समलैंगिकता और विवाह
सर्वोच्च न्यायालय में उपर्युक्त विषय पर बहस के कारण यह विषय अन्य मंचों पर भी बहस के केंद्र में आ गया है.
प्रचलित कानून, संविधान, धर्म और समाज इन चार के नजरिए से इस पर चर्चा की जा सकती है.
इस समय भारत में प्रचलित कानून केवल विपरीत लिंगियों को ही विवाह की अनुमति देता है. इसीलिए कानून में संशोधन की मांग होमोसेक्सुअल तथा उभय लिंगियों द्वारा की गई है. कानून बनाने का अधिकार संसद के पास है और कानून की संविधान सम्मत समीक्षा का अधिकार न्यायालय के पास . संविधान लोगों को, विशेषकर वयस्क लोगों को साथ रहने, और वैयक्तिक गोपनीयता को सुरक्षा का अधिकार देता है. इस नाते कोई भी दो या अधिक वयस्क समलिंगी, उभयलिंगी यदि साथ रहना चाहें तो इसमें कोई बाधा नहीं है. बाधा उनके साथ रहने को विवाह का नाम देने पर है . विवाह एक सामाजिक संस्था है और अनेकों धार्मिक क्रिया कलापों में इस संस्था के कारण संबंधित लोगों के कर्तव्य और अधिकार वर्णित किए गए हैं. इनमें दो पक्ष पुरुष और स्त्री के रूप में इंगित हैं.
सर्वोच्च न्यायालय में बहस इसे किस नतीजे पर ले जाएगी, ये देखना दिलचस्प होगा.
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