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Caste system in India is a curse

 जाति क्या होती है, क्यों होती है, भारतीय उपमहाद्वीप के बाहर भी होती है क्या?

वर्ण के बारे में भी हमें भ्रम होता रहा है। वर्णभेद को हम कलर डिस्क्रिमिनेशन समझते हैं। श्वेत वर्ण, गौर वर्ण, श्याम वर्ण, ताम्रवर्ण, रक्तवर्ण, पीतवर्ण - ऐसे लोग दुनिया के अलग अलग देशों में पाए जाते हैं। बाद में लोगों ने समझाया कि पश्चिमी जगत के रेसिज्म और भारत के वर्णभेद में अंतर है। भारत के वर्ण कथित ईश्वर के अलग अलग अंगों से उत्पन्न नस्लों को कहा जाता है, जिन्हें अलग अलग कार्य करने का निर्देश ईश्वर से ही प्राप्त है। किसी को सिर्फ मुंह और जबान चलाना है। किसी दूसरे को हाथ पैर यानी लात घूंसे चलाने है। किसी तीसरे को बस पेट भरना है और ला ला करना है और चौथे वर्ण को बाकी तीन के फैलाए रायते को समेटना है।

चलो रंगभेद या वर्णभेद आधा अधूरा समझ लें या बिना समझे ही हां में हां मिला दें। लेकिन जातियां - इन्हें समझना मेरे तो बस की बात नहीं ।

कोई बता रहा था कि पैतृक व्यवसाय को औलादों द्वारा अपनाने से जातियां बन गईं। अब समस्या ये है कि व्यवसाय निरंतर बढ़ते जा रहे हैं और जातियों की सीमा, आई मीन, संख्या सरकार ने गजट से निर्धारित कर रखी है। और दूसरी समस्या ये कि पिता की जाति ही संतान की जाति मानी जायेगी। जबकि संतान पिता का व्यवसाय अपनाती भी नहीं।

मास्टरजी, यानि पंडित का बेटा फौज में भर्ती हो गया। पिता ब्राह्मण और बेटा क्षत्रिय, बेरोजगारी के जमाने में पोते ने सफाई कर्मी की सरकारी नौकरी कर ली । व्यवसाय के हिसाब से उसे शुद्र माना जाना चाहिए लेकिन सरकार उसे अनुसूचित जाति में शामिल करने को तैयार ही नहीं।

बड़ा कंफ्यूजन है, गर्व करने में भी बड़ी दिक्कत आ रही है । अब रिंकू सिंह ने क्रिकेट को पेशा बना लिया, और ५ गेंद में ५ छक्के क्या जड़ दिए, जाट, सैनी, राजपूत, ब्राह्मण और जाने किन किन जातियों ने अपनी जाति में शामिल करके गर्व करना शुरू कर दिया। कोई ये मानने को तैयार ही नहीं कि उसका धर्म क्रिकेट, उसका भगवान सचिन और उसकी जाति बैटिंग है । क्योंकि सरकारी गजट में ये धर्म और जाति लिखे ही नहीं है।

जातिगत जनगणना भी मुझे तो भ्रामक लगती है। किसी और के बारे में क्या बताऊं, मेरे अपने गांव में बहुसंख्यक समाज खुद को अहीर कहता है, लेकिन जब बात शादी विवाह की चलती है कि इस कथित जाति में भी पता नहीं कितनी श्रेणियां हैं, सब एक दूसरे को नीचा बताने में लगी हैं। वैसे ब्राह्मणों में भी ऐसे वर्गीकरण हैं, कान्यकुब्ज, सरयूपारीण, भारद्वाज, तिवारी, चौबे, पांडे, छोटी धोती, बड़ी धोती जाने क्या क्या सुनते रहते हैं। होंगे तो ये गोत्र लेकिन ऊंचनीच की छेड़छाड़ इनमें भी सुनाई देती है । वो जो मैने अहीर के बारे में लिखा , वो सभी जातियों में भेद भाव है, कहीं नदी पार के नाम पर, कहीं क्षेत्र के नाम पर।अहीर, अहर, अहार, घोस, घोसी, गोप, कमरिया, चौधरी, यादव, मंडल, यदुवंशी, जाधव, जादौन, राव आदि अनगिनत जाति या उपजाति हैं। इसके अलावा चौबिसा के, खोले के, बारह के, पार के, पुरबिया जैसे नाम भी रख रखे हैं और हर वर्ग अन्य वर्गो को हेय बताता है ।

इसलिए भाइयों बहनों, मोदी कोई जाति विशेष नहीं है। पारसियों में भी एक फिल्मकार सोहराब मोदी हुए हैं। ऐसे ही जैसे तोमर राजपूत भी होते हैं, गूजर भी, जाट भी। देशवाल जाट भी हैं, पंडित भी,अहीर भी।

 सरनेम लिखना भ्रम फैलाने वाला है। सरनेम से जाति और जाति से व्यवसाय को नहीं पहचाना जा सकता। और जातियों का अपना कोई गुण नहीं होता। इसलिए ये फालतू का गर्व पालना बंद कीजिए। और राजनीतिज्ञों के जाल में मत फंसिए वो तो जातिगत जनगणना के आधार पर आपको बरगलाना चाहते हैं।

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