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सच्ची कहानी, नायिका की जुबानी

डिस्क्लेमर:- प्रस्तुत कहानी में संयोग से किसी की जिंदगी से कोई घटनाएं या नाम , मेल खा सकती हैं, दिए गए नाम और स्थान सब असल दुनिया में हैं, लेकिन जरुरी नहीं कि ये इस कहानी में लिखे पात्रों की असल जिंदगी हो। कहानी का उद्देश्य केवल आज के उत्तर भारत के गाँवों की महिलाओं के एक पहलू पर प्रकाश डालना है। 

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"मैं तब सोलह बरस की थी, दसवीं की बोर्ड की परीक्षा सर पर थी।  गाँव में अडोसी पडोसी नहीं होते, बल्कि चाची ताई, भैया भाभी होते हैं। मतलब सब एक ही खानदान के लोग होते हैं तो रिश्तेदार ही होते हैं, शहर की तरह हम यहाँ किसी के नाम या पद से नहीं , रिश्ते से एक दूसरे से सम्बोधित करते हैं। तो ऐसे ही हमारी एक चाची थीं जो उम्र में मुझ से ४ या ५ साल बड़ी थीं, उनकी शादी को साल भर ही हुआ था. बड़ी हंसमुख थीं, मेरी उनसे खूब पटती  थी, वो मुझे चिड़िया बुलाती थीं क्योंकि मैं चिड़िया की तरह हर समय चूं चूं करती फुदकती फिरती थी, हालांकि मेरे पापा मुझे गुड़िया बुलाते थे, वैसे मेरा नाम सुषमा है। चाची जी की एक बड़ी बहन थीं जिनका बेटा हरी, चाची की ही उम्र का था, और  १२वीं में पढता था और उसके भी बोर्ड की परीक्षा थी और उनका परीक्षा केंद्र हमारे गाँव के पास में ही पड़ा था तो वो महीने भर के लिए अपनी मौसी के यहां , यानि हमारी चाची के यहाँ ठहरा हुआ था। हमारे घर आपस में जुड़े हुए थे। तो जब कभी मौका मिलता मैं उनके यहां चली जाती थी, हमारी चाची का देवर यानि मेरा छोटा चाचा सूरज, भी बारहवीं में ही था, वैसे तो सूरज चाचा के लिए , चाची के मौसेरे भाई हरी को मामा का सम्बोधन बनता था, लेकिन पता नहीं क्यों वो उसे मौसा जी कहता था, शायद चिढ़ाने के लिए। हरी और सूरज दोस्त बन गए थे। परीक्षाओं की तैयारी हम तीनों साथ साथ बैठ कर करते थे। मुझे अच्छा लगता था जब मैं देखती थी कि हरी, जिसे मैं भी मौसा जी कहने लगी थी, मुझे देखता रहता था, शायद किताब से ज्यादा मुझ पर उसकी नज़रें टिकी रहतीं थी, मुझे लगता था, मैं बहुत सूंदर हूँ, इसलिए वो मुझे देखता रहता था, लेकिन मेरे मन में उसके प्रति इस से ज्यादा कोई भाव नहीं आता था। हर लड़की खुद को सबसे सुन्दर समझती है शायद, और उसकी सुंदरता का  सबूत यही है कि लोग और ख़ास कर पुरुष, उसकी ओर एक टक  देखें। "

"एक रात , सूरज चाचा की शायद तबियत ठीक नहीं थी, या वह अपने दोस्त मौसा जी को मौका देना चाहता था, जल्दी सोने चला गया। इस मौके का फायदा उठा कर मौसा जी ने मेरे गाल पर एक चुम्मा जड़ दिया। मैंने आव देखा न ताव, मौसा जी के गाल पर जवाब में एक जोरदार थप्पड़ जड़ दिया, और भाग कर अपने घर आ कर सो गयी, हालांकि पूरी रात करवट बदलती रही, नींद नहीं आयी, कभी सिहरन होती, कभी पश्चाताप होता।"


"भाभीनुमा चाची अपने मौसेरे भाई के साथ मिलकर कोई साजिश कर रही थी, या संयोग था, या मौसा जी की चालाकी, ये तो कभी सोचने का मन ही नहीं किया, क्योंकि चाची बहुत अच्छी थी, मुझे खाना खिलाती और बनाना सिखाती थी, प्यार से मजेदार बातें करती थी। लेकिन अगले दिन चाची ने बुलाया, वो कुछ ख़ास डिश बना रही थी, उन्होंने मुझे अंदर कोठरी में से गुड़ लाने को कहा, घर में हम दोनों के अलावा कोई नहीं था, लेकिन जब मैं कोठरी में गई, तो किसी ने मुझे बाँहों में भर लिया, मैंने उसकी बांह में जोर से काटा, तो फिर थप्पड़ बाजी शुरू हो गयी, उसने मुझे और मैंने उसे थप्पड़ जड़ दिए, बाहर भागी, गिरते गिरते बची, भाभी ने सम्हाला। और फिर भाभी ने अपने मौसेरे भाई को खूब गाली सुनाई। और मैं पूरी परीक्षा के दिनों चाची के घर नहीं गयी। "

"परीक्षा समाप्त होने पर मैं जब कॉलेज से निकलती तो बाहर मौसा जी साइकिल लिए खड़े मिलते, बाद में पता चला कि उन्होंने बोर्ड की परीक्षा ही छोड़ दी, और बस मेरे पीछे लगे रहते, पास नहीं आते थे, दूर से देखते रहते थे, धीरे धीरे गांव में मेरे बारे में बदनामी शुरू हो गयी, कि सुषमा का तो हरी से चक्कर चल रहा है। मैं समझ नहीं पा रही थी कि मैं इस गबरू जवान से नफरत करती हूँ या मुझे भी प्यार होने लगा है। "


"मैं अपने पिता कि दूसरी पत्नी से हूं, पहली पत्नी से मेरा बड़ा भाई है. बड़े भाई के बर्ताव में उसकी शादी के बाद से बहुत बदलाव आया है. भाई भाभी मुझे बिल्कुल पसंद नहीं करते, मेरी छोटी बहनों से उन्हें ज्यादा खुन्नस नहीं है, लेकिन मुझ से है. पिता जी मुझे बहुत प्यार करते हैं, लेकिन वो भी लड़कियों को इतनी आजादी देने के पक्ष में नहीं कि उनकी बदनामी हो. असल में हमारी बिरादरी में, और हमारी क्या, गांव की हर बिरादरी में आज भी प्रेम को पाप की तरह देखा जाता है, और प्रेम को एक दुर्घटना की तरह देखा जाता है, जिसका कारण लड़की को है माना जाता है, इसलिए गांव की लड़की अपनी प्रेम भावना को प्रकट ही नहीं करती, और पहल तो बिल्कुल भी नहीं करती. लड़के मौका मिलने पर छेड़छाड़ करते हैं, लेकिन जानते हैं कि प्रेम का परिणाम मौज मस्ती तक सीमित है."
"मौसा जी, यानि हरीओम जी, मुझे कुछ अलग लगे, दो बार मुझ से पिटकर भी, मेरा पीछा उन्होंने नहीं छोड़ा. अब पास नहीं आते थे. दूर से देखते रहते थे. परीक्षा के अंतिम दिन में पता नहीं क्यों स्कूल से बाहर निकलना ही नहीं चाह रही थी. मेरी दो सहेलियों ने कहा भी, चल . फिर एक ने दूसरी से पता नहीं, व्यंग में या गंभीरता से कहा, अरे चल भी, इसे तो इसके मौसा जी लेने आएंगे. और सचमुच जब में सबसे बाद में स्कूल से निकली तो गेट पर साइकिल लिए मौसा जी खड़े थे. मैं उन्हें देखकर मूर्ति सी बन गई. कुछ क्षण ऐसे ही खड़ी रही, तो उन्होंने चुप्पी तोड़ी- गुड़िया, मैं तुम्हें कुछ नहीं कहूंगा, न छुऊंगा. बस ये कहने के लिए तुम्हारा इंतजार कर रहा था कि कल मैं अपने गांव वापस जा रहा हूं, मेरे एग्जाम तो छूट गए हैं, लेकिन मैं चाहता हूं कि तुम हां कर दो तो मैं सिर्फ तुमसे ही शादी करूंगा, तुम न कर दोगी तो शादी करूंगा ही नहीं, लेकिन जवाब सुनकर ही जाऊंगा."
आगे जारी रहेगी


"मैं डर गयी कि अब ये कोई नया बखेड़ा न खड़ा कर दे, तो मैंने कह दिया -हाँ, तू जाओ. और वो विजेता की सी मुस्कान ला कर बोलै, चल तुझे घर छोड़ देता हूँ, और मैं पहली बार उसकी साइकिल पर बैठ गयी. पता नहीं क्या था उसमे कि मैं उस पर गुस्सा भी करती थी और उससे दूर भी भागती थी, और फिर भी उसकी और खिंच जाती थी, गाँव के बाहर ही मैं उसकी साइकिल से उतर गयी।
मैं घर चली गयी, कभी मन में आता, चलो अब कल से ये मुसीबत नहीं रहेगी, ये अपने गाँव चला जाएगा, मेरी जिंदगी भी अपनी पटरी पर लौट आएगी, लेकिन मेरे भैया भाभी तो घर में मेरी शादी की बातें कर रहे थे, भाभी का एक भतीजा था, मुझे एक आँख नहीं भाता था, उससे मेरे रिश्ते की बात मेरे कान में पड़ी तो मैं डर गयी, हरीओम एक सजीला जवान(अब मैं मौसा जी के बजाय उसे हरिओम कहने लगी हूँ, कभी कभी मजाक में मौसा जी कह देती हूँ) और कहाँ ये मेरी जान की दुश्मन भाभी का निखट्टू भतीजा। पहली बार मैंने महसूस किया कि हरिओम के लिए मेरे मन में भी कुछ कुछ होने लगा था।
शाम को मेरे जी में आया, कि कल सुबह तो वो चला ही जाएगा, चलो आखरी बार उसे देख आऊं, क्या पता फिर कभी मिलना हो न हो। मैं दिन छिपे चाची के घर चली गई, चाची से इधर उधर की बातें करने लगी, हरिओम में मुझे देखा और देख कर गायब हो गया, मैं सोच रही थी कि कुछ वो भी बोलेगा, लेकिन वो तो देख कर अनदेखा कर गया। मुझे अंदर ही अंदर गुस्सा आया कि मैं यहां आई ही क्यों? थोड़ी देर बाद हरिओम आया, और चाची के सामने ही जेब से एक डिब्बी निकाल कर मेरी मांग में चुटकी भर सिन्दूर भर दिया, सिन्दूर मेरी नाक ओठ तक पर बिखर गया। चाची चिल्लाई, भैया पागल है क्या तू, और अपने पल्लू से मेरा माथा और चेहरा साफ़ करने लगी, हरिओम हंसने लगा और कहने लगा-अब तो हो गया, अब तो हो गया। "

" महीना भर भी नहीं बीता था, वो फिर आ धमका, मैं रोजमर्रा की तरह चाची के घर गई , मुझे चाची तो पहले से ही पसंद थी, मेरी सहेली की तरह, लेकिन मुझे वहां चाची के मुंह से हरिओम की बाते सुनना भी अच्छा लगता था, इसलिए मैं वहां अब पहले से अधिक जाने लगी थी। मुझे देखते ही बोला - लो गुड़िया भी आ गयी। मैंने कहा क्यों, क्या मेरी ही बात हो रही थी। वो बोला - हाँ तुझे भगा कर ले जाने आया हूँ। मैं सन्न रह गयी। चाची मेरा रंग उड़ता देख बोली, अरे इसकी शादी तय हो गयी है। इसके पापा नहीं हैं न तो भाई इसकी जल्दी शादी करने के चक्कर में हैं। वो बोला - भैया से ज्यादा जल्दी भाभी को हो रही है, उसकी कोई रिश्ते की बहन है, उसे मेरे पल्ले बाँधने के चक्कर में है, इसलिए तुझे भगाने आया हूँ, ले जा कर बैठा दूंगा, कि लो ये आ गयी तुम्हारी देवरानी। मेरा रंग पीला पड़ता जा रहा था और उन दोनों को मस्ती सूझ रही थी। "

"मैं उठ कर वापस घर आ गई। मेरे घर में मेरी शादी की बात चल रही थी और उसके घर में उसकी शादी की, मैं अभी सत्रह की भी नहीं हुई थी, और शादी के नाम से डरती थी। खैर, अगले दिन वो चला गया और मेरे घर में मेरे खिलाफ मेरे भैया ने पापा को जाने क्या पट्टी पढ़ाई कि उन्होंने एक फैसला सुना दिया कि मुझे मेरे ममेरे भाई भाभी के पास इंटर की पढ़ाई के लिए भेजा जा रहा है, दो साल तक गाँव नहीं आएगी और उसके बाद शादी की जाएगी। मैं एक बात से खुश थी कि दो साल के लिए मेरी शादी तो टल जायेगी, लेकिन मैं अपना गाँव नहीं छोड़ना चाहती थी, मैंने अपनी माँ से बात की-माँ, पापा को समझाओ कि मुझे यहीं रहकर बारहवीं कर लेने दें, माँ ने उल्टा मुझे समझा दिया, कि शहर में रह कर थोड़ा शहरी हो जा, तो तेरी शादी भी किसी शहरी लड़के से कर देंगे, यहां के लोग तो तेरी फ़ालतू की अफवा उड़ाते रहते हैं, कोई ढंग का रिश्ता न होण देंगे, भांजी मारने वाले खेल बिगाड़ देंगे, यहाँ न दिखेगी तो सब दो साल में भूल पड़ जागी। मैं कुछ कर नहीं सकती थी, गाँव की लड़कियों की भैया और बाप के आगे कुछ नहीं चलती। 

"इस प्रकार मैं यमुनानगर भेज दी गयी, और मेरी जो वहां दुर्गति हुई है, पूछो ही मत। ये भैया भाभी पहले मुझे जितने अच्छे लगते थे, अब उससे कई गुना बुरे लगने लगे. उन्हें एक नौकरानी चाहिए थी जो मेरे रूप में मिल गयी, पढ़ाई के लिए समय भी नहीं देते थे, हर समय काम ही काम। खाने और पहनने को बचा कुचा। मेरे पास अपने पापा मां से बात करने का माध्यम भी वही। मेरे सामने ही फोन पर मेरी शिकायत कर देते। एक मुसीबत और हो गयी। एक दिन हरिओम यहां आ गया। भैया काम पर गए थे, भाभी बाजार गयी थे, बोला - मैं जनवासे से भाग कर आया हूँ, मेरी आज शादी हो रही थी, चल मेरे साथ भाग चल, हम मंदिर में चल कर शादी कर लेते हैं और फिर मैं तुझे ले जाकर गाजियाबाद में अपनी बहन के घर ले चलूँगा। मैंने भागने को मना कर दिया। उसने जिद की तो मैंने कहा, कि मैं कल कॉलेज के लिए जब जाऊँगी तब मुझे चौराहे पर मिल जाना , लेकिन भागूंगी नहीं लेकिन मंदिर चलूंगी शादी करूंगी, फोटो खिंचवाएंगे और तुम वो फोटो ले जाकर अपने घर वालों को दिखा देना कि तुम्हारी शादी हो चुकी है। वो बोलै चलो बाद की बाद में सोचेंगे, कल शादी करते हैं। "

"अगले दिन मैं कॉलेज के लिए निकली तो मैंने अपने बैग में किताबों की जगह कपडे रख लिए, भाभी की एक धुली हुई लाल साड़ी और उनकी कुछ चूड़ियां बिंदी सब रख ली, लेकिन भाभी को शक हो गया, उसने मेरा बैग पकड़ लिया और खोल लिया। फिर मेरी जो धुनाई हुई, इतना तो कोई किसान भैंसे को भी नहीं पीटता होगा, जो मेरी पिटाई हुई, मुझे लगा कि हरिओम ने भी भांप लिया वो शायद बाहर ही था, और फिर वो शोर सुनकर भाग गया। मुझे उस पर गुस्सा आया कि चला था शादी करने, जब मैं पिट रही थी तो बचाने भी नहीं आया, क्यों कि जब मैंने भाभी का हाथ मरोड़ कर खुद को पिटने से बचाया और बाहर आई, और चौराहे तक घूम आई, तो मुझे वो कहीं नहीं मिला। मुझे लग गया कि आज भैया भाभी मिलकर मेरी पिटाई करेंगे, मैं स्कूल ड्रेस में थोड़ी देर इधर उधर भटकती रही, बिना बैग के। आखिर में जब गुस्सा ठंडा हुआ तो वापस घर लौटी और अपने कमरे में बिस्तर पर जा पड़ी, भाभी ने तनिक भी देर नहीं की, और बाहर से कुण्डी लगा दी।

"भैया को शायद भाभी ने फोन कर दिया था, वो जल्दी घर आ गए, और भाभी ने उनके कान भर दिए कि मैंने भाभी को मारा और घर के गहने, कपडे ले कर मैं घर से भाग रही थी, जब भाभी ने किसी तरह उस से बैग छीना और कमरे में बंद कर दिया। भैया ने भी अपनी बेल्ट निकाल कर मेरी फिर से पिटाई कर दी। फिर मेरे पापा को फोन लगाया और जब वो फोन पर बात कर रहे थे तो मुझे अंदाजा हो गया कि दूसरी तरफ पापा हैं, तो मैंने चिल्ला कर कहा, ये लोग मुझे जान से मार देंगे, मुझे नौकरानी बना कर रखा हुआ है, मुझे ले जाओ। मेरे चिल्लाने का असर ये हुआ, कि फोन बंद करते समय पिटाई का एक सेशन और चला। खैर किसी तरह रात बीती, मुझे उम्मीद तो नहीं थी कि पापा ने मेरी बात सुन ली थी या नहीं और अगर सुन ली थी तो वो आएंगे कि नहीं, लेकिन सुबह होते ही, मेरे पापा आ गए और उन्होंने मुझे गले लगाया, मैं खूब रोई, मेरे पापा ने भैया भाभी को खूब बुरा भला कहा और बिना कुछ खाये पिए मुझे लेकर वापस अपने गाँव आ गए। "


"अब भैया भाभी, और पापा में मुझे लेकर कलह रहने लगी, माँ तो दखल नहीं ही देती थी, शायद वो हमारी बिरादरी में औरतों की हैसियत को समझती थी, इसलिए शांत रहती थी। रोज यही चर्चा होती कि मुझे जल्दी से जल्दी कहीं ब्याह दिया जाए, क्योंकि मैंने बड़ी बदनामी करा दी है, मेरी समझ में नहीं आता था, कि अब तक मैंने क्या गलती की है, मैं घर छोड़ कर भागी नहीं, मैंने किसी लड़के से कभी बात नहीं की, अब पडोसी के मेहमान ने मेरे साथ अगर कोई छेड़छाड़ कर भी दी तो मेरी इसमें खता क्या थी, लेकिन हिंदुस्तान में और ख़ास कर गाँव में सारा दोष लड़की के सर मढ दिया जाता है। लड़की ही घर की इज्जत और बेइज्जती की जिम्मेदार मानी जाती है, उसे जल्द से जल्द पराये घर भेजने की कोशिश रहती है, पराया घर जिसके बारे में लड़की को पहले से कुछ भी पता नहीं होता। मुझे पता चला कि मुझे किसी ऐसे आदमी से विवाह की बात भी चल रही है जिसकी पहली बीवी मर चुकी है, एक और आदमी जिसका विवाह उसकी विकलांगता के कारण नहीं हो रहा था, से भी मेरे रिश्ते की बात चल रही थी। मैं अब तक घर से भागने की खुद से नहीं सोचती थी, और मैं हरिओम से भी शादी का कोई संकल्प नहीं लिए थी, लेकिन जब मुझे कूड़े की तरह फेंके जाने की बात मेरे अहसास में आयी तो पहली बार मेरे दिमाग में आया कि ऐसी बेकद्री से तो हरिओम के साथ भाग जाना ही अच्छा था, कम से कम वो मुझे प्यार तो करता है, और अपनी शादी के मंडप से भाग आया था। चाची के यहां आना जाना भी प्रतिबंधित हो गया था, फिर भी घर के दरवाजे पर चाची कभी कभी दो बोल बतिया लेती थी, जिस से पता चल गया था कि हरिओम अब गाजियाबाद रहता है, किसी दूकान पर कोई छोटा मोटा सेल्समेन टाइप का काम उसके जीजा ने उसको दिलवा दिया है। लेकिन उसने अपने घर / गाँव में आना जाना बंद कर दिया है, क्योंकि उसके भैया भाभी ने उसकी शादी के समय बखेड़े के बाद कह दिया कि उसका अब उससे कोई रिश्ता नहीं। मैंने चाची से कह दिया कि वो हरिओम को किसी तरह खबर भिजवा दे कि अब मैं उस से शादी के लिए घर से भागने को तैयार हूँ। "

"अंकल जी, पता नहीं क्यों मैं अपनी जिंदगी का सारा दुःख आपसे शेयर कर बैठी, आप को देख कर मुझे अपने पिता की याद आ गयी, जिन्हें मैंने पिछले १३ साल से नहीं देखा है। एक दिन हरिओम मुझे दिन छिपे, मेरे घर से किसी की मोटरसाइकिल पर लेकर गाजियाबाद आ गए। पहले दो दिन हम हरिओम की बहन के घर रहे, फिर हमने एक कमरा किराये पर लिया। बड़ी मुश्किल से गृहस्थी शुरू की। मैंने इन्हें राजी किया कि अकेले की कमाई से गृहस्थी नहीं चलेगी, तो मैंने भी पार्ट टाइम एक दूकान पर सेल्स गर्ल का काम किया, फिर एक लेडी डॉक्टर ने मुझे अपने क्लिनिक पर लगा लिया। उन्हीं की कृपा से मैंने एक लोकल कॉलेज से नर्सिंग की ट्रेनिंग भी कर ली। लेकिन हरिओम भी बिरादरी के और मर्दों की तरह ही है, उन्हें औरत का काम करना पसंद नहीं था। और खाना, चौका बर्तन, सफाई, कपडे धोना जैसे काम। आज भी वो औरत की जिम्मेदारी मानते हैं। हमारी लड़ाई घर के रखरखाव पर ही होती है क्योंकि वो इन कामों में बिलकुल मदद नहीं करते और मेरा घर से बाहर काम पर जाना भी इन्हें पसंद नहीं। लेकिन कोविड ने इनके विचारों में थोड़ा परिवर्तन किया है, क्योंकि कोविड ने इनका जॉब छुड़वा दिया, तब मेरा काम करना ही काम आया। अब ये फिर से एक स्टोर पर काम पा गए हैं और मैं एक अस्पातल में हेड नर्स बन चुकी हूँ। इसके अलावा मैं प्राइवेट नर्सिंग सर्विस घर पर भी देती हूँ, जैसे डिलीवरी करना, ड्रिप लगाना आदि, तो इससे भी मेरी ठीकठाक आमदनी हो रही है। मेरे दो बेटे हो चुके हैं, वो घर संभालना भी सीख गए हैं, दोनों एक दूसरे का अच्छे से ध्यान रखते हैं. हम दोनों सुबह घर से निकल जाते हैं, बच्चे स्कूल से आते हैं, किचन में उन्हें खाना रखा मिल जाता है, जिसे वो गरम करके खा लेते हैं। अब हमारी जिंदगी पटरी पर आ गयी है, अभी मेरी उम्र केवल ३१ साल है और लगता है कि शेष जिंदगी ठीक ठाक कट जाएगी। लेकिन अब तक के १५ साल बहुत संघर्ष में बीते हैं। "


ये उसका आज मेरी सेवा में आखरी दिन था, उसने आखरी ड्रिप पूरी की, कैनुला निकाला, मैंने उसे मुंहमांगी फीस से थोड़ा अधिक देकर कहा ये, मेरा आशीर्वाद समझो। जाओ खुश रहो।




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