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व्यापार संसार को लील रहा है

सोशल मीडिया एक बहुत बड़ा मंच है। ये बड़ा इसलिए है कि यहां कोई भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पूरा पूरा लाभ उठा सकता है और उठा रहा है। इन मंचों के संचालकों ने आत्मानुशासन के लिए कुछ रेस्ट्रिक्शन्स रखी हुई हैं लेकिन ये रेस्ट्रिक्शन्स तभी काम में लाइ जाती हैं, जब कोई इन पर आपत्ति  दर्ज कराता है।  और ये जरुरी नहीं है कि हर आपत्ति पर मंच संचालक रेस्ट्रिक्शन लागू ही करे। कई बार उनका आपत्ति करने वाले को जवाब आता है कि उनके स्टैंडर्ड्स के अनुसार कंटेंट आपत्तिजनक नहीं पाया गया। 

अब ये स्टैण्डर्ड कौन बनाता है। हर देश/प्रदेश/समाज के अपने अपने स्टैंडर्ड्स होते हैं, अपने अपने सामजिक नियम और परम्पराएं होती हैं। मंच संचालक जिस देश में बैठे हैं, वे उस देश के स्टैंडर्ड्स को दुनिया भर में थोप रहे होते हैं।  ये सांस्कृतिक आक्रमण/अतिक्रमण जैसा समझिये। अमेरिका में बैठे लोग अपने स्टैंडर्ड्स सारी दुनिया पर थोप रहे हैं क्यों कि फेसबुक, ट्विटर/x , व्हाट्सप्प, इंस्टाग्राम, टेलीग्राम सब का सञ्चालन अमेरिका से हो रहा है। 

अच्छा लगता है कि हमें अपनी अभिव्यक्ति के लिए एक बड़ा मंच मिल जाता है और हम वहां कैसा भी लेख, कैसा भी चित्र, कैसा भी वीडियो अपलोड कर सकते हैं और उस पर आने वाले लाइक्स से खुश हो सकते हैं। लेकिन अभिव्यक्ति की ये आजादी तब कितनी घातक हो जाती है, जब इस आजादी का उपयोग, कुछ लोग अश्लीलता फ़ैलाने, समाज में वैमनस्य फ़ैलाने, आपराधिक षड्यंत्र करने, या लोगों के साथ ठगी करने के लिए करने लगते हैं, तब ये मांग भी उठती है कि अभिव्यक्ति की आजादी पर कुछ तो अंकुश लगना चाहिए। अब ये अंकुश कौन लगाए, कितना लगाए और इस बात की गारंटी कौन देगा कि अंकुश लगाने वाले लोग इस अंकुश के अधिकार का दुरूपयोग नहीं करेंगे। 

यही हो रहा है कि सरकारें अंकुश का अधिकार अपने पास रखती हैं और इस अंकुश का दुरूपयोग करके किसी को भी अनिश्चित काल के लिए जेल में भेज देती हैं, बरसों तक उनके मामले की अदालत में सुनवाई तक शुरू नहीं होती। घूम फिर कर फिर बात मंच संचालकों की जिम्मेदारी पर आ जाती है लेकिन अगर वे शुद्ध रूप से व्यापार करने के लिए इस प्रकार के मंचों का संचालन कर रहे हैं तो उनसे कैसे उम्मीद की जाए कि वे अपने व्यापार को नजरअंदाज करके समाज और देश का हित करेंगे। व्यापार के लिए ही तो हथियार बन रहे हैं, वायरस और एंटीवायरस बन रहे हैं। और अब तो व्यापार के लिए ही सरकारें बनाई और गिराई जा रही हैं। व्यापार संसार को लील रहा है। 

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