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लिंग और वर्ग के आधार पर कानूनों में भेदभाव असंवैधानिक हैं

भारत में ऐतिहासिक सामाजिक परिस्थितियों के उद्धरण देकर भारत में बहुत से क़ानून बनाये गए हैं जो मनुष्य मनुष्य में जाति और लिंग के आधार पर भेद भाव करते हैं। महिलाओं और कथित दलित वर्ग को सदा से पीड़ित पक्ष की तरह प्रस्तुत करने का फैशन सा बन गया है। इन बेचारों के साथ सदियों से होते आ रहे अन्याय से मुक्त करना एक बहुत अच्छा सामाजिक आंदोलन हो सकता था जो अभी तक नहीं हो पाया है। लेकिन इनकी अत्यधिक संख्या को वोट बैंक समझने वाले हमारे नेता इनको लुभाने के लिए या इनके दबाब में आकर ऐसे क़ानून बना देते हैं जिनसे ऐसा लगता है कि जैसे सदियों से इनके पूर्वजों पर जो अत्याचार पुरुष या सवर्णों ने किये हैं उनका बदला अत्याचारियों के उत्तराधिकारियों से लेने की व्यवस्था कर दी गयी है। जैसे एक भेड़िया और एक मैमने की कहानी में सुना जाता है कि मैं तुझे इस लिए खाऊंगा कि तेरे दादा ने मेरे दादा को गाली दी थी।  आज कथित दलित वर्ग या किसी महिला की और से यदि पुलिस में शिकायत की जाए कि अमुक व्यक्ति ने उसे गाली दी, या उसकी और गन्दा इशारा किया या थप्पड़ दिखाया तो पुलिस की पहली जिम्मेदारी है कि महिला एयर दलित वर्ग के व्यक्ति की...

युद्ध और हिंसा कैसे समाप्त हो

संसार में समस्त युद्ध समाप्त किये जा सकते हैं लेकिन वर्चस्व को सहन करने की क्षमता विकसित करना कठिन है। असंभव तो नहीं।  पति पत्नी में से एक को दूसरे का वर्चस्व स्वीकार कर लेना चाहिए।  या फिर अपने अपने वर्चस्व के एरिया निर्धारित कर लेने चाहिए। अपने एरिया से बाहर पर वर्चस्व करने की चाह से ही युद्ध होते हैं चाहे वो किसी भी देश धर्म के भूगोल या इतिहास में ढूंढ कर देख लो।  सब को अपने भले बुरे का पता है , हम दूसरों का भला करने की फर्जी ख्वाइश के चलते भी दूसरों के जीवन में दखल देने की कोशिश करते हैं जो दूसरे को बुरा लगता ही लगता है , वो मेरे ढंग से रहे, वो मेरे ही धर्म को माने मेरी ही भाषा बोले, मेरी पसंद की ही पोशाक पहने, मेरे पसंद का ही खाये। सारे झगड़ों की जड़ ये मेरी पसंद का दूसरों पर थोपना ही तो है। सारे धर्म के लोग अपनी अपनी पसंद का ही पहनावा या खान पान रखते हों , ये बिलकुल भी जरुरी नहीं क्यों कि उन का मन तो है कि वे वेस्टर्न स्टाइल में जिए लेकिन मुल्लाओं का डर , पंडितों का डर , पादरियों का डर उन्हें वैसा करने नहीं देता।  मेरे घर में झगडे बिलकुल बंद हो चुके हैं , क्योंकि...

सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया का निर्णय समलैंगिक विवाह पर

समलैंगिक विवाह पर भारत के सर्वोच्च न्यायलय ने ३-२ के बहुमत से सहमति देने से इंकार कर दिया। मैं इस फैसले का पुरजोर समर्थन करता हूँ, यद्यपि मैं किन्ही भी दो वयस्कों को बिना विवाह के साथ रहने को उनका निजी अधिकार मानता हूँ। किसी भी वयस्क युगल को साथ रहने पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है, इस सम्बन्ध में सर्वोच्च न्यायलय पहले ही समलैंगिक यौन संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर चुका है। साथ रहने को विवाह का नाम देना क्यों जरुरी है। आजकल तो वैसे ही बहुत से युवक युवती लिवइन रिलेशनशिप में रह लेते हैं और उनके इस लिवइन रिलेशन को सर्वोच्च न्यायलय ने स्वीकार किया है। बच्चा गोद लेने के लिए भी समलैंगिक जोड़ों को अधिकार देने की याचिका भी सुना है कि रद्द कर दी गयी है। यूँ तो एकल पैरेंट को भी बच्चा गोद लेने की , विशेष परिस्थिति में अनुमति दी जाती है , लेकिन समलैंगिकों को बच्चा गोद लेने का अधिकार देने का मतलब गोद लिए जाने वाले बच्चे के साथ ये एक जबरन अन्याय होगा। क्योंकि वो समलैंगिक संबंधों को बचपन से देखेगा और उस वातावरण में उस तरह से विकसित नहीं होगा यदि वह ऐसे माँ बाप द्वारा गोद लिया जाए जो समलैंगिक नहीं हैं।...

बिन पानी सब सुन

दुनिया भर की सभ्यताओं का विकास जल स्रोतों ( नदियों, झीलों, बड़े तालाबों, और समुद्र के तटों) के आसपास हुआ है। मनुष्य के लिए जल कितना महत्वपूर्ण है, ये इसी  एक बात से स्पष्ट हो जाता है।  बिन पानी सब सून।  लेकिन इस पानी को सबसे ज्यादा  बर्बाद भी मनुष्य ही करता है। नदियों और तालाबों व् झीलों और समुद्र तटों के जल को सबसे ज्यादा प्रदूषित भी मनुष्य ही करता है।  गाँवों में कुंवों पर पनिहारियाँ लड़ा करती थीं, मुंबई जैसे महानगरों में सार्वजनिक नलो से पानी लेने के लिए लड़ते आज भी देखे जा सकते हैं। दिल्ली में पानी की कमी होने पर टैंकरों से पानी की आपूर्ति के समय भी पानी की लूट के नज़ारे मिल जाते हैं।  लेकिन पानी को बर्बाद करना और प्रदूषित करना बदस्तूर जारी है। मेरे अपने गाँव में बहुत से घरों में झाड़ू नाम का यंत्र दिखाई नहीं देगा। क्योंकि उनके घर में सबमर्सिबल पम्प लगा है  जो बिजली आते ही चालू हो जाता है। उस पम्प की मदद से पानी की धार से घर की गंदगी बुहार दी जाती है , घर में भैंस आदि पशुओं को पहले कभी एक बाल्टी पानी में सावधानी से नहला दिया जाता था एक मग  की मदद स...

भाषा पर मेरी पकड़

 हमारे एक प्रतिष्ठित पत्रकार श्री शम्भुनाथ शुक्ल जी , बड़े बिंदास किस्म के व्यक्ति हैं, उनसे बहतु कुछ सीखने को मिलता है, अभी हाल ही में उन्होंने विभिन्न भाषाओं पर अपनी पकड़/समझ पर एक पोस्ट डाली तो मुझे भी लगा कि ये विषय भी अच्छा है, और उनसे प्रेरित होकर मैं भी आज भाषा सम्बन्धी अपनी समझ के बारे में ये पोस्ट लिखने का साहस कर रहा हूँ।  मेरा जन्म हस्तिनापुर और कुरुक्षेत्र के बीच स्थित वार्नावृत (आजकल इसे बरनावा कहते हैं) के आसपास के क्षेत्र में हुआ था, इस इलाके की भाषा खड़ी हिंदी में भी सबसे खड़ी मानी जाती है। साधारण बातचीत में भी लोग ऐसे बात करते हैं कि सुनने वाला यही समझे कि ये लड़ रहे हैं। इसका एहसास मुझे दो बार हुआ। एक बार इलाहाबाद विश्विद्यालय में जब रैगिंग के दौरान मुझे से अपने इलाके की बोली में बात करने को कहा गया और दूसरे जब मेरी पत्नी ने मेरे गाँव में पहली बार हम लोगों को हाई टोन  में बात करते सुना और घबरा गयी।  तो तात्पर्य ये कि मैं हिंदी भाषी हूँ और हिंदी की खड़ी बोली को ठीक से समझता हूँ। लखनऊ, बलिया, इलाहाबाद, कानपूर, इटावा, झांसी, आगरा, हाथरस, मुरादाबाद आदि स्थानो...

Knowledge is One, people see it divided

भारत सहित बहुत से देशों में , ज्ञान को विभाजित करके देखने की प्रथा सी बन गयी है। आर्ट स्ट्रीम, साइंस स्ट्रीम, मैथमेटिक्स स्ट्रीम, बायो स्ट्रीम, मेडिकल साइड, इंजीनियरिंग साइड, वगैरा वगैरा नाम से बच्चों को विषय चुनने के लिए दिए जाते हैं। जब कि ज्ञान एक समुच्चय है सब का मिला जुला। लेकिन अफ़सोस हमारे देश में तो विषय भेद भी लिंग भेद और व्यवसाय भेद यहाँ तक कि आर्थिक स्तर के भेदभाव का शिकार होते हैं। व्यक्ति कितना भी मेधावी हो लेकिन अगर वो गरीब है तो वो डॉक्टर बनने या इंजिनियर बनने की सोच भी नहीं सकता। कोचिंग व्यवसाय में भी इतनी मुश्किलें हैं कि कोचिंग कराने वाले भी छात्र की आर्थिक हैसियत को ध्यान में रखकर उसे सलाह देते हैं कि वो पुलिस में सिपाही, या फ़ौज का सिपाही बनने की तैयारी करे या क्लेरिकल जॉब को अपना सपना बनाये। गाँव में रहने वाले अधिकांश युवा बड़ा सपना इसीलिए नहीं देख सकते कि उनके घरवाले आर्थिक रूप से सक्षम नहीं हैं।  गाँवों में जो लोग दसवीं पास कर लेते हैं ( यद्यपि विषयों का चयन कक्षा ९ से ही शुरू हो जाता है और अधिकांश लड़कियों को गणित के लिए अक्षम मान कर उन्हें कक्षा ९ में गणित से द...

माता-पिता और बच्चे

हमारे बच्चे जिन्हें हम बड़े लाड प्यार से पालते हैं उनकी हर जरूरत का ध्यान रखते हैं, बीमार हो कर भी हम कभी उनके सामने लाचार या असहाय नहीं प्रदर्शित करते। हर संकट को मैनेज करके उनके सामने एक आदर्श स्थापित करते हैं , तो हमारे बच्चों की नज़र में हम दुनिया के सबसे अच्छे माँ या सबसे अच्छे बाप बन जाते हैं।  हमारे बच्चों को लगता है कि हम जीवन भर उनके लिए उसी प्रकार प्रोटेक्शन देते रहेंगे जैसे देते आये हैं, हम उनकी नज़र में साहसी, आत्मनिर्भर, खुद्दार, जूझने वाले बन जाते हैं जो किसी भी मुसीबत का सामना आसानी से कर लेता है।  लेकिन समय तो अपना असर दिखाता है।  हम बूढ़े हो जाते हैं , परिस्थितियों वश हमारे बच्चे उस समय तक दूर हो चुके होते हैं लेकिन उनकी नज़र में हम अभी भी आत्मनिर्भर, साहसी, खुद्दार और कुशल प्रबंधक बने रहते हैं और केयरिंग भी।  इसलिए यदि कभी हमारे बच्चों को कभी अपने पारिवारिक दिक्क्तों में (अपने बच्चे पालने में, घर की देखभाल में , अपनी नौकरी के समय प्रबंधन में) हमारी याद आती है तो सिर्फ इसीलिए कि उन्हें अभी भी हमारी क्षमताओं पर भरोसा ज्यों का त्यों बना हुआ है, उन्होंने हमा...

न्यायालयों की टिप्पणियां

 हाल ही में एक उच्च न्यायलय ने एक निर्णय में टिप्पणी की "लिवइन रिलेशनशिप शादी जैसी सामाजिक संस्था को बर्बाद कर रहा है" किसी भी मामले में जब न्याय का द्वार खटखटाया जाता है तो उसमे मामले की कानूनी पड़ताल करना और क़ानून के दायरे में फैसला प्राप्त करना ही अपेक्षित होता है। लेकिन न्याय की पीठ पर बैठे लोग हैं तो इंसान ही, इंसान होने के नाते उनकी व्यक्तिगत रुचियाँ और धारणाएं भी होंगी। लेकिन एक अच्छा न्यायाधीश वही है जो अपने निर्णयों को व्यक्तिगत रुचियों और धारणाओं से प्रभावित न होने दे।  मेरी दृष्टि में माननीय न्यायाधीश द्वारा उपर्युक्त टिप्पणी बिलकुल अनावश्यक थी।  ऐसी अनेकों टिप्पणियां आप लोग भी सुनते रहे होंगे, जैसे राजस्थान के एक जज साहब ने एक बार मोर-मोरनी के गर्भ धारण के लिए एक हास्यास्पद  और अनावश्यक टिप्पणी कर दी थी, मोरनी मोर के आंसू पी कर गर्भवती हो जाती है। चाहे ऐसा हो या न हो, ये लोगों का विश्वास हो सकता है लेकिन ये बिलकुल अनावश्यक टिप्पणी थी।  सर्वोच्च न्यायालय को सभी न्यायाधीशों को ऐसी सलाह जरूर देनी चाहिए कि वे अपनी व्यक्तिगत धारणाओं और रुचियों को न्यायिक क...

आप प्रतिक्रिया क्यों नहीं देते, क्योंकि आप वो हैं ही नहीं

 जो था नहीं उसे पूजा गया, जो है नहीं उसे पूछा गया ———————————————————— रिपोर्टर उस आदमी से पूछ रहा था कि भाई, किसी शुक्ला जी ने आपके सिर पर पेशाब कर दिया तो आपको वो वीडियो देख कर बुरा नहीं लगा?  “क्यों लगेगा? जब मैं वो हूं ही नहीं, जो वीडियो में है तो मुझे बुरा क्यों लगेगा?” “आप वो नहीं हैं?” “मुझे तो बिल्कुल याद नहीं कि वो मैं हूं या किसी ने मेरे सिर पर कभी पेशाब किया था।” “फिर सरकार ने आपको अपने घर बुला कर आपके पांव पखारे। आपकी तस्वीर देश भर में जारी की गई। कहा गया कि अब सिर पर पेशाब का पाप धुल गया है। सुना कि आपको कुछ इनाम वगैरह भी मिला है। फिर वो क्या था?” “साहब, हमें नहीं मालूम। वो तो एसपी साहब, कलेक्टर साहब ने मुझे बताया कि वो तुम्हीं हो जिसके सिर पर शुक्ला ने पेशाब किया था। तुम चलो सरकार के बंगले पर। तुम्हारा सम्मान किया जाएगा। तुम्हें इनाम मिलेगा। तुम मशहूर हो जाओगे, तो मैं चला गया।” कमाल है, आदमी ही बदल दिया गया। और वाहवाही लूट ली गई? सरकार के लिए कुछ भी बदल देना कौन-सी बड़ी बात है।  छोड़िए ये तो उस युवक के एक टीवी इंटरव्यू का हिस्सा है, जिसे मध्य प्रदेश में सिर ...

अरे सत्ताधारियों , मतदाताओं का अपमान मत करो

 भारत के मतदाता अंधे और बहरे समझ लिए गए हैं।  उन्हें बताया जाता है कि कांग्रेस एक परिवार की पार्टी है, इस परिवारवादी को भ्रष्टाचार का भी स्रोत बताया जाता है।  भारत के लोग नहीं जानते कि बीजेपी में कोई नेता ऐसा भी हो सकता है, जिसके माता, पिता, बहन, भाई, पति, पत्नी आदि कोई भी रिश्तेदार राजनीती में हो, क्योंकि बीजेपी तो परिवारवाद के विरुद्ध है।  भारत के लोग नहीं जानते कि इलेक्टोरल बांड की व्यवस्था ऐसी बनायी गयी है कि कोई भी कम्पनी कितना भी चंदा किसी पार्टी को दे सकती है और उसे उस पार्टी का नाम या दी गयी धनराशि प्रकट नहीं किया जाएगी। भारत के लोग नहीं जानते कि देश के एक अकेले बीजेपी दल को अन्य सभी दलों को कुल मिले चंदे से तीन गुने से भी अधिक चंदा मिलता है। और भारत के लोग ये भी नहीं जानते कि सत्ताधारियों को मिलने वाला चंदा कोई कम्पनी क्यों देती है और बदले में क्या पाती है। 

नेपोटिस्म इन इंडिया

 क्या भारतीय उपमहाद्वीप में आप किसी व्यक्ति को परिवारवाद से मुक्त मान सकते हैं? क्या इस उप महाद्वीप में भ्रष्टाचार वास्तव में कोई मुद्दा है? क्या इस महाद्वीप में स्त्री हो या पुरुष, बेटा , बहु, सास ससुर, दामाद, भाई बहन, अडोसी पडोसी सब एक दूसरे की तुष्टिकरण के लिए संकल्पबद्ध नहीं ? मोदी जी पता नहीं क्यों भारतीय मानसिकता को नहीं समझ पा रहे हैं? असल में वो सीधे सीधे नाम लेने से बचते हैं, वो कहना ये चाहते हैं कि नेहरू, इंदिरा, राजीव, और अब राहुल को पार्टी में मुख्य चेहरा समझने वाली पार्टी यानि कांगेस एक परिवार की पार्टी है, और भ्रष्टाचार तथा मुस्लिमों और दलितों को तुष्टिकरण की नीतियों से रिझा कर बरसों से सत्ता पर काबिज रही है।  इसलिए मोदी जी के अनुयायी गण  भ्रमित न हों, उन्हें बीजेपी में शामिल नेताओं के परिवारवादी होने, या भ्रष्ट होने अथवा अपने वोटबैंक के लिए तुष्टिकरण की नीतियां अपनाने में कोई ऐतराज न था और न होगा।  उनके भाषणों से कुछ विरोधी लोग बेकार ही चिल पों मचाने लगते हैं, इसलिए मैंने उनको समझने के लिए ये पोस्ट लिख दी है। आप जब चाहे बीजेपी ज्वाइन कर लें, आप से नहीं...

यूनिफार्म सिविल कोड बनाम हिन्दू कोड बिल

१९५५ में हिन्दू कोड बिल पारित होने से पहले के हिन्दू परिवारों में पुरुषों को बहुपत्नी रखने पर कोई प्रतिबंध नहीं था। हिन्दू कोड बिल को तैयार करने में डॉक्टर भीम राव आंबेडकर की बड़ी भूमिका रही थी, उन्होंने स्वयं हिन्दू धर्म में खुद पर और अनेकों महिलाओं पर हुए भेदभाव को महसूस किया था इसलिए वे इसमें बड़े बदलाव के पक्षधर थे, लेकिन हिन्दू महासभा और कांग्रेस के भी कई वरिष्ठ नेता डॉ  आंबेडकर द्वारा प्रस्तावित हिन्दू कोड बिल के विरोध में थे. डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद, श्यामा प्रसाद मुखर्जी , सरदार पटेल, इस विरोध में अधिक मुखर थे और जवाहर लाल नेहरू इस कोड के पक्ष में होते हुए भी सबको साथ लेकर चलने की कोशिश में इस कोड को थोड़ा कमजोर रखने के पक्ष में थे इस बात से नाराज डॉ आंबेडकर ने कानून मंत्री के पद से इस्तीफ़ा भी दे दिया।  आज यूनिफार्म सिविल कोड की चर्चा जोर पकड़ रही है, नेहरू की ही तरह मोदी जी की भी परीक्षा है, हिन्दू कोड बिल की चर्चा ने हिन्दुओं के कमजोर वर्ग यानि महिलाओं और दलितों में नेहरू की लोकप्रियता बढ़ा दी थी, और पहले आम चुनाव में उन्हें इतना मजबूत नेता बना दिया था कि उन्होंने हिन्दू क...

विभिन्न पर्सनल लॉ को डिस्टर्ब किये बिना

 यूनिफार्म सिविल कोड भारत के संविधान के नीति निर्देशक सिद्धांतों में दिए गए संविधानिक वचन को निभाने के लिए लाना ही चाहिए।  लेकिन भारत की विविधता को भी स्वीकार करना भारत के संविधान में ही वचनबद्धता है।  इसका सीधा सा उपाय ढूंढना पड़ेगा। जैसे कोई किसी भी विधि से किसी भी सामजिक रीति रिवाज से विवाह करे, लेकिन उस शादी/विवाह/मैरिज को सरकारी संस्था/विवाह अधिकारी के पास पंजीकरण कराया जाना अनिवार्य हो। केवल पंजीकृत विवाह को ही किसी भी कोर्ट में मान्य समझा जाएगा, अतः बिना पंजीकृत कराये, उस विवाह के विच्छेद यानि तलाक आदि का मामला अदालत में नहीं लाया जा सकेगा। सामाजिक संस्थाएं जो भी समाधान निकालेंगी, उनको चुनौती दिए जाने पर कोर्ट तभी दखल देगा जब विवाह पंजीकृत हुआ हो. इसी प्रकार जब तक सम्पत्ति के विभाजन के सम्बन्ध में परिवार में सहमति है, तो सरकार उसमे कोई दखल नहीं दे। लेकिन यदि किसी पक्ष द्वारा सम्पत्ति पर अपना दावा पेश किया जाता है तो उत्तराधिकारियों का निर्धारण, बिना लिंगभेद के, बिना आयु और वैवाहिक स्टेटस में भेद के, किया जाएगा।  संतान पिता और माता दोनों की संपत्ति में उत्तराधिक...

आदमी बदल गया तो क्या हुआ

रिपोर्टर उस आदमी से पूछ रहा था कि भाई, किसी शुक्ला जी ने आपके सिर पर पेशाब कर दिया तो आपको वो वीडियो देख कर बुरा नहीं लगा?  “क्यों लगेगा? जब मैं वो हूं ही नहीं, जो वीडियो में है तो मुझे बुरा क्यों लगेगा?” “आप वो नहीं हैं?” “मुझे तो बिल्कुल याद नहीं कि वो मैं हूं या किसी ने मेरे सिर पर कभी पेशाब किया था।” “फिर सरकार ने आपको अपने घर बुला कर आपके पांव पखारे। आपकी तस्वीर देश भर में जारी की गई। कहा गया कि अब सिर पर पेशाब का पाप धुल गया है। सुना कि आपको कुछ इनाम वगैरह भी मिला है। फिर वो क्या था?” “साहब, हमें नहीं मालूम। वो तो एसपी साहब, कलेक्टर साहब ने मुझे बताया कि वो तुम्हीं हो जिसके सिर पर शुक्ला ने पेशाब किया था। तुम चलो सरकार के बंगले पर। तुम्हारा सम्मान किया जाएगा। तुम्हें इनाम मिलेगा। तुम मशहूर हो जाओगे, तो मैं चला गया।” कमाल है, आदमी ही बदल दिया गया। और वाहवाही लूट ली गई? सरकार के लिए कुछ भी बदल देना कौन-सी बड़ी बात है। ये  उस युवक के एक टीवी इंटरव्यू का हिस्सा है, जिसे मध्य प्रदेश में सिर पर पेशाब कांड के बाद सकार ने घर बुला कर इज्जत बख्शी।  #SanjaySinha #ssfbFamily

यूनिवर्सल सिविल कोड

 विवाह, तलाक़, संपत्ति का बँटवारा मुख्य रूप से ये तीन विषय है, जो सिविल कोड द्वारा निर्धारित होते हैं । किसी भी देश में अलग अलग पृष्ठभूमि के लोग रहते हैं। ये पृष्ठभूमि उनके धर्म, उनके पूर्वजों के मूल निवास, उनकी भाषा में लिखे गये साहित्य या उनकी भाषा में लिखे,रचे, बसे लोकगीतों से निर्धारित होती है। जिन देशों ने अपना कोई राष्ट्रीय धर्म घोषित नहीं किया हुआ है, उनके नागरिकों को अपनी अपनी पृष्ठभूमि के अनुसार विवाह, तलाक़, संपत्ति विभाजन जैसे पारिवारिक मसलों को निपटाने की स्वतंत्रता प्राप्त है।  जिन देशों ने स्वयं को इस्लामिक या ईसाई या किसी धर्म से संचालित घोषित किया हुआ है, उन देशों के नागरिक अपने पारिवारिक मामलों के लिए अपने राष्ट्रीय धर्म के रिवाजों, धर्मग्रन्थों  में वर्णित विधियों का ही पालन करते हैं। भारत में अलग अलग राज्यों में, एक ही धर्म के लोग भी अलग अलग परंपराओं में अपने पारिवारिक मसलों का हल तलाश करते हैं। उदाहरण के लिए हरियाणा में पिता की मृत्यु के बाद पुत्र और पुत्री दोनों को विरासत में संपत्ति का समान अधिकार प्राप्त है लेकिन हरियाणा से सटे उत्तर प्रदेश में परंप...

समलैंगिकता और विवाह पर प्रचलित बहस

 समलैंगिकता और विवाह  सर्वोच्च न्यायालय में उपर्युक्त विषय पर बहस के कारण यह विषय अन्य मंचों पर भी बहस के केंद्र में आ गया है. प्रचलित कानून, संविधान, धर्म और समाज इन चार के नजरिए से इस पर चर्चा की जा सकती है. इस समय भारत में प्रचलित कानून केवल विपरीत लिंगियों को ही विवाह की अनुमति देता है. इसीलिए कानून में संशोधन की मांग होमोसेक्सुअल तथा उभय लिंगियों द्वारा की गई है. कानून बनाने का अधिकार संसद के पास है और कानून की संविधान सम्मत समीक्षा का अधिकार न्यायालय के पास . संविधान लोगों को, विशेषकर वयस्क लोगों को साथ रहने, और वैयक्तिक गोपनीयता को सुरक्षा का अधिकार देता है. इस नाते कोई भी दो या अधिक वयस्क समलिंगी, उभयलिंगी यदि साथ रहना चाहें तो इसमें कोई बाधा नहीं है. बाधा उनके साथ रहने को विवाह का नाम देने पर है . विवाह एक सामाजिक संस्था है और अनेकों धार्मिक क्रिया कलापों में इस संस्था के कारण संबंधित लोगों के कर्तव्य और अधिकार वर्णित किए गए हैं. इनमें दो पक्ष पुरुष और स्त्री के रूप में इंगित हैं. सर्वोच्च न्यायालय में बहस इसे किस नतीजे पर ले जाएगी, ये देखना दिलचस्प होगा.

Caste system in India is a curse

 जाति क्या होती है, क्यों होती है, भारतीय उपमहाद्वीप के बाहर भी होती है क्या? वर्ण के बारे में भी हमें भ्रम होता रहा है। वर्णभेद को हम कलर डिस्क्रिमिनेशन समझते हैं। श्वेत वर्ण, गौर वर्ण, श्याम वर्ण, ताम्रवर्ण, रक्तवर्ण, पीतवर्ण - ऐसे लोग दुनिया के अलग अलग देशों में पाए जाते हैं। बाद में लोगों ने समझाया कि पश्चिमी जगत के रेसिज्म और भारत के वर्णभेद में अंतर है। भारत के वर्ण कथित ईश्वर के अलग अलग अंगों से उत्पन्न नस्लों को कहा जाता है, जिन्हें अलग अलग कार्य करने का निर्देश ईश्वर से ही प्राप्त है। किसी को सिर्फ मुंह और जबान चलाना है। किसी दूसरे को हाथ पैर यानी लात घूंसे चलाने है। किसी तीसरे को बस पेट भरना है और ला ला करना है और चौथे वर्ण को बाकी तीन के फैलाए रायते को समेटना है। चलो रंगभेद या वर्णभेद आधा अधूरा समझ लें या बिना समझे ही हां में हां मिला दें। लेकिन जातियां - इन्हें समझना मेरे तो बस की बात नहीं । कोई बता रहा था कि पैतृक व्यवसाय को औलादों द्वारा अपनाने से जातियां बन गईं। अब समस्या ये है कि व्यवसाय निरंतर बढ़ते जा रहे हैं और जातियों की सीमा, आई मीन, संख्या सरकार ने गजट से निर...