सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

एंगर मैनेजमेंट

“क्रोध” को हमारे संत महात्माओं ने छ: विकारों में गिना है।

शेष पाँच विकारों के नाम हैं, काम, लोभ, मोह, भय और अहंकार। कुछ लोग पाँच विकार गिनाते हैं, वे अहंकार को विकारों में नहीं गिनते , अपितु अहं के पाँच दरबारियों के रूप में काम, क्रोध, लोभ, मोह और भय की गिनती करते हैं ।

कामना पूर्ण न हो तो क्रोध का जन्म होता है। हम चाहते हैं कि सब कुछ हमारे मन मुताबिक ही हो । मन मुताबिक न होने पर हमे क्रोध आ जाता है ।

लोभ पूरा न हो तब भी क्रोध आ सकता है। मोह भंग हो जाये तो भी क्रोध आ सकता है। कई बार कुछ खोने का भय प्रतिक्रियात्मक रूप में क्रोध की तरह व्यक्त हो जाता है। इस प्रकार पांचों विकार एक दूसरे को सपोर्ट करते हैं।

आजकल विज्ञान का युग है और शरीर विज्ञान की एक शाखा में क्रोध का भी अध्ययन किया गया है, इसके अनुसार क्रोध का मुख्य जनक अमिगडाला (Amygdala) नामक मस्तिष्क का भाग है। यह मस्तिष्क के लिम्बिक सिस्टम का हिस्सा है, जो हमारी भावनाओं और विशेष रूप से फाइट-या-फ्लाइट प्रतिक्रिया को नियंत्रित करता है। जब व्यक्ति किसी खतरे या तनाव का अनुभव करता है, तो अमिगडाला सक्रिय हो जाता है और शरीर में कई शारीरिक प्रतिक्रियाएँ शुरू कर देता है।

क्रोध के दौरान शरीर में निम्नलिखित प्रभाव पड़ते हैं:

1. स्नायविक प्रतिक्रिया:

      •   क्रोध के समय स्ट्रेस हार्मोन (जैसे एड्रेनालिन और कॉर्टिसोल) की मात्रा बढ़ जाती है, जिससे हृदय गति और रक्तचाप बढ़ जाता है।

2. हृदय और रक्तचाप पर प्रभाव:

      •   हृदय अधिक तेज़ी से धड़कने लगता है।

      •   रक्तचाप में वृद्धि होती है, जिससे हृदय रोगों का खतरा बढ़ जाता है।

3. मांसपेशियों का तनाव:

      •   क्रोध के समय मांसपेशियाँ तनावग्रस्त हो जाती हैं, खासकर गर्दन, कंधे और पीठ की मांसपेशियाँ।

4. पाचन तंत्र पर प्रभाव:

      •   क्रोध पाचन प्रक्रिया को धीमा कर सकता है, जिससे एसिडिटी और पेट की अन्य समस्याएँ हो सकती हैं।

5. प्रतिरक्षा तंत्र पर प्रभाव:

      •   लगातार क्रोध की स्थिति में शरीर की इम्यूनिटी कमजोर हो जाती है, जिससे व्यक्ति जल्दी बीमार पड़ सकता है।

6. मस्तिष्क पर प्रभाव:

      •   लंबे समय तक क्रोध में रहने से डिप्रेशन, एंग्जायटी और अनिद्रा जैसी मानसिक समस्याएँ हो सकती हैं।

7. त्वचा पर प्रभाव:

      •   क्रोध के दौरान रक्त का प्रवाह त्वचा की सतह पर कम हो जाता है, जिससे त्वचा पर लालिमा, मुंहासे और अन्य समस्याएँ हो सकती हैं।

इसलिए हमे क्रोध को नियंत्रित करना भी आना चाहिए।


   गहरी साँस लेना और ध्यान करना और ठंडा पानी पीना एक तात्कालिक उपचार हैं।

अपने विचारों को लिखना और उन्हें साकार  में परिवर्तित करना भी सहायक होता है।

 परामर्श (मनोवैज्ञानिक)या थेरेपी (दवाओं) की मदद लेना भी कारगर होता है।


शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए क्रोध को नियंत्रित करना आवश्यक है, क्योंकि अनियंत्रित क्रोध दीर्घकालिक स्वास्थ्य समस्याएँ पैदा कर सकता है।


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

सच्ची कहानी, नायिका की जुबानी

डिस्क्लेमर:- प्रस्तुत कहानी में संयोग से किसी की जिंदगी से कोई घटनाएं या नाम , मेल खा सकती हैं, दिए गए नाम और स्थान सब असल दुनिया में हैं, लेकिन जरुरी नहीं कि ये इस कहानी में लिखे पात्रों की असल जिंदगी हो। कहानी का उद्देश्य केवल आज के उत्तर भारत के गाँवों की महिलाओं के एक पहलू पर प्रकाश डालना है।  + "मैं तब सोलह बरस की थी, दसवीं की बोर्ड की परीक्षा सर पर थी।  गाँव में अडोसी पडोसी नहीं होते, बल्कि चाची ताई, भैया भाभी होते हैं। मतलब सब एक ही खानदान के लोग होते हैं तो रिश्तेदार ही होते हैं, शहर की तरह हम यहाँ किसी के नाम या पद से नहीं , रिश्ते से एक दूसरे से सम्बोधित करते हैं। तो ऐसे ही हमारी एक चाची थीं जो उम्र में मुझ से ४ या ५ साल बड़ी थीं, उनकी शादी को साल भर ही हुआ था. बड़ी हंसमुख थीं, मेरी उनसे खूब पटती  थी, वो मुझे चिड़िया बुलाती थीं क्योंकि मैं चिड़िया की तरह हर समय चूं चूं करती फुदकती फिरती थी, हालांकि मेरे पापा मुझे गुड़िया बुलाते थे, वैसे मेरा नाम सुषमा है। चाची जी की एक बड़ी बहन थीं जिनका बेटा हरी, चाची की ही उम्र का था, और  १२वीं में पढता था और उसके भी बोर्ड की प...

ghost story

Ghost का अर्थ भूत बताया जाता है, अंग्रेजी में इसे "जो वास्तव में अस्तित्व में नहीं है, या जो था पर अब नहीं है" के अर्थ में लिया जाता है। भूत को हिंदी में "बीता हुआ", या "अतीत" के अर्थ में लिया जाता है.   ghostwriting का भी चलन इन दिनों है। और इतना है कि अब इसके विज्ञापन भी आने लगे हैं कि अपनी कहानी ghostwriters से लिखवाइए। यानि कहानी के लिए बस कंटेंट आप उपलब्ध करा दीजिये और पैसा लेकर आपकी कहानी आपकी जुबानी भाषा और लेखन विशेषज्ञ लिख देंगे।   मेरे पास भी एक घोस्ट आया, यूँ कहिये कि मेरे एक प्रियजन ने मुझ से कहा कि क्या आप मेरी कहानी लोगों को बता सकते हैं, मैंने कहा कुछ दिलचस्प हुआ तो कोशिश करूंगा, लेकिन मैं कोई स्थापित लेखक नहीं हूँ और मैं कहानीकार के रूप में स्थापित भी नहीं, इसलिए किसी कुशल लेखक के पास क्यों नहीं करते, उसने कहा कि क्योंकि वे बड़े मंहगे हैं और मेरे पास देने को दमड़ी भी नहीं, और फिर मुझे जितना आप जानते हैं उतना मेरे परिवार के लोग भी नहीं जानते तो आप मेरी बात शायद बेहतर लिख सकें। और मैंने हाँ भर दी।   " मैं छोटी सी थी, गाँव में रहती थी ,...

व्यापार संसार को लील रहा है

सोशल मीडिया एक बहुत बड़ा मंच है। ये बड़ा इसलिए है कि यहां कोई भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पूरा पूरा लाभ उठा सकता है और उठा रहा है। इन मंचों के संचालकों ने आत्मानुशासन के लिए कुछ रेस्ट्रिक्शन्स रखी हुई हैं लेकिन ये रेस्ट्रिक्शन्स तभी काम में लाइ जाती हैं, जब कोई इन पर आपत्ति  दर्ज कराता है।  और ये जरुरी नहीं है कि हर आपत्ति पर मंच संचालक रेस्ट्रिक्शन लागू ही करे। कई बार उनका आपत्ति करने वाले को जवाब आता है कि उनके स्टैंडर्ड्स के अनुसार कंटेंट आपत्तिजनक नहीं पाया गया।  अब ये स्टैण्डर्ड कौन बनाता है। हर देश/प्रदेश/समाज के अपने अपने स्टैंडर्ड्स होते हैं, अपने अपने सामजिक नियम और परम्पराएं होती हैं। मंच संचालक जिस देश में बैठे हैं, वे उस देश के स्टैंडर्ड्स को दुनिया भर में थोप रहे होते हैं।  ये सांस्कृतिक आक्रमण/अतिक्रमण जैसा समझिये। अमेरिका में बैठे लोग अपने स्टैंडर्ड्स सारी दुनिया पर थोप रहे हैं क्यों कि फेसबुक, ट्विटर/x , व्हाट्सप्प, इंस्टाग्राम, टेलीग्राम सब का सञ्चालन अमेरिका से हो रहा है।  अच्छा लगता है कि हमें अपनी अभिव्यक्ति के लिए एक बड़ा मंच मिल जाता है और ...