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ghost story

Ghost का अर्थ भूत बताया जाता है, अंग्रेजी में इसे "जो वास्तव में अस्तित्व में नहीं है, या जो था पर अब नहीं है" के अर्थ में लिया जाता है। भूत को हिंदी में "बीता हुआ", या "अतीत" के अर्थ में लिया जाता है.  

ghostwriting का भी चलन इन दिनों है। और इतना है कि अब इसके विज्ञापन भी आने लगे हैं कि अपनी कहानी ghostwriters से लिखवाइए। यानि कहानी के लिए बस कंटेंट आप उपलब्ध करा दीजिये और पैसा लेकर आपकी कहानी आपकी जुबानी भाषा और लेखन विशेषज्ञ लिख देंगे।  

मेरे पास भी एक घोस्ट आया, यूँ कहिये कि मेरे एक प्रियजन ने मुझ से कहा कि क्या आप मेरी कहानी लोगों को बता सकते हैं, मैंने कहा कुछ दिलचस्प हुआ तो कोशिश करूंगा, लेकिन मैं कोई स्थापित लेखक नहीं हूँ और मैं कहानीकार के रूप में स्थापित भी नहीं, इसलिए किसी कुशल लेखक के पास क्यों नहीं करते, उसने कहा कि क्योंकि वे बड़े मंहगे हैं और मेरे पास देने को दमड़ी भी नहीं, और फिर मुझे जितना आप जानते हैं उतना मेरे परिवार के लोग भी नहीं जानते तो आप मेरी बात शायद बेहतर लिख सकें। और मैंने हाँ भर दी।  

" मैं छोटी सी थी, गाँव में रहती थी , अभी चार साल की थी कि मेरी माँ ने मुझे एक भाई ला दिया और मैं सदा उसके पास रहती। गोदी उठाने की कोशिश भी करती। कई बार उसे गिरा भी देती तो मैं खुद ही रोने लगती थी. पर अभी मेरा भाई एक साल का भी नहीं हुआ था कि मेरी पापा ने मेरा गाँव के बाहर एक स्कूल में ले जाकर मुझे छोड़ दिया और कहा आज से तुम्हे रोज यहाँ पढ़ने आना है , लेकिन मैं अपने भाई को छोड़ कर स्कूल नहीं जाना चाहती थी, लेकिन पापा से मुझे डर लगता था, हालाँकि वे मुझसे हमेशा प्यार से बात करते थे लेकिन उन्हें मैंने अपने भाइयों और मेरी माँ को डाँटते हुए देखा था, इसलिए मुझे उनसे बहुत डर लगता था। अच्छी बात ये है कि पापा कभी कभी ही गाँव आते थे वे शहर में नौकरी करते थे। मैं स्कूल जाती तो थी लेकिन किसी बहाने से जल्दी से घर वापस आ जाती थी , माँ को मेरा जल्द घर आ जाना अच्छा लगता था क्योंकि मैं उनके काम में थोड़ा बहुत हाथ बंटाती थी, और ख़ासकर वे मेरे भाई को मेरे भरोसे छोड़ कर अपने काम निपटा लेती थीं। मेरी माँ नाम मात्र को पढ़ी थी , शायद उनकी भी रूचि पढ़ने में नहीं रही थी और वो यही मानती थीं कि लड़कियों का पढ़ना कतई जरुरी नहीं है , बल्कि उन्हें गृह कार्य में दक्ष होना चाहिए, शायद इसीलिए वह मुझे घरेलू काम सिखाना चाहती थी, लेकिन मेरी रूचि गृहकार्य में नहीं थी , बस अपने भाई के पास बने रहने , उससे बात करने और उसे खिलाने में मेरी रूचि अवश्य थी। मुझे मेरे पापा इसलिए अच्छे लगते थे कि वे मुझे कभी किसी काम को नहीं कहते थे लेकिन जब उन्हें पता लगा कि मैं स्कूल में भी कुछ सीख नहीं रही हूँ और अक्सर जल्दी घर आ जाती हूँ तो उन्होंने मुझे तो थोड़ा डाँटा ही , लेकिन माँ को बहुत डाँटा और कहा कि वह मुझे भी अपने जैसी गँवार बना देगी। मुझे पापा का माँ को डाँटना अच्छा नहीं लगता था। मेरी माँ बहुत सुंदर थीं। लेकिन मेरे पापा उनसे खुश नहीं थे, मेरे पापा को पढ़ने का बहुत शौक था और उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की थी, वे हमारे गाँव के सबसे अधिक पढ़े लिखे व्यक्ति थे , इसलिए लोग उनका बहुत सम्मान करते थे और जब भी वह गाँव आते लगभग हर सप्ताह तो गाँव के लोग उनके पास इकट्ठे हो जाते थे।"

घोस्ट कथा - २ 

" अब मैं , कक्षा ४ में आ गयी थी, भैया दौड़ने भागने लगा था, अब मुझे स्कूल की अपनी सहेलियां अच्छी लगने लगी थीं और भाई के साथ अब खेलने में मुझे मजा नहीं आता था। एक दिन पापा ने अपने दोस्तों को बताया कि उनका चयन किसी बड़े पद पर हो गया है और उन्हें जबलपुर में पोस्टिंग मिली है, इस खबर को मैंने जा कर माँ को बताया , तो माँ उदास हो गयी। मेरी समझ में नहीं आया कि माँ को तो खुश होना चाहिए, कि अब उन्हें हर सप्ताह डाँटने वाला दूर जा रहा है, लेकिन वो उदास थी। लेकिन अगले दिन माँ खुश थी , क्योंकि उन्होंने पता नहीं कैसे पापा को समझाया कि उन्हें वहां खाने की दिक्कत होगी , स्वास्थ्य पर असर पड़ेगा, जबकि घर का खाना तो वो अब भी सप्ताह में एक ही दिन खाते थे. लेकिन पापा ने कह दिया कि अभी वो जाकर अपनी नई नौकरी ज्वाइन करेंगे और हफ्ते दस दिन में हम सब को भी जबलपुर ले जाएंगे। 

दस दिन बीत गए , वे नहीं आये. माँ उदास रहने लगीं , लेकिन गनीमत ये रही कि पन्द्रहवें दिन पापा आ गए, और दो दिन ठहर कर हम सब को जबलपुर ले गए। नए घर में नयी नयी चीजें हमने देखीं , शहर भी बहुत बड़ा था, कुछ दिनों में हमें और खासकर माँ को गाँव याद आने लगा, लेकिन डर के मारे उन्होंने पापा से कुछ नहीं कहा लेकिन मुझे से गाँव की बाते करती रहती। पापा ने यहाँ मेरा एक स्कूल में दाखिला करा दिया, जिसमे अच्छी सी ड्रेस भी थी। पहले गांव के स्कूल में तब सब अपने घर से कुछ भी पहन कर आ जाते थे , ड्रेस का उन दिनों कोई बंधन नहीं था, अब तो सरकार ड्रेस भी दिलवाती है। 

मैंने जबलपुर में एक और भाई पा लिया। अब मेरे दो भाई थे , लेकिन जितना मैंने पहले भाई को खिलाने में दिलचस्पी दिखाई , दुसरे भाई के साथ खेलने में उतनी नहीं क्योंकि यहां पापा रोज मेरी पढ़ाई के प्रगति पर नजर रखते थे, स्कूल में क्या क्या हुआ , रोज पूछते थे , होमवर्क करवाने में मदद करते थे , क्योंकि माँ तो कुछ जानती ही नहीं थी। और मैं पांचवी कक्षा में अपने स्कूल में सर्वाधिक नंबर प्राप्त किये , जिसका पूरा श्रेय मेरे पापा को जाता है. तभी एक घटना ऐसी हुई कि सब कुछ बदल गया। "

मेरे मामा जी जबलपुर आये, उन्होंने बताया कि मामी को बच्चा होने वाला है, और रिवाज के अनुसार वे अपनी बहन, यानि मेरी माँ को लेने आये हैं। पापा तब घर पर नहीं थे , शाम को पापा घर आये तो मामा जी को देखते ही उनका मूड ऑफ हो गया, उन्होंने मामा जी से गुस्से में बात की , कि वे क्यों आये हैं , मामाजी उन्हें मनाने की कोशिश करते दिखाई दिए , बताया कि वे माँ को लेने आये हैं, थोड़े दिनों बाद वापस छोड़ जाएंगे, रस्म पूरी हो जायेगी। लेकिन पापा बिलकुल तैयार नहीं थे, माँ ने भी उन्हें समझाने की कोशिश की तो पापा ने कह दिया, ये मेरा आखिरी फैसला है कि अगर तुम जाओगी तो बच्चों को भी ले जाओ, और फिर कभी न तो तुम्हें लेने आऊंगा और न इस घर में तुम्हें दुबारा जगह मिलेगी। इतना गुस्सा मुझे तब नहीं समझ आया था कि पापा मां से गुस्सा हैं कि मामा से , और क्यों हैं , लेकिन बाद में पापा से बरसों बाद मैंने पूछने की हिम्मत की तो उन्होंने जो बताया, उसके बाद मुझे उनका गुस्सा जायज लगा। लेकिन उस दिन तो हमारे परिवार का एक विस्फोट हो ही गया , अगले दिन पापा ऑफिस गए और माँ ने हम सब के कपडे एक सूटकेस में भरे और मामा के साथ हम सब लोग जबलपुर से चले आये. घर की चाबी चपरासी, जो घर पर ड्यूटी देता था, उसे दे कर. 

"घोस्ट कथा -३ 

चलिए, आप को उत्सुकता होगी कि पापा मामा जी से नाराज क्यों थे, ये बात मुझे भी दो बच्चों की माँ बनने के बाद पापा ने बताई , तब वे मुझ से मित्रवत व्यवहार करने लगे थे, वरना तो मैं, मैं ही क्या, मेरे दोनों भाई , मेरे चाचा लोग उनसे सदा डरते ही रहे। पापा ने बताया - 

' वो एक साधारण किसान परिवार के थे, और पोस्ट ग्रेजुएशन कर रहे थे, एक रविवार जब वे घर आये ,एक दिन उनके घर पर कुछ सफ़ेद झक कपड़ों में बनेठने चार लोग आये बैठे थे. उनके पिता यानि मेरे दादा जी उनसे बातें कर रहे थे। उन्होंने पापा को भी वहीँ बैठा लिया। मेहमान लोग करीब ५० किलोमीटर दूर के एक गाँव के रईस किसान , गाँव की भाषा में कहें तो जमींदार थे। पापा तब विवाह योग्य आयु के थे, गाँव में २०, २१ साल की उम्र शादी के योग्य ही मानी जाती थी। पापा शादी के लिए तैयार नहीं थे, लेकिन पढ़ाई जारी रखना चाहते थे, और मेरे दादा जी ने तो पोस्टग्रेडुएशन की पढ़ाई के लिए भी बढ़ी मुश्किल से हाँ भरी थी , जबकि पापा आगे भी पढ़ाई करना चाहते थे, तो पापा को एक सम्भावना नजर आई कि यदि वे इस रिश्ते को हाँ कर देंगे तो शायद ससुरालियों की आर्थिक क्षमता से अपनी पढ़ाई जारी रख सकेंगे। हमारे दादा जी के पास अधिक जमीन नहीं थी , और वे बड़े जमींदार से रिश्ता जोड़ने को गर्व की बात मानते थे। मेरे नाना जी को अपनी सुन्दर बेटी के लिए एक पढ़ा लिखा गबरू जवान मिल रहा था। तो कुल मिलाकर बात बन गयी और शादी भी हो गयी। 

शादी के बाद लौट फेर हुई, कुछ महीनों बाद गौने की रस्म होना तय हुआ। लेकिन मेरे पापा को पी एच डी में पंजीकरण कराना था इसके लिए उन्हें आर्थिक सहारा ढूंढने के लिए ससुराल याद आई, तो मेरे पापा अपने एक दोस्त के साथ अपनी ससुराल चले गए , उनको भरोसा था कि उनका दोस्त भी उनकी ससुराल की सम्पन्नता से इम्प्रेस हो जायेगा। ससुराल में अचानक पहुंचे पापा और उनके दोस्त को देखकर मेरे मामा / नाना लोग चकित तो हुए लेकिन उन्होंने उनके लिए नया बिस्तर लगाया , साफ़ सुथरी नयी चादरें बिछाई, अच्छे भोजन व्यंजनों से आवभगत भी की। लेकिन पापा अपनी जरूरत का इजहार नहीं कर पा रहे थे , उनका स्वाभिमान उन्हें रोक रहा था। सुबह हुई तो वो यह फैसला कर के कि कुछ नहीं माँगना है, जल्दी से तैयार हो कर चल दिए ताकि अपने कॉलेज समय से पहुँच सकें और अपने प्रोफेसर से बात कर सकें। उधर वे थोड़ी देर से खड़े हुए बस स्टॉप पर बस का इंतजार कर ही रहे थे, कि तभी मामा जी यानि मेरे पापा के साले साहब अपने छोटे भाई के साथ वहां पहुँच गए। पापा ने उन्हें बता दिया कि कॉलेज समय से पहुँचने के लिए उन्हें जल्दी निकलना था, इसलिए बिना आप लोगों को डिस्टर्ब किये चले आये। मामा जी ने उनसे कहा कि कोई बात नहीं, जैसी आपकी मर्जी , लेकिन आप अपने बैग खोल कर दिखाइए , आपके बिस्तर पर बिछाई हुई चादरें बिस्तर पर नहीं मिल रही हैं। पापा को गुस्सा फूट पड़ा , क्या हमें चोर समझ रहे हो। मामा जी ने आग में घी डाल दिया, अरे भाई भूल चूक से आपके कपड़ों के साथ क्या पता बैग में रखी गयी हों, और मजाक में ये भी कह दिया, वैसे आये तो चोरों की तरह ही हो, चुपके से, वरना कायदे से विदाई उपहार वगैरह लेकर आते। अब तो ज्वालामुखी फट पड़ा। साले का मजाक जीजा बर्दाश्त नहीं कर पाए। उन्होंने बैग मामा के मुंह पर दे मारा और बिना बैग के ही बस आते ही उसमे सवार हो कर चले आये। उसके बाद मेरे पापा कभी ससुराल नहीं गए। 

अब गुस्से का दूसरा चरण यानि पिछली कथा से आगे - जबलपुर से माँ और हम बच्चे मामा के साथ मामा के घर पहुँच गए, वहां हमें एक नन्ही सी ताजा सी ममेरी बहन को पैदा होते हमने देखा, मतलब होते हुए तो नहीं , होने के तुरंत बाद हमने देखा। एक सप्ताह के बाद माँ ने जिद्द की कि उन्हें गाँव पहुंचा दिया जाए। काश उन्होंने जबलपुर जाने की जिद्द की होती तो शायद मामा हमें जबलपुर भी पहुंचा देते, लेकिन माँ को तो गाँव की बहुत याद आया करती थी , तो उनका इरादा गाँव में कुछ दिन रूककर जबलपुर जाने का था, उसके लिए उन्होंने चाचा जी से बात की तब उन्हें पता चला कि उनके पास पापा की चिट्ठी आयी थी जिसमे चेतावनी लिखी थी कि ख़बरदार कोई हम लोगों को लेकर जबलपुर आया तो ! चाचा लोग तो पहले से ही पापा से बहुत डरते थे। इस प्रकार हमारा जबलपुर का छोटा सा स्टे अंतिम स्टे बन कर रह गया। "

"घोस्ट कथा - ४ 

पता नहीं सचमुच पापा को मुझ से प्यार था या कोई और कारण था, कि अगले साल की गर्मियों की छुट्टियों में वे गाँव आये, और घर के बाहर ही घर के बाहरी कमरे में मुझे बुलाया और कहा कि जो भी तुम्हारे पहनने के कपडे हों वो एक बैग में रख लेना, और कल मैं तुम्हारा एक बढ़िया स्कूल में दाखिला करवाने चलूँगा। उन्होंने न भाइयों को देखा, और न माँ से बात की , लेकिन माँ का भेजा हुआ खाना खाया, पता नहीं सचमुच उसमे कुछ गड़बड़ थी या उन्हें खाना खाने के बाद पता चला कि खाना माँ ने बनाया है, क्यों उनके लिए खाना लेकर तो चाचा जी आये थे जब मैं उनके पास बैठी थे , तो उन्होंने खाने की उल्टी कर दी, और चाचा से बोले कि जल्दी से गांव में जो भी डॉक्टर हो, जल्दी बुलाओ। डॉक्टर आया, उसने दवा दे दी , उलटी बंद हो गयी. ये उनका नाटक था या सचमुच खाना दूषित था ,ये हमें कभी पता नहीं चला , लेकिन मुझे विश्वास है कि खाना दूषित नहीं था , क्योंकि वही खाना घर में हम बच्चों ने और माँ ने भी खाया था, और हमें कोई उलटी नहीं आयी। सुबह हुई, पापा ने कुछ नहीं खाया और ये तक कह दिया कि ये औरत मुझे मारना चाहती है। 

वो मुझे लेकर एक पर्वतीय प्रदेश के एजुकेशन हब कहे जाने वाले शहर में एक कॉलेज में ले गए, उस कॉलेज की प्राचार्या शायद उनकी जान पहचान की थी , उन्होंने बड़े आदर से हमें बैठाया , मुझे भी बड़े प्यार से बात की, समझाया, और मेरा एडमिशन कक्षा ६ में कर लिया। घर से , माँ से अपने भाइयों से सबसे दूर इतनी छोटी सी उम्र में मुझे एक अनजान जगह छोड़ कर मेरे पापा मुझ से हाथ छुड़ा कर जब चले तो मैं फूट फूट कर रोई। उनके जाने के बाद थोड़ी देर तो प्रिंसिपल मुझे प्यार से समझाती रहीं लेकिन जब एक बार वो गरजी तो मेरी सिट्टी पिट्टी गुम हो गयी और मेरी रुलाई एक दम से रुक गयी। न पढ़ने में मन लगता , न खाना अच्छा लगता था, वहां की हॉस्टल की वार्डेन उदार थी और छात्राओं का ध्यान रखती थी. एक सप्ताह बाद मैंने ढंग से खाना शुरू किया, और पढ़ना भी शुरू किया। जबलपुर में पापा द्वारा कराई गई पढ़ाई यहाँ काम आई और मुझे अच्छे छात्रों में गिना जाने लगा. वहां मेरी कई सहेलियां बन गयीं। ये महाविद्यालय स्नातक स्तर तक का था और इसमें कक्षा ६ से केवल लड़कियों को प्रवेश दिया जाता था। अब तो ये पोस्टग्रेजुएट कॉलेज है और बहुत तरह के नए नए कोर्स इसमें शुरू हो चुके हैं। 

धीरे धीरे मेरा मन यहाँ रम गया। गर्मियों के एक महीने की छुट्टी में गाँव जाती और माँ के साथ समय बिताती , मुझे लेने के लिए हमेशा मेरे चाचाओं में से कोई आ जाता था और उनमे से ही कोई महीने भर बाद वापस छोड़ जाता था। बरस दर बरस बीतते गए। मुझे घर जाने का साल भर में एक बार ही मौका मिलता था, तब माँ भरपूर लाड लड़ा लेती थी, लेकिन फिर भी मुझे अब अपना नया ठिकाना, नया शहर , नए दोस्तों में ही मन लगने लगा था, इसलिए केवल माँ से बिछड़ते समय थोड़ी देर के लिए उदासी आती थी और थोड़ी देर में सब ठीक हो जाता था। मेरे पापा मुझे लेने केवल एक बार आये, वो भी तब जब उन्हें मुझे शादी के मंडप में बिठाने का फ़र्ज़ पूरा करना था।"

"घोस्ट कथा -५ 

आपको क्या लग रहा है कि मेरे पापा कोई गैर जिम्मेदार आदमी थे, हरगिज नहीं , वे कई विषयों में मास्टर्स डिग्री प्राप्त कर चुके थे, पी एच डी कर चुके थे, उस समय मेरे गाँव ही नहीं आस पास के गाँवों में और कहें तो कई कई कोस तक हमारे बिरादरी में उनसे ज्यादा पढ़ा लिखा नहीं था, लेकिन मेरे पापा सिर्फ स्वाभिमानी ही नहीं थे, जैसा कि उन्होंने अपने ससुराल में हुए अपमान की प्रतिक्रिया में प्रकट भी कर दिया था, लेकिन उन्हें अपनी पढ़ाई का घमंड भी था और इस घमंड में वे गाँव की चौपाल पर अपनी बिरादरी को गाली भी देते थे, यद्यपि ये उनका तरीका उन लोगों को शिक्षा के प्रति जागरूक करने का था। वे चाहते थे कि उनके गाँव और बिरादरी के लोग अपने ऊपर लगे हुए पिछड़ेपन के दाग को मिटायें, और इसके लिए वे हर उस व्यक्ति की मदद करने को तैयार रहते थे, जो शिक्षा के प्रति अपना लगाव प्रदर्शित करे। उन्होंने मुझे दूर पढ़ने इसलिए भेजा क्योंकि आस पास के विद्यालयों में लड़कियों के लिए कोई ढंग का स्कूल था ही नहीं , दूसरा वे मुझे गाँव के माहौल से दूर रखना चाहते थे, जब मेरे भाई पढ़ने लायक हुए तो उन्हें भी गाँव से काफी दूर अलग अलग शहरों के बेहतर स्कूलों में हॉस्टल में पढ़ने भेज दिया। मेरे ताऊ का लड़का जो उम्र में मुझ से कुछ ही घंटे छोटा था, उसे उन्होंने एम् ए , पी एच डी कराने में पूरा सहयोग दिया, जबकि मेरे ताऊ उसे अपने साथ खेती में जोड़ना चाहते थे , और अपने छोटे भाइयों की भी शिक्षा का पूरा प्रबंध किया, और सभी को इस योग्य बना दिया कि सब के सब अध्यापक बन गए, और हमारा परिवार मास्टरों का परिवार कहा जाने लगा। उन्होंने गाँव के पास ही निजी जमीन पर लोगों से चंदा इकठ्ठा करके एक इंटर कॉलेज स्थापित करवा दिया, इस कॉलेज ने गाँव ने शिक्षा की बयार बहा दी, सब लोग कम से कम इंटर तक तो पढ़ने ही लगे. मेरे चाचा इस विद्यालय में प्रवक्ता भी रहे और प्रिंसिपल भी, मेरे ताऊ का लड़का भी सरकारी कॉलेज में प्रिंसिपल हुआ, मेरे छोटे चाचा भी केंद्रीय विद्यालय में टीचर बने, मेरे ताऊ के दो और लड़के भी शिक्षक बन गए। बाद में मेरे दोनों भाई, दोनों भाभियाँ भी केंद्रीय विद्यालय में टीचर बनी। ये सब मैं इसलिए बता रही हूँ कि कहीं आप मेरे पापा को कठोर निर्दयी न समझ लें, वो जिद्दी थे , जो ठान लेते थे कर लेते थे. बस मुझे उनसे एक शिकायत रही कि वे क्षमाशील नहीं थे, क्योंकि शायद उनका बचपन कठिनाई में बीता था और बहुत अवरोधों के बाद ही वे शिक्षा प्राप्त कर पाए थे, दादा जी से लड़भिड़ कर। मझे उनसे डर तो लगता था लेकिन उनके प्रति सम्मान और प्यार भी बहुत था और है , क्योंकि उन्होंने हमारे परिवार को और परिवार के बाहर के भी प्रतिभावान युवाओं को आगे बढ़ने में बहुत मदद की, वे शिक्षा के प्रति पूरे जीवन भर समर्पित रहे। दूसरी शिकायत ये रही कि वे माँ और बच्चों के प्रति बहुत कठोर रहे , बरसों तक मेरे अलावा किसी से उन्होंने बात तक नहीं की। और मुझे एक दिन उनके सामान में एक पुस्तक दिखी "सुल्ताना डाकू " उस पर मैंने अपने पापा का नाम छपा देखा तो मुझे गर्व हुआ कि वो लेखक भी थे, उसे पढ़ कर पता चला कि नजीबाबाद के इस कुख्यात डाकू की जीवनी पर उपन्यास भी लिखा गया है और वो लेखक मेरे पापा हैं। " 

तो आज की ये कथा घोस्ट ने अपने पापा की छवि पर पड़ी धुल को साफ़ करने के लिए बताई। 

"घोस्ट कथा - ६ 

मेरे हॉस्टल और स्कूलिंग का खर्चा मेरे पापा सीधे प्रिंसिपल महोदया के पास मनीऑर्डर से भिजवा देते थे, मेरी सभी आर्थिक जरूरतों के बारे में मुझे कोई चिंता नहीं करनी पड़ती थी, लेकिन मुझे बाजार जाने की अनुमति नहीं थी , हम केवल किसी प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए ही बाहर निकलते थे और अध्यापिका की निगरानी में ही बाहर जाते थे और उन्हीं के साथ वापस आते थे, वह कॉलेज एक तरह से जेल जैसा था, सब कुछ अनुशासन में था, सीनियर लड़कियां , जूनियर्स से जरूर कपडे धोने जैसी कुछ सेवा करवा लेती थीं, और इसे वार्डन की मौन स्वीकृति मिली हुई थी। अधिकतर शिक्षिकाएं, या तो अविवाहित थीं , या तलाकशुदा या विधवा थीं, प्रिंसिपल का स्टेटस हमें कभी स्पष्ट नहीं हो सका कि वे तलाकशुदा थीं या विधवा? ? उनकी दो बेटियां थीं और दोनों ही विवाहित थीं, वे कभी कभी अपनी माँ से मिलने आ जाती थीं और तब वे हॉस्टल में भी आती थीं और हमें अच्छी लगती थीं, आधुनिक थीं , विचारों से भी और पहनावे से भी। मुझे अपने पिता के मेरी माँ से किये जाने वाले बर्ताव और कॉलेज की शिक्षिकाओं के स्टेटस और उनकी पुरुषों के बारे में राय से शादी नामक संस्था में कोई रूचि नहीं रह गयी थी, और मैं चाहती थी कि किसी तरह अपनी पढ़ाई पूरी करके नौकरी करूँ और फिर अपनी माँ और अपने भाइयों का ध्यान रखूँ। यद्यपि पापा मेरी ही तरह मेरे भाइयों की पढ़ाई की भी उचित व्यवस्था करके उन्हें भी हॉस्टल युक्त अच्छे स्कूलों में भेज चुके थे, और माँ अपना गुजारा गाँव की जमीन में चाचा जी की मदद से खेती करवा कर, कर ले रही थीं , शुरू के कुछ वर्षों तक मेरे मामा लोग भी माँ की मदद करते रहे लेकिन धीरे धीरे उनका संपर्क साल में एक दो बार भैया दूज या रक्षाबंधन तक ही सीमित रह गया, माँ का भी मायके जाना कम होता गया। लेकिन गर्मियों की छुटियों में मैं , दोनों भाई और माँ खूब अच्छे से समय बिताते थे, लेकिन खेती की आमदनी से सिर्फ माँ का ही काम चल पाता था और हम तीनों के लिए माँ अधिक कुछ नहीं कर पाती थी सिर्फ खाना , घी दूध से छका देती थी। 

किसी ने माँ के कान भरे कि मेरे पापा ने अपनी कार्यस्थल पर कोई दूसरा विवाह कर लिया है, तो डरते डरते माँ ने चाचा से कहा कि इस बारे में कुछ पता लगाए, लेकिन वे अपने भाई के खिलाफ जासूसी के लिए तैयार नहीं हुए, फिर उन्होंने अपने भाई यानि मामा जी से कहा तो उन्होंने भी बहुत रूचि नहीं दिखाई। इस लिए वो मन मसोस कर रह गयीं। इस बात का खुलासा बहुत बाद में हुआ कि ये अफवाह हमारे परिवार से ईर्ष्या रखने वाले गाँव के लोगों ने ही फैलाई थी और इस में तनिक भी सच्चाई नहीं थी।  

पढ़ते पढ़ते हम स्नातक भी हो गए, अब समस्या थी कि मैं और पढ़ना चाहती थी, और हमारे कॉलेज में ग्रेजुएशन तक की ही शिक्षा थी, शहर का सबसे बड़ा कॉलेज डी ए वी पो ग्रे कॉलेज था, वहां सहशिक्षा थी, और हॉस्टल में सीटें काम थीं और डिमांड ज्यादा। एक समस्या ये भी थी कि पापा मुझे अंग्रेजी में एम् ए कराना चाहते थे और मैं अंग्रेजी से घबराती थी। ग्रेजुएशन में वैसे तो मेरी प्रथम श्रेणी आयी थी लेकिन अंग्रेजी में तो जैसे तैसे पास ही हो पायी थी। इस में मेरी मदद की मेरे पापा की मुंह बोली बहन मेरी प्रिंसिपल ने. पापा ने उनसे थोड़ी जिरह तो की , कि अंग्रेजी में जॉब का स्कोप ज्यादा है, हिंदी, संस्कृत या राजनीतिशास्त्र में उतना नहीं है। लेकिन प्रिंसिपल ने कहा कि संस्कृत में निष्णात होगी तो जॉब की गारंटी उनकी है। और मैंने संस्कृत में MA में प्रवेश ले लिया, प्रिंसिपल ने मुझे हॉस्टल में रहने की अनुमति देने के बदले मुझे कक्षा ८ तक की छात्रों के पढ़ाने की शर्त रखी जो मैंने तुरंत मान ली, पापा भी दमयंती कपूर, यानि एक अनुशासन प्रिय प्रिंसिपल के संरक्षण में हॉस्टल में रहने की सुविधा को देखा मान गए।

घोस्ट कथा- ७ 

पापा मुझ से संतुष्ट थे, लेकिन मुझ से छोटे भाई ने उनकी उम्मीदों पर तब पानी फेर दिया जब वह बोर्ड इंटरमीडिएट की परीक्षा में फ़ैल हो गया , पापा के दरबार में माफ़ी तो थी ही नहीं , उसे हॉस्टल से निकाल कर गाँव पहुंचवा दिया , ये कहकर पढ़ना हो पढ़ो , न पढ़ना हो अपनी खेती बाड़ी सम्भालो , और उस से पल्ला झाड़ लिया। भाई गाँव माँ के पास पहुँच गया. इस से उन दोनों को एक दुसरे का साथ मिल गया लेकिन पढ़ना तो था ही , चाचा जी वाले स्कूल में ही एडमिशन ले लिया और वहीँ से इंटरमीडिएट करके ग्रेजुएशन के लिए गाँव के पास के जिला मुख्यालय के बड़े कॉलेज में एडमिशन ले लिया। गाँव से बस पकड़ कर शहर पढ़ने जाता रहा। 

मैं पहली बार अपने ९ वर्ष के कठोर अधिवास से बाहर आयी तो बहुत अच्छा लगा। वहां मेरी तीन सबसे प्रिय सहेलियां थीं, उनमे से एक अपनी छोटी बहन(इसलिए वह भी सहेली जैसी हुई ) के साथ वहां पढ़ती थी, वे किसी फौजी अफसर की बेटी थीं , उनके पिता जीवित नहीं थे, माँ शायद पेंशन पाती थी और वही उनका खर्चा उठाती थी। मेरी सहेली की अंग्रेजी (फौजी) माहौल से आने के कारण बचपन से ही अच्छी थी , उतनी है अच्छी जितनी मेरी संस्कृत अच्छी थी। उसने अपनी माँ को बुलवा कर प्रिंसिपल से बात करवाई, और उसे भी उन्हीं शर्तों पर हॉस्टल में रहने की अनुमति मिल गयी और उसने डी ए वी में MA इंग्लिश में एडमिशन ले लिया। अब हम दोनों साथ साथ हॉस्टल से जाती, साथ साथ वापस आती और शाम को हॉस्टल में छोटी लड़कियों को एक्स्ट्रा क्लास के रूप में शिक्षा देती। प्रिंसिपल भी थोड़ी सुरक्षा से निश्चिन्त हो गयी कि उनके हॉस्टल की साथ साथ दो लड़कियां DAV जाती हैं और साथ ही वापस आती हैं। मेरी तीसरी सहेली की पढ़ाई ग्रेजुएशन के बाद बंद हो गयी , क्योंकि उसके परिवार की स्थिति अच्छी नहीं थी , पिता गुजर चुके थे, कई भाई बहन थे , बड़ा भाई छोले भठूरे का खोखा लगाता था। उसकी माँ छोले भठूरे बनाती थी और वह बस दुबारा गर्म करके बेचता था। लेकिन उसके खोखे पर भीड़ रहती थी। मैंने और मेरी सहेली बिमला ने कई बार मुफ्त में / दोस्ती में वहां छोले भठूरे खाए। वहां एक हैंडसम लड़का भी अक्सर आता था, और हम से बात करने की कोशिश करता था, हम रेस्पॉन्ड नहीं करते थे। एक दिन उसने कहा कि आप लोग कमला की क्लास फेलो हो क्या ? कमला तो हमारी तीसरी सहेली थी , जिसकी पढ़ाई छूट गयी थी , तब हमें पता चला कि वह कमला (जो कि हमारे पुराने कालेज की डे स्कॉलर थी , का दोस्त था और उसी से मिलने के बहाने के लिए उसके भाई के ठेले पर छोले भठूरे खाने आता था। कमला भी भाई के पीछे खोखे में बैठी उसे देखती रहती थी। खैर हमने मामला समझ लिया और उनकी मदद करने के गरज से उससे बात करने लगे, उसका नाम सतीश था। धीरे धीरे वह हमारा दोस्त बन गया लेकिन मैं जल्द ही सतर्क हो गयी क्योंकि उसने कमला के बजाय मेरे चक्कर ज्यादा लगाने शुरू कर दिए , अब वह हमें छोले भठूरे के खोखे के बजाये हमारे DAV के गेट पर इंतजार करता मिलता। मैंने उसकी शिकायत कमला से कर दी और फिर उनमे क्या हुआ ये तो नहीं पता, लेकिन हमारा पीछा उसने छोड़ दिया। हमारे एक हैंडसम टीचर भी पढ़ाते पढ़ाते मुझे पर चॉक फेंक कर मारने का बहाना ढूंढते थे। लेकिन मुझे पारिवारिक कारणों से शादी प्रेम जैसे मामलों मे कोई रूचि ही नहीं थी। बहुत डरपोक थी मैं। 

घोस्ट कथा -८ 

" थोड़ा फास्फोरवर्ड कर देते हैं। मैं शादी के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं थी, लेकिन पापा ने धमका कर मुझे शादी के लिए तैयार कर लिया और तब मैं DAV से ही MA कर चुकने के बाद बी . एड कर रही थी। मध्यसत्र में ही मेरी शादी की तारिख आ गई. अक्टूबर १९७७ में सगाई हुई , आजकल की पीढ़ी के लोगों को ये बाद अजीब लगेगी कि सगाई कार्यक्रम के लिए लड़की की उपस्थिति अनिवार्य नहीं होती थी. लड़की के भाई , पिता , चाचा , यहाँ तक कि उनके कोई दूत (जैसे पंडित और नाइ ) भी जाकर वरपक्ष में लड़की की सगाई कर आते थे। मेरी सगाई में भी मेरे पापा अपने भाइयों और मेरे भाई , और अपने कुछ रिश्तेदारों को लेकर वरपक्ष के घर गए थे। लेकिन मेरे पापा ने एक आयोजन अपनी प्रिंसिपल दीदी के कार्यालय में भी इस सगाई से पंद्रह दिन पहले किया था, जिसमे वरपक्ष के लोग मुझे देखने आये थे और मुझे भी अपने होने वाले दूल्हे से कुछ मिनट अकेले में बात करने का मौका दिया था। जो उन दिनों आम बात नहीं थी। " 

चलिए अब तो अधिकतर लोग जान ही गए हैं कि इस कहानी की सूत्रधार जो कथा की नायिका भी है, मेरी पत्नी वन्दना ही है। इस प्रसंग को मैं पहले अपनी शादी की घटना पर एक लम्बी पोस्ट डाल चुका हूँ , कि कैसे मेरे पापा ने मेरे ससुर जी को उनके रूखे और अव्यवहारिक बर्ताव के कारण रिजेक्ट कर दिया था और हमारी शादी की बात ख़त्म ही हो गयी थी , लेकिन मेरे एक डायलाग और मम्मी के समर्थन 'इसमें लड़की की क्या गलती है' से मेरे पापा ने मुंह सुजाये सुजाये शादी की सहमति दे दी थी , क्योंकि लड़की तो उन्हें भी बहू के रूप में पसंद आई थी . 

हाँ तो वापस आते हैं घोस्ट के बयान पर - 

" उस दिन जब वे लोग मुझे देखने आने वाले थे , मेरी एक टीचर और मेरी सहेली विमला ने मुझे सजाया , संवारा, और साड़ी पहनाई , और मेरे साथ ही मेरे अगल बगल रहते हुए मुझे प्रिंसिपल ऑफिस के रिटायरिंग रूम में ले गयीं , जिसमे सोफे पड़े हुए थे, सोफों पर तीन महिलाऐं , दो युवक और एक प्रौढ़ दंपत्ति बैठे थे। मैं नजरें झुकाए थी , बिलकुल पुरानी हिंदी फ़िल्मी दृश्य की तरह। मैं तब तक नजरें झुकाए बैठी रही जब तक कि प्रिंसिपल साहिबा ने सब को सम्बोधित करते हुए कहा कि चलिए मैं आप लोगों को अपना कॉलेज दिखाती हूँ , तब तक राजेन्द्र और वन्दना आपस में कुछ बात कर लेंगे। मेरे पापा तो उस कक्ष में घुसे ही नहीं और पूरे समय बाहर ही घूमते रहे। उन के जाने के बाद मैंने नजरें उठाई और ठीक से अपने होने वाले दूल्हे की तरफ देखा। मुझे वह हैंडसम लगा, उसने बात करने की शुरुआत की- क्या आप इस शादी के लिए तैयार हैं। मैंने कहा कि अभी तो तैयार नहीं हूँ , और चाहती हूँ कि कुछ महीनों के लिए शादी टाल दी जाए क्योंकि मैं बी एड पूरा करना चाहती हूँ। तो उसने कहा= कि शादी टालने का कोई और कारण भी हो तो वह भी निस्संकोच बता दीजिये क्योंकि संभव है कि इस उम्र और कॉलेज के माहौल में किसी से प्रेम भी एक कारण हो सकता है , मैं कोई बहाना बना कर शादी से मना कर दूंगा, और आपका यदि कोई प्रेम है , तो उसे किसी से प्रकट नहीं करूंगा , फिर जब आप चाहें तब जिस से चाहें शादी कर लेना , क्योंकि मुझे भी शादी की कोई जल्दी नहीं है , मैं भी प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी कर रहा हूँ।= मैंने कहा, नहीं , मैं प्रेम व्रेम के चक्कर में नहीं पड़ती , लेकिन मैं भी जॉब तो करना चाहती हूँ , पढ़ाई पूरी करने के बाद , शादी में मेरी भी दिलचस्पी नहीं है। हम ज्यादा बात नहीं कर पाए थे कि लोग फिर से कमरे में आ गए। इसके बाद ज्यादा बातें नहीं हुईं , प्रौढ़ व्यक्ति जो बाद में मेरे प्यारे ससुर जी बने, ने ठीक है जी , अब हम लोग चलते हैं , जल्दी सूचित करते है, कहा और उठ लिए। उनके उठते ही बाकी लोग भी चल दिए। मैं भी अपनी सहेली के साथ अपने हॉस्टल के कमरे में पहुँच कर ऐसे लम्बे लम्बे सांस लेने लगी जैसे बड़ी मेहनत का काम कर के आई हूँ। "

घोस्ट कथा - ९ 

 "पीछे की घटनाएं तो मुझे बाद में पता चलीं कि शादी कैसे रद्द होते होते तय हो ही गयी , लेकिन शादी से पहले मैंने हिम्मत करके एक चिट्ठी पापा को लिख दी थी , कि पापा जी , मैं चाहती थी कि अभी मेरी शादी एक साल टाल दी जाए , अभी मैं २२ की ही तो हूँ। मैं भूल गयी थी कि हमारी बिरादरी और गाँव में तो १८ साल होते ही लड़की को विदा करने की कोशिश होती थी , मैंने घुमा फिर कर यह भी जता दिया था, कि शिक्षक से बेहतर नौकरी वाला लड़का ढूंढते तो और अच्छा होता। पापा का एक गरमागरम जबाब आया- मैंने दुनिया देखी है , लड़का आज शिक्षक है लेकिन मुझे पूरा विश्वास है कि वह जल्द ही एक अफसर बनेगा, उसमे बहुत प्रतिभा है और शिक्षक भी रहा तो भी वह तुम्हारे लिए बहुत अच्छा पति सिद्ध होगा , और अंत में एक धमकी भी लिख दी , अच्छे लड़के आसानी से नहीं मिलते , अगर ये रिश्ता हाथ से निकल गया तो तू मेरा मरा मुंह देखेगी । . इसके बाद तो मुझे चुपचाप शादी ही कर लेनी थी , और कोई सवाल की गुंजाइश ही नहीं छोड़ी थी. मुझे लेने पापा शादी से एक सप्ताह पहले आ गए , मेरे साथ मेरी दो सहेलियां भी चलना चाहती थीं , थोड़ी सी आनाकानी के बाद पापा ने उन्हें भी साथ चलने की अनुमति दे दी। लेकिन पापा मुझे गाँव नहीं लाये , बल्कि मुरादाबाद के हमारे एक रिश्तेदार के घर ले गए। वहां बातों बातों में मैंने जिक्र किया कि मैं स्कूटर चलाना सीखना चाहती हूँ। पापा के पास एक स्कूटर था वे मुझे उस पर बैठा कर शॉपिंग के लिए ले कर गए थे , तभी मैंने मौका देखकर अपनी ये इच्छा कह दी। पापा ने प्यार जताते हुए कहा कि मैं सीखा भी देता और तुझे शादी पर स्कूटर दहेज़ में भी देता लेकिन राजेन्द्र तो दहेज़ के नाम से चिढ़ता है और फिर उन्होंने बाजार से आकर मुझे वो चिट्ठी दिखाई जो राजेन्द्र यानि मेरे होने वाले दूल्हे ने उन्हें लिखी थी, मैंने इतने सुन्दर हस्तलेख में इतने सुलझी हुई भाषा में लिखी चिट्ठी को देखकर थोड़ी सी प्रसन्नता तो पाई लेकिन मेरे मन में अब तक देखी हुई शादियों और दहेज़ चर्चा के आधार पर जो छवि अपनी शादी के समय मिलने वाले उपहारों की बनाई थी , उसको जरूर धक्का लगा। अपने दूल्हे पर थोड़ा गर्व तो थोड़ा गुस्सा भी आया, कि मेरे उपहारों पर कुठाराघात कर दिया। एक आशंका ये भी जगी कि पता नहीं उस घर में जाकर दहेज़ के बारे में क्या सुनने को मिले । 

सादे ढंग से शादी हुई, मुझे डर लगा रहा कि कोई बखेड़ा न खड़ा हो जाए, हमारे रिश्तेदारों ने सारा इंतजाम अच्छे से किया था। मेरी माँ भी गाँव से वहीँ आ गयी थी. मुझे बाद में समझ में आया कि पापा ने मेरी शादी गाँव में अपने घर से क्यों नहीं की, कारण छोटा सा था कि उनके भीतर कहीं कोई हीन ग्रंथि थी और वह वर पक्ष को गाँव का अपना कच्चा छप्पर वाला घर नहीं दिखाना चाहते थे, या दूसरे अर्थों में कहें कि खुद को शहरी लाइफ स्टाइल का जताना चाहते थे। मेरे साथ मेरी सहेलियां भी मेरी ससुराल गयीं। और ऐसा मेरे पापा की फरमाइश पर हुआ, ये भी पापा ने मुझे बता दिया कि वो चाहते थे कि मेरी सहेलियां मेरी ससुराल को देखें। ससुराल निश्चय ही हमारे घर से बहुत बेहतर स्थिति में थी और सबसे अच्छी बात मुझे ये लगी कि मैं एक भरेपूरे परिवार में आई थी जिसमे मेरे ४ देवर और एक ननद थी , ननद शादी शुदा थी और नन्दोई भी ससुराल पक्ष में बहुत घुले मिले थे, दादा थे, दादी नहीं थीं। कई दिनों तक तो मुझे समझ ही नहीं आया कि इनके परिवार में कितने लोग हैं , बहुत बड़ा घर था दर्जन भर कमरे थे और सब भरे हुए थे। काफी आधुनिक सुविधाएं थीं. मेरे पति के दोस्त और देवर के दोस्त भी सपत्नीक वहां ठहरे हुए थे, इसलिए मैं भ्रमित रही. बाद में राजेंद्र ने मुझे बताया कि ये दम्पति भी हमारे घर के सदस्य जैसे ही हैं और अक्सर यहाँ लम्बे समय तक ठहर जाते हैं, उन्हें उचित आदर देना। 

पहली रात मैं डरी हुई थी , पहली बार पापा और भाइयों से भिन्न किसी पुरुष के साथ मैं एक कमरे में और एक बिस्तर पर थी, जब राजेन्द्र कमरे में आये तो मैं बैठी हुई थी, तो उन्होंने मुझ से बहुत शालीनता से बात की और मुझे उपहार में एक पुस्तक दी, लेकिन वह अंग्रेजी में थी, और कहा कि घबराना नहीं , जब तक तुम कम्फर्टेबल महसूस नहीं करोगी, मैं तुम्हें नहीं छुऊंगा। हम दोनों एक पलंग पर जरूर थे लेकिन दो अलग अलग रजाई में थे. मैं उचटी उचटी नींद में सोई, और अज्ञात आशंका में रही. सुबह दिन निकलने से पहले ही घर में खटर पटर की आवाज सुनकर नीचे मम्मी के पास चली गयी. उन्होंने बिलकुल बेटी जैसा प्यार दिया और पूछा , खाना बनाना आता है , मैंने कहा नहीं, तो उन्होंने कहा कि कोई बात नहीं , मैं सब सिखा दूँगी। धीरे धीरे दो दिनों में मेहमान और दोस्त लोग चले गए और मेरी सहेलियां भी चली गयीं । तब मैंने देवरों और एक मात्र प्यारी सी ननद, जो खुद BA की छात्र थी, और नन्दोई जो LLM के अंतिम वर्ष में थे, या शायद कर चुके थे, लेकिन नौकरी के लिए प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी कर रहे थे, के साथ जो समय बिताया , उसने शादी, परिवार, जैसे विषयों पर मेरी धारणा को बिलकुल बदल दिया। मेरे दिमाग में अपने परिवार अपने रिश्तेदारों के संबंधों से तुलना करने के लिए एक बिलकुल अलग तरह का परिवार मेरे सामने था , और मैं उस परिवार का हिस्सा थी। मुझे लगने लगा कि मैं इस परिवार की धुरी हूँ , सब मेरे आगे पीछे घुमते रहते। राजेन्द्र गाँव से २३ किमी दूर मेरठ शहर में प्रवक्ता थे। वहां उन्होंने एक घर किराये पर लिया हुआ था, सारे भाई बहन , ननद नन्दोई, सब उसी में रह कर पढ़ रहे थे। अगले सप्ताह मैं भी सबके साथ शहर चली गयी। 

वहां सब लोग मिलकर घर के सारे काम कर लेते, जिसको जो समय मिलता उसी में सब मदद के लिए उपलब्ध रहता। अच्छी बात ये थी कि सब को सब काम आते थे, खाना बनाने से लेकर सफाई तक। सबसे ज्यादा सीखने के लिए मैं ही थी , क्योंकि मुझे पहले ये सब करने का मौका ही नहीं मिला था। इतना प्यार और सहयोग मेरी कल्पना से परे था। 

वह उस वर्ष की आखरी तारीख थी, शादी के २४ दिन बीत चुके थे, रात को देर तक हम लोग गप्पें मारते रहे, फिर जब हम सोने के लिए अपने कमरे में गए, तब राजेंद्र ने मुझे एक सूट उपहार दिया, और कहा कि नया साल आने वाला है , ये तुम्हारा उपहार। आज मुझे भी उस पर भरपूर प्यार, और प्यार ही नहीं, उसके संयम पर श्रद्धा उत्पन्न हुई. मैंने कहा कि आज मेरी तरफ से आपको नए साल पर उपहार यही है कि अब आप मुझे छू सकते हो। "

घोस्ट कथा - १० 

" विंटर वेकेशंस समाप्त हो गयी थी , मेरी बी एड की कक्षाएं शुरू हो रही थी, इसलिए मैंने राजेन्द्र से कहा और वो मुझे वापस देहरादून छोड़ आये. लेकिन देहरादून में मेरा मन क्लास में बैठे बैठे अपने पति , देवर , मम्मी ननद के बारे में सोचने लगता और तुलना करने लगता। फिर मुझे लगता कि अगर मैं शादी न करने की जिद पकड़े रहती तो क्या क्या खोती। मेरी शारीरिक उपस्थिति और मानसिक अनुपस्थिति को मेरे टीचर नोटिस कर लेते, उन्होंने मेरी तरफ कुछ कहना चाहते थे कि मेरी सहेली जो अब मेरे ही साथ बी एड में भी थी , पहले ही बोल पडी, सर बेचारी की शादी हो गयी। फिर तो क्लास के लोगों ने मेरी चिढ ही बना ली, जब भी खोई खोई दिखाई देती, कोई न कोई कह देता, बेचारी की शादी हो गयी। 

उन दिनों फोन तो थे नहीं, मतलब मोबाइल फोन नहीं थे , और व्यक्तिगत संदेशों के लिए चिट्ठियां ही एक सहारा थीं। मेरे हॉस्टल के पते पर राजेन्द्र की चिट्ठियां करीब करीब रोज आने लगीं, जिस दिन नहीं आती थी, उस दिन खराब रहता। डाकिया भी, टीचर्स और सहेलियां सब राजेन्द्र की चिट्ठियों को हैंडराइटिंग से ही पहचान लेते, दो तीन सहेलियां तो उन्हें पढ़ने की भी जिद करतीं और मैं उन्हें पढ़वा भी देती थी , वे प्रेमपत्र की तरह ही होती थीं , बहुत शुद्ध हिंदी में कविता जैसा सुख देने वालीं। लगता था जैसे कोई हिंदी साहित्य का विद्वान लिख रहा हो। एक आध पात्र अंग्रेजी में भी आया , जो मुझे लगा कि केवल इम्प्रैशन जमाने के लिए लिखा गया होगा, या फिर मेरी सहेली को इम्प्रेस करने के लिए। मुझे पापा की बात अब सही लगने लगी थी कि शायद मुझे इससे अच्छा पति नहीं मिलता। लेकिन दो महीने बीत जाने के बाद भी उन्होंने मुझ से मेरी किसी आर्थिक जरूरत की बात भी नहीं पूछी तो मुझे लगा कि इतनी मामूली सी बात उसे क्यों नहीं समझ आ रही कि मैं किसी जॉब में नहीं हूँ स्टूडेंट हूँ, मुझे पैसों की जरूरत होगी। लेकिन मैं अपनी तरफ से कुछ लिखना नहीं चाह रही थी. फिर भी एक दिन मैंने एक छोटी सी चिट्ठी लिखी , जब कि मैं सिर्फ इकतरफा चिट्ठियों का ही आनंद ले रही थी , जबाब नहीं देती थी। मैंने चिट्ठी में लिखा कि क्या आप समय निकाल कर देहरादून आ सकते हैं। और चौथे दिन राजेन्द्र मेरा इंतजार मेरे हॉस्टल पर करते मिले, जब मैं कॉलेज से लौट कर आयी। उन्हें देखते ही मेरी रुलाई फूट पड़ी, और मैं उनसे लिपट कर खूब रोई। वो पूछते रहे और मेरी सहेलियां कमरे से बाहर निकल गयीं। फिर मैंने घर परिवार के लोगों के बारे में पूछा। फिर पूछा कि मेरी याद आती है, वो बोले रोज चिट्ठियों से यही तो जताता हूँ। फिर बोले, कोई ख़ास बात थी जो मुझे बताना चाहती थी ? मैंने कहा कि क्या आप कुछ पैसे दे सकते हैं , मुझ पर उधार चढ़ गया है, मेस का भुगतान नहीं हुआ है और सहेली के भी कुछ पैसे उधार चढ़ गए हैं, तो वे बोले कि क्या पापा पैसे नहीं भेजते। मैंने कहा कि अब वह क्यों भेजेंगे। तब भेद खुला -- मेरे पापा ने राजेन्द्र से कह दिया था कि वन्दना को बी एड कराना मेरी जिम्मेदारी है, वो फिजूल खर्च है उसे पैसे मत भेजना। जब कि मुझे पापा ने कह दिया था कि अब शादी के बाद तुम से मैं मुक्त हुआ, तुम अब राजेन्द्र की जिम्मेदारी हो। अजीब है न, मेरे पापा ने फिर सिद्ध कर दिया कि वे अपने किस्म के अकेले ही पिता हैं। खैर राजेंद्र ने कहा कि अभी तो मैं नहीं लाया हूँ , तुमने चिट्ठी में बताया होता तो इंतजाम करके लाता, और वो वापस लौट गए। मैं फिर उदास हो गयी और सोचती रही, कि अब क्या होगा लेकिन वो चार दिन बाद फिर वापस आये। उन्होंने अपनी मोटर साइकिल बेच दी थी मुझे तनाव से मुक्त करने के लिए। "

घोस्ट कथा - ११ 

"मेरी शादी के समय मेरा सबसे छोटा देवर सैनिक स्कूल में घोडा खाल में कक्षा ८ में पढ़ रहा था। यह एक प्रतिष्ठित स्कूल था, और शादी के समय विंटर वेकेशन में गाँव आया हुआ था। लेकिन उसने मम्मी जी को घोड़ाखाल के बारे में बड़ी नकारात्मक बातें , अध्यापकों की सख्ती और भोजन की गुणवत्ता पर कहीं , और उन्हें पटा लिया कि अब वो वापस घोड़ाखाल नहीं जायेगा। जबकि वह वहां तीन साल से पढ़ रहा था, और इस स्कूल में एडमिशन एक कठिन प्रतियोगी परीक्षा के द्वारा होता था, राजेन्द्र ने बताया था कि उसके एडमिशन के लिए उसने और मेरे सबसे बड़े देवर अजय ने बहुत मेहनत की थी। लेकिन मम्मी जी ने कह दिया तो कह दिया कि वो अब घोड़ाखाल नहीं जायेगा। लेकिन मम्मी जी का विरोध तो राजेन्द्र कर ही नहीं सकते थे, उनके आदर्श बेटे थे, लेकिन उनका जो रूप मैंने उस दिन देखा तो मैं डर गयी। मेरे मन में अभी ताजा ताजा जो एक आदर्श छवि अपने पति की बन रही थी, उस में दरार पड़ गयी , उन्होंने लात घूंसो से अपने सबसे छोटे भाई की पिटाई कर दी। ऐसा लगा जैसे उनका कोई बड़ा सपना चूर चूर हो गया था। बदले में मम्मी जी ने एक कपडे धोने वाली थपकी उठाई और राजेन्द्र जी की पिटाई कर दी। ये सब मेरे लिए अप्रत्याशित था. मैंने अकेले में उनसे एक वादा लिया कि भविष्य में वे कभी किसी भाई की पिटाई नहीं करेंगे। पहले तो उन्होंने कहा कि अरे ऐसी कोई बात नहीं, पापा तो साथ रहते नहीं हैं , भाइयों को अनुशासन में रखने की जिम्मेदारी मेरी ही है , सीरियस मत लो, सारे भाई कई बार पिट चुके हैं. लेकिन मेरे इंसिस्ट करने पर उन्होंने मुझे वादा कर लिया। 

अगले दिन सब कुछ नार्मल था, कोई किसी पर गुस्सा नहीं था, सब कुछ नार्मल जैसे कुछ हुआ ही न हो , मुझे ये भी अजीब लगा क्योंकि इस घर में ये सब क्या है, पिट जाते हैं फिर भी भैया का पूर्वत: आदर करते हैं , भैया भी पूर्वतः स्नेह जताते हैं। देखा, प्रवीण यानि सबसे छोटे देवर को तैयार किया जा रहा है, उन्हें मेरठ में सेंट मेरी स्कूल में मिड सेशन में दाखिला कराने लेकर जा रहे हैं राजेन्द्र जी। उनके लिए ये कठिन नहीं था क्योंकि वे स्वयं सेंट जोसफ में लेक्चरर थे।  

मुझे ख़ुशी है कि उन्होंने मुझ से किया हुआ वादा निभाया। और इस परिवार में मेरा सफल दखल था, जिसके लिए मम्मी जी ने बाद में मुझे शाबाशी दी, कि तूने तो मेरे लाडले का गुस्सा ही ठंडा कर दिया। 

कुछ दिनों तक* वह मेरा सबसे लाडला देवर भी रहा, क्योंकि वह मेरे छोटे भाई का हम उम्र था. उससे बड़ा देवर मेरे पहले भाई का हम उम्र था। और मैं अपने सबसे बड़े देवर से सिर्फ दो सप्ताह बड़ी थी। तो हम सब में बहुत प्यार और अच्छा तालमेल रहा. कुछ दिनों तक* क्यों कहा , ये भी आपको बाद में पता चल जाएगा। 

मेरा बी एड पूरा हो गया था, और मैं स्थाई रूप से मेरठ आ गयी। खर्च अधिक था और आमदनी कम। इस से निपटने के लिए राजेन्द्र कभी सस्ते मकान ढूंढते , कभी अतिरिक्त आय के लिए ट्यूशन पकड़ते। तभी एक अच्छी बात ये हुई कि इन दोनों बड़े भाइयों के प्रतियोगिता परीक्षाओं के सकारात्मक परिणाम आने शुरू हुए. बड़े देवर यानि अजय को उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के मुख्यालय में ही नौकरी मिल गयी, और नन्दोई को भी एक मिल में श्रम अधिकारी की नौकरी मिल गयी, और राजेन्द्र को BDO का पद ऑफर हुआ और वे ट्रेनिंग में चले गए, जाने से पहले मुझे गाँव छोड़ गए, गर्मियों की छुट्टियां ख़त्म हो गयी थी. सेंट मेरी से निकाल कर प्रवीण को भी बालेनी के इंटर कॉलेज में कक्षा ९ में प्रवेश दिला दिया गया। अनिल IIT रुड़की में थे। तीसरे देवर जिन्हें सब मुन्ना कहते थे, इंटर करके गाँव आ गए और डे स्कॉलर के रूप में ग्रेजुएशन में दाखिला ले लिया। इस प्रकार मेरठ हम सब से छूट गया। "

घोस्ट कथा - १२ 

" अब मैं राजेन्द्र को राजी कहने लगी थी (अकेले में ) , वो मेरी हर बात पे राजी जो हो जाता था, मैंने नोटिस किया था कि वो मम्मी जी , रेखा बहन जी (मेरी प्यारी ननद ) और मैं, हम तीन की हर बात मान लेता था। यानि वो महिलाओं के प्रति ज्यादा ही उदार था। बाकी लोग उसकी हर बात मान लेते थे। राजी की ट्रेनिंग के समय मैं मम्मी जी के पास गाँव में थी तो मेरी भी ट्रेनिंग चल रही थी , गाँव के सभी तरह के घरेलू बहुओं वाले कामों की अच्छी ट्रेनिंग मम्मी जी ने मुझे दे दी , मम्मी मुझे मजाक में कहती थी, जा मैंने तुझे एम् एड करवा दी। लेकिन मैं थक बहुत जाती थी. और मुझे देहरादून के आराम के दिन याद आते थे। मजेदार बात ये कि मुझे मायके की याद नहीं आती थी , जब मैं पहले पहल देहरादून गयी ही तब मुझे अपने गाँव की याद आती थी , और जब मैं ससुराल में आ गयी तो मुझे देहरादून की याद आती थी। सबसे कठिन काम मुझे मक्का या बाजरे की रोटी बनाना लगा, लेकिन अभ्यास से ये भी सीख ही लिया। दही बिलोना थोड़ा मेहनत का काम था, लेकिन वर्जिश हो जाती थी, तब तक बिजली की मशीनें अधिक प्रचलित नहीं थी , जबकि इस घर में बिजली तो थी लेकिन सिर्फ रौशनी और पंखे चलाने के लिए. कपडे भी हाथ से धुलते थे। 

ट्रेनिंग ख़त्म होते ही राजी गाँव आये। मम्मी ने कहा कि इसकी भी ट्रेनिंग ख़त्म हो गई है, अब इसे अपने साथ ले जा , राजी को बुलंदशहर जिले में गुलावठी विकासखंड के खंड विकास अधिकारी की पहली पोस्टिंग मिली थी। मम्मी जी की बात सुनकर मेरा मन भीतर ही भीतर प्रफुल्लित था लेकिन मुसीबतें मेरा इंतजार कर रही थीं। अभी तक मेरठ में और गाँव में मुझे बसी बसाईं गृहस्थी मिली थी, सब कुछ पहले से सुसज्जित था। मुझे केवल इस को इस्तेमाल करना था लेकिन अब आगे मुझे गृहस्थी खुद बसानी थी। मम्मी जी ने या किसी ने भी मुझ से शादी के दहेज़ के बारे में कोई बात कभी नहीं की थी, अड़ोस पड़ोस की महिलाऐं घर आती थीं और अगर दहेज़ के बारे में कुछ पूछती थी तो मम्मी जी खुद ही उनसे निपट लेती थी , बात मुझ तक नहीं आती थी। मुझे पता भी नहीं था कि मैं अब जहां जाने वाली थी , वहां क्या सामान है और क्या नहीं। इसलिए मैंने मम्मी जी से कुछ मांग भी नहीं की , और मैं और राजी, बस अटैची में जरूरत भर के कपडे आदि लेकर गुलावठी पहुँच गए. वहां सरकारी आवास था, लेकिन उसमे न कोई फर्नीचर , न पलंग , न चूल्हा, न बर्तन। 

यहाँ से भविष्य के एक रिश्ते की नींव पडी। उस आफिस में एक ADO थे जो राजी के गाँव के पास के ही गांव के रहने वाले थे और किसी कृषि विपणन सहकारी समिति के MD भी थे, उन्हें पता चला कि साहब सपत्नीक आ गए हैं तो उन्होंने एक तखत और अपने घर से कुछ और सामान भिजवा दिया। राजी तो आते ही अपने ऑफिस में बिजी हो गए और मेरी खातिरदारी में आसपास रहने वाली स्टाफ की पत्नियां लग गयीं। शाम को जब राजी घर आये तो अपने साथ एक १३ बत्ती वाला केरोसिन का स्टोव और कुछ बर्तन लाए , थोड़ी देर में चपरासी राशन का थैला भी लेकर आ गया. ADO साब का लाया हुआ सामान राजी ने वापस ले जाने को कहा तो तखत को छोड़कर बाकी सामान तो वापस चला गया, लेकिन ADO साब ने तखत को तब तक रखने को कहा जब तक पलंग नहीं आ जाता। नौबत जमीन पर सोने की थी, शायद क्योंकि राजी सभी निजी सामान वापस करने पर जिद पकडे थे. ADO साब भांप गए तो बोले कि साहब तखत सरकारी है स्टोर में फालतू ही रखा था , जब आप का पलंग आ जाएगा , वापस स्टोर में रखवा दीजियेगा , मेरा नहीं है। इस प्रकार उस दिन वो तखत रहा और शायद दो तीन दिन और रहा , जब तक दो फोल्डिंग पलंग नहीं आ गए। वैसे वो इतना बड़ा तो था कि हम दोनों उस पर आराम से सो सके थे, डबल बेड से कुछ ही कम रहा होगा। 

हर महीने थोड़ा थोड़ा सामान जुटता रहा और गृहस्थी बस्ती गयी। पहले दिन ADO साब की सदाशयता ने उन्हें हमारे नजदीक ला दिया। उनकी पत्नी और बच्चे भी मेरे पास आने लगे , हालांकि मेरे पतिदेव यानि राजी को वे पसंद नहीं थे और न उनका अधिक हम लोगों से घुलना मिलना, क्योंकि वे अधीनस्थ अधिकारी को अपनी नजदीकी का लाभ उठाने की प्रवृति से सशंकित थे। जो भी हो, उन ADO साब की बड़ी बेटी एक दिन मेरी भाभी बनने वाली थी।  

घोस्ट कथा - १३ 

यहां यानि गुलावठी में मेरे साथ मेरा सबसे लाडला देवर भी अगले सत्र में पढ़ने के लिए आ गया. उसने कक्षा १० में DN इंटर कॉलेज में एडमिशन ले लिया। इस से मेरा मन थोड़ा अच्छे से लगने लगा, क्योंकि राजी तो सरकारी काम काज में बहुत बिजी रहते थे, और थके हारे और कभी कभी तनाव में भी रहते थे। लेकिन धीरे धीरे उनकी तारीफों का जिक्र मुझ तक पहुँच जाता था, कभी कभी अखबारों में भी उनका नाम छपता था, तो मुझे गर्व होता था। लोग उनसे मिलने आने लगे। फ़ूड फॉर वर्क और बायो गैस नामक कार्यक्रमों में उनके कार्य को देखने के लिए दिल्ली, लखनऊ और पडोसी जिलों के अफसर और मीडिया के लोग आने लगे. राजी आगंतुकों को चाय पिलाने या कभी भोजन के लिए भी वे घर पर ले आते थे, जो मुझे असुविधाजनक लगता था. लेकिन ये इतनी बार होने लगा कि फिर मुझे इसकी आदत सी पड़ गयी. मेरी ससुराल की सैंकड़ों लड़कियां या सैंकड़ों लड़के गुलावठी के आसपास के गाँवों में ब्याहे गए थे, गांव में तो सब एक दुसरे के भाई बंधू ही होते हैं तो यहाँ चारों और रिश्ते दार बहुत थे. वे गाहे बगाहे घर आ जाते, मुझे ये समझ नहीं आता था कि किससे घूंघट करना है किससे नहीं। गाँव के घर में तो मुझे आजादी थी, वहां कोई घूंघट प्रथा नहीं थी, लेकिन लोक लिहाज से मम्मी जी ने कह रखा था कि घर से बाहर निकलो तो मुख्य सड़क तक पहुँचने तक घूंघट कर लिया करो, मैं इसका पालन भी करती थी, लेकिन यहाँ क्या करूँ, और करूँ तो उनकी जलपान सेवा कैसे करूँ। राजी ने समस्या हल कर दी ये कहकर कि यहाँ तुम किसी की रिश्तेदार नहीं हो , एक अफसर की बीवी ही, विनम्रता बरतो, यथा सम्भव आदर सत्कार करो, लेकिन घूंघट की जरूरत नहीं। रिश्तेदार शुरू शुरू में तो किसी न किसी काम में फेवर करने की आस लेकर ही आते थे लेकिन जब उन्होंने देखा कि यहाँ सब एक ही पैमाने से नापे जाते हैं तो आना कम हो गया। हमारे रिश्तेदारों में से एक दो को छोड़कर बाकि सब ने समझ लिया की राजी एक निष्पक्ष अधिकारी है और सही काम में किसी को कोई दिक्कत नहीं होगी और गलत काम में किसी की मदद भी नहीं हो पाएगी। जो एक दो नहीं समझे वो आज तक उनकी बुराई करने से नहीं चूकते।  

कुछ कथित(दूर के ) रिश्तेदारों ने महीने महीने अपनी लड़कियों को परीक्षा केंद्र गुलावठी पड़ने के कारण परीक्षा देने के लिए भेजा, जिनको मैंने हर तरह की सुविधा उपलब्ध कराइ, और उन नाशुक्रों ने कभी पलट कर दोबारा मिलने की या धन्यवाद देने की औपचारिकता भी नहीं निभाई। इसका मुझे अफ़सोस होता है कि लोग ऐसा कैसे कर लेते हैं।  

राजी रोज प्रवीण को रात में पढ़ाते भी थे, और उसका सुफल ये मिला कि उसने बोर्ड एग्जाम में अपने स्कूल को टॉप किया। लेकिन वो ऐसी उम्र में था जब हार्मोन्स अपना असर दिखा रहे थे, तो उसने एक पड़ोस में रहने वाले अधिकारी की बेटी को कोई चिट्ठी लिख कर दे दी , लड़की में अभी हार्मोन्स का असर शुरू नहीं हुआ था , उसने वो चिट्ठी अपने पापा को दे दी , और उसके पापा ने वो चिट्ठी राजी को दे दी। भेद खुलने पर प्रवीण घबरा गया और उसने छुट्टी मिलते ही गांव जाकर मम्मी से शिकायत की, कि वह अब गुलावठी नहीं रहेगा, भैया पीटते हैं , और भाभी बासी खाना खिलाती है। तो जब हम लोग गांव गए तो मम्मी का मूड ऑफ था , बात खुली तो मेरा दिल टूट गया, जिस देवर को मैं सबसे लाडला मानती थी , जिसे सगे भाई जैसा प्यार करती थी , उसने पीठ पीछे मेरी झूठी शिकायत की. इस समय के लिए मैंने अपनी कहानी में पहले बताया था कि कुछ दिनों तक* वह मेरा लाडला देवर था। 

गुलावठी में पापा जी, रेखा बहन जी, का जल्द जल्द आना जाना बना रहता था क्योंकि वे दोनों बुलंदशहर में रह रहे थे। पापा जी की नियुक्ति बुलंदशहर में थी और नन्दोई जी भी बुलंदशहर के पास ही एक फैक्ट्री में थे। इस प्रकार काफी व्यस्त और अच्छा समय बीत रहा था। इन्हीं दिनों मुझे ठीक उस दिन जब अमेरिका का एक सैटेलाइट लैब जिसे स्काईलैब का नाम दिया गया था, दुर्घटना ग्रस्त हो कर धरती पर गिरा, मुझे ईश्वरीय पुरुस्कार मातृत्व के रूप में मिला। बुलंदशहर के सरकारी अस्पताल में मेरी अमूल्य ख़ुशी मेरे पहले बेटे के रूप में मुझे मिली। 

घोस्ट कथा - १४  

घर परिवार में अगली पीढ़ी का पहला आगमन हुआ था. बड़ा उल्लास था, सब लोग वहां यानि गुलावठी में उस सरकारी आवास में इकठ्ठा हुए। ये आवास बहुत छोटा था मात्र दो कमरों का। दर असल, गुलावठी शहर से बाहर एक निर्जन सरकारी भूमि पर २५ साल पहले ये विकासखंड परिसर बनाया गया था, जिसमे BDO आवास, ADOs के आवास, बाबुओं, चपरासी आदि के आवास बनाये गए थे। लेकिन बताया जाता है कि चौधरी चरण सिंह के मुख्यमंत्री काल में लगभग आधे विकासखंड बंद कर दिए गए थे, क्योंकि वे एक ईमानदार मुख्यमंत्री थे और ब्लॉक्स को भ्र्ष्टाचार का अड्डा कहा जाता था। उन बंद विकासखंडों में से एक गुलावठी भी था। तो सरकार ने इन भवनों को त्याज्य मान लिया था। उसी अवधि में गुलावठी में टेलीफोन एक्सचेंज खुला तो टेलीफोन विभाग को अपने कार्यालय के लिए एक भवन की जरूरत पड़ी तो राज्य सरकार ने BDO आवास को उन्हें दे दिया। बाद में ब्लॉक्स की बहाली हुई लेकिन वह भवन केंद्र सरकार से राज्य सरकार वापस न ले सकी, तभी से BDO एक ADO आवास में रहते आये थे। स्टाफ की कमी थी, तो सारे क्वार्टर्स भरे हुए नहीं थे। तो बड़े बाबू ने एक रास्ता निकाला कि एक खाली पड़े आवास को खुलवा दिया और साफ़ सफाई करा कर इस्तेमाल लायक करवा दिया। परिवार जनों को ठहरने के लिए साधन हो गया। कई दिनों तक लोगों का आनाजाना बना रहा। मेरी सेवा के लिए रेखा बहन जी, मम्मी जी, थे। उनके लौट जाने के बाद मेरी माँ भी आईं। 

एक पड़ोस के गाँव से (गुलावठी के पास ) एक बुआ जी का आवागमन इन दिनों शुरू हुआ. राजी उन्हें बुआ जी कहते थे, लेकिन वे राजी की हमउम्र ही थी। गाँव में कभी इनके दर्शन नहीं हुए थे और न इनका जिक्र आया था। राजी ने बताया कि वे बचपन में हमारे गांव में ही अपनी नानी के यहाँ रहती थी, यद्यपि वे रिश्ते में बुआ जी लगती थी, लेकिन उनकी सहेली थी। 

घर के सब लोग उन्हें ओमी नाम से पुकारते थे. वे राजी को और मुझे भी बहुत लाड लड़ाती थी। शुरू शुरू में मैं कुछ सशंकित हुई, लेकिन धीरे धीरे दोनों (राजी और ओमी ) के बीच के स्वभाव को समझ कर नि:शंक हो गयी, और वे मेरे घोस्ट रूप धारण करने तक मेरी घनिष्ठ बनी रही।  

एक दिन एक भयंकर भूल मुझ से हो गयी। मैं दोपहर में घर में अकेली थी , किसी ने दरवाजा खटखटाया, मैंने खोला तो एक व्यक्ति ने कहा कि साहब ने ये आपको देने के लिए कहा है, मैंने उसके हाथ से वो लिफाफा ले लिया और जहाँ राजी अपने ऑफिस के कागज़ रखते थे वहां रख दिया। राजी आये तो मैं उन्हें बताना भूल गयी। लेकिन रात को सोने से पहले उन्होंने उस लिफ़ाफ़े को देखा तो खोला तो उसमें एक सौ नोटों की गड्डी थी, उन्होंने मुझ से पूछा तो मुझे याद आया कि कोई लड़का आया था और उसने कहा कि आपने भिजवाया है तो मैंने रख लिया। राजी ने पूछा कि उस लड़के को पहचानती हो, मैंने कहा नहीं। तो राजी नाराज हुए, कि कोई मुझे फंसा कर जेल भिजवा दे तो तुम्हे कैसा लगेगा, मैं घबरा गयी , तब राजी ने बताया कि ऐसी साजिशें लोग करते हैं, सोचो कि अभी पुलिस आकर मेरे घर की तलाशी ले तो इस के बारे में क्या कोई तुम्हारी बात मानेगा। इतनी बड़ी रकम कहाँ से आयी। उन दिनों दस हजार रूपये बड़ी रकम मानी जाती थी। मेरी धड़कन तेज हो रही थी, वो शांत रहा लेकिन बोलै चलो अभी चलो, कुछ ही कदम पर एक बड़ा मंदिर था, हम वहां गए , अन्धेरा हो चूका था आरती वगैरा सब हो चुके थे, मंदिर लगभग सुनसान था। राजी ने वो गड्डी मुझे दी कि जाओ दानपात्र में डाल आओ। दानपात्र की दरार में गड्डी घुसी ही नहीं और मैं जल्दी से उसके ऊपर ही रख कर भाग आई। मेरी साँस अभी भी तेज चल रही थी। अब मुझे अपने सोते हुए बच्चे की याद आयी और मैं तेजी से सीधे वहीँ पहुंची और उस सोते हुए बेटे को उठा कर सीने से चिपका लिया। मैंने कसम खाई कि अब से किसी अनजान से ऐसा धोखा कभी नहीं खाऊँगी। राजी शायद सोचते रहे कि ऐसा करने वाला कौन हो सकता है। वो करवटें बदलते रहे। "

घोस्ट कथा - १५ 

भाई और माँ आये तो, मेरा मन हुआ कि वे ज्यादा दिन रुकें , लेकिन माँ तो बिलकुल नहीं रुकना चाहती थी, अनुराग को अपनी क्लासेज मिस होने की चिंता थी। तो मैंने फरमाइश की कि क्या मैं कुछ दिनों के लिए इनके साथ चली जाऊं। राजी तो राजी थे, मान गए। और हम नन्हें से बच्चे के साथ अपने माँ भाई के साथ चले गए। वे लोग तब मुरादाबाद के एक गंदे से मोहल्ले (सस्ता होने के कारन) चाऊ की बस्ती में रहते थे। एक कमरे का मकान था, लेकिन मकानमालिक अच्छे लोग थे , परिवार की तरह रहते थे। अनुराग हिन्दू कॉलेज से पोस्ट ग्रेजुएशन कर रहा था। छोटा भाई इंटर मेडिएट में पारकर में पढता था। 

एक दिन मैं माँ के साथ बाजार में चूड़ियां खरीद रही थी, बेटे को मकान मालकिन के सुपुर्द कर के आई थी। अचानक से बाजार में भगदड़ मच गयी दुकाने फटाफट बंद होने लगीं। चूड़ी वाला भी शटर गिराने लगा, हमने कहा कि अरे चूड़ी तो पसंद कर लेने दो। उसने कहा जान बचाओ और भागो , जान बचे तो फिर चूड़ी पहनते रहना। अफरा तफरी में हम जैसे तैसे घर पहुंचे। वहां भी डर पहुँच चुका था। कुछ और किराए दार थे जो अपने गांव भागने की तयारी कर रहे थे। हमें भी कुछ नहीं सूझा हम पाँचों भी तुरंत मुख्य सड़क पर पहुंचे और ठाकुरद्वारा जाने वाली एक बस में चढ़ गए और फिर आगे चौराहे पर बस बदल कर गाँव पहुँच गए। अगस्त १९८० के भयंकर हिन्दू मुस्लिम दंगे मुरादाबाद में भड़के थे। जिसमे सैंकड़ों लोग मारे गए थे। "

इस घटना पर मैं यानि घोस्ट लेखक अपनी बात जोड़ता हूँ, अगले दिन अखबारों में मुरादाबाद में लगे कर्फ़यू की खबर पढ़ कर मैं चिंतित हुआ और कम्युनिकेशन का कोई साधन न होने के कारन वंदना और अपने बेटे की फ़िक्र में उन्हें ढूंढने मुरादाबाद पहुँच गया। कई जगह पुलिस वालों के रोकने पर किसी तरह उन्हें समझा बुझा कर, अपने पद का परिचय दे कर चाऊ की बस्ती में पहुंचा, जहाँ पता चला कि वे लोग गांव गए हैं, लेकिन गांव पहुंचे हैं या नहीं इसकी पुष्टि नहीं हो सकी. तो मेरी फ़िक्र बढ़ी और मैं पैदल कई किलोमीटर चल कर कर्फ़यू में किसी तरह बचता बचाता ठाकुरद्वारा मोड़ पर पहुँच गया और वहां से मुझे अपनी ससुराल की तरफ जाने वाली बस मिल गयी। यह मेरी पहली ससुराल यात्रा बड़ी डरावनी रही। रास्ते में खास कर रामगंगा में कई लाशों को मैंने देखा। 

मुझे ससुराल में देखकर उन्हें और उन्हें सही सलामत देखकर मुझे आश्चर्य मिश्रित हर्ष हुआ, और फिर मैं वन्दना और अपने बेटे नामित को लेकर वाया ठाकुरद्वारा , बिजनौर, मेरठ होते हुए वापस गुलावठी २४ घंटे बाद पहुंचा। 

घोस्ट कथा - १६ 

एक रात राजी करीब ११ बजे उठे और बोले कि मैं एक ज़रूरी काम से जा रहा हूँ ,दरवाजा बंद कर लो, मैंने कहा कि कहाँ , वो बोले कि यहीं शहर में , लौट के बताता हूँ । क़रीब ३ बजे लौटे । मैं जगी रही । लौटे तो आकर कुछ लिखा पढ़ी करने लगे और मैं निश्चिंत सो गई । सुबह मैंने पूछा तो उन्होंने बताया कि एक रेड मारने गया था , रात एक नक़ली खाद का कारखाना पकड़ा है, मैंने पूछा कौन कौन साथ था । बोले कोई नहीं । मैंने पूछा कि अकेले? बोले क्योंकि स्टाफ़ पर भरोसा नहीं था, कई बार प्लान बनाया था लेकिन हर बार प्लान लीक हो जाता था, लगता है कि कोई स्टाफ़ में ही उनसे मिला हुआ है। मैंने कहा कि आप अकेले नहीं है , पत्नी है, बेटा है , इनके बारे में सोच लिया करो , ऐसा खतरा उठाना ठीक नहीं . बोले सॉरी काम की धुन में, ये भूल गया था , आगे से ध्यान रखूँगा । फिर मैंने पूछा कि क्या सफलता मिली । उन्होंने कहा कि —जबरदस्त सफलता मिली । किसी को ये अंदाजा नहीं था कि मैं अकेला हूँ । गोदाम में मज़दूर टाइप के लोग थे , मुझे देखते ही भाग गए । संयोग से उधर से SO गुलावठी की जीप गश्त पर थी, मैंने हाथ दिया और उन्होंने मुझे पहचान लिया , फिर उन्होंने वायरलेस पर संदेश भेजकर गोदाम पर फोर्स बुला ली । आदमी कोई हाथ नहीं आया , एक ट्रक भरा हुआ तथा बोरी सिलने की मशीनें , सैंकड़ों बोरे सब जब्त करवा करवठाने जमा कराने और गोदाम सील कराने में इतना वक्त लग गया. जानती हो, SO कौन है, यशपाल यादव। ---- 

यशपाल का जिक्र अभी कुछ दिन पहले ही राजी ने मुझ से किया था और बताया था कि वह राजी के पापा के मित्र और सीनियर साधो सिंह का बेटा था। साधो सिंह पुलिस विभाग में एक प्रतिष्ठित अधिकारी थे, और राजी एक पापा के लिए वे आदर्श थे।  मुझे तसल्ली हुई कि एक परिचित अधिकारी लोकल पुलिस में है तो हमारी सुरक्षा की ज्यादा चिंता नहीं। लेकिन अगले ही दिन दफ्तर में एक काण्ड हो गया। एक युवा कोंग्रेसी नेता ने राजी से उनके दफ्तर में बदतमीजी कर दी, और राजी संयम नहीं रख सके और उन्होंने दफ्तर में ही उस नेता की धुनाई कर दी, दफ्तर के और लोगों ने भी हाथ  साफ कर लिए। शोर सुनकर थोड़ी देर बाद आस पास रहने वाले कर्मचारी और परिजन भी   दफ्तर पहुँच गये, और उन्ही में से एक पड़ोसन महिला ने आकर मुझे किस्सा सुनाया, तो मुझे अच्छा नहीं लगा, थोड़ी देर में राजी घर आये साथ में SO यशपाल भी थे, दफ्तर में पुलिस लग गयी थी. मामला नेता जी का था, अब नेता जी के पक्ष के लोग और उनके विरोधी दोनों की भीड़ जमा हो गयी। यशपाल ने भरोसा दिलाया कि भाभी जी चिंता मत करिये , भाई साहब की सुरक्षा मेरी जिम्मेदारी है, ऐसी तैसी नेता जी की। यशपाल तो चले गए, राजी घर पर ही रुक गए। मैंने फिर इन्हें समझाया कि आप अब पब्लिक लाइफ में हैं ,  पब्लिक सर्वेंट हैं, ये कॉलेज लाइफ वाली जिंदगी नहीं है, गुस्सा करना छोड़िये । इन्होने मुझ से सॉरी कहा और कहा कि आगे से ध्यान रखेंगे। 

२४ घंटे भी नहीं बीते थे कि अगली रात को हम सोये हुए थे, कि अचानक बेटा रोने लगा शायद उसका पेशाब निकल गया था, तो मैं और राजी उठे, लाइट जलाते ही, कमरे के बाहर भगदड़ सी सुनाई दी ,  राजी के पास बन्दूक थी, और खतरा भांप कर उसे लोड करके बिस्तर के पास रख कर ही सोए थे। उसने दरवाजा खोलने से पहले बन्दूक उठा ली और दरवाजा खोलते ही एक फायर भी कर दिया। तीन लोग पीछे के दरवाजे को खुला छोड़ कर भागते दिखाई दिए , लेकिन न पहचाने जा सके और न उन पर कोई गोली लगी ,  क्योंकि गोली उन पर निशाना लगा कर नहीं चलाई गयी थी। हमारे बराबर के कमरे की खिड़की उखाड़ कर अलग रख दी गयी थी और शायद उस कमरे की तरफ से घुसने ही वाले थे कि बेटा रो पड़ा था, वरना उस दिन कुछ भी हो सकता था। अब मैं बहुत डरने लगी थी। मैंने इनसे ट्रांसफर कराने के लिए कोशिश करने को कहा, लेकिन ये नहीं माने, इनकी क्षेत्र में लोकप्रियता बढ़ती जा रही थी और तत्कालीन  जिलाधिकारी जावेद उस्मानी राजी को बहुत सम्मान देते थे , उन्होंने इस घटना के बाद रिवाल्वर का एक लाइसेंस भी इन्हें दे दिया, लेकिन ये रिवाल्वर तत्काल खरीद नहीं पाए, लेकिन प्रचार ये हो गया कि BDO साब के पास बन्दूक और रिवाल्वर दोनों है, रिवाल्वर वे हर समय साथ रखते हैं ,  जो कि सच नहीं था। "


घोस्ट कथा - १७ 

"कभी कभी बड़ी विचित्र बातें अनायास ही हो जाती हैं. चोर खुद पकड़ में आ जाता है। एक रात हम बैठे बात कर रहे थे, बिजली गयी हुई थी ,  कमरे में लैंप जल रहा था। दरवाजे पर हलकी सी आवाज हुई ,  मैंने कहा कि कोई है, राजी बोले कुत्ता होगा, एक कुत्ता हमारे दरवाजे पर बनी सीढ़ी के स्टेप्स पर आ कर बैठ जाता था, इसीलिए राजी ने ये अंदाजा लगाया। लेकिन बाहर से आवाज आयी, हाँ जी मैं ही हूँ। मेरी और राजी की एक साथ हंसी छूट गयी, मैंने दरवाजा खोला और मैं हँसते हँसते अंदर दूसरे कमरे में चली गयी। दरवाजे पर एक ADO साब खड़े थे जिन्हें लोग गुप्ता जी कहते थे, और उन्होंने बाहर शायद सुनाई पड़ा कि गुप्ता होगा ,  जिसके जवाब में वे बोल पड़े कि हाँ जी मैं ही हूँ। राजी ने जाहिर नहीं होने दिया कि उन्होंने "कुत्ता होगा " कहा था। गुप्ता जी ने भेद खुद ही खोल दिया, पूछने लगे, सर दो दिन पहले कोई लड़का आया था आपका घर पूछ रहा था, शायद कोई डाक लाया था, उसके हाथ में एक लिफाफा भी था। मिला क्या ? राजी के स्वर में तल्खी आते देख मैं कमरे में वापस आई, और मैंने गुप्ता जी से कहा कि साहब का मूड ठीक नहीं है, कल ऑफिस में बात कर लीजियेगा। गुप्ता जी अनमने से चले गए ,  जाते जाते बोले ,  तबियत ठीक न हो  तो डॉक्टर को बुलवाऊं। मैंने कहा कि प्लीज आप जाइये, सुबह ऑफिस में मिल लीजियेगा।  

आप भी समझ गए होंगे, कि वो लिफाफा जिसके बारे में किसी और को कुछ पता नहीं था, वो गुप्ता जी को पता था, यही वो स्टाफ था जो कृषि विभाग का था, और रासायनिक उर्वरकों के विक्रेताओं उत्पादकों से मिला हुआ था और किसानों  को नकली खाद बिकवाने का दोषी था.  राजी बहुत अपसेट हुए, और अगले दिन उन्होंने जिलाधिकारी जावेद उस्मानी, जो खुद भी बहुत ईमानदार अफसर थे, से मिल कर सारी बात बताई।  जिलाधिकारी ने जिला कृषि अधिकारी को बुलाकर गुप्ता जी को जिला मुख्यालय पर बुलवा लिया। इस प्रकार ब्लॉक ऑफिस में राजी का रुतबा कायम हो गया कि इनके साथ रहना हो तो मेहनत औरईमानदारी से काम करना होगा। ऐसी कई घटनाएं हैं जो लिखी जा सकती हैं लेकिन वो नीरसता ही पैदा करेंगी, इसलिए उनकी विभागीय बातों पर और चर्चा नहीं करूंगी कि कब कैसे किस किस स्टाफ को उन्होंने सही रस्ते पर ला दिया। 

एक नए विभाग और एक नए स्टाफ का जिक्र जरूर करूंगी, क्योंकि वह मेरे जीवन का हिस्सा बना । प्रौढ़ शिक्षा विभाग। ये नया नया खुला था और इसका एक अफसर जिले स्तर पर तैनात हुआ और दो दो सुपरवाइजर की पोस्ट ब्लॉक स्तर पर बनाई गयी. इन्हीं में से एक पोस्ट पर कमलेश त्यागी नामकी एक खूबसूरत लड़की गुलावठी में तैनात हुई। उसके ओफ़्फ़िए में जोइनिंग करने पर राजी उसे घर ले कर आ गए और मुझ से परिचय करवाया कि ये मिस त्यागी हैं ,  आज ही सुपरवाइजर प्रौढ़ शिक्षा के पद पर इस ब्लॉक में तैनात हुई है. और खुद इतना बता कर वापस ऑफिस चले गए। मैंने आपको बताया था  कि महिलाओं के प्रति राजी कुछ ज्यादा ही उदार रहते रहे हैं. लेकिन एक जवान खूबसूरत लड़की को घर ले कर आना मुझे कुछ अटपटा लगा। खैर हमने काफी देर बात की, तो मुझे पता चला कि वह मेरठ की है, और मेरठ कालेज के पास ही उसका घर है, मेरे मन में तरह तरह की बातें घूमने लगीं, कि राजी भी मेरठ कालेज में पढ़े हैं, कहीं ये दोनों पहले से परिचित तो नहीं। उसने ये भी बताया कि विभाग अभी अभी खुला है और अभी और नियुक्तियां भी होनी हैं ,  इस बात को सुनकर मेरे मन में इच्छा जगी कि क्यों न मैं भी इस पद के लिए आवेदन करूँ। तो मैंने और ज्यादा जानकारी लेने के लिए उस लड़की से खूब घुलमिलकर बातें कीं। वह बहुत मधुर भाषी थी, और फिर वो मेरे घरेलू काम में भी हाथ बंटाने लगी, पहली ही मुलाक़ात में उसका इतना घुल मिल जाना अच्छा भी लग रहा था और संदेह भी बढ़ा रहा था। खैर उसका पहला दिन था, और शाम होते ही वह छुट्टी का एक आवेदन देकर चली गयी कि वह तीन दिन बाद अपने सामान के साथ आ जाएगी।  मैंने पूछा कि वह कहाँ ठहरी है तो उसने बताया कि अभी तो कहीं नहीं ठहरी ,  सीधे मेरठ से आई थी ,  लेकिन सर बहुत अच्छे हैं  उन्होंने पास में ही एक क्वार्टर खाली है, वह मुझे अलॉट कर दिया है।  मैंने ऊपरी तौर पर कहा कि चलो ये तो बहुत अच्छा हुआ , आप पडोसी बन जाएंगी। लेकिन मन ही मन संदेह के बादल घुमड़ते रहे। "


घोस्ट कथा - १८ 

 " हमें गुलावठी में रहते हुए चौथा साल चल रहा था। बेटा ब्लॉक ऑफिस के सामने बने एक नए स्कूल मॉडर्न अकादमी के प्ले स्कूल में प्रारम्भिक शिक्षा के लिए जाने लगा। इस स्कूल को एक युवा दंपत्ति ने खोला था जो बहुत मेहनती और बच्चों के प्रति प्यार रखने वाला था। वे बच्चों को प्रोत्साहित करने के कोई मौके नहीं चूकते थे. नमित को कभी पेन्सिल ,  कभी कोई बैलून उसके किसी भी छोटे मोठे अचीवमेंट पर इनाम दे देते थे। इस प्रकार नमित को स्कूल जाना अच्छा लगने लगा। नमित के चाचा लोग, अक्सर गुलावठी आते रहते और अपना पूरा लाड नमित पर लड़ाते।  बेचारे को सब पढ़ाने को लगे रहते, वो छोटी सी उम्र में ही अपने चाचाओं के अनुकरण में एक धीर गंभीर अनुशासित बच्चा बन कर रह गया, उसके साथ सब टोका टोकी करते ,  नहीं ये मत करो, वो मत करो ,  गन्दी बात। 

उधर मेरा छोटा भाई पारकर में फेल हो गया, और वह पता नहीं किस डर से, अपना एक बैग लेकर बिना टिकट मुरादाबाद से हापुड़ तक रेल से और हापुड़ से गुलावठी पैदल १६ किमी चल कर पूछतापाछता एक दिन हमारे यहाँ आ धमका। उसने रो रो कर जाने क्या क्या कहा, मैं उसे चुप कराती रही और दिलासा देती रही, कि फ़िक्र मत करो, अब तुम यहीं रहो। मैंने पूछा कि माँ को पता है कि तुम मेरे पास आये हो, उसने कहा कि हाँ बता कर आया हूँ। आगे की पढ़ाई उसने फिर हमारे साथ रहकर पूरी की, उसके बारे में इतना ही बताना काफी है कि वह बाद में अंग्रेजी में एम् ए और बी एड करके ही पापा के पास गया और उनकी गाइडेंस में केंद्रीय विद्यालय में अध्यापक बन गया, पापा ने उसके लिए एक अच्छे परिवार की अच्छी लड़की का रिश्ता लिया, उनका विवाह कराया। वह लड़की भी केंद्रीय विद्यालय में अंग्रेजी की ही अध्यापक बनी और अब दोनों नौकरी के अंतिम चरण में देहरादून में हैं, उनके एक प्यारा सा बेटा है जो आजकल अमेरिका में पोस्टग्रेडुएशन कर रहा है। 

बीच में मायके का अनायास जिक्र आ गया. छोटे भाई की शादी बड़े भाई की शादी के बाद ही हुई लेकिन बड़े भाई की शादी  का एक अलग नाटक है ,  उसे कभी फिर बताऊंगी। अब जब मायके का जिक्र आ ही गया है तो ये भी बता दूँ कि मेरी माँ सदा परित्यक्ता का ही जीवन बिताती रही और उसके बच्चों को भी पिता का प्यार और सहारा बहुत सीमित और अल्पावधि के लिए ही मिला। मैं उस दिन अपने पति राजी के प्रति कृतज्ञ हो गयी जब मुझे पता चला कि माँ को हर साल ६ साड़ियां मेरे पापा के नाम से चुपके से पार्सल भिजवाने वाला मेरे पापा नहीं बल्कि मेरा राजी था। मेरी माँ अपनी देह छोड़ने से तीन महीने पहले तक मेरे पास थी, और मेरे बड़े बेटे की बहू पसंद कर गयी थी, लेकिन वो अपने धेवते की शादी नहीं देख पाई थी, उससे पहले ही दिवंगत हो गयी थी, उनके दिवंगत होने के बाद ही मेरे पापा ने अपने बेटों से सशर्त सम्बन्ध वापस जोड़े और शर्त ऐसी कि मेरा मायका और मेरे बच्चों का ननिहाल सदा के लिए छूट गया। मैं  .... छोड़िये मैं भावुक हो रही हूँ। अभी इतना ही। "


घोस्ट कथा - १९ 

"गुलावठी में रहते हुए चौथा साल चल रहा था, मुझे स्थानीय डॉक्टर ने रोज अधिक से अधिक टहलने की सलाह दी थी , अरे नहीं , मैं मोटी या शुगर पेशेंट नहीं थी ,  मैं गर्भवती थी. एक दिन मैं शाम को राजी के साथ ब्लॉक कैंपस में टहल रही थी, तो मुझे हल्का हल्का दर्द शुरू हुआ, मैंने कहा कि चलो घर चलते हैं, हम घर आये, तो मैंने कहा कि किसी डॉक्टर को बुला लो, शायद बुलंदशहर जिला अस्पताल जाना पड़े (जहाँ नमित पैदा हुआ था ). राजी एक लोकल लेडी डॉक्टर के पास गए और आधा घंटा में उसे लेकर आ गए, लेकिन तब तक तो मैं दुसरे बेटे की माँ बन चुकी थी। ईश्वर की मुझ पर बड़ी कृपा रही कि दोनों बेटे बड़ी आसानी से बिना ऑपरेशन हो गए, और मुझे अधिक कष्ट नहीं उठाना पड़ा। 

तब तक राजी अपने विभाग और अपने अधिकारीयों और अपने क्षेत्र के ग्राम वासियों में बहुत लोकप्रिय हो चुके थी, दूसरे बेटे की खबर फैलने पर बधाई देने वालों का तांता लग गया, इस समय घर परिवार और मित्रों के अलावा, ग्राम प्रधान लोग, नेता लोग सब मुझे बधाई देने आये, सबसे नया एक सम्बन्ध जुड़ा गुलावठी के एक बहुत बड़ी डेरी के मालिक वेदराम नागर से। उनमें गज़ब का वात्सल्य था, आज उनकी डेरी के उत्पाद पारस नाम से बिकते हैं, उन्होंने मुझ से कहा कि तू मेरी बेटी है, मेरे सिर्फ अब तक ६ बेटे थे आज से सातवीं बेटी है तू। एक अनजान व्यक्ति से ऐसे शब्द मुझे पहले कभी सुनने को नहीं मिले थे.  राजी के पापा जी मुझे बेटी कहते थे, मेरे पापा ने सदा मेरा नाम लिया। उन्होंने कहा कि तेरे दोनों बच्चों के लिए मेरी निजी देशी गाय का दूध मैं भिजवाऊंगा, और उसके बाद जब तक हम गुलावठी में रहे, हमें देसी गाय का एक किलो दूध बिना एक पैसा खर्च किये मिलता रहा। वे बहुत सक्षम संपन्न व्यक्ति थे, उनका कोई स्वार्थ हम लोगों से सिद्ध नहीं होता था, और राजी का स्वभाव भी किसी की मदद लेने का या किसी को फेवर करने का नहीं था, इसलिए आदतन  राजी ने चौधरी वेदराम से भी इस पर थोड़ा सा विरोध तो किया लेकिन  उन्होंने मेरे सामने एक बाप की तरह डांट दिया, मुझे डर था कि राजी उखड न जाए, लेकिन इस बार राजी ने कोई विरोध नहीं किया , ये राजी में बड़ा बदलाव था। 

ऐसा ही एक और शख्स गुलावठी में था जिसका जिक्र करना जरुरी समझती हूँ, बल्लीमल। धोती कुरता वाले एक लाला जी, विकास खंड परिसर में केवल एक हैंडपंप था, सरकारी। सब उसी से पानी लेते थे। शहर से बाहर होने के कारण कोई पाइप लाइन वाटर सप्लाई वहां नहीं थी। जमीन पर्याप्त थी लेकिन पानी के अभाव में कोई पेड़ पौधा पनप नहीं पाता था। वो हमारे छोटे बेटे के जन्म पर बधाई देने आये. और उन्होंने उस कैंपस की दुर्दशा देखकर पूछा कि क्या यहाँ पानी की व्यवस्था नहीं है। फिर उन्होंने अपने  स्रोतों से वहां एक बोरिंग करा दिया और एक मोटर  लगवा दी। उस एक उपहार ने गुलावठी विकासखंड कैंपस में अगले तीन सालों में पूरी हरियाली ला दी। मैंने अपने घर के पीछे क्यारियां भी बनवा लीं और उनमे किचन गार्डन बना कर खूब सब्जियां खाईं और बांटी ,  देखादेखी और अधिवासियों ने भी अपने अपने घर के आसपास सब्जियां और फुलवारी लगाईं। और गुलावठी विकासखंड का परिसर जिले के आदर्श परिसर में शुमार हो गया। लोग निःस्वार्थ मदद के लिए तत्पर रहते हैं, ये मैंने महसूस किया, बस उन्हें कोई पात्र व्यक्ति मिल जाए। 

उधर मेरा लखनऊ से इंटरव्यू कॉल आ गया, अरे शायद मैं बताना भूल गयी कि मैंने नए नए खुले विभाग में ब्लॉक स्तर के पर्यवेक्षक पद के लिए आवेदन कर दिया था। और आसानी से मेरा चयन हो गया लेकिन मुझे सहारनपुर में योगदान के लिए  आदेश मिला, मैं तो सोच रही थी कि गुलावठी में ही एक पद रिक्त है, तो यहीं नौकरी मिल जाएगी।  राजी मुझे लेकर जिला प्रौढ़ शिक्षा अधिकारी ढौंढियाल सर से मिले, उन्होंने सलाह दी कि आप पहले जहाँ का आदेश है वहां ज्वाइन कर लो, फिर ट्रांसफर की एप्लीकेशन दे देना, दम्पत्ति आधार पर आसानी से हो जाएगा। 

बड़े बेटे को संभालने के लिए परिवार जनों की मदद ली और हम सहारनपुर पहुंचे। हमारे सारे डाक्यूमेंट्स एक बड़े एनवेलप में थे, जो मैंने संभाल कर अपनी पास रखे हुए थे। और एक हैंड बैग था। मेरी लापरवाही से एनवेलप बस में ही छूट गया और हम ज्वाइन करने जिला प्रौढ़ शिक्षा अधिकारी के पास पहुंचे तो हमारे पास कुछ था ही नहीं जिस के आधार पर  हम नौकरी ज्वाइन करते। उन्होंने कहा कि अपॉइंटमेंट लेटर की तो चिंता मत कीजिये, उसकी कॉपी तो हमारे पास है, लेकिन अपने शैक्षणिक प्रमाण पत्र तो आपको लाने ही होंगे। मैं तो हिम्मत हार गई लेकिन राजी ने मन बना लिया कि काम कैसे करना है, पहले हम देहरादून गए, वहां से कुछ सामग्री जुटाई, फिर हरिद्वार गुरुकुल कांगड़ी विश्विद्यालय गए , वहां से ग्रेजुएशन स्तर तक के कागज़ जुटाए, फिर हम गढ़वाल विश्विद्यालय श्रीनगर गए लेकिन वहां उन्होंने कह दिया कि MA और बी . एड की डुप्लीकेट डिग्री मिलने में टाइम लगेगा, और वे डाक से हमारे पते पर भेज देंगे। गए थे एक दिन के लिए और लौटे तीन दिन बाद और वो भी खाली हाथ।  दस दिन बाद डाक से  गढ़वाल से भी कागज़ आ गए। राजी ने कहा कि चलो फिर सहारनपुर चलते हैं तो मैंने मना कर दिया कि बड़े झंझट हैं पता नहीं ट्रांसफर करा पाएंगे या नहीं, बच्चे छोटे हैं, केवल गुलावठी में तो नौकरी कर सकती हूँ बाकि दूर नहीं। तो मामला टाल दिया गया। अब तक गुलावठी में तैनात कमलेश त्यागी मेरी अच्छी मित्र बन चुकी थी, उसने  कहा कि आपको आसानी से नौकरी मिल गई है इसलिए आप इसकी कद्र नहीं कर रही ,  आपको ज्वाइन करना चाहिए, आगे शायद चयन भी आसानी से न हो पाए। मुझे बात जमी, लेकिन मैं राजी से और बच्चों से दूर जाने की सोच नहीं सकती थी.  मैंने उस से कहा कि मुझे अपने डिस्ट्रिक्ट बॉस से मिलवा दो, वो मुझे लेकर ढौंढियाल साब के पास गयी, मैंने पूरा घटनाक्रम उन्हें बताया।  उन्होंने कहा कि चलो मैं देखता हूँ कि क्या कुछ हो सकता है। 

और मेरी किस्मत अच्छी है या लोग बहुत अच्छे हैं, ढौंढियाल साब ने मेरा ट्रांसफर खुद करा लिया और मुझे गुलावठी में ही पोस्टिंग भी दे दी , इस सब काम में लगभग दो महीने लग गए। 

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मेरे द्वारा लिखी "घोस्ट कथा सीरीज" के पाठकों ने कुछ जिज्ञासा और कुछ टिप्पणियां की हैं. इसलिए मैं यहां कुछ स्पष्टीकरण दे रहा हूं।

१- इसमें मेरी स्वर्गीय पत्नी वन्दना की आपबीती सुनाई गई है।

२- इसमें कल्पना का कोई सहारा नहीं लिया गया है। सब कुछ सच है, लेकिन संभव है कि यदि कहीं किसी तारीख या वर्ष का उल्लेख हुआ हो तो वह एक दो नंबर आगे पीछे हो सकता है।

३- इस कहानी का उद्देश्य जीवन की सच्चाई सामने लाना है, न कि किसी का चरित्र हनन करना । इस कहानी में कुछ लोगों को नायिका के पिता (संत यादव) का चरित्र नाटकीय लग सकता है। लेकिन उन्हें नजदीक से जानने वाले लोग उनके बारे में पुष्टि कर सकते हैं कि बहुत ज्ञानी भी थे और बहुत अहंकारी भी, तथा पत्नी के प्रति निष्ठुर भी। रामगंगा बिहार में वे संचेतना विद्यालय नाम से एक विद्यालय भी छोड़ गए थे, अब पता नहीं कि वह अभी भी चलता है या बंद हो गया।

४- उनका गांव डूंगरपुर है जो रामपुर जिले की सीमा पर है। उन्होंने जो माध्यमिक विद्यालय डूंगरपुर के पास बनवाया था, वह उनके गांव के पास मानपुर में आज भी है।

५- उन्होंने अपने भाइयों को पढ़ने के लिए गाली दे देकर प्रेरित किया। उनके एक भाई गजराम सिंह मानपुर इंटर कॉलेज के प्रिंसिपल से रिटायर हुए। उनके एक भाई जगदीश और उसकी पत्नी केंद्रीय विद्यालय से रिटायर हुए। उनके एक भतीजे डूंगरपुर में बसंतसिंह मेमोरियल इंटर कॉलेज आज भी चला रहे हैं। उनके एक भतीजे मुरादाबाद के एक इंटर कॉलेज के प्रिंसिपल पद से रिटायर हुए और मानसरोवर में रहते हैं। उनके बेटे डिप्टी डायरेक्टर शिक्षा दिल्ली से रिटायर हुए, उनके दूसरे बेटे केंद्रीय विद्यालय देहरादून से रिटायर हुए। उनकी दो पुत्र वधुएं अभी भी केंद्रीय विद्यालय में सेवा रत हैं। तात्पर्य ये कि अपने परिवार और बंधु बांधवों को पिछड़ेपन से निकालने में संत यादव के योगदान को कम नहीं आंका जा सकता।

६- विषम परिस्थितियों में भी उनके तीनों बच्चों ने संघर्षपूर्ण जीवन जीते हुए भी सफलता पाई और अगली पीढ़ी को प्रेरणा दी जिसके फलस्वरूप संत जी के पोते और धैवते आज विदेश तक पहुंचे, जिसे आजकल सफलता का मानक माना जाने लगा है। इसके लिए वे बच्चे बधाई के पात्र हैं।


कहानी के काफी राज खुल चुके हैं इसलिए अभी इस सीरीज को विराम देता हूं, लेकिन घोस्ट अपनी बची हुई जिंदगी की बातें बताने फिर आयेगी। 


इंटरवल के बाद ---

घोस्ट कथा - २० 

प्रौढ़ शिक्षा के सुपरवाइजर के रूप देखे जाने कुछ अनुभव। 

मुझे विकासखंड गुलावठी में ही प्रौढ़ शिक्षा के सुपरवाइजर की तैनाती मिल गयी ,  इसका श्रेय ,  अब तक मेरी सहेली बन चुकी पहली सुपरवाइजर कमलेश त्यागी, जिला प्रौढ़ शिक्षा अधिकारी बुलंदशहर श्री ढौंढियाल और थोड़ा सा राजी को भी जाता है। अगर राजी मेरे डाक्यूमेंट्स की दूसरी कॉपी बनवाने हरिद्वार और श्रीनगर (गढ़वाल ) जाने का थैंकलेस  जॉब न करते तो मैं ये नौकरी तो क्या आगे भी कोई नौकरी न कर पाती, और अगर मेरे पापा को पता चलता कि मैंने अपने सारे शैक्षणिक प्रमाणपत्र खो दिए हैं तो पता नहीं वो मुझे क्या क्या नहीं कहते। न मैंने और न घर के और किसी सदस्य ने उन तक ये बात पहुँचने दी, कभी भी। 

थोड़े दिनों बाद एक और सुपरवाइजर की तैनाती गुलावठी ब्लॉक में हो गयी, वह एक अनुभवी ग्राम विकास अधिकारी (पुरुष ) था , लेकिन सुपरवाइजर पद चूँकि ADO लेवल का था, तनख्वाह भी ग्रामविकास अधिकारी से अधिक थी ,  तो उसने डेपुटेशन लेकर ये पद ज्वाइन किया था। तो अब हम तीन लोगों में विकासखंड के ४७ ग्राम पंचायतें बाँट लीं , हमने उसे भैया भैया कह कर दूर के गाँव लेने के लिए उसे मना लिया और पास के तीस गाँव मैंने और कमलेश ने बाँट लिए। हमारा बॉस (परियोजना अधिकारी) सिकंदराबाद ब्लॉक में बैठता था, उसके पास गुलावठी और सिकंदराबाद दो ब्लॉक का चार्ज था। तो हमें पन्द्रहवें दिन सिकंदराबाद जाना पड़ता था। यद्यपि हम पर पंद्रह पंद्रह गाँव थे, चौहान साब (पुरुष सुपरवाइजर ) के पास १७ गांव थे, लेकिन मैं और कमलेश एक दुसरे के गाँवों में जोड़ी में ही जाते थे और एक टीम की तरह काम करते थे, यानि तीस के तीस गावों के हर प्रौढ़ शिक्षा केंद्र के बारे में हम दोनों  ही पूरी खबर रखते थे और सभी अनुदेशकों को पहचानते थे, उनकी मीटिंग भी हम साझे में ही लेते थे। इसलिए हम जब चाहे आपस में छुट्टी भी एक दुसरे को दे देते थे ,  बिना अपने परियोजना अधिकारी को बताये।  बहुत अच्छा समय कटा. कमलेश स्वभाव और परिश्रम में मुझ से २१ ही थी, और मुझ से सुन्दर भी ,  ये सुंदरता ही  मुझ में संदेह पैदा कर देती थी, कि कहीं राजी इस की और आकर्षित न हो जाए, और मुझे कई बार लगा भी कि वे दोनों  एक दुसरे की तरफ आकर्षित हैं। लेकिन मैं और कमलेश घर हो या बाहर साथ ही रहते ,  साथ घर के सारे काम करते ,  वह मेरे बच्चों के पालन पोषण में भी मदद करती। बस रात को वह अपने क्वार्टर में चली जाती थी.  एक बार राजी लखनऊ में किसी मीटिंग में गए थे और कमलेश अपने घर मेरठ गयी थी, लेकिन वह अगले दिन ऑफिस नहीं आयी ,  और दो दिन तक नहीं आयी ,  राजी को भी लखनऊ जाने से वापस आने पर दो दिन तो लग ही जाते थे, तो मेरे मन में भय छा गया कि कहीं दोनों ही तो लखनऊ नहीं गए हैं। मैं राजी के लौट आने पर भी गुमसुम रही तो राजी ने मेरे तबियत के बारे में पूछा। मैंने डरते डरते कहा कि मुझे आपकी चिंता हो जाती है, जब आप बाहर होते हो ,  आप के साथ कौन कौन था? राजी ने कहा बहुत सारे अफसर थे, मैंने पूछा कहाँ ठहरे थे, उसने कहा, ठहरने का क्या सवाल ,  सुबह ट्रैन पहुंची ,  दिन भर मीटिंग ,  शाम को फिर वापसी की ट्रैन। जब तीसरे दिन कमलेश आई ,  तो कमजोर लग रही थी, मैंने पूछा दो दिन क्यों नहीं आई , उसने कहा क्यों पी ओ साब ने पूछा था क्या, मैने कहा नहीं, बोली मुझे बुखार आ गया था। मुझे में ये असुरक्षा की भावना मेरे माता पिता के बीच के तनावपूर्ण संबंध के कारण गहरे घर कर गई थी और इसीलिए मैं शादी भी नहीं करना चाहती थी.  मैंने अपने आप को  समझाने की कोशिश की, कि मुझे राजी पर शक नहीं करना चाहिए, वह सिर्फ अपने स्वभाव के कारण कमलेश ही नहीं सभी से सॉफ्टली बात  करता है। 

हमें मासिक प्रगति सूचना एक चार्ट के रूप में बना कर पी ओ को हर महीने देनी होती थी, इस काम में कमलेश चौहान साब की मदद लेती थी , मुझे लगता है कि वह कमलेश को खुश रखने के लिए उसका बहुत सा काम कर देता था, लेकिन मेरे काम को करने में बहाने बाजी करता था। लेकिन सच्चाई यही है कि हम फील्ड वर्क तो अच्छे से कर लेते थे , लोगों को मोटिवेट करते थे, प्रौढ़ शिक्षार्थियों को केंद्र पर लाने में अनुदेशकों की मदद करते थे, लेकिन पेपर वर्क में हम चौहान साब का शोषण ही करते थे। अपना काम शायद ही हमने कभी खुद किया हो. अगर मेरा काम छूटा भी तो  कमलेश ही कर देती थी, और कमलेश के काम के लिए तो चौहान साब सदा तैयार रहते थे। मुझे लगता है, दुसरे विकास खण्डों में भी यही ट्रेंड था, सब ने कोई न कोई पुरुष मददगार पकड़ रखा था। 

इस नौकरी के दौरान कुछ खट्टे मीठे कड़वे अनुभव भी हुए,  मेरी जानकारी में एक गांव भटौना का एक प्रकरण आया, जिसमे अनुदेशिका प्रधान जी की पुत्रवधू थी , वह गर्भवती थी ,  एक बार जब हम उसके केंद्र पर पहुंचे, आठ दस दिन में हमारा हर केंद्र पर चक्कर लग जाता था ,  तो लगा कि प्रसव कर चुकी है ,  उसका पेट पिचका हुआ था, लेकिन वो उदास थी, हमने पूछा क्या हुआ? बोली -लड़की हुई थी, मैंने कहा, हुई थी ,  मतलब? वह मेरे कान के पास मुंह करके रुआंसे स्वर में बोली सासु माँ ने मार दी। मैं शॉकड रह गयी, उसने हाथ जोड़कर कहा कि किसी से मत कहियेगा। हम दोनों तुरंत चले आये.  आज से पहले ये बात मैंने किसी को नहीं कही, अब न तो प्रधान जी जीवित होंगे, और न उस अनुदेशिका की सासु माँ ,  लेकिन वह फुसफुसाती आवाज आज भी मेरे कानों में गूंजती है। आज जब महिला सशक्तिकरण चरम पर है, और लड़कियां खूब पढ़लिख रही हैं, पहलवानी भी करती हैं, फ़ौज में पुलिस में सब जगह दिखाई देती हैं, तो बड़ा संतोष होता है कि चलो अब कोई माँ बाप कन्या की हत्या शायद ही करने की सोचे, लेकिन ऐसा भी समय था। 


घोस्ट कथा -  २१  

"राजी के ऑफिस में एक ADO कोआपरेटिव ट्रांसफर हो कर आए, उनको ADO टाइप मकान अलॉट किया वही ,  जो अब तक कमलेश त्यागी के नाम था, और कमलेश को एक सिंगल रूम वाला छोटा क्वार्टर अलॉट कर दिया गया, कमलेश कुछ खिन्न सी मेरे पास आई ,  बोली लगता है कि भाई साब मुझ से नाराज हैं ,  मेरा क्वार्टर छीन कर किसी दुसरे को दे दिया है। मैंने उसे तसल्ली दी ,  कि मैं बात करूंगी ,  यद्यपि मुझे पता था कि वह जो भी निर्णय लेते हैं ,  सोच समझ कर लेते हैं और फिर उसे आसानी से नहीं  बदलते।  लेकिन मैंने सिर्फ अपनी दोस्ती दिखाने  के लिए कमलेश को ये बात कही। संयोग से उसी दिन गाँव से राजी के दादा जी आ गए, मुन्ना भैया उनको लेकर आये थे, मुन्ना भैया मेरे बहुत अच्छे दुसरे नंबर के देवर थे (वो अब इस दुनिया में नहीं हैं , लेकिन जो भी उनके संपर्क में आया होगा , उसे वे एके बहुत सहयोगी और मिलनसार, सेवाभाव से युक्त बताएगा ,  अनजान लोगों की मदद करने में भी वो पूरी तन्मयता दिखते थे )  , उन्होंने मुझे बताया कि कल मम्मी जी और पिता जी(उन्हें उनके सब पोते पिताजी ही कहते थे ) में कुछ बहस हो गयी, और पिता जी ने कहा कि मुझे राजा के पास छोड़ आओ ,  (वो मेरे राजी को राजा )  कहते थे।  इसलिए उन्हें लाया हूँ.  हमने, यानि मैंने और कमलेश ने मिलकर  मुन्ना भैया और पिता जी के लिए बढ़िया खाना बनाया, खिलाया ,  और एक चपरासी को कहा कि साहब को जा कर बता दो कि पिताजी गांव से आये हैं।  असल में हम दोनों को शाम को प्रौढ़ शिक्षा केंद्र के निरिक्षण के लिए निकलना पड़ता था, ज्यादातर हम एक घोड़ेतांगे से चले जाते थे, तो हम चाहते थे कि हमारे जाने से पहले राजी घर आ जाएं। और वो आ भी गए। मैंने कमलेश के सामने  ही उनसे पूछा कि कमलेश का क्वार्टर क्यों बदल दिया। उन्होंने कहा कि ये तो सिंगल है एक कमरे के मकान में भी रह लेगी, बाकि रसोई ,  बाथरूम सब तो उसमे है ही ,  ADO जो आ रहे हैं, वो परिवार के साथ रहते हैं ,  हमारे हमउम्र हैं और उनके भी दो पुत्र हैं ,  हमारे बेटों की ही उम्र के। उन्होंने इतनी आसानी से ये बात समझा दी, मुझे ये तसल्ली हुई कि राजी के मन में कोई कमलेश का कोई विशेष दर्जा नहीं है और मुझे ज्यादा  सशंकित होने की जरूरत नहीं है। फिर राजी ने कमलेश की तरफ मुखातिब हो कर कहा कि कोई परेशानी, उसने धीरे से कहा कि नहीं। उधर पिता जी ने राजी से कहा कि वो अब यहीं रहेंगे, कमलेश ने पूरा अपनत्व दिखाते हुए कहा कि हम दादा पोती एक साथ रहेंगे। और चपरासियों की मदद से उसी दिन कमलेश छोटे घर में राजी के दादा जी के साथ शिफ्ट हो गयी. 

अगले दिन प्रताप सिंह वर्मा ADO सहकारिता ,  हमारे बगल वाले घर में अपना सामान ले आये, हमारे दोनों बेटों को अपने हम उम्र दोस्त मिल गए। प्रताप सिंह वर्मा हमारे तरह के कर्मचारी थे, यानि फील्ड वर्क में माहिर और लिखने पढ़ने में, स्टेटमेंट्स / प्रगति रिपोर्ट्स बनाने में फिसड्डी। तब हमें लगा कि महिलाऐं ही नहीं पुरुष भी कागजी काम के लिए दूसरों की मदद लेते हैं। इन ADO साब का भी हमारे जीवन में बहुत बड़ा रोल रहा है। इनसे हमारे पारिवारिक सम्बन्ध ऐसे बने जैसे वे राजी के सगे भाई ही हों, हम लोगों के परिवार के हर आयोजन में वे ऐसे रहे जैसे उनके ही परिवार का कार्यक्रम हो। बाद में वे गाजियाबाद में आवास विकास परिषद में आवास अधिकारी पद पर डेपुटेशन पर रहे, वहां २००३ में एक सहकारी आवास स्कीम निकली तो राजी उस समय मुजफ्फरनगर में तैनात थे, हमारा बड़ा बेटा अल्प समय के लिए कनाडा गया था और वहां से काफी बचत कर के लौटा था, तो प्रताप को तो घर की हर खबर रहती थी ,  एक दिन मुजफ्फरनगर आ धमके और मुझ से बोले कि भाई साहब से तो बात करना फिजूल है, लेकिन नमित जो कनाडा से बचा कर लाया है, वो पैसे मुझे दे दो, मुझे आप लोगों के लिए एक मकान बुक करना है , राजी ने नो कमेंट की स्थिति रखी.  और इस प्रकार हमारा एक फ्लैट बुक हुआ जो बाद में मेरे और सबसे छोटे बेटे के तब काम आया, जब राजी के हर साल ट्रांसफर होने लगे। 

बीच में कहानी फास्फोरवर्ड हो गयी ,  वापस लौटती हूँ। गुलावठी में हमें सातवां साल चल रहा था। तब मैंने कहा कि अब बच्चों की पढ़ाई के लिए कोई ढंग का स्थान ढूंढो ,  कोशिस करो कि किसी शहर मुख्यालय में बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ा सकें। राजी ने कहा कि मैं ट्रांसफर की न तो कोशिश करूंगा ,  और न गुलावठी में बने रहने के लिए मैंने कोई कोशिश की है। जब होगा तब हो  जायेगा। मैंने फिर कहा कि इस छोटे से कसबे से कभी कहीं बाहर जा सकते हैं, तो राजी ने कहा बताओ कहाँ चलना चाहती हो, मैंने वैष्णो देवी जाने की इच्छा व्यक्त की. राजी ने छुट्टी अप्लाई कर दी। "


घोस्ट कथा - २२ 

"गुलावठी के इस कालखंड में मेरे सबसे बड़े देवर अजय जो मेरठ में हमारे साथ थे, और उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग में जिन्होंने UDC के रूप में सेवा आरम्भ की थी ,  कम्पटीशन देते रहे और एक दिन सब रजिस्ट्रार पद पर चयनित हो कर मुजफ्फरनगर में तैनात थे, मेरा सबसे छोटा देवर प्रवीण उनके पास रह कर ग्रेजुएशन कर चूका  था, और मेरठ में एमएससी फिजिक्स कर रहा था, मेरा सबसे छोटा भाई गुलावठी से इंटर करने के बाद मेरठ कॉलेज से पोस्ट ग्रेजुएशन में था, मेरे बड़े देवर अजय की शादी दिल्ली के एक प्रतिष्ठित परिवार की लड़की से हो चुकी थी ,  वह खूब अच्छा सा दहेज़ भी लायी थी ,  यद्यपि मम्मी जी यानि राजी की मम्मी ने कभी मुझे दहेज़ के बारे में कुछ नहीं कहा, फिर भी उसका दहेज़ देखकर मेरे मन में हीन भाव आये बिना न रह सका। लेकिन सबसे अच्छी बात ये कि शादी के अवसर पर सारे रिश्तेदार ,  राजी के दोस्त लोग और उनकी पत्नियां ,  ननद नन्दोई के साथ साथ और भी कई नए परिवार जुटे और मुझे एक भरे पूरे परिवार की बड़ी बहू होने का एक अप्रतिम अनुभव हुआ। इतना सम्मान मैंने पहले किसी पारिवारिक वातावरण में नहीं देखा था। अजय की शादी में सब काम या तो मम्मी जी की अनुमति से हुए या फिर मेरी अनुमति से।  इसी शादी में विराज ,  यानि मेरा भाई ,  प्रवीण यानि राजी का सबसे छोटा भाई, नरेश यानि अजय का साला ,  और अरुण यानि राजी के मामा जी का बड़ा लड़का (ये सारे हम उम्र थे)आपस में  दोस्त बने और ऐसे दोस्त बने कि उनकी शरारतों के मुझे अपने जीते जी कई राज छिपाने पड़े। अब भी नहीं बताऊंगी ,  उन्होंने अपनी प्यारी बहन / भाभी से कसम ली थी। विराज और नरेश मुझे दीदी कहते थे और प्रवीण और अरुण भाभी। नरेश अब एक रियल एस्टेट व्यापारी है और अरुण ने सेना के कर्नल पद से रिटायरमेंट ले लिया है और अब एक बड़ी सिक्योरिटी एजेंसी का मालिक है। 

ये चारों दोस्त अक्सर और गर्मियों की छुट्टी में तो जरूर गुलावठी में इकठ्ठा होते थे। मैंने विराज से कहा कि - माँ को ले आओ, क्यों कि मम्मी जी तो गाँव छोड़ कर आएंगी नहीं (वैसे भी वो ज्यादा अनुशासन प्रिय थीं इसलिए चारों लड़के उनसे डरते थे) , और यहाँ पंद्रह दिन मस्ती काटो , पिता  जी (राजी के दादा जी)का ध्यान रखना, वैसे कमलेश भी रहेगी। हम लोग वैष्णो देवी जा रहे हैं, पंद्रह दिन में लौटेंगे। -

राजी के मामा जी आर्मी में कर्नल थे और उन दिनों जम्मू के पास नगरोटा में पोस्टेड थे। राजी ने उन्हें अपना प्रोग्राम चिट्ठी से सूचित कर दिया था। संयोग से मेरे पापा भी नगरोटा में ही केंद्रीय विद्यालय के प्रिंसिपल थे। हमें जम्मू रेलवे स्टेशन पर मामा जी की भेजी आर्मी जीप मिली और हम दोनों और हमारे दोनों बच्चे बड़े आराम से नगरोटा कैंट पहुँच गए। मामी जी कड़क आर्मी ऑफिसर वाइफ थी, मुझे उनसे थोड़ा डर लगा था लेकिन व्यवहार में वे बहुत अच्छी थी और राजी को तो बचपन से ही बहुत प्यार करती थी, इसलिए मैं भी उस प्यार की भागीदार बन गयी। मामा जी ने मेरे पापा को भी फोन से बता दिया कि राज (मामा जी, मम्मी जी और उनके कई दोस्त राजी को राज ही कहते थे ) और वंदना बच्चों सहित आये हैं। तो अगले दिन शाम को पापा जी हमसे मिलने आये और उन्होंने कई वर्षों बाद  अपनी बेटी को और पहली बार अपने दो दो धेवतों को देखा। उन्हें नमित में अपने आप की झलक दिखाई दी, और वो उसकी  बुद्धि से प्रभावित् दिखे। बोले ये तो मुझ पे गया है। मैंने मन ही मन कहा, आप जैसा न बन जाए। उसकी पढ़ाई के बारे में पूछने लगे, मैंने कहा कि अभी तो ऐसे ही मामूली स्कूल में डाल रखा है, सोच रहे हैं कि कहीं अच्छी जगह ट्रांसफर हो जाए तो किसी अच्छे स्कूल में डालें। उन्होंने डपट दिया, ये क्या डालें डालें लगा रखा है, स्कूल कोई कूड़े दान है, या तुम्हारा बेटा कोई सामान है। फिर अपने आप बोले कि मैं इसका एडमिशन अपने स्कूल में कर लेता हूँ , इसे यहीं छोड़ जाना। मैं तो डर गई। बात बदल कर भ्रमण / टूर प्रोग्राम पर आ गई। 

अगले दिन मामा जी ने हमें आर्मी जीप से ही कटरा भेजा और वहां पहले से हमारे लिए VIP व्यवस्था करा रखी थी, देवी दर्शन हुए, राजी को इन देवी देवताओ में आस्था नहीं है लेकिन उन्होंने इस धार्मिक यात्रा में हमारा साथ दिया। वापस नगरोटा आ गए। बातों बातों में उन्होंने बताया कि अरुण(राजी के मामा का लड़का )  ने उनके ही केंद्रीय विद्यालय से इंटर पास किया है और वो उनका प्रिय  शिष्य था। 

हम कुछ दिन वहां रूककर वापस गुलावठी आ गए , पापा जी ने हमसे उस दौरान तीन बार मुलाकात की और अपना स्कूल दिखाया, एक दिन अपने घर पर खाना भी खिलाया। 

और जब हम लौट कर आये तो आते ही पहली खबर मिली, कि राजी का ट्रांसफर बुलंदशहर विकास खंड में हो गया है। और गुलावठी के प्रधानों ने एक ज्ञापन उसका ट्रांसफर रुकवाने के लिए जिलाधिकारी को दे रखा है, बड़े बाबू ने बताया कि प्रमुख जी के साथ प्रधानों का डेलीगेशन डीएम से मिला था तो उन्होंने कहा है कि जब बी डी ओ छुट्टी से लौट आएं तो उन्हें भेजना। 

मैंने राजी से कहा कि अब आप क्या करोगे, उसने कहा वही जो पहले कहा था, ट्रांसफर रोकने को नहीं कहूंगा। "


घोस्ट कथा - २३ 

"मैंने बताया था न कि गुलावठी से राजी ने सरकारी विभाग में पहली बार नौकरी शुरू की थी और पहली ही पोस्टिंग उसकी एक ही ब्लॉक में  इतनी लम्बी रही ,  जो आम तौर पर सरकारी सेवा में और ऐसे पद पर अधिक लम्बी नहीं होती, तो इस पोस्टिंग ने बहुत ज्ञान ,  अनुभव ,  सम्बन्ध हम लोगों को दिए। 

सरसरी तौर पर नजर डालें तो इस विकास खंड में पोस्टिंग के दौरान कई बहुत अच्छे लोगों से हमारे सम्बन्ध स्थाई तौर पर बने। यहाँ रहते हुए मुझे नौकरी के अच्छे बुरे परिणाम समझने का मौका भी मिला ,  चूँकि मैंने तीन साल तक यहाँ वेतन पाया तो मेरे मन से दहेज़ न लाने की हीन भावना भी निकल गयी, क्योंकि मैंने वह सारा पैसा गृहस्थी के सामान जोड़ने में ही खर्च किया। मेरठ में राजी के एक घनिष्ठ मित्र दिनेश सक्सेना थे तो यहाँ उन्हें अपने से वरिष्ठ एक और बहुत अच्छे अफसर के के सक्सेना का साथ और मार्गदर्शन मिला, जो लगभग हर सप्ताह हमारे घर आ जाते थे ,  उस समय वो शिकारपुर विकासखंड के बी डी ओ थे, और अपने काम और ईमानदारी के लिए बहुत लोकप्रिय थे। गुलावठी के क्षेत्र पंचायत प्रमुख मौदूद अली भी राजी को बहुत सम्मान देते थे क्योंकि वो खुद भी बहुत ईमानदार थे। इसके अलावा दिल्ली दूरदर्शन के एक फोटोग्राफर और एक वरिष्ठ वैज्ञानिक कृषि विभाग भारत सरकार का बहुत बार हमारे घर आना हुआ करता था जिनके लिए मैं लंच डिनर बनाती थी, जबकि वे अपने सरकारी काम से  कोई डॉक्यूमेंट्री बायोगैस पर बनाने आते थे, उनसे अच्छी दोस्ती हो गयी थी और हम भी दिल्ली उनके घर  उनके निमंत्रण पर गए थे।  बड़े धूमधाम से हम लोगों की विदाई हुई और हम बुलंदशहर शिफ्ट हो गए। मेरा छोटा बेटा भी खूब बातें बनाने लगा था। हमारे शिफ्ट होने के दिन सामान उत्तर रहा था तो के के सक्सेना पूछने आए कि कोई मदद चाहिए तो बताएं ,  तो मेरे छोटे बेटे ने उनसे बड़े तपाक से कहा-भाई साब अब हमारा तबादला बुलंदशहर हो गया है। मात्र ३ साल के बेटे से ऐसा डायलॉग सुनकर हम सब की हंसी छूट गयी थी ,  के के भाई साहब उस बात को याद करके अपने जीवन के अंतिम दिनों तक अमित को छेड़ते रहते थे।

बुलंदशहर का ऑफिस एग्रीकल्चर स्कूल कैंपस में था ,  और यहां का मकान भी काफी बड़ा था। गुलावठी में सीखी हुई किचेन गार्डनिंग यहाँ बहुत काम आयी, खूब खाली जमीन थी जिस पर मैंने बहुत सब्जियां उगाईं, यहाँ खूब हरियाली थी, पानी की भी कमी नहीं थी। 

संयोग से बुलंदशहर विकासखंड में भी प्रमुख महेश कुमार सिंह एक ईमानदार नेता थे इसलिए राजी की उनसे भी अच्छी पटरी बैठ गयी। 

लेकिन जिला मुख्यालय का दफ्तर होने के कारण इनकी व्यस्तता बढ़ गयी थी , गुलावठी पोस्टिंग के दौरान पी एल पूनिया ,  जावेद उस्मानी ,  बी एस लाली इनके जिलाधिकारी रहे जो राजी को उसके कार्यों के कारण बहुत पसंद करते थे , लेकिन इनके बुलंदशहर आने पर जिलाधिकारी भी ट्रांसफर हो गए और नए अधिकारी को  लोगों को समझने में टाइम तो लगता ही है। जिले के विभागीय अधिकारी और  जिलाधिकारी मुख्यालय के बी डी ओ  से कुछ अधिक चापलूसी की उम्मीद करते हैं, ये परंपरा है। तो ऐसे ही किसी बात पर राजी के बॉस जो नए नए आये थे, उखड गए.  हमारे आवास के सामने ही प्रसार प्रशिक्षण केंद्र के प्राचार्य रहते थे, वो शाम को बाहर प्रांगण में राजी के साथ बैठे बैठे चाय पी रहे थे, राजी ने उनसे उस दिन की घटना उनसे शेयर कर दी ,  तो उन्होंने कहा कि प्रसार प्रशिक्षण केंद्र  पर काम करना चाहोगे, राजी मूलतः एक अध्यापक तो थे ही, तो उन्होंने हाँ कर दी, प्राचार्य जी ने एक डी ओ  पत्र लिखकर अपने स्टेनो को लखनऊ भेज दिया और तीन दिन बाद राजी का ट्रांसफर आर्डर BDO बुलंदशहर से  प्रसार प्रशिक्षण अधिकारी बुलंदशहर पद के लिए लेकर वो आ गया। 

तब तक राजी के बॉस को अपने स्रोतों से राजी की कार्यशैली और कार्य क्षमता का पता चल चूका था, उनके पास आर्डर की कॉपी आई तो वो हमारे घर आ गए। एक तरह से उन्होंने तीन दिन पहले हुए संवाद के लिए उन्होंने अफ़सोस व्यक्त किया और  ब्लॉक न छोड़ने के लिए कहा। लेकिन राजी ने उन्हें कहा, सर उस दिन आपने हमारी चाय ठुकरा दी थी, आज तो पी लीजिये। मैं चाय लेकर आई ,  उन्होंने पी और अंत में राजी ,  प्राचार्य जी और राजी के बॉस कोमल राम में यह तय हुआ कि प्रसार प्रशिक्षण अधिकारी का पद ज्वाइन करने के बाद भी वो BDO बुलंदशहर भी बने रहेंगे। बाद में पता चला कि इस निर्णय के पीछे प्रमुख महेश कुमार सिंह का हाथ था जो कोमल राम  पर नाराज हो कर आए थे कि आपने हमारे एक अच्छे अफसर को हमसे दूर कर दिया। आप सोच रहे होंगे कि मैं अपने पति के गुणगान कर रही हूँ, लेकिन मैंने ये भी तो बताया कि ईमानदारी के चक्कर में वे थोड़े रूड व्यवहार भी कर बैठते थे, जिस से कई बार उनके अपने अधिकारीयों से सम्बन्ध बिगड़ जाते थे, लेकिन उनकी किस्मत अच्छी रही कि किसी भी अधिकारी ने उनका कोई नुक्सान नहीं किया। "


घोस्ट कथा - २४ 

राजी ने प्रसार प्रशिक्षण अधिकारी के पद पर योगदान कर लिया, और पुराने बॉस और नए बॉस की सहमति का सम्मान करते हुए जब तक कोई नए BDO की आमद जिले में न हो जाए ,  तब तक के लिए उस पद के दायित्व निभाने की भी सहमति दे दी। लगभग छह महीने में नया BDO आ गया और फिर राजी को उस दायित्व से मुक्ति मिल गयी। प्रशिक्षण केंद्र पर ग्राम विकास अधिकारी ,  सहायक विकास अधिकारी लोगों का प्रशिक्षण होता था, ज्यादातर रेफ्रेशर कोर्स  के लिए दस दिन के बैच चलते थे, इसलिए ज्यादा काम नहीं था, हम दोनों काफी समय किचेन गार्डन में गुजारते थे। 

इस बीच परिवार में कई नए घटनाक्रम हुए। मेरे देवर अजय की सब रजिस्ट्रार बुलंदशहर पद पर तैनाती हो गए ,  नन्दोई  का चयन सीनियर मार्केटिंग इंस्पेक्टर पद पर बुलंदशहर के शिकारपुर में हो गयी। मेरे तीसरे देवर जो BTech और MBA करने के बाद बंगलौर में हीरो हौंडा के एरिया सेल्स मैनेजर बन गए थे, उन्होंने नौकरी छोड़ कर बुलंदशहर में ही मोटरसाइकिल का शोरूम खोल लिया। सबसे छोटा देवर केंद्रीय विद्यालय में दिल्ली में पीजीटी फिजिक्स के रूप में काम करने लगा. मुन्ना भैया का विवाह तो हमारे गुलावठी प्रवास के समय ही गुलावठी के पास के गाँव मोहाना के एक संभ्रांत परिवार की सबसे छोटी लड़की से हो गया, इस लड़की की खोज हमारे पड़ोस में रहने वाले ADO प्रताप सिंह ने ही की थी। गाँव हम लोग साल में तीन चार बार जाते थे, वहां मम्मी ,  मुन्ना और उसकी पत्नी अनीता रहते थे। तो कभी बुलंदशहर में तो कभी गांव में सारा परिवार इकठ्ठा होता रहता था और खूब एन्जॉय करते थे। उसी समय दो घटनाएं ह्रदय विदारक हुईं। 

मुन्ना भैया और अनीता अपनी तीन साल की बेटी के साथ बुलंदशहर आ रहे थे ,  रस्ते में एक रात वे मोहना में रुके, फिर अगली सुबह वे वाया सिकंदराबाद बुलंदशहर के लिए निकले , लेकिन जब वे हमारे पास रट बिलखते पहुंचे तो उनकी गोदी में उनकी बेटी की लाश थी ,  वे बस में बैठने से पहले  सिकंदराबाद में सड़क किनारे कुछ फल खरीद रहे थे, तभी कहीं से किसी तांगे को टुडे कर एक घोडा दौड़ता हुआ आया और सड़क किनारे खड़ी नन्ही बच्ची के सर पर एक टाप मार गया, सड़क और टाप के बीच नन्ही बच्ची का सर आ गया और उसने मौके पर ही दम तोड़ दिया।   

दूसरी घटना में मेरी ननद सुबह सुबह नई कृत्रिम सिल्क की साडी पहन कर तैयार हुई कि भैया भाभी से मिलने जाऊंगी, जाने से पहले अपने पति के लिए टिफिन तैयार करने लगी, उसने गैस चूल्हा जलाकर जलती हुई माचिस की तीली  नीचे गिरा दी ,  वो बुझी नहीं थी ,  और उसने साडी का निचला सिरा पकड़ लिया और वह भभक उठी . पूरी साड़ी उसके बदन से चिपक गयी। उसे राजी और उसके भाई पिता जीजा जी लेकर सफदरजंग दिल्ली गए लेकिन उन्हें बचाया न जा सका , उस समय उनके तीन छोटे छोटे बच्चे थे। ये बहुत बड़ी त्रासदी थी हमारे परिवार पर।  

इन त्रासदियों के बीच ही एक बड़ी भूल मुझ से हुई , घर बड़ा होते हुए भी परिवार जनों और रिश्तेदारों के आवागमन से अव्यस्थित हो गया था, तो मैंने एक दिन सिरे से सफाई अभियान चलाया, उसमे राजी के कमरे से कुछ कॉपियां जिनमे वे अपनी कविताएं ,  और कहानिया लिख छोड़ते थे, भी रद्दी अखबारों के साथ एक ढेर में बरामदे में पहुँच गईं। अगले दिन बहुत सबेरे मैं मुंह अँधेरे उठी तो देखा कि बाहर  आँगन में बैठे कुर्सी डाले राजी कुछ अखबार जला कर ताप रहे हैं ,  मैं वहां पहुंची तो देखा आग में वे कॉपियां भी पड़ी थीं. मैंने जल्दी जल्दी एक लकड़ी से से उन्हें निकलने की कोशिश की  तो केवल एक कॉपी ही बचा पाई ,  जिसे बाद में हमारे के पारिवारिक दोस्त खुर्जा के ब्रह्म प्रकाश ने "अंजुरी भर गीत " नाम से पुस्तकाकार में छपवाया। 

इसलिए मैं कभी कभी सोचती थी ,  कि इस आदमी में बहुत गुण हैं ,  लेकिन इसकी सनक का कोई भरोसा नहीं कि कब क्या कर बैठे। मैंने पूछा कि आपने ऐसा क्यों किया, क्यों जलाया, तो उन्होंने कहा कि जब तुमने इन्हें कबाड़े में डालने लायक मान लिया तो मैंने जला कर हाथ तापने लायक मान लिया। उनके इस अप्रत्याशित बर्ताव की शिकायत दबे दबे  उनके स्टाफ के लोग भी करते थे और राजी से डरते थे। वे कहते थे कि साहब अच्छे हैं, इंटेलीजेंट हैं लेकिन  कब क्या कर दें , कोई नहीं जानता।  

मेरे पापा का एक पत्र मेरे नाम आया ,  उसमे नमित (प्रवेश मेरे बड़े बेटे ) का केंद्रीय विद्यालय नगरोटा से जारी एक स्कूल लिविंग सर्टिफिकेट था, और पत्र में लिखा था, बुलंदशहर में नया केंद्रीय विद्यालय खुल रहा है ,  इस सर्टिफिकेट के साथ वहां एडमिशन करा सकते हो ,  प्रिंसिपल कुछ आनाकानी करे तो मेरा ऑफिस का फोन नंबर ऊपर लिखा है, कहना है बात करना चाहे तो कर ले। हम जिला सोल्जर बोर्ड के भवन में दो महीने पहले ही खोले गए केंद्रीय विद्यालय गए, प्रिंसिपल से बात की, तो उन्होंने पूरे सत्कार के साथ हमें बैठाया ,  चाय पिलाई ,  हमारे बेटे का एडमिशन भी कर लिया। इस प्रकार हमारे बड़े बेटे का केंद्रीय विद्यालय में हुआ। 

तभी उत्तर प्रदेश सरकार ने ग्रामीण आवास परिषद् का गठन किया और प्रत्येक जिले में आवासीय योजनाओं के लिए एक आवास विकास अधिकारी का कार्यालय स्थापित किया जिस पर स्थानीय व्यवस्था करने का निर्देश जिलाधिकारियों को  दिया। उस से पहले हर जिले में जिला ग्राम्य विकास अभिकरण की भी स्थापना की जा चुकी थी। और के के सक्सेना, जो राजी के घनिष्ठ मित्र और मार्गदर्शक थे, को उस अभिकरण का अपर परियोजना निदेशक बना दिया गया था। उनकी सलाह पर कोमल राम एक बार फिर हमारे घर आये। और उन्होंने राजी से कहा कि वे आवास विकास अधिकारी के पद पर उन्हें लाना चाहते हैं और सहमति लेने आये हैं.  राजी ने प्राचार्य महोदय को भी खबर करके घर पर बुलवा लिया और तीनों ने विचार विमर्श करके सहमति दे दी। 

तीसरे दिन राजी को आवास विकास अधिकारी पद का नियुक्ति पत्र मिल गया और उसने नया पद ,  नया ऑफिस ज्वाइन कर लिया, हमें डीएम कॉलोनी में घर भी अलॉट हो गया और हम एग्रीकल्चर स्कूल कैंपस से डीएम कॉलोनी बुलंदशहर में शिफ्ट हो गए ,  हमारे घर के सामने ही के के सक्सेना का घर था, इसके बाद हम दोनों परिवारों में और घनिष्टता हो गयी।  नए पद या नई योजना के कारण नहीं, बल्कि कोमलराम के अति विश्वास पात्र बन जाने के कारण राजी बहुत व्यस्त हो गए, उनका दफ्तर घर पर भी लगने लगा. उस दौरान बहुत से जिला स्तर के अधिकारी या तो ससपेंड हो जाते या ट्रांसफर करा कर चले जाते, कोमल राम बहुत अच्छे और ईमानदार और कर्मठ अफसर थे लेकिन अपने अधिकतर काम राजी पर डाल देते थे। एक समय तो राजी के पास ९ विभागों का कार्यभार आ गया था। राजी काम के भार से नहीं लेकिन अव्यवस्थाओं और भ्र्ष्टाचार से तंग आ कर खिन्न रहने लगे थे। एक बार तो उन्होंने  वापस शिक्षक का जॉब लेने की सोची। लेकिन उनके पापा ने उनका हौसला बढ़ाया और कहा कि तुम कर सकते हो, सब सुधर जाएगा। 

उनकी सनक का एक नमूना बताती हूँ ,  १९८९ में यानि आवास विकास अधिकारी बनने के दो महीने बाद , मैं फिर गर्भवती थी, हम तीसरा बच्चा नहीं चाहते थे, इसलिए मैंने ओमी बुआ जी के साथ एक लेडी डॉक्टर से संपर्क किया और उनकी सलाह पर एबॉर्शन कराने की सोची , मैं और बुआ जी ऑपरेशन रूम तक पहुँच गए, लेकिन फिर मैं डर  गयी और ऑपरेशन टेबल से बीच में ही उठ कर बुआ जी के साथ वापस आ गयी. शाम को बुआ जी ने राजी को ये बात बता दी ,  उन्होंने कोई खास प्रतिक्रिया नहीं दी ,  बस इतना कहा कि अब जो आ रहा है उसे आने दो ,  आगे से ध्यान रखेंगे। उसके अगले दिन चुपचाप बिना किसी को कुछ भी बताये अपनी नसबंदी करवा आये, जिसका पता मुझे उनकी चाल देख कर दो दिन बाद चला। यानि वो अपने फैसले लेने से पहले किसी से सलाह मशविरा नहीं करते।   

तीन वर्ष इस पद पर रहने के बाद, राजी का इस पद से रामपुर जिले में पुराने विभाग ,  ग्राम्य विकास में हो गया. मेरी सबसे छोटी चाची के जीजा जी (बाबू राम जी )उन दिनों, ग्राम्य विकास विभाग में मुख्यालय पर अपर आयुक्त प्रशासन पद पर तैनात थे, वे बुलंदशहर किसी जांच में आये थे, उन्हें मेरा पता था कि मैं भी बुलंदशहर में हूँ, राजी के मामा कर्नल साब के वे जवानी में साथी भी रह चुके थे, राजी उन्हें लंच पर घर ले आये। बातों बातों में मजाक में राजी ने उन्हें कहा, मामा जी, लगता है कि विभाग भूल गया है कि उनका एक अधिकारी एक ही जिले में १२, १३ साल से तैनात है, तो उन्होंने भी आश्चर्य किया कि क्या तुम्हें इस जिले में इतना समय हो गया है, क्या ट्रांसफर चाहते हो? राजी ने कहा कि आपकी मर्जी मैं तो जैसा यहाँ वैसा कहीं और।  उस दिन की बात शायद उनको याद रही हो और उन्होंने ट्रांसफर सीजन आते ही पहली ही लिस्ट में राजी का ट्रांसफर रामपुर कर दिया। पूरे १३ साल तक हम इस जिले में रहे। लेकिन इस जिले का और अन्न जल हमारे भाग्य में बदा था। 


घोस्ट कथा - 



घोस्ट कथा - २५ "अगस्त १९९१ का पहला सप्ताह था, बरसात का मौसम था, राजी आवास विकास अधिकारी का कार्यभार छोड़ चुके थे और पैकिंग में हाथ बंटा रहे थे, हम दोनों ने तीन दिन में सारी पैकिंग कर ली , और अधिकतर सामान बाहर के कमरे ( ड्राइंग रूम ) में पैक कर के रख लिया, बस एक चूल्हा , एक बन्दूक ,दो तीन बर्तन और हमारा बेड बचा, सोचा था कि सुबह ट्रक आएगा तब जब तक ये सामान लदेगा, तब तक ये बचा हुआ सामान भी खोल कर पैक कर लेंगे। हमने बड़े दोनों बेटों को उनके चाचा के घर सोने के लिए भेज दिया जो भूड़ मोहल्ले में रहते थे,क्योंकि उनके बेड और कपडे सब पैक हो चुके थे। हम थक कर चूर हो गए थे, इसलिए हम , यानि मैं , राजी और हमारा नन्हा क्षितिज गहरी नींद सो गए। रात के दो बजे बहुत शोर मचा,कोई हमारा गेट जोर जोर से बजा रहा था। उस शोर से हमारी आँख खुली तो घुप्प अँधेरा था, बिजली नहीं आ रही थी और जैसे ही पलंग से नीचे पैर रखा , छपाक से पारी पानी में। पूरा घर पानी में डूबा हुआ था डेढ़ फुट पानी खड़ा था, कुछ दिखाई नहीं दे रहा था, सारा सामान तैर रहा था। जैसे तैसे हमने बिस्तर से एक बिछौने में क्षितिज को लपेटा, खूँटी पर टंगी बन्दूक उठाई, घर से बाहर निकले एक ताला मय चाबी के ड्राइंग रूम के खिड़की पर रखा था , मुख्य प्रवेश द्वार पर ताला लगाया, आस पड़ोस में भी सब घर डूबे हुए थे और वही पडोसी हमें जगाने की एक घंटे से कोशिश कर रहे थे, वे समय रहते शिफ्ट हो गए थे क्योंकि वे देर तक जागे हुए थे, और उनके सामने ही मूसलाधार पानी बरसा था और उनके देखते देखते सड़क , नाला , आँगन सब एक हो गए थे, और हमें कुछ पता ही नहीं चला. हम इतनी गहरी नींद में थे . उस दिन रात के दो तीन बजे हम डीएम कॉलोनी में कोई सुरक्षित ठिकाना ढूंढ रहे थे, लेकिन हमने दूसरी मंजिल पर रहने वाले मित्र अफसरों के घर पर भी आवाज दी , लेकिन किसी ने उस अँधेरे में दरवाजा नहीं खोला तो हम नुमाइश ग्राउंड से होते हुए भूड़ देवर के घर पहुंचे। उस दिन हमें बाढ़ पीड़ितों का कष्ट क्या होता है, ये अनुभव हुआ। वे दूसरे मंजिल पर रहते थे, और उनके यहाँ जनरेटर भी चालू था, तो वहां हमें जा कर सबसे पहले तो कपडे बदलने और नहाने की इच्छा हुई। मैंने देवरानी के और राजी ने देवर के कपडे पहने. दिन निकल आया तो हमने सबसे पहले ट्रक वाले को फोन किया कि आज लदान नहीं हो पाएगा , तीन दिन बाद चलेंगे। उसे पूरा किस्सा बताया तो उसने सहानुभूति दिखाई और कहा कि कोई बात नहीं। ये अति वृष्टि की आपदा से अधिक, मानव सृजित आपदा थी क्योंकि बुलंदशहर के ड्रेनेज/नाले सब ठस्स थे, पानी काली नदी तक पहुँच ही नहीं रहा था और शहर के निचले इलाकों में भरता गया। पूरे चौबीस घंटे में पानी उतरा तब हम ने जा कर घर का हाल देखा.पूरे घर में सड़ांध फ़ैल गयी थी , क्योंकि गंदे नाले का पानी अपने साथ बहुत सा मल अदि वहां छोड़ गया था। समझ नहीं आ रहा था, क्या करें और हमने कुछ नहीं किया। तीसरे दिन उसी हाल में सारा सामान ट्रक में लदवाया और उन्हीं कपड़ों में हम रामपुर पहुँच गए.हमें चमरव्वा ब्लॉक में एक बड़ा सा घर अलॉट किया गया था जिसमे कभी जिला विकास अधिकारी रहते थे. वहां ब्लॉक के स्टाफ और उन्हीं के द्वारा बुलवाये गए मजदूरों की मदद से सारा सामन पूरे आँगन में खुलवा कर फैला दिया. संयोग से इस भारी बारिश के बाद चटक धुप खिली हुई थी. और हवा भी ठीक चल रही थी. हम दुआ करते रहे कि फिर से बारिश न आ जाए , भगवान ने मेरी सुन ली.और तीन दिन में सब कुछ सूख गया तब उनकी जांच पड़ताल शुरू हुई , तब तक राजी ने ज्वाइन भी नहीं किया , उनके बॉस राजी को पहले से जानते थे, वे बुलंदशहर में रह चुके थे, उन्होंने कहा कि इत्मीनान से ज्वाइन करना, तो सप्ताह भर का पूरा जोइनिंग टाइम राजी ने इस्तेमाल किया। मेरी मनपसंद साड़ियां पूरी तरह खराब हो गयीं, वे पहनने लायक नहीं रह गयीं, उनमे विचित्र डिज़ाइन रंगबिरंगे घालमेल से उभर आये. बाकी कपडे बच्चों के और राजी के, दो दो बार धो कर पहनने लायक हो गए। एक ब्लैक एंड वाइट टीवी था, उसकी उम्मीद नहीं थी कि चालू हो पाएगा, इसलिए उसे हमने तीन दिन और सूखने दिया, फिर उसे ठीक से पोंछ कर चालू किया तो वो उम्मीद के विपरीत ठीक से चल गया। इसी जोइनिंग टाइम में CRPFके कैंपस में चलने वाले केंद्रीय विद्यालय में राजी और मै बच्चों को लेकर गए. प्रिंसिपल बहुत उदार थे और हम भाग्यशाली कि नमित का एडमिशन ट्रांसफर आधार पर और अमित का brotherhood में आसानी से हो गया, अगर आपका भाई या बहन उस स्कूल में पहले से है तो वे उसे वेटेज देते हैं. अब सब सेट हो गया, तो राजी ने अपर परियोजना निदेशक के पद पर जोइनिंग की, लेकिन उनके बॉस ने उनके ऊपर एक जिम्मेदारी और लाद दी , बोले कि आप मिलक ब्लॉक के खंड विकास अधिकारी का कार्य अतिरिक्त रूप में सम्हालें , क्योंकि वह मुख्य राजमार्ग पर है और काफी अरसे से वहां को बी डी ओ नहीं है और वह एक बिगड़ा हुआ ब्लॉक है। अब राजी एक दिन मिलक जाते, एक दिन जिले के दफ्तर पर बैठते, बहुत व्यस्त हो गए, रामपुर से मेरा मायका २५ किमी दूर था, मैंने अपने भाई विराज को भेज कर अपनी माँ को रामपुर अपने पास रहने के लिए बुलवा लिया।" घोस्ट कथा - २६ " मेरे पापा ने भले ही प्रकट में हम सब भाई बहन , माँ, भाई भतीजे, के प्रति कठोरता बरती, बल्कि कहा जा सकता है कि निष्ठुरता बरती, लेकिन उन्होंने अपने विभाग की जानकारियों और अनुभवों का लाभ भी पहुँचाया। उन्हें पता था कि उनके विभाग में कब कब किस किस रीजन में किस विषय की कितनी रिक्तियां निकलती हैं। उनके भाई जगदीश, बेटे अनुराग , बेटे विराज की क्या क्षमताएं हैं. वो मुझे अंग्रेजी में एम् ए करने की सलाह क्यों देते थे, उन्होंने जगदीश चाचा और अनुराग को भूगोल में पोस्टग्रेडुएशन करने की क्यों सलाह देते थे। उन्हें पता था कि पूर्वोत्तर राज्यों और जम्मू कश्मीर में लोग आतंकवाद के डर से केंद्रीय सेवा में आवेदन नहीं करते हैं क्योंकि आतंकवादियों के निशाने पर केंद्र सर्कार के कर्मचारी सबसे पहले आते है. लेकिन वे जानते थे कि दिल्ली , मुंबई , जयपुर , लखनऊ जैसे रीजन में बहुत लोग एप्लीकेशन डालते हैं और कम्पटीशन टफ हो जाता है। लिखित परीक्षा की इन क्षेत्रों की मेरिट ज्यादा ऊँची जाती है और उनके परिवार के लोग तो जैसे तैसे पोस्टग्रेडुएशन कर पाए हैं, मैं और मेरा भाई अनुराग तो प्रथम श्रेणी से एम ए थे, लेकिन शेष द्वितीय श्रेणी के थे। मेरे पापा ने कई वर्ष पहले ही कह दिया था कि अगर तुम लोग इंटरव्यू तक पहुँच जाओगे तो मेरा नाम ही तुम्हे चयन कराने में मदद कर देगा लेकिन तुम्हारा वहां तक पहुंचना तभी संभव है जब तुम ऐसे रीजन में अप्लाई करो जहाँ लोग आवेदन करने से डरते हैं। उनकी इस सलाह पर मेरे चाचा जी ने असम से , मैंने और मेरे भाई अनुराग ने जम्मू कश्मीर से और मेरे भाई विराज ने नागालैंड से आवेदन केंद्रीय विद्यालय संगठन में डाल रखे थे। सबसे पहले जगदीश चाचा, फिर अनुराग, फिर मेरा और मेरे भाई का चयन केंद्रीय विद्यालय में हुआ, अनुराग को धर्मशाला के पास योल कैंट में, जगदीश को असम में, विराज को नागालैंड में नियुक्ति मिली. सबने अपने अपने समय पर ज्वाइन भी कर लिया, मेरा रिजल्ट सबसे बाद में आया और मुझे नियुक्ति मिली पाकिस्तान बॉर्डर पर बारामूला के कैंट में। विराज को नागालैंड जाना था, लेकिन वो हिचक रहा था, उसकी जोइनिंग के लिए पापा जोर डाल रहे थे, विराज बताता है कि वो कहते थे कि नालायकों जहाँ मिले, वहीँ ज्वाइन करलो , बाद में समय आने पर ट्रांसफर का आवेदन करने का चांस तो रहेगा। नागालैंड और बारामूला दोनों खतरनाक जगह थी. मुझे डर था कि अगर ज्वाइन न किया तो ये मौका हाथ से निकल जाएगा, और फिर उम्र भी निकल जाएगी। तो मैंने और विराज ने तय किया कि पहले मुझे ज्वाइन करवाओ फिर तुम अपना ज्वाइन करना. राजी व्यस्त रहते थे हम उन्हें डिस्टर्ब नहीं करना चाहते थे, हमने उनके सामने प्रस्ताव रखा कि क्या मैं विराज के साथ बारामुला ज्वाइन करने जाऊं. राजी तो, मेरे हर काम को राजी ही रहते थे, वही इस बार भी हुआ , उन्होंने हाँ कह दी लेकिन ये भी जोड़ दिया अपने डाक्यूमेंट्स इस बार मत खो देना। हाँ शायद मैं ये बताना भूल गयी कि गुलावठी से ट्रांसफर के बाद मैंने प्रौढ़ शिक्षा बिभाग की नौकरी छोड़ दी थी , क्योंकि दो दो बच्चों को पालने के लिए मुझे दिक्कत हो रही थी , मेरी वो सहेली कमलेश भी शायद छोड़ गयी हो, उसकी शादी के बाद उससे संपर्क छूट गया था। तो मैं और विराज बारामूला पहुँच गए. मेरी माँ मेरे तीनों बेटों की देखभाल के लिए रामपुर में ही रुक गयीं। काश हम भाई बहनों का संपर्क पापा से बना रहता तो हमें बारामूला न जाना पड़ा होता। लेकिन ये सच है कि हम सब के इंटरव्यू में पापा के नाम ने बहुत मदद की, इंटरव्यू लेने वाले पिता के नाम को पढ़ते ही पूछ बैठते थे कि क्या आपके पापा के वि में हैं. और हमारे हाँ कहने पर हमारा आधा इंटरव्यू तो इस एक सवाल से ही ख़त्म हो जाता था। मेरे साथ भी ऐसा हुआ और मेरे दोनों भाइयों के साथ भी। मैंने बारामूला कैंट में केंद्रीय विद्यालय में प्रवेश किया तो वहां एक प्राइमरी टीचर था वही प्रिंसिपल बना हुआ था, उसने कहा कि चलिए चेयरमैन साब के पास चलते हैं, वो मुझे एक ब्रिगेडियर के कक्ष में ले गया. उन्होंने मुझे देखा और कहा कि आप महिला हो कर भी यहां ज्वाइन करने का जोखिम उठा रही हैं, ब्रेव लेडी। जोइनिंग लेटर पर इंडोर्समेंट करते हुए उसने उस टीचर से कहा कि लो अब तो आप से सीनियर टीचर आ गयी है , इन्हें प्रिंसिपल का भी चार्ज दे दो, और अब तुम घर जा सकते हो, लेकिन एक सप्ताह से ज्यादा की छुट्टी नहीं मिलेगी। मैं बोल पड़ी , सर छुट्टी तो मुझे भी लेनी है, मैं तो सिर्फ अभी ज्वाइन करने आई हूँ , मुझे अपने बच्चे को और माँ को भी लाना होगा , अभी गोदी का है तो उसे छोड़ नहीं सकती, मैं ज्वाइन करके जाती हूँ और अगले हफ्ते आती हूँ. ब्रिगेडियर साहब थोड़ा सख्त होते हुए बोले, खेल तमाशा समझा है। आज ज्वाइन करो आज ही छुट्टी ले लो.बेहतर है कि आप ज्वाइन ही मत कीजिये. मैं डर गयी , मैंने कहा नहीं सर मैं अपना कुछ सामान ले आई हूँ, थोड़ा और सामान और अपने बेटे को लेने तो जाना ही होगा/ उन्होंने कहा कि आप डिसाइड करें, नौकरी करनी है या बच्चे पालने हैं। मैं बाहर आ गई। जाते जाते उन्होंने कहा कि प्रिंसिपल साब आपका क्वार्टर भी दिखा देंगे कोई फर्नीचर की जरूरत हो तो इन्हें बता दीजियेगा . मैं बड़ी दुविधा में रही, क्या करूँ। विराज ने भी तसल्ली दी, कि दीदी कुछ दिन ठहरो , चेयरमैन साब भी इंसान हैं, पिघल जाएंगे। उस रात हम ठीक से सो नहीं पाए , क्वार्टर में सब सुविधा थी कई कई कम्बल थे, बिस्तर हम भी लेकर गए थे। लेकिन सो न पाने की वजह थी, रात भर फायरिंग की आवाज आती रही, और मुझे नहीं लगता कि वहां पूरे कैंपस में एक भी महिला थी, मैं अकेली कैसे रहूंगी , अगर विराज चला गया तो मैं निकलूंगी कैसे। सुबह हुई। स्कूल लगा, बहुत कम बच्चे थे जो बारामुला शहर के निवासियों के ही थे, उनमे कुछ सरदार / सिक्ख बच्चे भी थे.उनमे से एक के अभिभावक स्कूल आये बच्चे को छोड़ने तो मेरे कक्ष में भी आये, मैं प्रिंसिपल की कुर्सी पर बैठी थी। मुझे देखकर बहुत खुश हुए, बोले मैडम आप यहाँ कैंपस में मत रुकिए, यहाँ सुरक्षा नहीं है और कोई दूसरी लेडी भी नहीं है, आप स्कूल के बाद मेरा घर देखिए , सब बढ़िया है, आपको अच्छा लगेगा। पहली मुलाकात में मुझे ये सब अजीब लगा लेकिन स्कूल के बाद वो बच्च्चे को लेने कार में आये , जबकि सुबह वो स्कूटर पर आये थे। उन्होंने जिद की, कि आप चलिए तो सही, पसंद न आये तो मैं आप दोनों को आपके क्वार्टर पर वापस छोड़ दूंगा। तो मैं और विराज उनके यहाँ गए। मकान भी अच्छा था, उसकी पत्नी , उनके बुजुर्ग माता पिता सब अच्छे लोग लगे, हमने हाँ कर दी और कहा कि हमें एक बार तो क्वार्टर पर जाना ही होगा , सामान लाने और ब्रिगेडियर साब को भी बताना होगा। सरदार जी हमें वापस लाये , हम ब्रिगेडियर साब से भी मिले, उन्हें बताया कि हमने सरदार जी का कमरा किराए पर लिया है, हम वहां कम्फर्टेबल होंगे, तो उन्होंने कहा , दिस आई एग्री। खैर हम सोमवार से शनिवार तक वहां रहे, शनिवार को मैंने फिर ब्रिगेडियर साब से कहा कि सर कल तो दुसरे सर लौट ही आएंगे, मुझे अगले हफ्ते की छुट्टी दे दीजिये मैं अपने बच्चे और अपना कुछ और सामान ले आऊं। वो मुस्कुराए, शायद मूड ठीक था, बोले छुट्टी दे दूंगा लेकिन मुझे पता है कि आप लौट कर नहीं आएंगी, मैंने कहा नहीं सर मेरा सामान यहीं रहेगा, मैं खाली हाथ जाऊंगी। उन्होंने छुट्टी दे दी और मैं और विराज ऐसे दौड़े जैसे जेल से छूट कर आये हों , हमने सरदार जी से भी यही कहा कि हम अपने बच्चे और सामान लेने जा रहे हैं, सर ने छुट्टी दे दी है। श्रीनगर की बस पकड़ी, फिर वहां से जम्मू की पूरी रात बस का सफर किया फिर जनरल बोगी में बैठ कर जम्मू से रामपुर जा कर अगले दिन शाम तक घर पहुंचे तो बच्चों को देखकर फूट फूट कर माँ से लिपट कर रोई। राजी हमें देख कर बोले, यहाँ की कहानी सुनो, मेरे दफ्तर में योल से पहले अनुराग का फोन आया, मैंने उसे बताया कि आप और विराज बारामूला गए हुए हो और कुछ खबर नहीं है कि वे ठीक हैं या नहीं। फिर आपके पापा का फोन आया कि वन्दना कहाँ है, मैंने उन्हें भी बताया कि वन्दना विराज को लेकर बारामुला ज्वाइन करने गयी है, वो लगभग भड़कते हुए बोले कि क्यों भेजा और वंदना को ज्वाइन करना था तो विराज को क्यों भेजा, मैंने कहा कि अकेले इतनी दूर जाना ठीक नहीं था, फिर बोले तुम क्यों नहीं गए, मैंने कहा कि मैं तो उसकी नौकरी के भी पक्ष में नहीं हूँ और मैं भी अपने काम में व्यस्त हूँ, अब वो नौकरी करेगी तो इतना सब तो उसे अपने अंदर कनिफ्डेन्स लाना ही पड़ेगा कि मेरे बिना भी रह सके। बोले क्या खबर है, तो मैंने कह दिया कि मुझे तो खबर नहीं है लेकिन अनुराग से कहा है कि वह उनकी खबर पता लगाए। तो वो और भी भड़क गए। लगभग चिल्ला दिए मेरे पूरे खानदान को बारामूला भेज दिया. मैंने कहा नहीं पापा जी सिर्फ खबर पता लगाने को कहा है, अनुराग बारामूला नहीं जाएगा। मैं राजी से लिपट कर रोने लगी , और सॉरी सॉरी करती रही, बच्चे सकपकाए से हमें देखते रहे। खैर मैं बारामूला दुबारा नहीं गयी, मेरा बिस्तर , बर्तन , कुछ कपडे सरदार जी के यहाँ हमेशा के लिए रह गए। बाद में काफी दिनों बाद एक चिट्ठी हमारे पास उनकी आई , जिसमे लिखा था कि माहौल बिगड़ता देख कर हम लोग सब बेचबाच कर जम्मू शिफ्ट हो गए हैं। इसके बाद उनसे फिर कोई संपर्क नहीं हुआ। " घोस्ट कथा - २७ (छूटी कड़ियाँ ) "धाराप्रवाह कहानी सुनाने में बीच की कुछ कड़ियाँ छूट गयी हैं। पहले उनका उल्लेख कर दूँ फिर आगे बढ़ूंगी.जब हमारे परिवार में मेरी ननद के साथ दुर्घटना हुई थी, तब मेरे तीसरे देवर की शादी सर पर थी। मेरे देवर अनिल रुड़की से इंजीनियरिंग करने के बाद चंडीगढ़ चले गए थे MBA करने। वहां एक युथ फेस्टिवल में कानपुर से आई एक लड़की को वे दिल दे बैठे। संयोग से वो सजातीय थी तो अनिल को उम्मीद जगी की कि शायद घर वाले इस रिश्ते को राजी हो जायेंगे। उसने मम्मीजी से जिक्र किया, तो मम्मी जी ने राजी के पापा जी से बात की, उन्होंने कहा कि रिश्ता लड़की वाले लाएं तो सोचेंगे। लड़की वाले कानपुर के एक प्रसिद्ध वकील थे, प्यार एकतरफा था, यानि लड़की ने अपने घर पर कोई जिक्र ही नहीं किया, तो मम्मी जी और अनिल के भाई लोगों ने शायद कोई साजिश की या क्या कारण बना कि वकील साब तक बात पहुंचा दी गयी, कि एक पुलिस अफसर का लड़का है, रिश्ते की बात चलाई जाए, अब वकील साब के बड़े बेटे की शादी हो चुकी थी और उनके घर में एक ख्यात / कुख्यात (जो भी हो)वरिष्ठ आईएएस की सगी बहन, बहू के रूप में मौजूद थी, तो उनके दिमाग में अपनी बेटी के लिए भी किसी आईएएस वर की तलाश थी, इसलिए उन्होंने कोई सन्देश नहीं भेजा.कई वर्ष बाद उनको शायद आईएएस नहीं मिला तब उनका सन्देश आया। इससे पहले पापा जी अनिल की शादी अपने एक पुलिस अफसर दोस्त की बेटी से करने का मन बना चुके थे। लेकिन देर होने से पहले ही वो रिश्ता आ गया जिसकी अनिल को इंतजार थी। फटाफट शादी की हाँ भर दी गयी.और तभी घर में ननद के साथ ये हादसा हो गया। ६ दिन बाद ही शादी थी और रेखा बहन चल बसी . इसलिए बिना किसी तामझाम के पापा जी , जीजा जी , और ये भाई लोग जा कर मेरी तीसरी देवरानी शोभा को ले आये। अनिल नौकरी छोड़कर बुलंदशहर में मोटरसाइकिल का शोरूम खोल चुके थे। उधर सबसे छोटे देवर जो सदा ही दिल फेंक साबित हुए,बचपन में ही प्रेमपत्र देने वाले ने प्रेम प्रसार जारी रखा और अपने साथ पढ़ने वाली लड़कियों से इश्क का इजहार इस ख़ूबसूरती से किया, कि मेरठ में एक बड़ा(शायद सबसे बड़ा ) चिकित्सा संस्थान चलाने वाले डॉक्टर साहब हमारे घर अपनी बहन का रिश्ता ले करा आये थे। राजी ने उनसे बड़ी समझदारी से बात की और प्रस्ताव दिया कि कोशिश की जाए कि यह परीक्षा ली जाए कि ये सतही आकर्षण है या सचमुच प्रेम है, इन दोनों को ६ महीने तक एक दुसरे से मिलने या संपर्क करने से प्रतिबंधित कर दिया जाए, और यदि इनका प्रेम तब भी वैसा ही बना रहे तो इनका विवाह कर दिया जाए। डॉक्टर साब को बात समझ में आ गयी। प्रयोग सफल रहा, लड़की को उन्होंने सिविल सर्विसेज की तैयारी करने को प्रेरित किया और कहीं दूर (शायद अपनी एक आईएएस निकट सम्बन्धी के पास ) भेज दिया. छह महीने बाद, तू नहीं और सही की तर्ज पर प्रवीण अपनी एक और क्लास फेलो के प्रेमपाश में ऐसे फंसे कि मेरठ के आर्यसमाज मंदिर में उससे विवाह रचा कर उस समारोह के फोटोग्राफ हमलोगों को बुलंदशहर आवास विकास अधिकारी के पते पर भेज दिए। इस के तुरंत बाद एक प्रौढ़ और एक युवा चौधरी साहब हमारे घर आये। राजी ने उनसे बात करने पर पाया कि उन्हें अभी तक ये पता ही नहीं था कि उनकी लड़की ने शादी कर ली है , वो प्रवीण की शिकायत लेकर आये थे कि अपने भाई को समझा लीजिये कि वह हमारी लड़की को परेशां कर रहा है, और ये भी कहा कि उसके पास उनकी बेटी के फोटोग्राफ हैं , वो हमें वापस दिलवा दीजिये ,वरना बुरा होगा . राजी ने चपरासी भेज कर शोरूम पर अनिल की मदद कर रहे प्रवीण को बुलवा लिया। प्रवीण ने तब भी नहीं बताया कि वे शादी कर चुके हैं, जबकि वह फोटो भी हमें भेज चूका था। उसने उन दोनों से कहा कि आप अपनी लड़की को समझा लीजिये की वो मुझ से न मिले ,मुझे क्यों समझाने आये हैं। वे राजी की बात करने की शैली से प्रभावित हुए और बोले कि आप हमारी मदद कीजिये, वो दादरी नवोदय स्कूल में PGT इंग्लिश है , उसे समझाने के लिए हमारे साथ चलिए, (प्रवीण उस समय केंद्रीय विद्यालय दादरी में पीजीटी फिजिक्स थे). राजी ने अपने दोस्त और पडोसी के के सक्सेना से बात की और उन दोनों के साथ दादरी चले गए। शाम को लौट कर राजी ने मुझे बताया कि लड़की बहुत मजबूत इरादों वाली है उसने अपने पिता और भाई से मिलने से इंकार कर दिया, मुझ से बात की और कह दिया कि शादी करूंगी तो प्रवीण से अन्यथा नहीं करूंगी, फिर चलते चलते धीरे से मेरे से ये भी कह दिया कि हमारी शादी हो चुकी है। कभी कभी मुझे लगता है कि केंद्रीय विद्यालय पूरी जिंदगी भर मेरे इर्द गिर्द घूमता रहा। अनिल की पत्नी आयी तो वो भी केंद्रीय विद्यालय की टीचर, प्रवीण की पत्नी भी नवोदय छोड़कर केंद्रीय विद्यालय में चली गयी, आजकल दक्षिण भारत के केंद्रीय विद्यालय की प्रिंसिपल है. राजी के दादा जी का परलोक गमन की सूचना भी इन छूटी कड़ियों में शामिल की जा सकती है। गुलावठी से वे हमारे साथ बुलंदशहर आये और उसी अवधि में जब राजी बी डी ओ बुलंदशहर थे, नहा धोकर अपनी धोती सूखा रहे थे, तो उसमे राजी को उसमे खून के धब्बे दिखाई दिए, राजी उन्हें अस्पताल ले गए , फिर वहां से मेरठ रेफेर कर दिए गए और फिर तीन दिन बाद उन्होंने देह त्याग दी। इन छूटी घटनाओं के बाद रामपुर वापस आते हैं। राजी के मिलक के विधायक और प्रमुख से तनातनी चली और अंततः राजी मिलक विकास खंड की समस्याओं का निदान कर पाने में सफल हुए, इसके लिए उन्हें विधायक, जो कि प्रमुख का पद भी संभाले हुए थे (जोकि अवैध था ) से लड़ाई मोल लेनी पड़ी और प्रमुख का पद स्थानीय SDM को मिला फिर दोनों ने मिलकर उस ब्लॉक को जिले का सर्वश्रेष्ठ ब्लॉक बनवा दिया। वहां आतंकवाद (खालिस्तान ) उन दिनों चरम पर था, कई बार इन्होंने खतरा मोल लिया। इन्होने वहीँ गुरुमुखी सीखी.लेकिन मिलक छोड़ने से पहले इनके साथ एक घटना हो गयी, मुरादाबाद के कमिश्नर थे राधे श्याम कौशिक, बड़े काबिल अधिकारी थे, बरेली से आते समय वो एक शाम दफ्तर बंद होने के समय विकासखंड कार्यालय में पहुँच गए। उन्होंने आकस्मिक निरिक्षण नोट लिखा और उसमे उल्लेख किया कि दफ्तर में केवल एक लेखाकार के आलावा कोई नहीं मिला, लेखाकार के पास हाजिरी रजिस्टर में कुछ नामों के सामने हस्ताक्षर नहीं थे, उसमे CL अंकित नहीं थी, जबकि उन अनुपस्थित लोगों के अवकाश प्रार्थना पत्र लेखाकार के पास फाइल में मौजूद थे। इस आधार पर लेखाकार को निलंबित किया जाए और BDO को प्रतिकूल प्रविष्टि दी जाए। जिलाधिकारी ने कमिश्नर के निरीक्षण नोट का पालन कर दिया और दो आदेश जारी कर दिए। जब राजी को आदेश की प्रति मिली तो उसने विद्रोह कर दिया और इस्तीफ़ा भेज दिया, जिसकी भाषा थोड़ी तल्ख़ थी। राजी के बॉस घर आये और राजी को समझाया कि इस्तीफ़ा देने के बजाय अपनी बात के लिए लड़ो। राजी ने कहा कि आप और डीएम को सारी स्थिति पता है, आप लोगों को जो उचित लगे कीजिये , मैं तो ऑफिस तब तक नहीं आऊंगा जब तक मुझे और मेरे लेखाकार को दिए गए दंड वापस नहीं होते। और एक सप्ताह में दोनों आदेश वापस हो गए। उसी महीने राजी का प्रमोशन हो गया और उसे तैनाती मिले सहारनपुर के प्रोजेक्ट डायरेक्टर की। और एक और खुशखबरी मिली कि मेरा तबादला बारामूला से ज्योतिपुरम केंद्रीय विद्यालय हो गया है , मुझे पता है कि ये करिश्मा करवाने वाले मेरे पापा ही थे।" घोस्ट कथा - २८ (छूटी कड़ियाँ-२ ) "मेरे सबसे छोटे देवर के चुपचाप किये गए विवाह की खबर पुष्पा ( मेरी सबसे छोटी देवरानी ) के घर वालों को जब लग गयी तो वो दुबारा हमारे पास आये, उन्होंने कहा कि अब जो हुआ सो हुआ , समाज को दिखाने के लिए अब हमें अपनी लड़की की शादी तो करनी ही है, तो बताओ कैसे किया जाए। सबसे पहले जिम्मा आ पड़ा राजी को अपने पापा को और अजय भाई को मनाना था. वे दोनों ही जाति से बाहर शादी की शादी के लिए तैयार नहीं थे, लेकिन मम्मी पापा और भाई सब शुरू से ही राजी की बात को महत्त्व देते थे, मेरी शादी भी राजी के एक डायलॉग के कारण हो पाई थी वरना पापा जी तो मेरे पापा के देहरादून में किये गए रूखे बर्ताव के कारण शादी की मना कर चुके थे। पता नहीं राजी ने क्या कह के अजय और पापा जी को तैयार कर लिया, और फिर गाँव से मेरठ के उसी आर्यसमाज मंदिर में बारात गयी , जहां कुछ ही महीने पहले उसी जोड़े ने शादी कर ली थी, जाटों और अहीरों की क्षेत्रीय प्रतिद्वंदिता के कारण होने वाले खतरे को भांप कर पापा जी गाँव से कम से कम दस बन्दूक / राइफल धारी लोगों को बारात में लाये थे.लेकिन पुष्पा के घरवालो ने सिर्फ अपने निमंत्रण कार्ड में प्रवीण और उसके पापा का सरनेम छिपा कर उसे सजातीय शादी बनाने की कोशिश की। और शादी राजी ख़ुशी निपट गयी.लेकिन मुझे आश्चर्य होता है कि पुष्पा सीधे दादरी से शादी के मंडप तक आयी और फिर शादी के बाद हमारे परिवार में शामिल हो गयी, कभी अपने पिता और बड़े भाई के यहाँ नहीं गयी। उस समय उसके छोटे भाई बहन ज्यादा छोटे थे। बड़े होने पर और आत्मनिर्भर होने के बाद उसके छोटे भाई और बहन ने उसके यहाँ आना जाना शुरू किया और उसके बेटे की शादी में भी वे ही दोनों शामिल हुए. बड़े भाई और पिता ने कभी हमसे या प्रवीण पुष्पा से संपर्क नहीं किया। एक और शादी - मेरे भाई अनुराग की भी ऐसी है जिसमे उसके पिता शामिल नहीं हुए और जब शादी के बाद मैं और राजी अनुराग और उसकी नई नवेली दुल्हन को लेकर मेरे पापा से आशीर्वाद लेने गए तो उन्होंने कहा कि मैं इन लोगों की शक्ल भी नहीं देखना चाहता, राजी ने कहा कि पापा जी, बहु तो बेटी जैसी है, इसकी क्या गलती है, आप अनुराग से नाराज हो सकते हो , इस लड़की ने तो अभी कोई अपराध किया ही नहीं है। तो उन्होंने जो कहा वह क्रूरता की अति है, इसलिए मैं उसे नहीं दोहराऊंगी। राजी को लगता है और मैं भी उनसे सहमत हूँ कि इस शादी में अनुराग और उसके ससुर की ही गलती है, उन्हें शादी से पहले मेरे पापा जी से मिलने उनकी अनुमति लेने जाना चाहिए था। लेकिन पापा के द्वारा अपनी पहली बहू के प्रति बरती गयी क्रूरता भी अक्षम्य है। कुल ग्यारह महीनों का रामपुर प्रवास उथलपुथल वाला रहा। और हम सहारनपुर पहुँच गए। सामन सेट कर लेने के बाद मैंने राजी से रिक्वेस्ट की कि मैं ज्योतिपुरम वाली पोस्टिंग ज्वाइन करना चाहती हूँ। जब ट्रांसफर एक पीसफ़ुल जगह और अच्छे हिल स्टेशन पर हो गया है तो ये मौका क्यों गवाएं। हमेशा की तरह उन्होंने इस बार भी मेरी बात मान ली और चूँकि माँ भी हमारे साथ थी, तो बच्चों और माँ सहित कई सूट केस लेकर हम सहारनपुर से जम्मू , और फिर जम्मू से रियासी और रियासी से ज्योतिपुरम पहुँच गए। हमारे पास मुरादाबाद के एक अध्यापक का एड्रेस था जो जो ज्योतिपुरम में ही पोस्टेड थे। हमने अपना सामान वहां रखा और प्रिंसिपल के पास जाकर अपनी जोइनिंग दी, यहाँ एक विद्युत् प्रोजेक्ट था , मकान पर्याप्त संख्या में थे, तो उसी दिन फर्स्ट फ्लोर पर एक मकान भी मेरे नाम अलॉट हो गया, वरना हमें किराए का मकान ढूंढना पड़ता, जो कम से कम ज्योतिपुरम में तो मिलना संभव नहीं था, क्योंकि यहाँ सिर्फ सरकारी लोग ही थे और सब सरकारी भवनों में ही रहते थे। दो रात वहां रुक कर और जरुरी सामान की व्यवस्था करके राजी वापस सहारनपुर लौट गए। दोनों बच्चे भी मेरे साथ स्कूल जाने लगे और माँ सबसे छोटे क्षितिज को घर पर सम्भालतीं। अभी एक ही महीना हुआ था कि एक भयंकर तूफ़ान आ गया। ....... ...जारी है। ... घोस्ट कथा २९ पहले थोडी छूटी कड़ियाँ - बुलंदशहर में पापा जी, डिप्टीएसपी पद से रिटायर हो कर आ गए थे, मेरे पापा के उलट बहुत सोशल थे, और अपने विभाग के चर्चित अधिकारीयों में उनकी गिनती होती थी , उन्हें गणतंत्र दिवस पर होने वाले पुरुष्कारों में दो बार वीरता के लिए भारतीय पुलिस पदक मिल चूका था। उन्होंने अपने बेटे के साथ बुलंदशहर में स्थापित मोटरसाइकिल शोरूम में हाथ बंटाने की सोची, लेकिन व्यापार और अफसरी में बहुत फर्क है, इसलिए थोड़े दिनों में ही उकता गए। अनिल ने शोरूम का नाम श्री दुर्गा मोटर्स और श्री दुर्गा ऑटोमोबाइल्स रखा, एक में हीरो हौंडा की एजेंसी थी और दूसरे में मारुती का ऑथोरिज्ड सर्विस स्टेशन। दुर्गाप्रसाद दादा जी का नाम था। इस बिजनेस के अलावा, देवर जी और पापा जी रिमझिम कॉलोनाइजर्स नाम से भी एक बिजनेस शुरू किया गया। जिसके मुनाफे से बुलंदशहर में कई प्लाट सेव किये गए और उनमे से एक पर हरी एन्क्लेव नामक कॉलोनी में एक खूबसूरत मकान बनाना शुरू हुआ। गाँव में रह रहे देवर देवरानी भी दो बच्चों के पेरेंट्स बन गए। और बुलंदशहर में अनिल शोभा भी दो बच्चों के पेरेंट्स बन गए। अजय और लतेश भी तीन बच्चों के पेरेंट्स बन गए। दुर्गा प्रसाद जिनके कोई भाई जीवित नहीं रह सका, और पापा जी, जिनके भी कोई भाई बहन जवानी नहीं देख सके, अब उनके परिवार में छह बगियाँ महक रही थीं. जब कभी सब लोग गाँव के घर में इकठ्ठा होते , प्रायः होली दिवाली पर तो जरूर या कभी किसी बच्चे का जन्मदिन मनाने के लिए , तो अपार सुख का अनुभव होता था। ऐसा प्रेममय परिवार और उसमे ढेरों किलकारियां शरारतें स्वर्गिक आनंद प्रदान करते थे। हमारे घर में चहल पहल से आस पड़ोस में भी चहल पहल हो जाती थी, कुटुंब के सब लोग चहक जाते। चलिए अब लौटते हैं सहारनपुर - नहीं नहीं , सहारनपुर नहीं , ज्योतिपुरम क्योंकि मैं तो बच्चों सहित वहीँ पर थी.एक दिन बहुत जोर का तूफ़ान आया, उस तूफ़ान में हमारे क़्वार्टर की छत उड़ गयी.छत ही नहीं बहुत सारा सामान , खास तौर पर कपडे तो उड़ ही गए, तेज बारिश और ओलों ने हालत खराब कर दी। मैं , माँ और तीनों बच्चे नीचे वाले उन्ही मास्टर जी के घर में पहुंचे जिनके यहाँ हम आते ही रुके थे। जैसे तैसे रात कटी, दिन निकला तो स्कूल के ऑफिस पहुँच कर हमने राजी को फोन किया। तब राजी को घर पर भी लैंडलाइन की सुविधा मिल चुकी थी। सारा हाल बताया और कहा कि हम लोगों के जो भी कपडे वहां मिल जाएं सब लेते आओ, हमारे कपडे भी उड़ गए हैं.तीसरे दिन राजी दो अटैचियों को ढोते हुए पैदल पैदल दिन छिपने के काफी बाद ज्योतिपुरम पहुंचे। हुआ यूँ कि रियासी तक तो उन्हें साधन मिल गए, लेकिन दिन छिपने के समय ज्योतिपुरम के लिए कोई साधन नहीं मिलता था। रियासी से चढ़ाई पर लगभग ७, ८ किमी पर ज्योतिपुरम था। तो बारिश के मौसम में ठण्ड में ठिठुरते राजी वहां पहुंचे हम सब लोग एक कमरे में थे और दुसरे कमरे में मास्टरजी का परिवार था। उस दिन राजी ने पहली बार कहा, कि मैं भी केंद्रीय विद्यालय में अध्यापक पद के लिए अप्लाई कर देता हूँ, ये संभव नहीं है कि मैं राज्यसरकार की नौकरी करू और तुम भारत भर में कहीं भी.शायद उस दिन वो खिन्न थे. मैंने कहा कि लेकिन अब आप चालीस के हो रहे हो , अब केंद्रीय विद्यालय में जॉब कैसे मिलेगा, वो उसी खिन्नता में बोले कि तो क्या हुआ, मैं हाउस हस्बैंड बन कर बच्चे पालूंगा , तुम नौकरी करना. कुछ टूशन से कमा कर आर्थिक योगदान भी कर दिया करूंगा। मुझे कई बार धोखा हो जाता है कि राजी सीरियस्ली कह रहे हैं या व्यंग्य कर रहे हैं, इनकी बातचीत की शैली ऐसी ही है। हम लोगों ने प्रिंसिपल से बात की, उन्होंने कहा कि क्वार्टर चाहे आपका हो या कोई खाली पड़ा हुआ, रहने लायक बनाने में सप्ताह भर तो लगेगा। तो मैंने छुट्टी की मांग रख दी कि जब तक मकान की व्यवस्था हो, तब तक छुट्टी दे दीजिये , जब व्यवस्था हो जाएगी तो आप फोन कर देना और मैं आ जाऊंगी. मैंने उन्हें हमारा सहारनपुर का घर का लैंडलाइन नंबर दे दिया और फिर हम सब सहारनपुर के लिए चल दिए. मास्टर जी ने कहा कि आपके सामान को हम संभाल कर रखेंगे और मकान ठीक होते ही आपको फोन कर देंगे। सहारनपुर में बात फिर वही छिड़ी जो ज्योतिपुरम में अधूरी रह गयी थी। मैंने सोच समझ कर कहा कि बच्चों को अफसर के बच्चे कहलवाना ठीक होगा या मास्टर के, बच्चों के व्यक्तित्व पर पृष्ठभूमि का असर पड़ता है, इसलिए मैं केवल तभी नौकरी करूंगी जब मुझे आपके पास ही पोस्टिंग मिले। तो तय हो गया कि बच्चे अब राजी के साथ ही रहेंगे, और अगर जाना पड़ा तो मैं अकेली जाऊंगी.इस निर्णय के हो जाने के बाद हम एयरफोर्स स्टेशन सरसावा के केंद्रीय विद्यालय गए जो सहारनपुर से १२ किमी पर था, मैंने अपना ID दिखाया , प्रिंसिपल को पूरा परिचय दिया और नमित और अमित का एडमिशन स्टाफ कोटे में सरसावा में हो गया। लगभग एक महीने बाद प्रिंसिपल का ज्योतिपुरम से फोन आया तो मैंने उनसे मना कर दिया और कहा कि मैं लम्बी छुट्टी की एप्लीकेशन भेज रही हूँ. और रिक्वेस्ट की, कि अगर मेरा ट्रांसफर हो सके तो कृपया अड़ंगा मत डालियेगा। वो भले आदमी थे उन्होंने कहा ठीक है ; उधर मास्टर जी का भी फोन आया उन्हें मैंने कह दिया जो सामान आपके लायक हो, इस्तेमाल कर लीजिये , अब मैं नहीं आऊंगी। मैंने राजी से कहा कि बस एक बार और, आप कोशिश कर लो कि अगर मेरा ट्रांसफर सरसावा हो जाए तो। वे बोले, हाँ जैसे मैं तो सदा सहारनपुर में ही रहूंगा, फिर मेरा ट्रांसफर होगा फिर या तो अपने ट्रांसफर को रुकवाने की या तुम्हारे करवाने की कोशिस में ही जिंदगी काटनी पड़ेगी , मेरे बस की ये बात नहीं है।" लेकिन अभी तो मुझे और परेशान होना था और राजी को भी परेशान करना था..... शेष अगली कड़ी में" घोस्ट कथा - ३० " विराज के साथ माँ को वापस अपने मूल गाँव पहुंचवा दिया, और मैंने मन बना लिया कि अब नौकरी करने की बात नहीं सोचूंगी, राजी क्लास वन अफसर है , पर्याप्त वेतन है, सब सुविधाएं सरकार से उपलब्ध हैं, और राजी की कार्यशैली अपना प्रभाव दिखा रही है, वह यहाँ भी डीएम और CDO के चहेते बने हुए हैं, जनता भी इन्हें पसंद करने लगी है. तो अभी गृहणी बन कर रहना ही मेरी नियति है. समय अच्छे से बीतना शुरू हुआ था कि ६ दिसंबर १९९२ को प्रदेश में बवंडर आ गया। ७ दिसंबर हमारी शादी की साल गिरह थी, लेकिन उस दिन वो आखरी सालगिरह हो सकती थी, सुबह ६ बजे मुझे फोन की घंटी सुनाई दी, राजी उठे और मैं नींद में ही थी कि राजी बोले मैं जा रहा हूँ डीएम ने बुलाया है, मुझे पता नहीं क्यों खतरा महसूस हुआ , मैंने कहा अपनी पिस्टल लेते जाओ और उन्होंने मेरी सलाह मान ली। .... लगभग दोपहर ११ बजे ये लौटे, तो इनकी जिप्सी का फ्रंट शीशा टूटा हुआ था, इनके ड्राइवर ने पूरी घटना बताई, कि कैसे सर ने भीड़ का हमला होने पर फायर करके खुद को और स्टेनो को और मुझे बचा लिया वरना आज तो तीनों की जली हुई लाशें ही मिलतीं। खैर , घटना का विस्तृत वर्णन देने की जरूरत नहीं क्योंकि मुझे पता है कि राजी आप लोगों को अपने बहुत से किस्से पहले ही सुना चुके हैं, तो सहारनपुर दंगों का भी जरूर सुना रखा होगा। तो ये ईश्वरीय प्रेरणा ही थी कि मैंने सुबह उन्हें जाते समय पिस्तौल ले जाने को कहा था , जो उनकी रक्षक बन सकी. सहारनपुर की कई बातें मुझे अच्छे से याद हैं, राजी ने घर के सामने बने बैडमिंटन कोर्ट में अपना खेल शुरू किया, इस कोर्ट में अफसर और बैंक अधिकारी आते थे। उनके आने से पहले बच्चे भी खेलते थे. राजी शादी से पहले खिलाड़ी भी रह चुके थे तो उनका पुराना शौक फिर जाग गया, उन्होंने दोनों बड़े बेटों को भी बैडमिंटन खेलना सीखा दिया, बैंक ऑफ़ बड़ोदा के मैनेजर इनके साथ खेलते थे, खेल के बाद सामने ही घर होने के कारण कुछ लोग घर भी आ जाते थे, मैं उन्हें चाय पिलाती थी.एक दिन मैनेजर साब से इन्होने पूछा कि कम्प्यूटर लेना चाहते हैं, क्या लोन मिल सकता है, उन्होंने कहा कि कल ब्रांच आ जाइएगा. इस प्रकार हमारे यहाँ १९९३ में पहली बार कंप्यूटर आया, राजी एक डेडिकेटेड लर्नर हैं. इन्होने dos, dBase और जाने कौन कौन सी किताबें मंगा ली, और पूरी पूरी रात कंप्यूटर पर जाने क्या क्या सीखते और प्रैक्टिस करते रहते। उनकी अनुपस्थिति में दोनों बड़े बच्चों को भी कंप्यूटर का चस्का लग गया और उनकी मदद की, राजी के ऑफिस से लगे हुए हिल्टॉन नामक कंपनी की ब्रांच हेड ने। वो तो इतना प्रभावित हुआ नमित से कि मात्र १२ वर्ष की आयु में उसे उन्होंने अपने केंद्र पर आने वाले बच्चों को कंप्यूटर सिखाने के लिए हायर करने की पेशकश कर दी , जिसे हमने ठुकरा दिया। दो और युवकों को राजी बहुत सप्पोर्ट करते थे। एक गंगोह के अजय सैनी, जिन्हें उन्होंने मौन पालन का प्रशिक्षण दिलाया और उनके गांव रंगेल में एक सरकारी मौनपालन प्रशिक्षण केंद्र खुलवाया, आज अजय सैनी भारत के शीर्ष मौनपालन विशेषज्ञ हैं। दुसरे थे देवबंद के पास के गाँव के राजेंद्र सिंह राणा , जो उस समय कॉलेज से ग्रेजुएशन करके निकले ही थे और उनमे एक युवा नेता के गुण थे। वह अक्सर राजी के पास आ जाते थे, और राजी उन्हें लोगों का दिल जीतने के नुस्खे सिखाते थे। आगे चलकर वो उत्तर प्रदेश में दो तीन बार मंत्री रहे, लेकिन अफ़सोस कि राह भटक गए और धारा के साथ बहने वाले नेता बन कर रह गए, बिना ५० साल पूरा किये (शायद) हृदयाघात से वे चल बसे। राजेंद्र राणा ने एक दिन बातों बातों में बताया कि अर्जुन सिंह केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री के वह बहुत निकट है. मेरे अंदर सोई हुई, केंद्रीय विद्यालय ज्योतिपुरम से ट्रांसफर कराने की इच्छा फिर जग गयी। मैंने कहा भैया, हमारा एक छोटा सा काम उनसे करा सकते हो क्या ? वो गर्व से बोले कि बिल्कुल क्यों नहीं भाभी जी। राजी ने मुझे घूर कर देखा तो मैं चुप हो गयी. राजेंद्र राणा भांप गए, भाभी जी आप भाई साब की तरफ मत देखो मुझे बताओ। तब राजी खुद ही बोल पड़े कि तुम्हारी भाभी केंद्रीय विद्यालय की टीचर हैं और ज्योतिपुरम से सरसावा ट्रांसफर कराना चाहती हैं. उसने विश्वास पूर्वक कहा कि हो जाएगा। लगभग पंद्रह दिन बाद मेरा ट्रांसफर ज्योतिपुरम से सरसावा तो नहीं हुआ , लेकिन आर्डिनेंस फैक्ट्री मुरादनगर के केंद्रीय विद्यालय में हो गया , वहां के अलावा कहीं संस्कृत अध्यापक की पोस्ट खाली ही नहीं थी, ऐसा राजेंद्र राणा ने बताया। मुझे ख़ुशी हुई कि चलो उत्तर प्रदेश में तो आ गयी। अब मैंने मौका देखकर कई बार टोका कि मुझे ज्वाइन कराने ले चलो या किसी को मेरे साथ भेज दो, और अपना ट्रांसफर गाजियाबाद के लिए मांग लो, अगर हो गया तो गाजियाबाद से मुरादनगर तो आसानी से आया जाया जा सकता है। मन मसोस कर राजी मुझे मुरादनगर ज्वाइन कराने ले गए, वहीँ इत्तेफाक से पता चला कि बालैनी इंटर कॉलेज में राजी के प्रिंसिपल जो कि इनके सगोत्री थे, की बेटी का घर वहीँ स्कूल के पास है, एक टीचर हमें वहां ले गयी , उन्होंने अपने यहाँ एक कमरा हमें दे दिया कि आप यहाँ रहो , स्कुल भी वाकिंग दूरी पर है। मुझे लगा कि सब काम अनुकूल होते जा रहे हैं। लेकिन राजी अपने ट्रांसफर की अप्लीकेशन देने को तैयार नहीं हुए.कह दिया जब जहाँ होगा देखा जाएगा। मैं क्षितिज के साथ मुरादनगर शिफ्ट हो गयी, बड़े दोनों बेटे सहारनपुर में ही बने रहे। लेकिन मेरा मन मुरादनगर में लग नहीं रहा था। मैंने एक महीना वहां काटा और वहां से पहला वेतन मिलते ही छुट्टी लेकर सहारनपुर आ गयी। फिर छुट्टी बढ़ाने की एप्लीकेशन भेजती रही। दो साल सहारनपुर में बीतने के बाद राजी का ट्रांसफर उसी पद पर बुलंदशहर हो गया। काश गाजियाबाद हुआ होता। मैंने बुलंदशहर से गाजियाबाद , और गाजियाबाद से मुरादनगर बसें बदल बदल कर नौकरी जारी रखने की भी कोशिश की, लेकिन बहूत दूर पड़ जाता था और थका देता था। समय भी बहुत बर्बाद होता था, बुलंदशहर में केंद्रीय विद्यालय का नया भवन बन चूका था, दोनों बेटों को वहां एडमिशन मिल गया. नमित ११ वीं में आ गया था उसने सरसावा में दसवीं में प्रथम स्थान प्राप्त किया था, इस से उसे इस स्कूल में विशेष सम्मान मिला, और अमित आठवीं में आ गया था, उसे भाई की छाया मिली। फिर उस विद्यालय में उनकी चाची भी टीचर थी। मैंने फिर लगातार छुट्टी ली और मेरे प्रिंसिपल ने मेरा केस मुख्यालय को रेफेर कर दिया और मुझे नोटिस आने लगे, मैंने किसी नोटिस का जबाब नहीं दिया; राजी ने और सहयोग करने को साफ़ मना कर दिया,वार्ना मैं चाहती थी कि एक कोशिश और कर लो , मुरादनगर से बुलंदशहर ट्रांसफर ज्यादा मुश्किल नहीं होगा सेम रीजन है। पता नहीं मेरी दुआओं का असर था कि कुछ और, साल भर में ही गाजियाबाद के पी डी का ट्रांसफर बुलंदशहर हो गया, और राजी का ट्रांसफर गाजियाबाद को हो गया। मुझे तो मन मांगी मुराद मिल गयी। उन्होंने ज्वाइन कर लिया, और गाजियाबाद से आये इनके रिप्लेसमेंट तेजपाल सिंह को जब तक उनके ठहरने की व्यवस्था हो तब तक अपने घर में रहने का ऑफर दे दिया, खुद राजी गाजियाबाद में सरकारी गेस्ट हाउस में रुके। लेकिन ये व्यवस्था जल्द ही भंग हो गयी जब सरकार गिर गयी और राज्यपाल का शासन हो गया। पिछले एक महीने में किये गए सब तबादले रद्द कर दिए गए। लेकिन एक गड़बड़ ये हुई कि राजी का तो उसी पद पर वापस तैनाती हो गयी जो वह छोड़ कर गया था लेकिन तेजपाल सिंह को डीएम गाजियाबाद ने अपने DO के माध्यम से गाजियाबाद भेजने से मना कर दिया तो उन्हें बुलन्दशहर में ही जिला विकास अधिकारी का पद दे दिया गया जो संयोग से खाली था। तो इस प्रकार मेरी नौकरी फिर से शुरू होते होते रह गयी। बुलंदशहर में चार साल और बीत गए, तेजपाल सिंह के रूप में राजी ने अपने घर में एक विषैला सांप रख लिया था , ये आगे चलकर राजी के लिए घातक हुआ जिसका जिक्र राजी ने जरूर अपनी किसी पोस्ट में विस्तार से किया होगा, कि कैसे उन पर हमला हुआ, हड़ताल हुई, वगैरा । राजी के विरुद्ध तरह तरह के शिकायती पत्र अलग अलग स्तर पर गए, आयकर , विजिलेंस, एंटी करप्शन सब विभागों से जांच हुई , और राजी इन सब से जब बेदाग़ निकल गए तो राजी ने नौकरी छोड़ने का मन बनाया कि वो किसी सरकारी नौकरी के लायक ही नहीं हैं। ऐसे में के के सक्सेना ने फिर इन्हें संभाला और कहा कि विजयी होने के बाद रण छोड़ने का तो कोई औचित्य नहीं है।इस दौरान एक सांसद प्रतिनिधि के फ्रॉड को सामने लाने की सजा राजी को बलिया ट्रांसफर के रूप में मिली । जांचों में आरोप मुक्त हो जाने के बाद सांसद जाकर मुख्य सचिव के पास बैठ गए, उन्हीं की पार्टी की सरकार थी रो मुख्य सचिव ने राजी का दूरस्थ ट्रांसफर करने का निर्देश फोन पर दिया और दूसरी और डीएम बुलंदशहर रजनीश गुप्ता, जो खुद भी ईमानदार अधिकारी थे ,को भी फोन किया कि ट्रांसफर आर्डर आते ही इन्हें रिलीव किया जाए , रजनीश गुप्ता ने कोशिश की कि बता सकें कि गलती सांसद के आदमी की है, लेकिन मुख्य सचिव क्या जाने एक मामूली पीडी को। इस बीच दोनों बड़े बेटे IIT रूडकी में पढ़ रहे थे एक का अंतिम वर्ष था और दुसरे का प्रथम। हमारे पास एक मारुती -८०० कार भी आ चुकी थी। तो राजी मैं और क्षितिज कार में जरुरी सामान लेकर निकल पड़े बलिया के लिए जहाँ राजी को फिर से प्रोजेक्ट डायरेक्टर के पद का कार्यभार संभालना था। रस्ते में हम लखनऊ रुके , फिर आजमगढ़ रुके और तीसरे दिन पूरे परिवार सहित ऑफिस पहुँच गए। स्टाफ बहुत अच्छा था , तुरन्त हमारी सुविधाओं के आयोजन में जुट गया। क्षितिज का एडमिशन संत जोसेफ स्कूल में करा दिया। सेटल हो जाने के बाद अगले महीने दो दिन की छुट्टी पड़ी तो हम पर्यटन के लिए कार से बनारस के लिए निकल लिए। सारनाथ , बनारस घूमे। लेकिन जब वापस बलिया के लिए चले तो भयंकर अंधड़ आया। हमारी कार को जैसे पीछे से धक्का लग रहा हो, हमारे पीछे पीछे पेड़ और पेड़ के डाले टूट टूट कर सड़क पर गिर रहे थे, जैसे पेड़ों और उनके डालियों की हम से होड़ लग रही हो कि कार को अब पकड़ा तब पकड़ा. शिव बाबा की कृपा रही कि उस मार्ग पर गिरे कुल १५० पेड़ों में से एक भी हमारे ऊपर नहीं गिरा, अगले दिन अख़बारों की ख़बरें पढ़ कर हमने काशी विश्वनाथ जी का आभार व्यक्त किया, जिनके दर्शन हम ने पहली बार किये थे। बलिया को लोगों ने बेकार ही बदनाम कर रखा है, बलिया के नेताओं में अलग अलग दल में होते हुए भी बहुत एकता है, एक दिन ग्राम्य विकास मंत्री वहां पधारे , सारे विधायकों ने उनसे भेंट की और सबने सिफारिश की, कि हमारे पी डी साहब पश्चिम के हैं, यहां की भाषा नहीं समझते, बेचारे भले आदमी हैं , इन्हें कहीं पश्चिम में ही भेज दीजिये। असल कारण ये था कि राजी की कार्यशैली वहां के ठेकेदारों/उनके संरक्षक नेताओं को रास नहीं आ रही थी.हमें बलिया में केवल ढाई महीना ही हुआ था कि राजी का तबादला फिर उसी पद पर बिजनौर कर दिया गया। बुलंदशहर , बलिया , बिजनौर, इस ब अक्षर में कुछ तो आकर्षण रहा होगा।" ....जारी है। ..... ोस्ट कथा - ३१ हम तीनों यानि मैं राजी और हमारा छोटा सा बेटा क्षितिज फिर अपनी मारुती - ८०० में अपने जरुरी सामान को लाद कर वापस बुलंदशहर आये, हमारे पापा जी, हमारे हरि एन्क्लेव के नए मकान में रह रहे थे। तो मुझे और क्षितिज को वहां छोड़ कर राजी बिजनौर अपनी नयी पोस्टिंग पर ज्वाइन करने चले गए. कह गए कि मकान का इंतजाम होने के बाद हमें ले जायेंगे। वहां उनके जिलाधिकारी देवदत्त थे जो पहले बुलंदशहर में भी उनके डीएम रह चुके थे, जिनके बुलंदशहर में रहते हुए, राजी के पक्ष में तीन दिन राजकीय कार्यालयों में हड़ताल हो आई थी , उस प्रकरण को राजी आप लोगों को अपनी किसी पोस्ट में जरूर बता चुके होंगे। देवदत्त जी खुद कैसे भी रहे हों लेकिन राजी का सम्मान करते थे। मैंने राजी के साथ रहते हुए देखा है कि ईमानदार अफसर को उनके सीनियर्स या जूनियर्स पसंद करें या न करें, उनसे डरते हैं या उनका सम्मान करते हैं . उन्हें मकान तो तुरंत अलॉट हो गया, लेकिन उसी समय एक मीटिंग में कुछ गर्मागर्मी हो गयी, और राजी मीटिंग में ही अपना इस्तीफ़ा लिखकर अपने सीडीओ को देकर मीटिंग से चले आए। बाद में जिला विकास अधिकारी खंडूरी जी ने मुझे सारा किस्सा बताया, कि कैसे सीडीओ ने खंडूरी जी को और दो और अफसरों को राजी को ढूंढने भेजा और वे राजी को ढ़ूंढ़त ढूंढते मीरापुर के पास एक बस में से खुशामद कर के और ये डर दिखाकर कि सीडीओ साहब को हार्ट अटैक आया है, वापस बिजनौर ले गए। खैर उसके बाद शशिकांत शर्मा, सीडीओ से राजी के पूरे कार्यकाल बहुत अच्छे सम्बन्ध रहे, मैं और क्षितिज भी बिजनौर पहुँच गए और इस बार पापा जी ने हमें पूरे साजो सामान के साथ ट्रक के साथ विदा किया, हमारे देवर मुन्ना भी हमारे साथ गए और हमारे घर को सेट कराने में मदद की. बिजनौर का कार्यकाल यद्यपि दो ही वर्ष का था, लेकिन यहां हमारी ऑफिसर्स कॉलोनी की बनावट ऐसी थी जैसे गांव की बक्खल होती हैं.ऑफिसर्स क्वार्टर्स के बीचों बीच एक पार्क था, जैसे बक्खल के बीच कॉमन आँगन होता है। ऑफिसर्स में आपस में पारिवारिक माहौल था, प्रायः सप्ताह में एक दिन हम सब किसी एक के घर में सामूहिक भोज करते थे, अपने अपने घर से डिशेस बना कर भी लाते थे और होस्ट के घर में भी खाना बनाने में मदद करते थे। पूरे सेवाकाल में इतना अच्छा माहौल और कहीं नहीं मिला। मुकेश कुमार शर्मा, शोरज सिंह , जयशंकर तिवारी, राकेश गोयल, भट्ट साब , सक्सेना कई नाम मुझे याद आ रहे हैं जिनसे बहुत घनिष्टता हम लोगों की थी। और शायद ये सभी अपने अपने क्षेत्र में तरक्की करते हुए शीर्ष पदों तक पहुंचे। ऐसा लगता है कि सारे अच्छे स्वभाव के ऑफिसर्स भगवान् ने एक साथ एक जगह इकट्ठे कर दिए थे। पता नहीं वे लोग अब कहाँ हैं, पर जहाँ होंगे अच्छे ही होंगे। यहाँ एक उपलब्धि और हुई कि मैंने अपने गुरुकुल में जो यज्ञ हवन सीखे थे , उनमे मेरी फिर से रूचि जाएगी और मैंने अपने नए बने परिवार जनों (ऑफिसर्स फॅमिली ) के साथ हर रविवार यज्ञ करना शुरू कर दिया। दो ही रविवार गुजरे थे कि बिजनौर जनपद के सबसे दबंग माने जाने वाले एक विधायक स्वामी ओमवेश हमारे घर यज्ञ के समय आ गए, पता नहीं उन्हें कहाँ से पता चला कि यहाँ हर रविवार यज्ञ होता है, उन्होंने कहा कि बहन जी , अब से आपके यहाँ हर रविवार मैं यज्ञ करा करूंगा, और उन्होंने हर रविवार तो नहीं लेकिन कई बार हमारे यज्ञ में पुरोहित की भूमिका निभाई। स्वामी ओमवेश से अधिकतर अधिकारी डरते थे और वे स्वयं मेरे राजी के प्रशंसक थे। एक और विधायक जो बाद में मंत्री भी बने, मूलचंद चौहान भी राजी के बड़े प्रशंसक थे। दोनों ही विधायक बहुत ईमानदार थे। इन दिनों मैं सोशली बहुत एक्टिव हो गयी थी , डीएम मुकुल सिंघल की पत्नी की अध्यक्षता में एक NGO (आकांक्षा समिति ) की डिस्ट्रिक्ट ब्रांच थी मैं उसकी सेक्रेटरी बन गयी, और हम लोगों ने परिवार नियोजन , प्रौढ़शिक्षा और पर्यावरण सुधार जैसे कई कार्यक्रम आयोजित किये। ऐसे ही एक कार्यक्रम की एक बार मुख्य अतिथि सुष्मा स्वराज भी थीं, उनके साथ फोटो खिंचवाना,हमें ऐसा लगा जैसे कोई डिग्री हासिल कर लिये हो। वह बहुत मधुर स्वभाव की थीं। एक दिन शाम को घर पर एक फोन आया उसके बाद राजी जोर से हँसते हुए मेरे पास आये, मैंने कहा-क्या हुआ ? बोले कि किसी फ्रॉड का फोन था, कह रहा था कि मंत्री शिवपाल जी का पीए बोल रहा हूँ, आपका नाम आईएएस के लिए स्टेट सर्विसेज के लिए पैनल लिस्ट में आया है, ५० लाख का इंतजाम कर लीजिये तो आपको आईएएस में स्टेट सर्विस कोटा में रेकमंड कर दिया जाएगा. मैंने कहा कि क्या पता कि सही में आपका नाम गया हो , तो वो बोले कि पचास लाख जानती हो कितने होते हैं , मैं तो पचास हजार भी न दूँ। मैं चुप हो गयी। तीन दिन बाद फिर एक फोन आया, इस बार उसने कहा कि मंत्री जी ने याद किया है, तो ये बोले कि कृपया फैक्स भिजवा दीजिये, उधर से उसने क्या कहा पता नहीं, लेकिन ये उखड़ गए और बोलने लगे , न तो मैने किसी से बिजनौर की पोस्टिंग की रिक्वेस्ट की और न ही पी डी की पोस्टिंग मांगी , जहां भेजना हो भेज दो। मैं इन्हें गुस्सा नहीं देखना चाहती थी, क्योंकि इनके गुस्से का असर और पर उतरता था। तो मैं ने कहा कि परेशान मत होइए, मुझे बताइये , क्या कहा उसने , बोले होगा कोई फ्रॉड, कह रहा था कि सवा लाख रूपये लेकर आने को कह रहा था। आजकल ठगी के नए नए धंधे चल गए हैं। लेकिन चार दिन बाद राजी का ट्रांसफर जिला विकास अधिकारी के पद पर इटावा कर दिया गया। राजी चार्ज सर्टिफिकेट तैयार कर के सीडीओ के पास गए, सीडीओ उन्हें साथ लेकर जिलाधिकारी के पास गए, तो उन्होंने कह दिया कि जब तक रिप्लेसमेंट नहीं आता तब तक रिलीव नहीं किया जाएगा। ये भी कहा कि रुकवाने की कोशिश क्यों नहीं करते, लखनऊ चले जाओ। राजी ने मना कर दिया कि ये उनके सिद्धांत के विरुद्ध है , जहाँ होगा वहीँ काम करना है। खैर रिप्लेसमेंट आ गया, चूँकि क्षितिज का स्कूल बीच में नहीं छोड़ा जा सकता था, इसलिए हम बिजनौर में रुके रहे और राजी इटावा चले गए। लेकिन महीने भर में ही वापस आ गए, मैंने सोचा कि हम लोगों को ले जाने आये हैं तो मैंने पहले ही कह दिया कि अभी सामान बाँधने को मत कहना, बच्चे के इम्तेहान हो जाने दो। वो हँसे और बोले कि मैं लखनऊ सहायक आयुक्त पद पर ज्वाइन करके आया हूँ, मंत्री जी इटावा आये थे, मैंने उन्हें निरीक्षण भवन पर अटेंड किया, ड्यूटी थी, उन्होंने परिचय पूछा, तो उन्होंने कहा कि अरे आप तो हमारे विभाग की शान हैं, हम चाहते हैं कि आप मुख्यालय पर रहकर विभाग की सेवा करे। तो उन्होंने मुझे मुख्यालय पर बुला लिया है। रविवार को यज्ञ पर विधायक द्वय आये दोनों उस समय एक ही राजनीतिक दल में थे. मूलचंद चौहान ने एक चाबी जेब से निकाल कर राजी को दी और कहा कि लखनऊ में अभी मकान तो नहीं मिला होगा , जल्दी मिलेगा भी नहीं मांग ज्यादा और मकान कम हैं , ये लो मेरे फ्लैट की चाबी, मैं तो ज्यादातर धामपुर में ही रहता हूँ, सत्र के समय ही जाता हूँ। वहां मेरा एक सहायक मिलेगा , मैं उसको बोल दूंगा वह आपके भोजन की व्यवस्था कर देगा, राजी ने न न करते करते चाबी ले ली। स्वामी जी ने भी कहा कि मेरा फ्लैट तो खुला ही रहता है , वहां भी रह सकते हो लेकिन वहां भीड़ बहुत रहती है, कोई न कोई पड़ा ही रहता है। राजी दो दिन बाद चले गए। बीस दिन बाद फिर वापस आ गए, मैंने कहा की सब ठीक तो है, बोले - वहां कोई काम ही नहीं है , कमिश्नर के विजिटिंग रूम में बैठा रहता हूँ, कभी कक्ष और सीट भी अलॉट नहीं हुई है। तो एक दिन मैंने कमिश्नर साहब से कहा कि सर अगर मेरी कोई जरूरत तत्काल न हो तो मुझे छुट्टी दे दीजिये ताकि बच्चे बिजनौर में अकेले हैं, उन्ही के देखभाल कर लूँ , उन्होंने सहर्ष छुट्टी दे दी , और कहा कि अपना नंबर सेक्शन अफसर को देते जाना, तो मैंने कहा कि सर पर्सनल नंबर तो नहीं है लेकिन DRDA बिजनौर के माध्यम से मुझे खबर मिल जाएगी , तो बोले जब तुम्हारे लिए व्यवस्था हो जाएगी, हम बता देंगे, तब तक एन्जॉय विद फॅमिली। अब मुझे आनंद ही आनंद था, राजी सारा दिन घर में रहते बच्चे को स्कूल छोड़ने जाते , लेने जाते, घर के काम में हाथ बंटाते। पुराने मित्र अफसरों का शाम को जमावड़ा भी लगता। दो महीने इस प्रकार कटे। तब एक दिन खबर आई कि राजी का जिला विकास अधिकारी मुजफ्फरनगर के रूप में ट्रांसफर हो गया है। मुजफ्फरनगर उनदिनों टिकैत के कारण हॉट माना जाता था, कोई अफसर वहां की पोस्टिंग नहीं चाहता था और जिला विकास अधिकारी का पद कई महीने से रिक्त चल रहा था। राजी लखनऊ गए , सामान तो वहां कोई था ही नहीं विधायक जी की चाभी उनके केयर टेकर को दे कर और मुख्यालय से रिलीव हो कर आ गए और अगले दिन जाकर मुजफ्फरनगर में DDO पद पर ज्वाइन कर लिया। अगले सप्ताह हम लोगों को भी ले गए। वहां बच्चे का मन नए स्कूल में बिलकुल नहीं लगा और वो बीमार रहने लगा, डॉक्टर को दिखाया तो उसने कहा कि शायद बच्चे को मानसिक आघात है, इसके स्कूल जल्दी जल्दी बदले जा रहे हैं। हमने कहा कि कुछ कुछ ऐसा है तो. तो उन्होंने कहा कि फिजिकली तो ये ठीक है, तो तय हुआ कि हम वापस इसको इसे पुराने स्कूल ले जाते हैं। और मात्र दो महीने मुजफ्फरनगर में रह कर मैं और क्षितिज वापस बिजनौर शिफ्ट हो गए, क्षितिज वापस अपने पुराने स्कूल में आ गया , जहां छोटी सी उम्र में वह सब टीचर्स का चहेता रह चुका था। मॉडर्न एरा उस स्कूल का नाम है। राजी हर सप्ताह हम से मिलने आ जाते थे. एक दिन मुजफ्फरनगर में ग्राम्य विकास मंत्री आये हुए थे, राजी ने बताया कि मंत्री जी बालैनी में उनसे दो क्लास सीनियर थे, उनके गांव के पास के थे, उस नाते वह उनसे मिला और उन्हें उनके बचपन की याद दिलाई तो वे बड़े खुश हुए, और उन्होंने कहा कि उन्होंने अच्छे अफसर के रूप में राजी का नाम तो सुन रखा था लेकिन वो बचपन के साथी हैं ये याद नहीं था। उन्होंने कहा कि तुम वही हो न , जो पूरे स्कूल में अकेले चश्मा लगाते थे। यानि उन्हें याद था। राजी ने उनसे हिम्मत करके कह दिया कि अगर संभव हो तो उसे वापस बिजनौर किसी भी पद पर कर दिया जाए तो बच्चे को देख सकेगा क्योंकि इस कच्ची उम्र में उसे पापा की भी जरूरत पड़ती है। उन्होंने आश्वासन दिया कि वो लखनऊ जा कर कुछ करेंगे। उन्होंने किया लेकिन अब राजी को और भी दूर भेज दिया पहले राजी को मुजफ्फरनगर से आने जाने में घंटा डेढ़ घंटा लगता था अब चार पांच घंटे। उन्हें मुरादाबाद का DDO बना कर ट्रांसफर कर दिया। अब राजी का हर सप्ताह हम से मिलना भी संभव नहीं रहा। घोस्ट कथा - ३२ (फिर कुछ छूटी कड़ियाँ) "इससे पहले कि मैं कुछ मुरादाबाद पोस्टिंग के बारे में लिखूं, कुछ छूटी बातें बताना चाहती हूँ। जब हम एग्रीकल्चर स्कूल में थे और किचेन गार्डन में अधिक दिलचस्पी लेते थे, एक दो महीने राजी भी फुर्सत में आ गए थे तब मैंने पहले मोपेड चलाना सीखा, और अपने देवर के शो रूम से एक मोपेड खरीदी। सब्जियां इतनी पैदा होती थी कि हर तीसरे दिन मैं मोपेड पर थैले लटका कर अपने देवर और अपने और राजी के साझे दोस्तों के यहाँ बाँट आती थी। इन्हीं साझी दोस्तों में से एक का इकलौता बेटा बाद में हमारा दामाद बना, अजय की छोटी बेटी की शादी उसके साथ हुई। फिर पापा की मारुती कार से मैंने ड्राइविंग भी सीखी , राजी जैसा ट्रेनर मुश्किल से मिलेगा , उसने बिना एक बार भी डांट लगाए मुझे कार चलाना सिखाया। एक दिन मैं और राजी किसी काम से गाजियाबाद जा रहे थे, सिकंदराबाद पर करते ही राजी को अचानक दिखाई देना लगभग बंद हो गया, उसने किनारे गाड़ी रोक ली, मैंने पूछा क्या हुआ, उसने कहा कि मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मैं किसी पतले पाइप में से देख रहा हूँ , आसपास कुछ नहीं दिख रहा। मैं डर गयी , मैंने पूछा कि क्या वापस चलें , राजी ने कहा कि वापस जाने में भी मैं तो गाडी नहीं चला सकूंगा। अच्छा हो कि तुम गाडी चलाओ और गाजियाबाद में किसी नेत्र विशेषज्ञ को दिखाएं। मैंने पहली बार गाडी मुख्य सड़क पर चलाई और किसी तरह डॉक्टर तक पहुँच गई। डॉक्टर ने देखा कि सही समय पर ले आये, ग्लोकोमा है , इंजेक्शन दिए, दवाई लिखी और कहा कि परमानेंट अँधापन भी हो सकता है, जल्दी ऑपरेशन कराना होगा.तब तक राजी को दिखने तो लगा था लेकिन दवा के असर से धुंधला दिख रहा था। मैं ही उनको वापस बुलंदशहर लाई. फिर अगले दिन इनके भाई इन्हें लेकर श्रॉफ आई सेंटर दिल्ली ले कर गए। इनका पहले लेजर से ऑपरेशन हुआ वो सफल नहीं हुआ, फिर दस दिन बाद ओपन ऑय सर्जरी हुई। दूसरी छूटीी हुई कड़ी , अनिल जिन्होंने मोटरसाइकिल का शो रूम खोला था, उनका एक अलुमनी मिलन समारोह में हुआ जिसमे उनके IIT के साथी या शायद MBA के साथी आये थे , अनिल भी गए थे, वहां से लौटे तो उन्हें लगा कि वह अपने साथियों से पीछे रह गए हैं। बी . टेकऔर MBA दोनों डिग्री धारण करने वाले उनदिनों कम ही थे, तो उन्होंने विदेश जाने की सोची और कुछ ही महीनों में उन्हें लॉन्ग टर्म वीसा ऑस्ट्रेलिया का मिल गया। वे सपरिवार ऑस्ट्रेलिया चले गए, यद्यपि उन्हें वहां शुरू में काफी दिक्कतें हुई लेकिन वे डटे रहे और अब वे और उनका परिवार वहीँ के नागरिक हैं। उनके छोड़े हुए बिज़नेस को सँभालने के लिए गाँव से मुन्ना भैया को बुलाया गया और वो अपने. खेती बारी और गाँव का डेरी और फर्टिलाइजर सेल का बिज़नेस बंद करके बुलंदशहर आ गए , ये उनके बच्चों की पढ़ाई का सही समय शुरू हुआ था, इसलिए उनके लिए ये एक गोल्डन अवसर था। जब अनिल ऑस्ट्रेलिया में जॉब पा गया और सेटल हो गया तो उसने पापा मम्मी को वहां आने के लिए कहा। और वे दोनों छह महीने के वीसा पर ऑस्ट्रेलिया गए, लेकिन मम्मी जी ने तीन महीने बाद ही वापस चलने की जिद की तो वे लौट आये. दिल्ली से उन्हें लाने के बाद बुलंदशहर में रोका गया लेकिन पता नहीं मम्मी जी को क्यों जल्दी थी, कि मुझे गाँव जाना है। उनकी जिद के आगे झुकना पड़ा। लेकिन वे बहुत स्वस्थ और प्रसन्न लग रही थीं, कहीं से बीमारी के कोई लक्षण भी नहीं थे। वे एकादशी का व्रत रखती थी और उस दिन घर में बने छोटे से मंदिर में बैठ कर पड़ोसन महिलाओं के साथ कीर्तन करती थी, वे नहा धोकर तैयार हुई , लेकिन कपडे पहनते पहनते पापा जी से बोलीं कि मुझे सीने में दम सा घुट रहा है , डॉक्टर को दिखा दो , पापा घेर (शहरी लोगों के लिए आउटहाउस) से कार लेने चले गए, लेकिन जब तक वे लौटे , तब तक मम्मी जी ने प्राण त्याग दिए थे। पापा जी ने फोन से बुलंदशहर सुचना देते हुए कहा कि मेरा महाजन चला गया। पहले तो हम समझे नहीं , फिर उन्होंने कहा कि आपकी मम्मी चली गयी। तब हम सब जो लोग भी बुलंदशहर में थे गाँव गए। राजी की आँखों का ऑपरेशन हुआ था, इसलिए अजय ने दाह की रस्म निभाई। ऑस्टेलिया से लौटने के एक माह से भी कम समय में वे दुनिया से अज्ञात लोक को लौट गयी, और भारतीय महिलाओं का वो वचन पूरा कर गई , कि जिस घर में डोली आई है , उसी से अर्थी निकलेगी। उन्हें ये संतोष था कि उनका जो बेटा, परिवार के शेष सदस्यों से बहुत दूर जा बसा था वह वहां सुखपूर्वक रह रहा था। " घोस्ट कथा - ३३ "मुजफ्फरनगर में जब हम लोग थे, तो मंडल स्तर पर जो मासिक बैठकें होती थी, तो उस समय कमिश्नर थे नवतेज सिंह, CDO मुजफरनगर हर्ष तन्खा थे , वो उस मीटिंग में अक्सर राजी को ही भेजते थे, खुद मीटिंग में जाना अवॉयड करते थे, कारण तो वही बेहतर जाने, लेकिन नवतेज सिंह जिनसे अक्सर अधिकारी बच कर रहते थे, वे राजी की बैठक में प्रस्तुति से प्रसन्न दीखते थे, बाद में वे रजिस्ट्री विभाग के महानिरीक्षक बन गए,यानि अजय के बॉस। अजय भी अपने विभाग में अपनी कार्यशैली और कानूनी समझ के बल पर रजिस्ट्री विभाग में राज्य भर में एक जाना पहचाना नाम बन चुके थे। और इस प्रकार अपने विभागाध्यक्ष के चहेते अधिकारी थे, एक दिन नवतेज सिंह इंस्पेक्शन पर बुलंदशहर आये , अजय की पोस्टिंग किसी पूर्वी जिले में थी, लेकिन वह छुट्टी लेकर बुलंदशहर आये हुए थे, हम लोग मुरादाबाद में थे.अजय को पता चला कि नवतेज सिंह बुलंदशहर आए हुए हैं तो वह शिष्टाचार वश उन्हें लंच पर घर ले गया, वहां पापा जी ने मौके का फायदा उठाने की सोची और लंच पर नवतेज सिंह से कह दिया कि अब मैं बूढा हूँ मेरी सेवा के लिए मेरे बेटे की पोस्टिंग बुलंदशहर कर दो, इतनी दूर भेज रखा है आपने। नवतेज सिंह ने कहा, अरे पापा जी, बिलकुल आपकी बात सर माथे। नवतेज सिंह बुलंदशहर से मुरादाबाद पहुंचे और इंस्पेक्शन हाउस से राजी को बुलवा लिया। .... यहां ये बता दूँ कि मुरादाबाद में राजी की पोस्टिंग के महीने भर बाद ही CDO मुरादाबाद का ट्रांसफर हो गया था और जाते जाते वो अपना चार्ज राजी को ही दे गए थे, हर जिले की तरह यहाँ भी डीएम राजी के बारे में बहुत सकारत्मक राय रखते थे, इसलिए उन्होंने किसी ADM को CDO का चार्ज न दे कर DDO पर ही बने रहने दिया , ऐसा प्रायः नहीं होता। उसके बाद एक नए आईएएस अफसर रवींद्र CDO की नियुक्ति हुई तो उन्हें भी डीएम ने बता दिया कि उनका DDO उनके लिए एसेट है, आपकी अच्छी ट्रेनिंग हो जाएगी। इसलिए रवींद्र भी राजी को हर समय अपने साथ रखते थे. नवतेज सिंह का फोन भी उन्होंने ही उठाया था, तो उन्हें थोड़ा आश्चर्य हुआ कि नवतेज जैसा अफसर DDO को क्यों बुला रहा है, राजी ने सारा किस्सा शाम को घर आने पर बताया कि हमारे मंत्री जी तब से नवतेज सिंह के दोस्त हैं जब नवतेज गाजियाबाद के डीएम थे. इन मंत्री जी ने राजी का ट्रांसफर मुजफ्फरनगर से मुरादाबाद किया था और अब उन्होंने मुरादाबाद से बुलंदशहर कर दिया था.जब मंत्री कुछ करना चाहता है तो मिनटों में सब काम हो जाता है, उसी दिन नवतेज ने मंत्री जी को मुरादाबाद से फोन किया अपने स्टेनो से राजी के नाम से अप्लीकेशन टाइप करवाई , फैक्स किया और दो घंटे के अंदर राजी का स्वयं के अनुरोध पर मुरादाबाद से बुलंदशहर DDO के पद पर ट्रांसफर हो गया। मैंने राजी से कहा कि आपने अप्लीकेशन क्यों दी , राजी ने कहा , कि तुम वहां होती तो तुम भी हस्ताक्षर कर देती , सारा ब्लेम तो तुम्हारे ही ऊपर है। मैं चौंकी, मुझ पर कैसे। राजी ने बताया कि कमिश्नर साब मुझे सहारनपुर से जानते हैं और अजय के बॉस हैं, पापा ने उनसे अजय के ट्रांसफर के लिए कारण बताया कि उन्हें बुढ़ापे में सेवा के लिए बेटे की बुलंदशहर में जरूरत है। तो उन्होंने उनकी मांग पूरी कर दी , और बताऊँ, उन्होंने मुझे बड़े प्यार से गालियां दीं, साले , बीवी के कहने में चलता है, वो ही तुझे अपने बाप से दूर लिए फिरती है, ससुर की सेवा नहीं करना चाहती , अब मैं इस पर गुस्सा करता या हँसता। जो लोग नवतेज सिंह को जानते हैं, वे उनके खुसर पुसर गाली देने के अंदाज को भी जानते होंगे. इसी दौरान हमारे परिवार पर एक और कहर टूट पड़ा था। हमारे सब भाइयों में से , गाँव और रिश्तेदारियों में सबसे लोकप्रिय मुन्ना भैया जो कुछ ही समय पहले अनिल भाई के छोड़े हुए बिजनेस को संभाल रहे थे, इतने बड़े बिजनेस को ढंग से मैनेज नहीं कर पाए और वार्षिक बैलेंस शीट में लाखों का घाटा देखकर हताशा में एक खतरनाक कदम उठा बैठे। उन्होंने आत्महत्या कर ली। हँसते खेलते परिवार को जैसे किसी की नजर लग गई , पहले बहन और फिर भाई को खोने का असर राजी , अजय और घर के हर सदस्य पर पड़ा। लेकिन अजय भैया ने बहुत ढाढस बंधाया, वह नौकरी छोड़ने तक को तैयार हो गए कि श्री दुर्गा प्रसाद का नाम तो बचाना पड़ेगा। तभी प्रवीण आगे आये कि आप मत छोडो , मैं केंद्रीय विद्यालय छोड़ कर बिजनेस सम्भालूंगा। पापा जी ने भी कहा कि ये ज्यादा उचित रहेगा। घोस्ट कथा - ३४ मुरादाबाद पर वापस लौटते हैं मेरे पापा जो रिटायरमेंट के बाद से मुरादाबाद में रहने लगे थे और अपने HIG आवासीय भवन में संचेतना विद्यालय नाम से एक जूनियर स्कूल चला रहे थे, वे शायद राजी की प्रसिद्धि से प्रभावित हो कर हमारे प्रति नरम हो गए थे। जबकि मेरे बड़े भाई अनुराग की शादी के समय से वे बहुत नाराज चल रहे थे। इसके बाद उन्होंने मेरे छोटे भाई विराज की शादी के समय भी हमारे प्रति बेरुखी दिखाई थी. लेकिन अब हमारा सरकारी आवास उनके घर से मात्र दो सौ मीटर की दूरी पर था, तो मेरे मना करने के बावजूद राजी एक दिन टहलते टहलते उनके घर चले गए। लौट कर उन्होंने मुझे बताया कि उन्होंने अच्छी खातिर की और ठीक से बात भी की , कोई पुरानी शिकवे शिकायत नहीं की, और फरमाइश भी की है, कि बहुत दिनों से उसके हाथ का खाना नहीं खाया है , कुछ पसंद की डिश बना कर खिलाये. ये एक तरह से संबंधों को जोड़ने का प्रयास था। अपनी छुट्टी बिताने अनुराग हर साल बच्चों सहित माँ के पास गांव आता था, उसका ट्रांसफर भी योल से दिल्ली हो गया था। एक दिन वह अपने बच्चों सहित हमारे घर आया। राजी ने एक प्रयोग करने की ठानी वह क्षितिज और उसके हमउम्र मेरे भतीजे संचित को लेकर मेरे पापा के घर गया. क्षितिज तो दो बार पापा जी के पास राजी के साथ जा चूका था, इस बार जब वह गया, उसके साथ एक १२ वर्ष का बच्चा भी था, क्षितिज ने कहा, नाना जी बताओ ये कौन है , उसके नाना जी ने तब तक उस बच्चे को पहले कभी नहीं देखा था जबकि वो उनका अपना सगा पोता था। ऐसे थे मेरे पापा। लेकिन उस दिन उन्होंने अपने पोते के प्रति कोई नफरत नहीं दिखाई , बहुत प्रेम भी नहीं दिखाया.दोनों को चॉक्लेट मंगा कर खिलाई । अगर हम लोग मुरादाबाद और रुकते तो शायद सम्बन्ध और सुधर पाते। लेकिन नवतेज जी की चालाकी भरे प्यार ने हमें फिर से बुलंदशहर पहुंचा दिया.." बुलंदशहर के लिए मुरादाबाद से कार्यमुक्त होने से पहले राजी और मेरे बीच में काफी कसमकस रही, मैं चाहती थी कि मेरा क्षितिज मुरादाबाद से कक्षा ८ तो पास कर चुका था और मैं इस बात से चिंतित थी कि वह अब तक आठ स्कूल बदल चुका था तो कम से कम चार साल उसे यहीं मुरादाबाद में पढ़ने दिया जाए, बार बार स्कूल बदलने से उसे नए स्कूल में एडजस्ट करने में बहुत टाइम लगता है। राजी ने कहा कि अच्छा हो कि इसे किसी हॉस्टल युक्त अच्छे स्कूल में भेज दिया जाए तब इसकी शिक्षा डिस्टर्ब नहीं होगी, मुरादाबाद तो कोई अच्छा एजुकेशन हब नहीं है। मैं कश्मकश में निर्णय नहीं ले पा रही थी, तो मैंने राजी पर ही छोड़ दिया और कहा कि अब इसे चार साल एक जगह ही पढ़ने दिया जाए. राजी ने खोज बीन की , तो पाया कि पिलानी में बिरला का स्कूल है, और वहां से इंटर करने वालों को बिरला इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी में एडमिशन मिलने में आसानी होती है। उसने मुझे बताया। अमित रुड़की से हमारे पास आया हुआ था, उसका अंतिम रुड़की में अंतिम वर्ष था। नमित को तीन वर्ष पहले IIT रुड़की कैंपस से ही विप्रो कम्पनी चयन करके बंगलौर ले जा चुकी थी, तो अमित ने भी बिरला स्कूल की तारीफ़ की, तो राजी ने उसका फॉर्म भर दिया और एक दिन मैं और राजी क्षितिज को लेकर पिलानी पहुँच गए, हमारे अनुमान के विपरीत ये कोई शहर नहीं था, बल्कि एक गांव था जो केवल बिरला के शैक्षणिक संस्थानों के लिए प्रसिद्द था। स्कूल में क्षितिज का टेस्ट हुआ, वो आसानी से पास हो गया, राजी ने अपने बड़े दोनों बच्चों की तरह क्षितिज को भी घर पर पढ़ाने में समय दिया था जो उनके काम आया। एडमिशन की औपचारिकताएं पूरी हो गयीं.अगला सत्र शुरू होने में पंद्रह दिन बाकी थे, हम वापस कर सामान पैकिंग करने लगे , बुलंदशहर के लिए। लेकिन मेरी नींदें उड़ गयीं , और स्वास्थ्य तेजी से गिरने लगा। कुछ समझ नहीं आ रहा था। क्या हो रहा है। राजी ने भांप लिया, राजी काफी बरसों पहले अपनी बहन , अपनी मम्मी, अपने दोस्त ब्रह्मानंद के साथ घटित , कुछ मानसिक आघातों से परिचित था, इसलिए उसने भांप लिया कि मुझे किसी मानसिक चिकित्सक की जरूरत है .हमारे साथ गुलावठी में ADO रहे प्रताप सिंह वर्मा के साले. डॉ अशोक जैनर लंदन में मानसिक रोग विशेषज्ञ थे और उस समय भारत आये हुए थे, ये बात राजी को पता थी, प्रताप सिंह निरंतर संपर्क में बने रहे, हमारे हर दुःख सुख में वो शामिल हुए, राजी ने उन्हें फोन कर कन्फर्म किया तो उन्होंने बताया कि वे यहीं हैं। तो राजी मुझे लेकर उनसे मिलने गए। उन्होंने पिछले छह महीने का घटना क्रम मुझ से अकेले में पूछा। कुछ दवा लिखी और राजी को परचा देते हुए बोले कि वैसे किसी इलाज की जरूरत नहीं है, बस इनके बेटे को पिलानी भेजने का विचार त्याग दो। वहीँ प्रताप ने सलाह दी कि भाभी जी, भाई साब को करने दो नौकरी , आपका मकान जो मैंने आप से बुक करवाया था, उसकी लाटरी निकलने वाली है, तब तक आप किराये पर मकान ले लो, यहीं गाजियाबाद में रहो, आपके घर के पास ही डीपीएस स्कूल है, वहां इसका एडमिशन करवा दो। हम वापस आये, सामान की पैकिंग पूरी की, और बुलंदशहर वापस आ गए। हमारे पास क्षितिज के बारे में सोचने का वक़्त था, लेकिन ये तय था कि अब वो मुझ से दूर नहीं जाएगा. राजी थोड़ा सा अपसेट हुए कि पिलानी जाने को हाँ करने की क्या जरूरत थी, पहली बार उन्होंने मुझे इस बात का ताना दिया कि बेकार वहां फीस बर्बाद करवाई। मुझे बुरा तो लगा लेकिन मैं चुपचाप पी गई,क्योंकि मैं खुश थी कि भले ही मेरे दो बेटे मुझ से दूर हैं , लेकिन मेरा सबसे छोटा, सबसे प्यारा वो बेटा मेरे साथ रहेगा, जिसे कभी मैं गर्भपात कराने पहुँच गई थी। " घोस्ट कथा - ३५ " वसुंधरा में जो मकान हमें मिलने वाला था वह सेक्टर ९ में था , और डीपीएस स्कूल भी हमारे बिल्डिंग के पीछे ही था, हमने मकान किराए से पहले स्कूल में एडमिशन की ट्राई लेना उचित समझा। हम स्कूल गए, प्रिंसिपल एक प्रौढ़ महिला थी ,सुन्दर, मृदुभाषी, उन्होंने राजी की सर्विस आदि के बारे में पूछा , मेरी एजुकेशन स्टेटस के बारे में पूछा, बातों बातों में मैंने बता दिया कि मैं केंद्रीय विद्यालय में टीचर थी, बच्चों की शिक्षा प्रभावित न हो, इसलिए जॉब छोड़ा है। तो उन्होंने औपचारिकता भर क्षितिज से बात की और उसकी आठवीं के मार्कशीट देखी और प्रवेश को अनुमति दे दी। इसके बाद हमने मकान ढूँढा लगभग स्कूल से दो सौ मीटर पर सेक्टर ६ में हमें एक मकान मिल भी गया। और हम यानि मैं और क्षितिज गाजियाबाद शिफ्ट हो गए और राजी अपने पापा के साथ उनके मकान में रहने चले गए। इस बार उन्होंने सरकारी आवास के लिए अप्लाई भी नहीं किया। हम से दुश्मनी निभाने वाले तेजपाल सिंह जिला विकास अधिकारी की आकस्मिक मृत्यु हो चुकी थी. राजी हर सप्ताह गाजियाबाद आते थे, एक दिन मैंने उनसे कहा कि किराया मंहगा पड़ रहा है, और हमारे मकान का निर्माण बहुत धीमा चल रहा है, वहां बिल्डर और सोसाइटी में विवाद है , पता नहीं कब बन कर पूरा होगा, तो हम निर्माण स्थल पर गए, मैनेजमेंट समिति के लोगों से मिले.उन्होंने कहा, कि फर्श , बाथरूम फिटिंग पुताई जैसे काम बाकी हैं और बाहर रोड निर्माण बाकी है पानी का कनेक्शन भी लेना है , बिजली अभी निर्माण के लिए कमर्शियल कनेक्शन लिया हुआ है। तो सही में तो साल दो साल तो लग जायेंगे, लेकिन ये भी जोड़ा कि कुछ बहुत जरूरतमंद लोग रहना शुरू कर दिए हैं। हम उन लोगों से मिले जो बिना निर्माण पूरे हुए ही मकान का पजेशन ले चुके थे। हमने भी पजेशन लेने कई रिक्वेस्ट डाल दी. सेक्टर ६ में हम जिस किराये के मकान में थे, वहां एक महत्वपूर्ण घटना हुई, राजी ने आप लोगों को पहले ही बता रखा होगा। हमारा बेटा नमित जो बंगलौर से गुड़गांव आ चूका था, कंपनी के काम से ४ महीने कनाडा गया था और वहां से पैसा बचा कर, उसी पैसे से ये वसुंधरा गाजियाबाद में हमारे पारिवारिक मित्र प्रताप सिंह ने ये मकान बुक किया था, अब अमेरिका लम्बी अवधि के लिए चला गया था, उस से शादी का प्रस्ताव लेकर एक लड़की स्वयं गुड़गांव से मेरी माँ के साथ हमसे मिलने आई थी। मेरी माँ को और मुझे लड़की पसंद आई, उस लड़की के माँ बाप तीन वर्ष पहले ही गुजर चुके थे। और हमने शादी के लिए हाँ कर दी। राजी को भी आपत्ति नहीं थी, बिना जाति की पूछताझ के लिए हमने उसका प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। वहीँ एक दिन बुलंदशहर से एक जवान लड़के के साथ आये, उन्होंने बताया कि इस लड़के की माँ गांव के नाते मेरी बहन लगती है, यानि ये मेरा भांजा है और आज ये देश का हीरो है। आज मुख्यमंत्री इसके गांव में इसे सम्मानित करने आये थे, और उन्होंने इसे गाजियाबाद में एक मकान उपहार में दिया है। वो लड़का था, भारत का एक मात्र जीवित परमवीर चक्र सोल्जर, जिसने कारगिल युद्ध में अप्रतिम साहस दिखाया था। हम लोगों ने साथ में लंच किया, क्षितिज , मैंने और मेरी मम्मी ने उसके साथ एक फोटों खिंचवाया। घोस्ट कथा - ३६ उधर राजी का फिर बुलंदशहर से ट्रांसफर हो गया, यानि सिर्फ ११ महीने में, इन ग्यारह महीनों में राजी और पापाजी खूब साथ रहे, अजय का परिवार भी बुलंदशहर ही शिफ्ट हो गया था क्योंकि उसके बॉस उसे लखनऊ या अपने मुख्यालय के आसपास ही रखना चाहते थे, उसका भी प्रमोशन हो गया था, वो अब DIG कहलाता था। मुन्ना के बच्चे और अजय के बच्चे एक साथ एक घर में रहते थे, अजय ने अपने तीन बच्चों और मुन्ना के दो बच्चों में कोई भेदभाव नहीं माना , और सब को समान प्यार और सुख सुविधाएं दीं और मुन्ना भैया के अपूरणीय क्षति को कम से कमतर करने की भरपूर कोशिश की. अजय के बेटे और मुन्ना के बेटे दोनों ने भी बीटेक और MBA किया और फिर बहुत कम उम्र में बिजनेस संभाल लिया, क्योंकि प्रवीण भी ठीक से प्रबंधन नहीं कर पाए और वापस अपने शिक्षण व्यवसाय में लौट गए। राजी इस बार नए बने जिले ज्योतिबा फुले नगर जिसे बाद में अमरोहा नाम वापस मिला, के प्रोजेक्ट डायरेक्टर बन कर गए और कुछ ही दिनों में उनका प्रमोशन हो गया. वो अब मुख्य विकास अधिकारी बन गए थे। लेकिन उन्हें इस पद पर नियुक्ति नहीं मिली, बल्कि उनके कथित प्रशंसक ग्राम्य विकास मंत्री ने जिस दिन राजी हमसे मिलने गाजियाबाद आये हुए थे, उन्हें खुद फोन करके बताया कि देखों मैं तुम्हें मुख्य विकास अधिकारी से बड़े पद पर तैनात कर रहा हूँ, सहारनपुर मंडल का जॉइंट डेवलपमेंट कमिश्नर। राजी मुस्कुरा कर रह गए , मैंने उनसे पूछा कि क्या हुआ? तो राजी ने बताया कि परसों मैं आश्रम गया था, अरे हाँ , मैं ये बताना भूल गई थी, राजी के बचपन के, यानि कक्षा ८ के एक टीचर थे, जो एक आध्यात्मिक गुरु भी थे , लोग उन्हें शांत जी के नाम से पुकारते थे, पूरा नाम मुझे याद नहीं , उन्होंने कई शिक्षण संसथान क्षेत्र में खोले थे और उनका अंतिमसंस्थान का नाम सर्वोदय संस्कृत आश्रम, यह जिला बालैनी में हिण्डन नदी के किनारे है , मुजफ्फरनगर तैनाती के समय वे राजी के पास आये थे और स्टाम्प पेपर पर उस आश्रम को राजी के सुपुर्द कर गए थे कि उनके बाद इस आश्रम को इसके उद्देश्यों के अनुरूप संसचालित करना राजी का काम होगा , वे राजी को उसके लिए अपना उत्तराधिकारी बना गए थे, वह बड़ा पवित्र स्थान है , मैं भी कई बार वहां जा चुकी थी। तो राजी ने बताया कि वो आश्रम गए थे तो एक अन्य उनके टीचर गजेंद्र जी, जो की मंत्री जी के भी टीचर रह चुके थे मिले थे। तो वहीँ आश्रम में उनसे बातों बातों में राजी ने उन्हें बताया था कि एक दो दिन में उनकी प्रोन्नति का आदेश आने वाला है, और वो CDO बनने वाले हैं, तो गजेंद्र सिंह ने कहा कि बधाई हो, तो राजी के गुरु जी शांत जी बोले क्या राजपाल त्यागी तुम्हारे संपर्क में है , उसे मेरी और से कहना कि राजेंद्र को बागपत का सीडीओ बना दे. राजी ने मुझे बताया कि मैंने उन्हें बता दिया है कि ऐसी कोशिस न करें, अब वो आपके स्टूडेंट नहीं हैं राजनेता हैं। लेकिन मुझे लगता है कि गजेंद्र जी ने उन्हें कह ही दिया होगा, इसीलिये मंत्री जी ने मुझे फोन करके तसल्ली दी है कि वो मुझे CDO से भी ऊपर के पद पर भेजने की खबर दे रहे थे. जब कि वास्तविकता ये है कि JDC एक सुपरवाइजरी पोस्ट है जिसके अधीन कई जिले आते हैं, लेकिन उसके पास कोई फाइनेंसियल पावर नहीं होती. और CDO अपेक्षाकृत अधिक सक्रीय और महत्वपूर्ण पद है। लेकिन राजी खुश थे। वो सहारनपुर ज्वाइन कर आए, वहां उन्हें कमिश्नर के रूप में फिर से नवतेज सिंह मिले, जो वहां दोबारा कमिश्नर बन कर पहुंचे थे। इधर नमित का अमेरिका से सन्देश आया कि वह अक्टूबर में आ रहा है और चूँकि आप लोगों ने हाँ कर दी है तो शादी करके तुरंत वापस जाएगा। अब हम लोग शादी की तैयारियों में जुट गए। भाइयों और पापा जी ने तय किया कि शादी बुलंदशहर में रहकर की जाए, तो हम पंद्रह दिन के लिए बुलंदशहर शिफ्ट हो गए। शादी बिना तामझाम के आसानी से हुई , चूँकि राजी ने अपनी शादी में दहेज़ नहीं लिया था तो भात देने की रस्म भी नहीं हुई , या कहें कि सिर्फ नाम के लिए भाइयों का स्वागत हुआ, लड़की ने बारात बुलाई थी दिल्ली के एक पंच सितारा होटल में, क्योंकि वो खुद एक पंच सितारा होटल में मैनेजमेंट का जॉब करती थी। मेरे लिए ऐसा भव्य स्थान एक नया अनुभव था। इसमें हम अधिक लोगों को नहीं ले जा सके थे तो शादी के बाद एक रिसेप्शन हमने बुलंदशहर में रखा। शादी के बाद हम फिर से गाजियाबाद चले गए। पापा बुलंदशहर में ही बने रहना चाहते थे क्योकि वहां उन्होंने हरिएन्क्लेव में बूढ़े रिटायर्ड लोगों का एक जमघट तैयार कर लिया था और हमारा घर एक ओल्ड एज हॉस्टल जैसा बन गया था, कॉलोनी के बूढ़े वहां ताश खेलते , बदपरहेजी खाना खाते। उन की सेवा के लिए हमने एक नौकरानी भी वहां छोड़ रखी थी जो सफाई और खाने बनाने का काम कर जाती थी। बाकी विशेष आवश्यकताओं के लिए परिवार के अन्य लोग भूड़ पर शोरूम के ऊपर वाले हिस्से में रिहाइश रखते ही थे। मैंने नमित से बातचीत करने के लिए yahoo मैसेंजर का उपयोग सीखा याहू मेल सीखा राज ने अपना पूर्ण कंप्यूटर मेरे पास छोड़ दिया, और हमारे लैंडलाइन से उसे जोड़ दिया , मुझे तकनीकी पक्ष तो कुछ भी पता नहीं लेकिन मेल भेजना और चैट करना मैंने सीख लिया। अमित भी IIT रूडकी से पास होकर हमारे पास आ गया और किसी साउथ अफ्रीकन कंपनी में उसे जॉब मिल गया , लेकिन मुझे तभी पता चला कि वो रुड़की से केवल इंजीनियरिंग की डिग्री ले कर नहीं आया बल्कि एक गिटारिस्ट और परफॉमिंग म्यूजिशियन बन कर लौटा था। वो पांच दिन नॉएडा में अपने दफ्तर जाता और दो दिन म्यूजिक में डूबा रहता। पंद्रह दिन में नमित और भावना अमेरिका चले गए। मुझे वे पंद्रह दिन स्वर्ग से लगे, बहू से मुझे सहानुभूति भी थी क्योंकि उसके माँ बाप उसे तब अकेला छोड़ गए थे जब वह कक्षा ११ में पढ़ती थी, इस प्रकार आगे अपने पैरों खड़े होने में उसने जो हिम्मत दिखाई थी , उस पर मुझे गर्व होता था क्योंकि मैं उतना साहस दिखाने में सफल नहीं हो सकी थी। मेरी अपनी बहू से सिर्फ पंद्रह दिन का साथ मिला। बेटे अमित को अचानक से लिम्ब्स मूवमेंट बंद हो गए। वह न हाथ उठा पा रहा था, न पैरों पर अपने शरीर को थाम पा रहा था। राजी संयोग से उस दिन वहां थे, जबकि वो सहारनपुर से साप्ताहिक रूप से आया करते थे. हम उसे किसी तरह अस्पताल ले गए, जहाँ उसे GBSyndrom नामक रेयर बीमारी बता दी गयी, डॉक्टर्स की बातें वे ही जाने, हमने तो इस बीमारी का नाम भी नहीं सूना था। खैर अपनी क्षमता से अधिक खर्च करके उस बीमारी पर काबू पाया , संगठित परिवार ऐसे वक़्त में बहुत काम आता है। उसके इंजेक्शन एडवांस पेमेंट पर विदेश से आते थे। लेकिन परिवार ने हमेशा की तरह साथ निभाया. अब मेरी इच्छा बहू बेटी से मिलने की होने लगी , राजी समझाते रहते कि वे लोग वहां जॉब छोड़कर यहाँ नहीं आ सकते, उन दिनों वीडियो कॉल तो क्या कॉल भी नहीं होती थी और होती थी तो बड़ी मंहगी पड़ती थी। तो चैट और ईमेल ही सहारा थी। मैंने कहा कि चलो सब लोग अमेरिका चलते हैं, राजी ने कह दिया, पहले तो पैसा चाहिए , फिर पासपोर्ट वीसा बहुत झंझट है , अपने पर संयम रखो। मुझे डर था कि कहीं फिर बीमार न हो जाऊं ,, एंग्जायटी का शिकार मैं पहले हो ही चुकी थी . दोनों बेटे जो मेरे पास थे उन पर ज्यादा लाड लड़ाने लगी उन्हें रोज नयी नयी डिश बना कर खिलाने लगी. बच्चे मेरे काम में हाथ बांटते थे। राजी साप्तहिक मेहमान की तरह आते। लेकिन मन में अमेरिका जाने की इच्छा कायम रही। हमारा मकान अब इस लायक हो गया था कि उसमे रहा जा सके, तो हम एक रविवार उसमे शिफ्ट हो गए , २००५ का वर्ष था। क्षितिज दसवीं में था। अपने स्कूल में अपनी पढाई और अपने डिबेट और प्रोग्राम कम्पीयरिंग की दक्षता के कारण शिक्षकों और मित्रों का चहेता बन गया था। घर के छुटपुट शेष काम हमने उसमे रहते रहते पूरे कराये। मैंने राजी की रूचि न देखते हुए , स्वयं ही पासपोर्ट बनवाने की ठानी, एक दिन पासपोर्ट ऑफिस गयी , फॉर्म लाइ , एजेंट से मिली , राजी ने पुरानी कार मेरे पास रख छोड़ी थी, वो बहुत काम आई , मोपेड तो मैंने बुलंदशहर में देवर को ही वापस सौंप दी थी। एजेंट ने बताया कि यदि विद्यायक , सांसद या जिलाधिकारी के फॉर्म के एक पेज पर हस्ताक्षर हो जाएं तो पासपोर्ट जल्दी और आसानी से हो जाएगा। मैंने हिम्मत की और जिलाधिकारी कार्यालय पहुँच गयी, बाहर बैठे अर्दली से कहा कि जाओ साहब को बताओ कि JDC सहारनपुर की वाइफ आई हैं , संतोष यादव जिलाधिकारी थे, बहुत कर्मठ और ईमानदारी बताया जाता था उन्हें। वैसा ही पाया भी। उनकी राजी से कभी भेंट तो नहीं हुई थी, लेकिन वे बुलंदशहर के सीडीओ भी रहे थे इसलिए उन्होंने राजी का नाम सुन रखा था। उन्होंने स्टेनों को बुलाकर एक पत्र बनवाया, मेरा , अमित का और क्षितिज का पासपोर्ट जो मैं लेकर गयी थी ,उस पर अपनी संस्तुति लिखी, और पत्र के साथ नत्थी करके मुझे दे दिए और कहा कि अगर दिक्कत आये तो पासपोर्ट अफसर से कहियेगा कि मुझे से बात कर ले। मैं फिर से पासपोर्ट ऑफिस गयी , मैंने पासपोर्ट अफसर के बाहर बैठे चपरासी को पत्र दिया , पहले तो उसने मना कर दिया फिर पत्र पर डीएम की मोहर देख कर लिफाफा अंदर ले गया। मुझे अंदर बुलाया गया। फीस जमा करने केलिए भी उन्होंने चपरासी को बुलाया और मैंने उसे पैसे दिए और फिर उन्होंने कहा कि अब आप घर जाइए दस पंद्रह दिन में आपके घर पासपोर्ट पहुंच जाएंगे । मुझे बिलकुल नहीं लगा था कि एक ही दिन की मेहनत में इतना आसानी से सब काम हो जाएगा। " ....जारी है। .. घोस्ट कथा - ३७ "क्षितिज का हाई स्कूल पास हो चुका था.उसके मार्क्स बहुत अच्छे आये , वह अपने स्कूल का डिबेटर भी था, स्कूल के फंक्शन्स कम्पीयरिंग, यानि उद्घोषक का काम भी करता था, अमित को नॉएडा स्थित एक साउथ अफ्रीकन सॉफ्टवेयर कंपनी में जॉब मिल गयी थी, लगने लगा था कि काफी झंझावातों के बाद अब अच्छे दिन आ गए हैं, तभी गाँव से खबर आई कि मेरी माँ को सुबह सुबह नल पर कुल्ला करते करते खून की उलटी हुई और वो चल बसीं। मुझे समझ नहीं आया कि भगवान् का विधान क्या है कि सुख दुख साथ साथ आगे पीछे चलते रहते हैं। माँ गयी लेकिन पापा ने सारे गिले शिकवे समाप्त कर दिए. अपने बेटों और बड़ी बहू को भी उन्होंने परिवार मानना शुरू कर दिया। अब उनके पास दो बेटे , दो बहुएं , दो पोते थे। उधर राजी जो शांत जी का सबसे प्रिय शिष्य था, उनके पौत्र का संदेश आया कि वे मेरठ अस्पताल में भर्ती हैं अनर्गल बातें कर रहे हैं। मैं और राजी संतोष मेडिकल कॉलेज गए (ये वही संस्थान है, जिसके मालिक एक दिन प्रवीण की बहन का रिश्ता ले कर आये थे और जिन्हें राजी ने समझा बुझा कर वापस भेज दिया था ) शांत जी बड़ी प्रसन्न मुद्रा में लेटे लेते ऐसे बातें कर रहे थे जैसेकि वो किसी उपवन में विचरण कर रहे हैं। राजी ने उनसे प्रणाम किया तो उन्होंने राजी की तरफ देखा, कहा, अहा कितना सुन्दर दृश्य है, देखो और उन्होंने राजी का हाथ पकड़ लिया। थोड़ी देर चुप रहे फिर बोले, राज , अपने अनुज का ध्यान रखना, अनुज उनके पौत्र का नाम था। फिर और इधर उधर की बातें करने लगे, सब को लगा कि राजी के आने से वो नार्मल हो गए हैं। तो राजी ने डॉक्टर से बात की , उन्होंने भी कहा कि कोई चिंता की बात नहीं है, तो राजी ने कहा कि मैं कल फिर आऊंगा, कुछ पैसे अनुज को दिए कि सेवा करो। हम वापस गाजियाबाद तक पहुंचे भी नहीं थे कि अनुज का फोन आ गया, शांत जी नहीं रहे। राजी ने कहा कि अब तो अँधेरा हो गया है , उन्हें आश्रम ले जाओ, दाह संस्कार कल वहीँ करना है, हम समय से पहुँच जाएंगे। ९ अगस्त २००६ था वो दिन शायद। सितम्बर २००६ के अंतिम दिनों में राजी की बचपन की सहेली और बुआ जी , जो कि मेरी भी पक्की सहेली बन चुकी थी, अपने पति के साथ हम से मिलने गाजियाबाद आई, उनका बेटा राजी की गाइडेंस से पहले नवोदय में गया , फिर BSF में डिप्टी कमांडेंट बन गया, वो कहीं पंजाब में, शायद चंडीगढ़ में तैनात था, तो उन्होंने वैष्णो देवी जाने का प्रोग्राम बनाया। राजी को फिर से ट्रांसफर कर के सहारनपुर से मुरादाबाद संयुक्त विकास आयुक्त पर भेज दिया गया था, जबकि ऑफिसियली वह अभी भी मुख्य विकास अधिकारी ही था। मैंने फोन करके उससे अनुमति मांगी कि क्या मैं इन लोगों के साथ वैष्णो देवी जा सकती हूँ। राजी ने कहा कि ठीक है, जैसा तुम चाहो , मैं संडे को आता हूँ। राजी के बॉस इस समय किशन सिंह अटोरिया थे, उनके एक पारिवारिक समारोह में मैं उनसे और उनकी पत्नी से मिली थी, बहुत विनम्र और आकर्षक व्यक्ति थे वे , राजी ने उनसे फोन पर ही घर जाने की अनुमति मांगी, जो उन्होंने सहर्ष दे दी, और वो संडे के बजाय सटरडे को ही आ गए। उन्हें लगा कि मेरी तबियत थी नहीं है, अगले दिन बुआ जी और फूफा जी अपनी बेटी आदि के साथ आनंदविहार पहुँच गए , जहां से हमें साथ साथ जाना था, पहले चंडीगढ़ और फिर वहां से जम्मू। चंडीगढ़ तक की यात्रा बस में करनी थी आगे की जिम्मेदारी उनके बेटे नीरज ने ली थी (हम उसे उसके घरेलू नाम नीरज से ही पुकारते थे, जब कि उसका दस्तावेजी नाम यिनीत राव है। लेकिन कहते हैं न माता ने बुलाया है , माता का बुलावा आया है , तो मेरे लिए शायद माता के यहाँ अभी एंट्री पास नहीं था। मुझे तेज बुखार था लेकिन मैं सुबह से ही तैयार हो रही थी, राजी बार बार मना कर रहे थे कि तबियत ठीक नहीं है। जब आनंद विहार पहुँच कर फूफा जी ने फोन किया तो राजी ने उन्हें कह दिया वो नहीं जा पाएगी , उसे बुखार है। तो मुझे बिलकुल अच्छा नहीं लगा। राजी ने फोन कटते ही डॉ दीपक वर्मा जो हमारे फॅमिली फ्रेंड प्रताप वर्मा के बेटे और हमारे बेटों के बचपन के साथी थे, और वसुंधरा में ही रहते थे, को फोन किया कि तुम्हारी आंटी की तबियत ठीक नहीं है, वो दस मिनट में ही आ गए , उन्होंने प्रारंभिक जांच करके कहा कि अंकल इनकी स्किन पर ब्राउन चकत्ते उभर रहे हैं, ये नार्मल बुखार नहीं है, आजकल डेंगू और चिकनगुनिया का भयंकर प्रकोप चल रहा है, इन्हें हॉस्पिटल भर्ती करना पड़ेगा। उसने तभी कई हॉस्पिटल में फोन किया तो मोहननगर के हॉस्पिटल में एक बेड खाली मिला। मुझे वहां ले जाया गया। मुझे ड्रिप लगाईं गई , कई और टेस्ट हुए ,तब तक बुलंदशहर से पापा जी और देवर लोग भी आ गए। डॉक्टर ने कहा कि इन्हें ICU में रखने की जरूरत होगी, और हमारे यहाँ ICU पहले ही फुल है। राजी के साथ रह चुके एक अफसर नॉएडा में एडिशनल सुपरिन्टेन्डेन्ट पुलिस थे,जो सहारनपुर में ट्रेनिंग के दौरान भी हमारे यहाँ ठहरे थे और जो रामपुर में भी साथ रह चुके थे , तो उनसे पारिवारिक सम्बन्ध थे, उनकी पत्नी राजी की सगोत्री भी थी. राजी ने उन्हें फोन किया कि पता लगाओ कि कहीं ICU में कोई बेड खाली है। सौमित्र (ASP) ने थोड़ी देर में कॉल बैक किया कि थोड़ी देर में Fortis हॉस्पिटल से एक एम्बुलेंस आएगी, और फोर्टिस में आपके लिए सब तैयारी करा दी गयी है। हम ७ अक्टूबर २००६ को भर्ती हुए। मुझे देखने पापा भी आये,अनुराग विराज भी आये, राजी का तो सारा परिवार था ही, पता नहीं किस किस ने मुझे ब्लड दिया, किस किस ने प्लेटलेट्स दिए। ११ अक्टूबर की रात को राजी को मेरे पास लाया गया,मैंने उन्हें तरसती निगाहों से देखा और उन्होंने मुझे भी वैसे ही देखा , लेकिन जब वो जाने लगे तो मैं चिल्लाने लगी , उन्हें मुझ से दूर मत ले जाओ , उन्हें मुझे से दूर मत ले जाओ. और मैं किसी अंधे कुंवे में गिर पडी। " तब से वन्दना भूत बन कर मेरी स्मृतियों में बस गयी है। भूत एक अतीत का नाम है, जो स्मृति बन कर आप से चिपक जाता है, अच्छी स्मृतियाँ प्रेरणा देती हैं, और बुरी स्मृतियाँ सताती हैं। भूत इसीलिए अच्छे या बुरे होते हैं क्योंकि आपकी स्मृतियाँ अच्छी या बुरी हो सकती हैं। मेरी वन्दना सदा एक अच्छे भूत की तरह मेरे साथ है। इति घोस्ट कथा। --- बस अब और कोई कड़ी नहीं। .....

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