जलवायु परिवर्तन: जब अपराधी नियम बनाते हैं और दुनिया सज़ा भुगतती है
जलवायु परिवर्तन को अब भी यदि “प्राकृतिक संकट” कहा जाता है, तो यह एक सुविधाजनक झूठ से अधिक कुछ नहीं। यह संकट प्राकृतिक नहीं, बल्कि योजनाबद्ध, लाभ-केन्द्रित और सत्ता-संरक्षित मानवीय गतिविधियों का परिणाम है। इसके बावजूद, विडंबना यह है कि जिन देशों और उद्योगों की भूमिका इस विनाश में निर्णायक रही है, वही आज वैश्विक मंचों पर सबसे अधिक नैतिक भाषण देते दिखाई देते हैं — और वास्तविक प्रतिबंधों से उतनी ही कुशलता से बच निकलते हैं।
बीते एक शताब्दी में औद्योगिक समृद्धि का जो मॉडल विकसित हुआ, वह सस्ते संसाधनों, असीमित उपभोग और पर्यावरणीय लागत की उपेक्षा पर आधारित था। इस विकास का लाभ कुछ मुट्ठी भर देशों और कॉरपोरेट घरानों को मिला, लेकिन इसकी कीमत पूरी पृथ्वी चुका रही है। समुद्र का बढ़ता स्तर, असामान्य मौसम, सूखा, बाढ़ और खाद्य असुरक्षा — ये सब उस ‘विकास’ के दुष्परिणाम हैं, जिसे अब भी सफलता की कहानी की तरह प्रस्तुत किया जाता है।
अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरणीय संगठन इस वास्तविकता से अनभिज्ञ नहीं हैं। रिपोर्टें लिखी जाती हैं, चेतावनियाँ दी जाती हैं, लक्ष्य निर्धारित किए जाते हैं। लेकिन जब बात उन लक्ष्यों को बाध्यकारी बनाने की आती है, तो वैश्विक व्यवस्था अचानक अत्यंत विनम्र और लाचार हो जाती है। प्रतिबंध “सिफ़ारिश” बन जाते हैं और उल्लंघन पर लगाया जाने वाला दंड अक्सर केवल आर्थिक जुर्माने तक सिमट कर रह जाता है।
यही वह बिंदु है जहाँ यह पूरी प्रणाली नैतिक रूप से ढह जाती है।
आर्थिक जुर्माना उन उद्योगों के लिए दंड नहीं होता जिनका वार्षिक मुनाफ़ा कई देशों के सकल घरेलू उत्पाद से अधिक है। ऐसे जुर्माने उनके लिए उत्पादन लागत का एक और मद भर होते हैं — ठीक वैसे ही जैसे कच्चा माल या परिवहन खर्च। पर्यावरण को होने वाला अपूरणीय नुकसान, मानव जीवन पर पड़ने वाले दूरगामी प्रभाव और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को गिरवी रख देना — इन सबकी कीमत कुछ अंकों में तय कर देना, स्वयं में एक गहरी नैतिक विफलता है।
यह प्रश्न अनिवार्य रूप से उठता है कि जब किसी कारखाने की लापरवाही से नदी ज़हरीली हो जाती है, खेत बंजर हो जाते हैं और पीने का पानी असुरक्षित हो जाता है, तो उसे केवल आर्थिक अपराध क्यों माना जाए? जब किसी उद्योग की कार्बन-उत्सर्जन नीति के कारण पूरे द्वीप राष्ट्र अस्तित्व के संकट में आ जाते हैं, तो क्या यह मानवता के विरुद्ध अपराध नहीं है?
वास्तविक समस्या यह नहीं है कि नियम मौजूद नहीं हैं, बल्कि यह है कि नियम बनाने वालों और नियम तोड़ने वालों के बीच अक्सर वही लोग होते हैं। अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर वही शक्तिशाली देश सबसे प्रभावी भूमिका निभाते हैं, जिनकी अर्थव्यवस्थाएँ आज भी जीवाश्म ईंधनों और अति-उपभोग पर टिकी हैं। परिणामस्वरूप, नियम इतने लचीले बना दिए जाते हैं कि उनका उल्लंघन करना आसान और सज़ा से बच निकलना लगभग सुनिश्चित हो जाता है।
इस व्यवस्था का सबसे क्रूर पहलू यह है कि इसका भार उन देशों और समुदायों पर पड़ता है, जिनकी भूमिका इस संकट को पैदा करने में नगण्य रही है। विकासशील देश, गरीब किसान, तटीय इलाकों में रहने वाले लोग और भविष्य की पीढ़ियाँ — ये सब उस उत्सव की कीमत चुका रहे हैं, जिसमें उन्हें कभी आमंत्रित ही नहीं किया गया।
यदि जलवायु परिवर्तन को सचमुच गंभीरता से लेना है, तो सोच की दिशा बदलनी होगी। पर्यावरणीय उल्लंघनों को केवल नियामक चूक नहीं, बल्कि आपराधिक कृत्य मानना होगा। बड़े पैमाने पर प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों और उनके निर्णयकर्ताओं की व्यक्तिगत जवाबदेही तय करनी होगी। व्यापारिक प्रतिबंध, अंतर्राष्ट्रीय न्यायिक प्रक्रिया और वैश्विक स्तर पर बाध्यकारी दंड — ये विकल्प असभ्य नहीं, बल्कि अपरिहार्य हैं।
यह तर्क दिया जाता है कि कठोर कदम उठाने से आर्थिक विकास प्रभावित होगा। लेकिन यह प्रश्न शायद अधिक प्रासंगिक है कि यदि पृथ्वी ही रहने योग्य न रही, तो उस विकास का क्या मूल्य बचेगा? मुनाफ़ा, चाहे कितना भी विशाल क्यों न हो, मानव अस्तित्व से बड़ा नहीं हो सकता — और यदि कोई व्यवस्था ऐसा मानती है, तो उस व्यवस्था पर पुनर्विचार करना अनिवार्य है।
जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में आज की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं है कि हमें समाधान नहीं पता, बल्कि यह है कि समाधान ज्ञात होने के बावजूद उन्हें लागू करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव है। और यह अभाव कोई भूल नहीं, बल्कि एक सचेत चयन है — ऐसा चयन, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए दुनिया को अधिक असुरक्षित, अधिक असमान और अधिक क्रूर बनाता जा रहा है।
यदि आज भी संपन्न देश और बड़े उद्योग यह मानते हैं कि कुछ जुर्माने भर कर वे इतिहास से बरी हो सकते हैं, तो यह भ्रम उन्हें महँगा पड़ेगा। प्रकृति न तो मोलभाव करती है, न ही छूट देती है। देर-सबेर, उसका हिसाब सभी को चुकाना पड़ता है — और तब न जुर्माने काम आएँगे, न सम्मेलन।
डिस्क्लेमर:- प्रस्तुत कहानी में संयोग से किसी की जिंदगी से कोई घटनाएं या नाम , मेल खा सकती हैं, दिए गए नाम और स्थान सब असल दुनिया में हैं, लेकिन जरुरी नहीं कि ये इस कहानी में लिखे पात्रों की असल जिंदगी हो। कहानी का उद्देश्य केवल आज के उत्तर भारत के गाँवों की महिलाओं के एक पहलू पर प्रकाश डालना है। + "मैं तब सोलह बरस की थी, दसवीं की बोर्ड की परीक्षा सर पर थी। गाँव में अडोसी पडोसी नहीं होते, बल्कि चाची ताई, भैया भाभी होते हैं। मतलब सब एक ही खानदान के लोग होते हैं तो रिश्तेदार ही होते हैं, शहर की तरह हम यहाँ किसी के नाम या पद से नहीं , रिश्ते से एक दूसरे से सम्बोधित करते हैं। तो ऐसे ही हमारी एक चाची थीं जो उम्र में मुझ से ४ या ५ साल बड़ी थीं, उनकी शादी को साल भर ही हुआ था. बड़ी हंसमुख थीं, मेरी उनसे खूब पटती थी, वो मुझे चिड़िया बुलाती थीं क्योंकि मैं चिड़िया की तरह हर समय चूं चूं करती फुदकती फिरती थी, हालांकि मेरे पापा मुझे गुड़िया बुलाते थे, वैसे मेरा नाम सुषमा है। चाची जी की एक बड़ी बहन थीं जिनका बेटा हरी, चाची की ही उम्र का था, और १२वीं में पढता था और उसके भी बोर्ड की प...
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