कॉकरोच जनता पार्टी, युवा और लोकतंत्र में मेरा फिर जागता विश्वास
काफी दिनों से मैं आज के युवाओं और उनकी समस्याओं को लेकर कुछ लिखने की सोच रहा था। कॉकरोच जनता पार्टी के नाम से शुरू हुए एक युवा आंदोलन ने मुझे इस विषय पर लिखने के लिए और अधिक प्रेरित किया।
शायद इस विषय को देखने का मेरा नजरिया कुछ अलग है। मैंने अपने जीवन के पाँच वर्ष शिक्षक के रूप में बिताए हैं और उसके बाद लगभग 34 वर्ष प्रशासनिक सेवा में। इसलिए छात्र आंदोलनों को मैंने केवल अखबारों की खबरों के रूप में नहीं देखा। शिक्षक के रूप में छात्रों के बीच रहते हुए उनकी बेचैनी और उनके सपनों को समझने का अवसर मिला। बाद में प्रशासनिक सेवा में रहते हुए आंदोलनों का दूसरा पक्ष भी देखा—सरकार और प्रशासन के सामने खड़ी जनता, उनकी माँगें, उनका आक्रोश और कभी-कभी उस आक्रोश को नियंत्रित करने की प्रशासनिक मजबूरियाँ।
किसानों के आंदोलन भी मैंने देखे हैं। किसान जब अपनी माँग लेकर सड़क पर आता है तो उसके पीछे केवल राजनीतिक विचारधारा नहीं होती। उसके पीछे उसकी जमीन, उसकी फसल, उसके परिवार और आने वाली पीढ़ी की चिंता होती है। प्रशासन के लिए वह कानून-व्यवस्था की चुनौती हो सकता है, लेकिन उस आंदोलनकारी के लिए वह उसके जीवन का प्रश्न होता है।
इसीलिए शायद आज जब मैं युवाओं को अपने मुद्दों के लिए सड़कों पर उतरते देखता हूँ तो मेरी पहली प्रतिक्रिया उन्हें केवल 'प्रदर्शनकारी' के रूप में देखने की नहीं होती। मैं यह समझने की कोशिश करता हूँ कि आखिर वह कौन-सी बेचैनी है जिसने उन्हें घर से निकलकर सार्वजनिक रूप से अपनी आवाज उठाने के लिए मजबूर किया है।
मेरे लिए कॉकरोच जनता पार्टी का आंदोलन इसी संदर्भ में दिलचस्प है।
पहली बार इस नाम को सुनकर मुझे भी हँसी आई थी। आखिर किसी राजनीतिक आंदोलन का नाम 'कॉकरोच जनता पार्टी' क्यों रखा जाएगा? लेकिन कुछ देर सोचने पर लगा कि शायद यही तो इस आंदोलन की पहली विशेषता है—यह पारंपरिक राजनीति की भाषा में बात ही नहीं करना चाहता।
आज का युवा अलग भाषा में संवाद करता है। वह लंबे भाषण की जगह छोटे वीडियो बनाता है, पोस्टर की जगह मीम बनाता है और राजनीतिक व्यंग्य को भी अपने विरोध का माध्यम बना लेता है।
लेकिन माध्यम चाहे कितना ही नया क्यों न हो, उसके पीछे का प्रश्न बहुत पुराना है—
क्या मेरी बात सुनी जा रही है?
मैंने छात्र आंदोलनों में भी यही प्रश्न देखा है।
मेरे शिक्षक जीवन के दौरान जब छात्र अपनी समस्याओं को लेकर आंदोलन करते थे, तो उनके तरीकों और हमारी पीढ़ी के तरीकों में अंतर जरूर था, लेकिन उनकी मूल आकांक्षा बहुत अलग नहीं थी। वे चाहते थे कि विश्वविद्यालय या सरकार उनकी बात सुने, उनकी समस्याओं का समाधान करे और उन्हें अपने भविष्य के बारे में कुछ भरोसा मिले।
बाद के वर्षों में प्रशासनिक सेवा में मैंने आंदोलनों को एक दूसरे कोण से देखा। किसी अधिकारी के सामने आंदोलनकारियों की माँगें होती हैं, कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी होती है और सरकार के निर्देश होते हैं। कभी माँग उचित होती है, कभी अतिशयोक्तिपूर्ण; कभी आंदोलन शांतिपूर्ण रहता है तो कभी स्थिति नियंत्रण से बाहर जाने लगती है।
लेकिन एक बात मैंने हमेशा महसूस की—किसी आंदोलन को केवल इसलिए समाप्त नहीं किया जा सकता कि वह असुविधाजनक है।
आंदोलन के पीछे के प्रश्न का उत्तर देना पड़ता है।
किसान आंदोलन ने भी मुझे यही सिखाया। किसान लंबे समय तक सड़क पर बैठ सकता है क्योंकि उसके लिए वह केवल एक दिन का राजनीतिक कार्यक्रम नहीं होता। उसके लिए वह अपनी आजीविका और भविष्य से जुड़ा प्रश्न होता है। प्रशासन के लिए रास्ता खुलवाना जरूरी हो सकता है, लेकिन लोकतंत्र के लिए यह भी जरूरी है कि रास्ते पर बैठे व्यक्ति की बात सुनी जाए।
शायद यही लोकतंत्र की सबसे कठिन परीक्षा है।
सरकार के लिए असहमति को सहना।
और जनता के लिए अपनी असहमति को अनुशासन और अहिंसा के साथ व्यक्त करना।
इसीलिए कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन में मुझे सबसे अधिक आकर्षित करने वाली बात उसका अहिंसक स्वरूप है।
मैंने अपने जीवन में अनेक आंदोलन देखे हैं। मैंने यह भी देखा है कि जब आंदोलन हिंसा का रास्ता पकड़ लेता है तो उसका मूल मुद्दा धीरे-धीरे पीछे चला जाता है। चर्चा होने लगती है पत्थर किसने चलाया, सरकारी संपत्ति का कितना नुकसान हुआ, पुलिस ने क्या किया और किसे गिरफ्तार किया गया।
मूल प्रश्न कहीं खो जाता है।
इसके विपरीत शांतिपूर्ण आंदोलन सरकार को उसके मूल प्रश्न के सामने खड़ा करता है।
यही कारण है कि महात्मा गांधी की अहिंसा का महत्व मेरे लिए आज भी समाप्त नहीं हुआ है। समय बदल गया है, आंदोलन की भाषा बदल गई है, तकनीक बदल गई है, लेकिन सत्ता के सामने अपनी बात रखने का शांतिपूर्ण अधिकार आज भी लोकतंत्र की आत्मा है।
कॉकरोच जनता पार्टी का आंदोलन इसी पुराने लोकतांत्रिक सिद्धांत को एक बिल्कुल नई भाषा में सामने लाता हुआ दिखाई देता है।
और शायद इसी कारण यशासिविनी राजे सिंधिया जैसी युवा महिला की इसमें भागीदारी ने मुझे विशेष रूप से प्रभावित किया।
उनकी पृष्ठभूमि को देखते हुए कोई यह अपेक्षा कर सकता था कि वे युवाओं के इस आंदोलन से दूरी बनाए रखेंगी। लेकिन उन्हें युवाओं के साथ खुलकर खड़ा देखकर मुझे लगा कि नई पीढ़ी शायद राजनीतिक पहचान की पारंपरिक सीमाओं को कुछ अलग तरीके से देख रही है।
मुझे यह बात इसलिए भी महत्वपूर्ण लगती है क्योंकि लोकतंत्र में असहमति का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि हम हमेशा अलग-अलग खेमों में बँटे रहें।
शिक्षा का प्रश्न यदि वामपंथी छात्र उठाते हैं तो क्या दक्षिणपंथी छात्र उससे असहमत होने के लिए बाध्य हैं?
किसी परीक्षा में अनियमितता का विरोध यदि किसी ऐसे संगठन द्वारा किया जाता है जिसकी विचारधारा हमसे अलग है, तो क्या हम केवल इसी कारण उस प्रश्न को गलत मान लें?
और यदि बेरोजगारी से परेशान युवा किसी ऐसे व्यक्ति के साथ खड़ा हो जाता है जिससे हमारी राजनीतिक सहमति नहीं है, तो क्या उसकी समस्या भी राजनीतिक हो जाती है?
मेरे अनुभव में इसका उत्तर 'नहीं' होना चाहिए।
किसान की फसल किसी विचारधारा की नहीं होती।
छात्र का भविष्य किसी पार्टी का नहीं होता।
और बेरोजगार युवक की चिंता किसी राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं है।
यही वह स्थान है जहाँ मुझे अभिजीत दीपके का नेतृत्व भी रोचक लगता है। एक अपेक्षाकृत युवा व्यक्ति ने सोशल मीडिया की भाषा और युवाओं की बेचैनी को समझते हुए उसे एक संगठित आवाज देने की कोशिश की। SFI जैसे छात्र संगठनों से सहयोग लेना भी इस बात का संकेत है कि मुद्दे कभी-कभी विचारधाराओं की सीमाओं को पार कर सकते हैं।
हो सकता है मैं इस आंदोलन के हर विचार से सहमत न हूँ।
हो सकता है इसके तरीके पर भी कुछ लोगों को आपत्ति हो।
लेकिन एक लोकतांत्रिक समाज में हर आंदोलन से सहमत होना आवश्यक नहीं है। आवश्यक यह है कि हमें उसके अस्तित्व और अपनी बात कहने के उसके अधिकार को स्वीकार करना चाहिए।
आज जब मैं इस आंदोलन को देखता हूँ तो मुझे अपने शिक्षक जीवन के छात्र याद आते हैं।
फिर मुझे अपने प्रशासनिक जीवन के किसान और अन्य आंदोलनकारी याद आते हैं।
और फिर आज के ये युवा दिखाई देते हैं।
चेहरे बदल गए हैं।
नारे बदल गए हैं।
पोस्टर बदल गए हैं।
आंदोलन करने का तरीका बदल गया है।
लेकिन एक चीज नहीं बदली—
व्यवस्था से यह अपेक्षा कि वह नागरिक की आवाज सुने।
शायद यही लोकतंत्र है।
लोकतंत्र केवल चुनाव के दिन मतदान करने का नाम नहीं है। लोकतंत्र उस दिन भी जीवित रहता है जब कोई युवा सरकार से प्रश्न पूछता है, कोई किसान अपनी माँग लेकर सड़क पर बैठता है और कोई नागरिक शांतिपूर्ण ढंग से सत्ता से कहता है—हमारी बात सुनिए।
और शायद लोकतंत्र तब और मजबूत होता है जब सरकार उस आवाज को दुश्मनी की आवाज न मानकर सुधार की संभावना के रूप में सुनती है।
इसीलिए कॉकरोच जनता पार्टी के बहाने मुझे आज के युवाओं में केवल आक्रोश नहीं दिखाई देता।
मुझे एक उम्मीद दिखाई देती है।
यह उम्मीद कि वे हिंसा के बजाय अहिंसा को चुन सकते हैं।
यह उम्मीद कि वे केवल सोशल मीडिया पर शिकायत करने के बजाय सड़क पर भी शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रख सकते हैं।
यह उम्मीद कि अलग-अलग राजनीतिक पृष्ठभूमि के लोग किसी साझा मुद्दे पर साथ खड़े हो सकते हैं।
और सबसे बढ़कर यह उम्मीद कि आज की युवा पीढ़ी लोकतंत्र से निराश होकर उससे दूर नहीं जा रही, बल्कि लोकतंत्र को अपने लिए और अधिक उत्तरदायी बनाने की कोशिश कर रही है।
मैंने अपने जीवन के एक हिस्से में छात्रों को आंदोलन करते देखा है, दूसरे हिस्से में किसानों को। प्रशासन में रहते हुए कभी-कभी मुझे उन आंदोलनों को संभालने की जिम्मेदारी भी मिली होगी, और नागरिक के रूप में मैंने उनके औचित्य पर विचार भी किया है।
आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि शायद आंदोलन लोकतंत्र की समस्या नहीं हैं।
अहिंसक और अनुशासित आंदोलन तो लोकतंत्र के स्वास्थ्य का संकेत हैं।
समस्या तब है जब नागरिकों को यह विश्वास ही न रहे कि उनकी आवाज सुनी जाएगी।
इसलिए कॉकरोच के मास्क पहने इन युवाओं को देखकर मुझे केवल एक विचित्र नाम या सोशल मीडिया का नया प्रयोग दिखाई नहीं देता।
मुझे एक पीढ़ी दिखाई देती है जो अपने ढंग से कह रही है—
“हमारे भविष्य के बारे में निर्णय हो रहे हैं, इसलिए हमारी बात भी सुनी जानी चाहिए।”
और शायद इसी आवाज को सुनकर, लंबे प्रशासनिक और सामाजिक अनुभव के बाद, भारत के लोकतंत्र में मेरा विश्वास एक बार फिर थोड़ा मजबूत हुआ है।
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