता है। हम चाहते हैं कि सब कुछ हमारे मन मुताबिक ही हो । मन मुताबिक न होने पर हमे क्रोध आ जाता है । लोभ पूरा न हो तब भी क्रोध आ सकता है। मोह भंग हो जाये तो भी क्रोध आ सकता है। कई बार कुछ खोने का भय प्रतिक्रियात्मक रूप में क्रोध की तरह व्यक्त हो जाता है। इस प्रकार पांचों विकार एक दूसरे को सपोर्ट करते हैं। आजकल विज्ञान का युग है और शरीर विज्ञान की एक शाखा में क्रोध का भी अध्ययन किया गया है, इसके अनुसार  क्रोध का मुख्य जनक अमिगडाला (Amygdala) नामक मस्तिष्क का भाग है। यह मस्तिष्क के लिम्बिक सिस्टम का हिस्सा है, जो हमारी भावनाओं और विशेष रूप से फाइट-या-फ्लाइट प्रतिक्रिया को नियंत्रित करता है। जब व्यक्ति किसी खतरे या तनाव का अनुभव करता है, तो अमिगडाला सक्रिय हो जाता है और शरीर में कई शा...