कभी-कभी मेरे मन में एक बहुत साधारण-सा प्रश्न उठता है। मान लीजिए मैं भारत में बैठा हूँ। मैं भारत का नागरिक हूँ, भारत के कानूनों का पालन करता हूँ और भारत की संसद में अपने प्रतिनिधियों को चुनता हूँ। फिर दुनिया के किसी दूसरे कोने में स्थित कोई देश ऐसा कानून बनाता है, जिसका प्रभाव मेरे देश की किसी कंपनी, बैंक या मेरे जैसे किसी व्यक्ति पर भी पड़ने लगता है। तो मेरा प्रश्न है— जिस देश की संसद के लिए मैंने वोट नहीं दिया, जिस देश में मैं रहता नहीं हूँ और जिसके कानून बनाने में मेरी कोई भूमिका नहीं है, उसके कानून का प्रभाव मुझ पर क्यों पड़े? पहली नजर में यह प्रश्न अटपटा लग सकता है। लेकिन आज की दुनिया में यह केवल कल्पना नहीं है। अमेरिकी sanctions, FATCA, यूरोपीय संघ का GDPR और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं की नीतियाँ हमें यह सोचने के लिए मजबूर करती हैं कि राष्ट्रीय सीमाओं और राष्ट्रीय कानूनों के बीच पुराना संबंध क्या अब बदल रहा है? और उससे भी बड़ा प्रश्न है— क्या आधुनिक दुनिया में उपनिवेशवाद समाप्त हो गया है, या उसने केवल अपना रूप बदल लिया है? कभी सेना सीमा पार करती थी उपनिवेशवाद का पुराना चेहरा ब...