सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

Positive Thoughts, Stress Management and Personality Development

सकारात्मक सोच,  तनाव प्रबंधन और व्यक्तित्व विकास 

व्यक्तित्व क्या है ?
प्रत्येक व्यक्ति विशिष्ट है, कोई भी दो व्यक्ति एक जैसे नहीं हैं। दो व्यक्ति देखने में, डील डौल में वेशभूषा में, एक जैसे लग सकते हैं फिर भी उनके बोलचाल में, उनके लहजे में अंतर आप ढूंढ ही लेंगे।अगर कोई हूबहू किसी दुसरे व्यक्ति की नक़ल भी कर ले तो भी किसी विषय पर दो व्यक्तियों के आप विचार जानने की कोशिश करें तो उनके विचारों में, उनके ज्ञान के स्तर में, उनकी रुचियों, उनकी धारणाओं में और उनके व्यवहार में आप अंतर जरूर पाएंगे। 
ये जो अंतर है ये ही प्रत्येक व्यक्ति को विशिष्ट बनाता है। हर व्यक्ति की अपनी विशिष्टता ही  उसका व्यक्तित्व है। 
लेकिन क्या प्रत्येक व्यक्ति अपनी विशिष्टताओं  के बारे में जागरूक है। हमारे सामाजिक ढांचे में एक गुण या कुछ लोग इसे अवगुण भी कह सकते हैं कि हमारे माता पिता और हमारे गुरुजन भी व्यक्ति को एक बने बनाये पैटर्न के रूप में ढालना चाहते हैं, वे व्यक्ति/बच्चों की विशिष्टताओं को जानने या समझने की चेष्टा शायद ही करते हैं। उनके सामने कुछ आदर्श पहले से मौजूद होते हैं और वे अपने संतान या शिष्य को उन्ही आदर्शों के अनुरूप बनाने की कोशिश में लगे रहते हैं। तो जब कच्ची उम्र में हमारे माता पिता और गुरुजन ही हमारे व्यक्तित्व/वैशिष्ट्य के बारे में जागरूक नहीं रहते तो हम स्वयं भी अपनी विशिष्टताओं और क्षमताओं के प्रति जागरूक नहीं रह पाते। और प्रायः पूर्व से स्थापित आदर्शों के अनुसरण को ही ज़िंदगी का लक्षित मार्ग मान लेते हैं। 
व्यक्तित्व के प्रति अपनी सीमाओं और अपनी सामर्थ्यों के बारे में जानकारी न रखने के कारण ही हम अक्सर अपने को बहुत बार असफल व्यक्ति मान लेते हैं और अनावश्यक रूप से तनाव और चिंताओं से ग्रसित हो जाते हैं। 
तो पहली बात जो हम सब को समझ लेनी चाहिए कि हमें हर व्यक्ति को अलग बाध्यताओं और शक्तियों के धारण करने वाला मान लेना चाहिए, न मानते हों तो आजमा लें।  आजमाने के बाद  आपको यकीन हो जाएगा बहुत से ऐसे काम हैं जो सिर्फ आप कर सकते हैं दूसरा नहीं कर सकता। जैसे कोई पद्मासन लगा सकता है, कोई  शीर्षासन कर सकता है, हो सकता है दूसरा जो आपके पास बैठा है वो नहीं कर सकता। या जो दूसरा कर सकता है वो आप नहीं कर सकते। कहने का तात्पर्य ये कि एक व्यक्ति की दुसरे से तुलना नहीं  की जा सकती। भद्र भाषा में  कहें तो तुलना नहीं की जानी चाहिए। कोई किसी से श्रेष्ठ या हीन नहीं है, बस अलग हैं। कोई हिंदी अच्छी टाइप  कर सकता है, तो कोई शॉर्टहैंड में डिक्टेशन ले सकता है। 
कुछ भी श्रेष्ठ या हीन नहीं है, अच्छा या बुरा नहीं हैं। सिर्फ हमारी रुचियों के हमारी क्षमताओं के अनुकूल या प्रतिकूल है। जो अनुकूल है वो अच्छा लगता है. जो प्रतिकूल है वो बुरा लगता है। कोई भी व्यक्ति बुरा न दिखना चाहता है और न बनना चाहता है। केवल तुलना करने पर ही अच्छा या बुरा, श्रेष्ठ या हीन के भाव का जन्म होता है और इन दो छोरों के बीच जितनी दूरी बढ़ती जाती है उतना ही जीवन में तनाव,  चिंता, भय, ईर्ष्या, क्रोध और अहंकार जैसे दोष पैदा होते हैं। 
जिन्हे आप स्वयं से बेहतर मानते हैं, आप उन्हें सुखी होने का भ्रम पाल  लेते हैं। वो कथित बेहतर लोग हमेशा कुछ खो जाने के भय से ग्रस्त रहते हैं, भय को वो क्रोध के रूप में प्रकट करते हैं, अहंकारी हो जाते हैं और  उस अहंकार के वशीभूत होकर भयंकर गलतियां करते हैं। 
इसलिए वे लोग दया के,  तरस खाने के पात्र हैं। जब भी आप किसी को खुद से बेहतर समझें, तो ये भी समझ लीजिये कि जल्द ही आपको उन पर दया करने का भी अवसर मिलेगा। 
तो लीजिये बातों बातों में आपको तनाव प्रबंधन का एक सूत्र मिल गया। ये सूत्र है कि अपनी किसी से तुलना मत कीजिये, आप कुछ मामलों में उनसे बेहतर हैं और वो कुछ और मामलों में। 
अब व्यक्तित्व का विकास को लेते हैं - 
क्या व्यक्तित्व का विकास संभव है ? व्यक्तित्व के दो हिस्से हैं , एक है नैसर्गिक या कुदरत द्वारा आपको दिया गया और दूसरा हिस्सा है आपके द्वारा अर्जित किया गया। 
नैसर्गिक व्यक्तित्व का विकास - शरीर की रचना, बनावट, कद काठी, रंग आदि आपकी जरूरत के हिसाब से कुदरत ने आपको दिए हैं और इसके लिए आपको कुदरत का शुक्रगुजार होना चाहिए। इस पर आपको कोई शिकायत नहीं होनी चाहिए।  ये शरीर ख़ास आप के लिए बनाया गया है यूनिक पीस के तौर पर। आप इसे जबरन किसी और की तरह की बनाने की कोशिश करेंगे तो बहुत सी विकृतियों और बीमारियों का शिकार हो सकते हैं. इस शरीर का सदुपयोग कीजिये लेकिन इसको टार्चर मत कीजिये। इसको स्वस्थ और ठीकठाक रखना आपकी जिम्मेदारी है, ये आपका स्थायी टूल है और आपके व्यक्तित्व की पहली पहचान है.  शरीर को स्वस्थ रखने के लिए हल्का व्यायाम और योगासन व प्राणायाम भी उपयोगी होते हैं लेकिन किसी विशेषज्ञ की देखरेख में ही इनका अभ्यास किया जाना चाहिए ।
अपनी पहचान का दायरा बढ़ाना ही व्यक्तित्व का विकास है, इसलिए आप जैसे हैं उस से बेहतर दिखें, आप जितने लोगों के आकर्षण का केंद्र हैं उनसे अधिक लोगों के आकर्षण का देन्द्र बने, यही आपके व्यक्तित्व का विकास है। 
चाहे विशेषज्ञों की सलाह से या अपने प्रिय जनों की प्रशंसा के जुमले से, आपको खुद पता लग जाएगा कि  आप पर कैसे कपडे अच्छे लगते हैं, आपकी कौन से अदा लोगों को लुभाती है. उन्हें अपना लिया तो समझिये आपने किताब का बढ़िया कवर तैयार कर लिया। लेकिन कवर से ही मार्केटिंग नहीं होती, कंटेंट भी चाहिए। 
अर्जित व्यक्तित्व का विकास - आपका ज्ञान, आपकी विचारधारा और आपके विश्वास, आपकी कार्यदक्षता, आपकी भाषा, और आपके बोलने की शैली - ये आप समाज से, स्कूल से, परिवार से, ट्रेनिंग सेण्टर से या किसी प्रोफेशनल की मदद से सीखते हैं। इस लिए इन सब को हम आपका अर्जित व्यक्तित्व कहते हैं. सोशल साइट्स की भाषा में कहें तो इसे हम आपका प्रोफाइल भी कह सकते हैं।  इसमें आपके द्वारा पास की गयी परीक्षाएं, आपको मिले पुरुष्कार, आपकी संगत, आपके द्वारा पढ़ी गयी पुस्तकें, आपके द्वारा देखी गयी फिल्में, आपके द्वारा किये गए भ्रमण आदि सब शामिल हैं। आपके द्वारा जो कुछ अर्जित किया जाता है उससे निश्चय ही गुपचुप तरीके से आपके व्यक्तित्व में परिवर्तन आता है जो आपको तो पता भी नहीं चलता लेकिन आपके मित्रों, परिजनों को ये परिवर्तन दीखता है और लोग कहने लगते हैं, "छोरा तो शहर जा कर बदल गया।"
इसलिए यदि आप चाहते हैं कि आपके व्यक्तित्व का विकास हो तो अधिक से अधिक लोगों से मिलिए, अधिक से अधिक पढ़िए, अधिक से अधिक भ्रमण कीजिये, फ़िल्में देखिये। जीवन में विविधता को झाँकने के लिए दुनिया भर में बहुत कुछ उपलब्ध है. ज्ञान असीम है। लेकिन इस प्रकार के ज्ञान अर्जन में एक सावधानी बरतनी बहुत जरुरी है - आग्रह का त्याग। आग्रह आपके विकास को रोक देता है, एक दीवार खड़ी कर देता है। 
इसे समझने की जरूरत है - अगर आपने किसी पुस्तक को अंतिम सत्य मान लिया, किसी महापुरुष को ईश्वर का अवतार मान कर उसके विचारों को अंतिम सत्य मान लिया, अगर किसी शासन प्रणाली, किसी नेता, किसी देश, जाति, धर्म, व्यवसाय को आदर्श और अनुकरणीय मान लिया या उस पर गर्व करना शुरू कर दिया, तो समझिये कि आपने नए विचारों, नए ज्ञान, नयी शैली को प्राप्त करने के लिए अपनी खिड़की दरवाजे हमेशा के लिए बंद कर दिए। क्यूंकि तब आप केवल आप एक ही दिशा में सोचने के लिए विवश होंगे, आपके ज्ञान चक्षु केवल एक छोटे से झरोखे में से ही दुनिया को देख सकेंगे, आपकी दुनिया गिनती के लोगों तक सीमित हो जायेगी, चाहे वो गिनती कुछ हज़ार या कुछ करोड़ लोगों की दुनिया हो। जबकि वास्तव में दुनिया बहुत बड़ी है। आप १५-२०% दुनिया तक सीमित हो जाएंगे और ८०-८५ % विविधताओं से वंचित हो जाएंगे। 
अभी तक संसार में जो भी विकास हुआ है, वो पुराने किसी विचार, किसी आग्रह को त्यागने से ही संभव हुआ है। इसलिए ये आपको समझना होगा कि आप जो जीवन में घुटन महसूस करते हैं, जो तनाव महसूस करते हैं उसका कारण केवल जिद है, आग्रह है। लीजिये बातों बातों में आपको तनाव प्रबंधन का दूसरा सूत्र मिल गया - तनाव मुक्त रहना है तो जिद छोड़िये।
व्यक्तित्व के विकास के प्रति सचेत होने के लिए ये जरुरी है कि आप अपने व्यक्तित्व को पहचानें। आम तौर पर दो प्रकार के व्यक्ति बताये जाते हैं-अंतर्मुखी और बहिर्मुखी। अंतर्मुखी व्यक्ति को भीड़ पसंद नहीं होती, वो अकेले या सीमित लोगों के बीच रहना पसंद करता है, वो सामाजिक गतिविधियों में उतना ही हिस्सा लेता है जितना उसे अपने जीवन के लिए जरुरी लगता है, कम बोलता है. लेकिन उसमे चिंतन, कला, विज्ञान के क्षेत्र में बहुत दूर तक सोच पाने की बड़ी क्षमताएं होती हैं। अधिकतर वैज्ञानिक, कलाकार, मूर्तिकार, संगीतकार और दार्शनिक लोग अंतर्मुखी व्यक्तित्व के स्वामी थे। कभी कभी ऐसे अंतर्मुखी व्यक्तियों के जीवन में कोई घटना ऐसा विस्फोट कर देती है कि वे एकदम से बहिर्मुखी हो जाते हैं, गांधी, गौतम बुद्ध जैसे अनेकों उदाहरण इस विस्फोट के साक्षी हैं। इसलिए किसी भी मातापिता या गुरु को अपनी संतान/शिष्यों में अंतर्मुखी बालकों को देखकर उन्हें कमतर नहीं मान लेना चाहिए, बल्कि उनमे छिपी हुई जिज्ञासाओं को जगाना और विकसित करना चाहिए, पता नहीं कब उनमे कला विज्ञान संगीत या चिंतन का एक अभूतपूर्व व्यक्ति प्रकट हो जाए। 
बहुधा मातापिता और गुरुजन, यहाँ तक कि समाज भी अंतर्मुखी लोगो के प्रति सचेत नहीं होता और उन्हें कम क्षमतावान या फिसड्डी मान बैठता है, और उसके व्यक्तित्व को विकसित होने के अवसर ही नहीं प्रदान करता और इस प्रकार संसार को महान चिंतक, कलाकार, वैज्ञानिक मिलने से वंचित कर देता है। 
ध्यान रखिये कि प्रत्येक व्यक्ति में विकास की अपार संभावनाएं हैं दिशाएँ केवल दस ही नहीं हैं, कोण केवल ३६० ही नहीं बनते, तल केवल तीन ही नहीं हैं. सब कुछ असीम और असंख्य हैं। 
चलिए अब थोड़ी बात सकारात्मक सोच की करते हैं। 
हम जो कुछ भी करते हैं उसका पहला कदम हमारे मष्तिष्क में उठता है कार्य के विचार के रूप में। यानि सोच ही कर्म का बीज है। केवल कुछ ही क्रियाएं हैं जो बिना सोचे होती हैं जैसे सांस लेना, पलक झपकना या शरीर के रिफ्लेक्स एक्शन्स। 
जो सोच/विचार हमें सक्रिय करे उसे सकारात्मक कहेंगे और जो हमें निष्क्रिय करे उसे नकारात्मक कहेंगे। यानि कुछ न करने की इच्छा अथवा करने और न करने के विकल्पों के बीच न करने के विकल्प को चुनना नकारात्मक सोच है। 
कुछ करने से कर्म का परिणाम आने की संभावना रहती है , कुछ न करने से अगर कोई परिणाम आता है तो तो उस परिणाम के लिए व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी से खुद को बरी करने का ढोंग कर सकता है लेकिन वास्तव में कभी कभी दुष्परिणामों के आरोप से खुद को बरी करना बाद में आलोचना का सबब बन सकता है। उदाहरण के लिए किसी अन्याय, किसी अपराध को घटित होते देख कर भी चुप रहना या आग लग जाने पर उसे बुझाने की कोशिश न करना और ये सोच लेना कि आग मेरे घर या मेरे सामान में तो लगी नहीं है इसलिए मैं क्यों कोशिश करूँ। 
तो कुछ करने से परिणाम आने की संभावना रहती है इसलिए करने के लिए स्वयं को तैयार रखना सकारात्मक सोच का आधार हो सकता है लेकिन यदि किसी कार्य के करने से नकारात्मक परिणाम आने का विश्वास हो तो उस कार्य को करना भी नकारात्मक सोच ही कहलायेगा। जैसे - किसी पर हमला करना, किसी को अपमानित करना, किसी को नीच कहना। ऐसे कार्य जिसका परिणाम अनिवार्य रूप से नकारात्मक आना हो, के बारे में सोचना भी नकारात्मक सोच है। इसलिए हम कह  सकते हैं कि सकारात्मक परिणाम की कामना से स्वयं को सक्रिय करना ही सकारात्मक सोच है तथा नकारात्मक परिणाम की सुनिश्चितता जानकार भी उस ओर प्रवृत्त होना भी नकारात्मक सोच है।
अच्छे दिन आएंगे - ये एक सकारात्मक सोच है लेकिन अच्छे दिन लाने की दिशा में स्वयं कोई प्रयास न करना और अच्छे दिनों की इंतजार में निष्क्रिय बैठे रहना नकारात्मक सोच है। 
प्रत्येक व्यक्ति को अपने प्रयासों में हमेशा सफलता नहीं मिलती, बल्कि कहा जा सकता है कि असफलता का स्वाद सभी को कभी न कभी चखना पड़ता है और बहुत से लोग तो असफलता के स्वाद को चखने के आदी हो जाते हैं। लेकिन "हमें तो असफल होना ही है" ये सोच कर प्रयास छोड़ देना नकारात्मक सोच है। और "एक बार फिर कोशिश कर के देखते हैं " ऐसा सोचना सकारात्मक सोच है। यहां हमें  प्रयासों का विश्लेषण भी करना चाहिए कि क्या हम अपनी गलती से सीख लेकर अपने प्रयासों में कुछ सुधार ला रहे हैं या बार बार एक ही गलती को दोहरा रहे हैं। गलतियों को दोहराना ऊर्जा का अपव्यय है। 
हम जो सांस लेते हैं, जो भोजन लेते हैं उस से हमारे भीतर ऊर्जा का सृजन होता है, उस ऊर्जा का उपयोग न करना और आलसी जीवन बिताना भी ऊर्जा का अपव्यय है। आलस्य का आधार स्थाई नकारात्मक सोच है। स्थाई नकारात्मक सोच यानि आलस्य के कारण हमारे शरीर को रुग्ण और भारी बना देती है। इसलिए आप पाएंगे कि अधिकतर बीमार और भारी लोगों में नकारात्मक सोच पायी जाती है वो हताश और निराश बातें करते हैं। हताशा और निराशा व्यक्ति में तनाव को जन्म देती है. इसलिए तनाव प्रबंधन का तीसरा सूत्र है - नकारात्मक सोच से खुद को बचाये रहना। हताशा और निराशा को  अपनी सोच पर हावी न होने देना। समय सदा एक सा नहीं रहता, कोशिश करने वालों को एक न एक दिन सफलता मिल ही जाती है इसलिए कोशिश नहीं छोड़नी चाहिए। सकारात्मक सोच रखने वाले व्यक्ति तनावमुक्त रहते हैं। 
इसलिए शरीर को स्वस्थ/निरोग  रखना नकारात्मक सोच  पर विजय पाने के लिए पहली शर्त है। बच्चों और युवाओं, खिलाड़ियों की संगत करना नकारात्मक सोच पर विजय पाने का एक साधन है। प्रेरणादायी कहानियां पढ़ना, प्रेरक प्रवचन सुनना, कॉमेडी फिल्मे/नाटक देखना, प्रेरक जीवनियां पढ़ना सकारात्मक सोच लाने में सहायक होती हैं। 
तनाव प्रबंधन-
व्यक्तित्व विकास और सकारात्मक सोच पर बात करने के बाद क्या तनाव प्रबंधन पर अलग से बात करने की जरूरत है ? किसी से अपनी तुलना मत कीजिये और अपने को किसी से कमतर मत समझिये। अपनी सीमाओं और क्षमताओं को पहचानिये। किसी व्यक्ति, विचार, वाद, धर्म, जाति, देश, दल के प्रति पूर्वाग्रह मत पालिये, जिद्द छोड़िये, और नकारत्मक सोच से खुद को बचाइए। बीएस इतना सा ही तो करना है. तनाव छू मंतर हो जाएगा, जब तनाव होगा ही नहीं तो प्रबंधन क्या करना। 
फिर भी अगर आप तनाव ग्रस्त हो ही चुके हैं तो तब तो उसे प्रबंधन करना ही पड़ेगा। हमारा शरीर हमारे खोपड़ी से नियंत्रित होता है, खोपड़ी में रहता है मष्तिष्क, मष्तिष्क में पूरी बॉडी के नियनत्रण केंद्र हैं, इसके निर्देशों पर ही हमारे शरीर में हॉर्मोन्स पैदा होते हैं जो हमारे स्नायुतंत्र को संचालित करते हैं। इन हॉर्मोन्स के प्रभाव से ही हमारे व्यवहार में परिवर्तन आते हैं। ये हॉर्मोन्स  विशेष प्रकार के रसायन हैं। मजेदार बात ये है कि इन रसायनों के प्रभाव से हमारा रक्त चाप, धड़कन, मांसपेशियों की अकड़न, और हमारे सोचने का ढंग बदलता है; साथ साथ हमारे सोचने के ढंग और हमारे खान पान और जीवन शैली से इन रसायनों का उत्पादन होता है। यानि होर्मोन्स के नियंत्रण से व्यक्ति के व्यवहार को नियंत्रित किया जा सकता है । हमारे देश के लोगों में शरीर के विभिन्न अंगों के चिकित्सकों से सलाह लेने की प्रवृत्ति तो है लेकिन वे सबसे महत्वपूर्ण अंग मस्तिष्क के चिकित्सक के पास जाने में संकोच करते हैं । स्नायुतंत्र और मस्तिष्क और होर्मोंस के संतुलित स्वास्थ्य के लिए इन के विशेषज्ञों की सलाह ले कर मामूली उपचार से तनाव, चिंता, भय और क्रोध (जैसी बीमारियों ) के रोगी इन से मुक्त हो सकते हैं।
तनाव न हो, यानि प्रिवेन्शन के उपाय तो मैंने ऊपर अपनी वार्ता में दे ही दिए हैं; लेकिन तनाव हो जाने के बाद आपको मनोचिकित्सकया स्नायु रोग विशेषज्ञ की सलाह ज़रूर लेनी चाहिए। तनाव को पहचानिये, जब लोग पूछने लगें, “सब ख़ैरियत तो है?” घर के लोग महसूस कराने लगें कि आप चिड़चिड़े हो गए हैं, या आपको लगे कि आप कम से कम ६ घंटे रोज़ाना नींद नहीं ले पा रहे हैं।या आपको किसी बात का भय सताने लगा है तो समझिए क़ि आप तनाव की गिरफ़्त में आ गए हैं। इसके बाद आप का मन भाग जाने, मर जाने, या मार देने को करेगा तब आपको लम्बे इलाज की ज़रूरत पड़ेगी, इसलिए ऐसी स्थिति आने से पहले ही डॉक्टर की सेवा लेना ही उचित है।
एक आख़री बात तनाव को जुनून में बदलने वाले लोग भी इसी दुनिया में पाए जाते हैं और ये जान लीजिए कि दुनिया में जो कुछ भी नया हुआ है किसी भी फ़ील्ड में वो इन जुनूनी लोगों की ही दें है ।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

सच्ची कहानी, नायिका की जुबानी

डिस्क्लेमर:- प्रस्तुत कहानी में संयोग से किसी की जिंदगी से कोई घटनाएं या नाम , मेल खा सकती हैं, दिए गए नाम और स्थान सब असल दुनिया में हैं, लेकिन जरुरी नहीं कि ये इस कहानी में लिखे पात्रों की असल जिंदगी हो। कहानी का उद्देश्य केवल आज के उत्तर भारत के गाँवों की महिलाओं के एक पहलू पर प्रकाश डालना है।  + "मैं तब सोलह बरस की थी, दसवीं की बोर्ड की परीक्षा सर पर थी।  गाँव में अडोसी पडोसी नहीं होते, बल्कि चाची ताई, भैया भाभी होते हैं। मतलब सब एक ही खानदान के लोग होते हैं तो रिश्तेदार ही होते हैं, शहर की तरह हम यहाँ किसी के नाम या पद से नहीं , रिश्ते से एक दूसरे से सम्बोधित करते हैं। तो ऐसे ही हमारी एक चाची थीं जो उम्र में मुझ से ४ या ५ साल बड़ी थीं, उनकी शादी को साल भर ही हुआ था. बड़ी हंसमुख थीं, मेरी उनसे खूब पटती  थी, वो मुझे चिड़िया बुलाती थीं क्योंकि मैं चिड़िया की तरह हर समय चूं चूं करती फुदकती फिरती थी, हालांकि मेरे पापा मुझे गुड़िया बुलाते थे, वैसे मेरा नाम सुषमा है। चाची जी की एक बड़ी बहन थीं जिनका बेटा हरी, चाची की ही उम्र का था, और  १२वीं में पढता था और उसके भी बोर्ड की प...

ghost story

Ghost का अर्थ भूत बताया जाता है, अंग्रेजी में इसे "जो वास्तव में अस्तित्व में नहीं है, या जो था पर अब नहीं है" के अर्थ में लिया जाता है। भूत को हिंदी में "बीता हुआ", या "अतीत" के अर्थ में लिया जाता है.   ghostwriting का भी चलन इन दिनों है। और इतना है कि अब इसके विज्ञापन भी आने लगे हैं कि अपनी कहानी ghostwriters से लिखवाइए। यानि कहानी के लिए बस कंटेंट आप उपलब्ध करा दीजिये और पैसा लेकर आपकी कहानी आपकी जुबानी भाषा और लेखन विशेषज्ञ लिख देंगे।   मेरे पास भी एक घोस्ट आया, यूँ कहिये कि मेरे एक प्रियजन ने मुझ से कहा कि क्या आप मेरी कहानी लोगों को बता सकते हैं, मैंने कहा कुछ दिलचस्प हुआ तो कोशिश करूंगा, लेकिन मैं कोई स्थापित लेखक नहीं हूँ और मैं कहानीकार के रूप में स्थापित भी नहीं, इसलिए किसी कुशल लेखक के पास क्यों नहीं करते, उसने कहा कि क्योंकि वे बड़े मंहगे हैं और मेरे पास देने को दमड़ी भी नहीं, और फिर मुझे जितना आप जानते हैं उतना मेरे परिवार के लोग भी नहीं जानते तो आप मेरी बात शायद बेहतर लिख सकें। और मैंने हाँ भर दी।   " मैं छोटी सी थी, गाँव में रहती थी ,...

व्यापार संसार को लील रहा है

सोशल मीडिया एक बहुत बड़ा मंच है। ये बड़ा इसलिए है कि यहां कोई भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पूरा पूरा लाभ उठा सकता है और उठा रहा है। इन मंचों के संचालकों ने आत्मानुशासन के लिए कुछ रेस्ट्रिक्शन्स रखी हुई हैं लेकिन ये रेस्ट्रिक्शन्स तभी काम में लाइ जाती हैं, जब कोई इन पर आपत्ति  दर्ज कराता है।  और ये जरुरी नहीं है कि हर आपत्ति पर मंच संचालक रेस्ट्रिक्शन लागू ही करे। कई बार उनका आपत्ति करने वाले को जवाब आता है कि उनके स्टैंडर्ड्स के अनुसार कंटेंट आपत्तिजनक नहीं पाया गया।  अब ये स्टैण्डर्ड कौन बनाता है। हर देश/प्रदेश/समाज के अपने अपने स्टैंडर्ड्स होते हैं, अपने अपने सामजिक नियम और परम्पराएं होती हैं। मंच संचालक जिस देश में बैठे हैं, वे उस देश के स्टैंडर्ड्स को दुनिया भर में थोप रहे होते हैं।  ये सांस्कृतिक आक्रमण/अतिक्रमण जैसा समझिये। अमेरिका में बैठे लोग अपने स्टैंडर्ड्स सारी दुनिया पर थोप रहे हैं क्यों कि फेसबुक, ट्विटर/x , व्हाट्सप्प, इंस्टाग्राम, टेलीग्राम सब का सञ्चालन अमेरिका से हो रहा है।  अच्छा लगता है कि हमें अपनी अभिव्यक्ति के लिए एक बड़ा मंच मिल जाता है और ...