Ghost का अर्थ भूत बताया जाता है, अंग्रेजी में इसे "जो वास्तव में अस्तित्व में नहीं है, या जो था पर अब नहीं है" के अर्थ में लिया जाता है। भूत को हिंदी में "बीता हुआ", या "अतीत" के अर्थ में लिया जाता है.
ghostwriting का भी चलन इन दिनों है। और इतना है कि अब इसके विज्ञापन भी आने लगे हैं कि अपनी कहानी ghostwriters से लिखवाइए। यानि कहानी के लिए बस कंटेंट आप उपलब्ध करा दीजिये और पैसा लेकर आपकी कहानी आपकी जुबानी भाषा और लेखन विशेषज्ञ लिख देंगे।
मेरे पास भी एक घोस्ट आया, यूँ कहिये कि मेरे एक प्रियजन ने मुझ से कहा कि क्या आप मेरी कहानी लोगों को बता सकते हैं, मैंने कहा कुछ दिलचस्प हुआ तो कोशिश करूंगा, लेकिन मैं कोई स्थापित लेखक नहीं हूँ और मैं कहानीकार के रूप में स्थापित भी नहीं, इसलिए किसी कुशल लेखक के पास क्यों नहीं करते, उसने कहा कि क्योंकि वे बड़े मंहगे हैं और मेरे पास देने को दमड़ी भी नहीं, और फिर मुझे जितना आप जानते हैं उतना मेरे परिवार के लोग भी नहीं जानते तो आप मेरी बात शायद बेहतर लिख सकें। और मैंने हाँ भर दी।
" मैं छोटी सी थी, गाँव में रहती थी , अभी चार साल की थी कि मेरी माँ ने मुझे एक भाई ला दिया और मैं सदा उसके पास रहती। गोदी उठाने की कोशिश भी करती। कई बार उसे गिरा भी देती तो मैं खुद ही रोने लगती थी. पर अभी मेरा भाई एक साल का भी नहीं हुआ था कि मेरी पापा ने मेरा गाँव के बाहर एक स्कूल में ले जाकर मुझे छोड़ दिया और कहा आज से तुम्हे रोज यहाँ पढ़ने आना है , लेकिन मैं अपने भाई को छोड़ कर स्कूल नहीं जाना चाहती थी, लेकिन पापा से मुझे डर लगता था, हालाँकि वे मुझसे हमेशा प्यार से बात करते थे लेकिन उन्हें मैंने अपने भाइयों और मेरी माँ को डाँटते हुए देखा था, इसलिए मुझे उनसे बहुत डर लगता था। अच्छी बात ये है कि पापा कभी कभी ही गाँव आते थे वे शहर में नौकरी करते थे। मैं स्कूल जाती तो थी लेकिन किसी बहाने से जल्दी से घर वापस आ जाती थी , माँ को मेरा जल्द घर आ जाना अच्छा लगता था क्योंकि मैं उनके काम में थोड़ा बहुत हाथ बंटाती थी, और ख़ासकर वे मेरे भाई को मेरे भरोसे छोड़ कर अपने काम निपटा लेती थीं। मेरी माँ नाम मात्र को पढ़ी थी , शायद उनकी भी रूचि पढ़ने में नहीं रही थी और वो यही मानती थीं कि लड़कियों का पढ़ना कतई जरुरी नहीं है , बल्कि उन्हें गृह कार्य में दक्ष होना चाहिए, शायद इसीलिए वह मुझे घरेलू काम सिखाना चाहती थी, लेकिन मेरी रूचि गृहकार्य में नहीं थी , बस अपने भाई के पास बने रहने , उससे बात करने और उसे खिलाने में मेरी रूचि अवश्य थी। मुझे मेरे पापा इसलिए अच्छे लगते थे कि वे मुझे कभी किसी काम को नहीं कहते थे लेकिन जब उन्हें पता लगा कि मैं स्कूल में भी कुछ सीख नहीं रही हूँ और अक्सर जल्दी घर आ जाती हूँ तो उन्होंने मुझे तो थोड़ा डाँटा ही , लेकिन माँ को बहुत डाँटा और कहा कि वह मुझे भी अपने जैसी गँवार बना देगी। मुझे पापा का माँ को डाँटना अच्छा नहीं लगता था। मेरी माँ बहुत सुंदर थीं। लेकिन मेरे पापा उनसे खुश नहीं थे, मेरे पापा को पढ़ने का बहुत शौक था और उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की थी, वे हमारे गाँव के सबसे अधिक पढ़े लिखे व्यक्ति थे , इसलिए लोग उनका बहुत सम्मान करते थे और जब भी वह गाँव आते लगभग हर सप्ताह तो गाँव के लोग उनके पास इकट्ठे हो जाते थे।"
घोस्ट कथा - २
" अब मैं , कक्षा ४ में आ गयी थी, भैया दौड़ने भागने लगा था, अब मुझे स्कूल की अपनी सहेलियां अच्छी लगने लगी थीं और भाई के साथ अब खेलने में मुझे मजा नहीं आता था। एक दिन पापा ने अपने दोस्तों को बताया कि उनका चयन किसी बड़े पद पर हो गया है और उन्हें जबलपुर में पोस्टिंग मिली है, इस खबर को मैंने जा कर माँ को बताया , तो माँ उदास हो गयी। मेरी समझ में नहीं आया कि माँ को तो खुश होना चाहिए, कि अब उन्हें हर सप्ताह डाँटने वाला दूर जा रहा है, लेकिन वो उदास थी। लेकिन अगले दिन माँ खुश थी , क्योंकि उन्होंने पता नहीं कैसे पापा को समझाया कि उन्हें वहां खाने की दिक्कत होगी , स्वास्थ्य पर असर पड़ेगा, जबकि घर का खाना तो वो अब भी सप्ताह में एक ही दिन खाते थे. लेकिन पापा ने कह दिया कि अभी वो जाकर अपनी नई नौकरी ज्वाइन करेंगे और हफ्ते दस दिन में हम सब को भी जबलपुर ले जाएंगे।
दस दिन बीत गए , वे नहीं आये. माँ उदास रहने लगीं , लेकिन गनीमत ये रही कि पन्द्रहवें दिन पापा आ गए, और दो दिन ठहर कर हम सब को जबलपुर ले गए। नए घर में नयी नयी चीजें हमने देखीं , शहर भी बहुत बड़ा था, कुछ दिनों में हमें और खासकर माँ को गाँव याद आने लगा, लेकिन डर के मारे उन्होंने पापा से कुछ नहीं कहा लेकिन मुझे से गाँव की बाते करती रहती। पापा ने यहाँ मेरा एक स्कूल में दाखिला करा दिया, जिसमे अच्छी सी ड्रेस भी थी। पहले गांव के स्कूल में तब सब अपने घर से कुछ भी पहन कर आ जाते थे , ड्रेस का उन दिनों कोई बंधन नहीं था, अब तो सरकार ड्रेस भी दिलवाती है।
मैंने जबलपुर में एक और भाई पा लिया। अब मेरे दो भाई थे , लेकिन जितना मैंने पहले भाई को खिलाने में दिलचस्पी दिखाई , दुसरे भाई के साथ खेलने में उतनी नहीं क्योंकि यहां पापा रोज मेरी पढ़ाई के प्रगति पर नजर रखते थे, स्कूल में क्या क्या हुआ , रोज पूछते थे , होमवर्क करवाने में मदद करते थे , क्योंकि माँ तो कुछ जानती ही नहीं थी। और मैं पांचवी कक्षा में अपने स्कूल में सर्वाधिक नंबर प्राप्त किये , जिसका पूरा श्रेय मेरे पापा को जाता है. तभी एक घटना ऐसी हुई कि सब कुछ बदल गया। "
मेरे मामा जी जबलपुर आये, उन्होंने बताया कि मामी को बच्चा होने वाला है, और रिवाज के अनुसार वे अपनी बहन, यानि मेरी माँ को लेने आये हैं। पापा तब घर पर नहीं थे , शाम को पापा घर आये तो मामा जी को देखते ही उनका मूड ऑफ हो गया, उन्होंने मामा जी से गुस्से में बात की , कि वे क्यों आये हैं , मामाजी उन्हें मनाने की कोशिश करते दिखाई दिए , बताया कि वे माँ को लेने आये हैं, थोड़े दिनों बाद वापस छोड़ जाएंगे, रस्म पूरी हो जायेगी। लेकिन पापा बिलकुल तैयार नहीं थे, माँ ने भी उन्हें समझाने की कोशिश की तो पापा ने कह दिया, ये मेरा आखिरी फैसला है कि अगर तुम जाओगी तो बच्चों को भी ले जाओ, और फिर कभी न तो तुम्हें लेने आऊंगा और न इस घर में तुम्हें दुबारा जगह मिलेगी। इतना गुस्सा मुझे तब नहीं समझ आया था कि पापा मां से गुस्सा हैं कि मामा से , और क्यों हैं , लेकिन बाद में पापा से बरसों बाद मैंने पूछने की हिम्मत की तो उन्होंने जो बताया, उसके बाद मुझे उनका गुस्सा जायज लगा। लेकिन उस दिन तो हमारे परिवार का एक विस्फोट हो ही गया , अगले दिन पापा ऑफिस गए और माँ ने हम सब के कपडे एक सूटकेस में भरे और मामा के साथ हम सब लोग जबलपुर से चले आये. घर की चाबी चपरासी, जो घर पर ड्यूटी देता था, उसे दे कर.
"घोस्ट कथा -३
चलिए, आप को उत्सुकता होगी कि पापा मामा जी से नाराज क्यों थे, ये बात मुझे भी दो बच्चों की माँ बनने के बाद पापा ने बताई , तब वे मुझ से मित्रवत व्यवहार करने लगे थे, वरना तो मैं, मैं ही क्या, मेरे दोनों भाई , मेरे चाचा लोग उनसे सदा डरते ही रहे। पापा ने बताया -
' वो एक साधारण किसान परिवार के थे, और पोस्ट ग्रेजुएशन कर रहे थे, एक रविवार जब वे घर आये ,एक दिन उनके घर पर कुछ सफ़ेद झक कपड़ों में बनेठने चार लोग आये बैठे थे. उनके पिता यानि मेरे दादा जी उनसे बातें कर रहे थे। उन्होंने पापा को भी वहीँ बैठा लिया। मेहमान लोग करीब ५० किलोमीटर दूर के एक गाँव के रईस किसान , गाँव की भाषा में कहें तो जमींदार थे। पापा तब विवाह योग्य आयु के थे, गाँव में २०, २१ साल की उम्र शादी के योग्य ही मानी जाती थी। पापा शादी के लिए तैयार नहीं थे, लेकिन पढ़ाई जारी रखना चाहते थे, और मेरे दादा जी ने तो पोस्टग्रेडुएशन की पढ़ाई के लिए भी बढ़ी मुश्किल से हाँ भरी थी , जबकि पापा आगे भी पढ़ाई करना चाहते थे, तो पापा को एक सम्भावना नजर आई कि यदि वे इस रिश्ते को हाँ कर देंगे तो शायद ससुरालियों की आर्थिक क्षमता से अपनी पढ़ाई जारी रख सकेंगे। हमारे दादा जी के पास अधिक जमीन नहीं थी , और वे बड़े जमींदार से रिश्ता जोड़ने को गर्व की बात मानते थे। मेरे नाना जी को अपनी सुन्दर बेटी के लिए एक पढ़ा लिखा गबरू जवान मिल रहा था। तो कुल मिलाकर बात बन गयी और शादी भी हो गयी।
शादी के बाद लौट फेर हुई, कुछ महीनों बाद गौने की रस्म होना तय हुआ। लेकिन मेरे पापा को पी एच डी में पंजीकरण कराना था इसके लिए उन्हें आर्थिक सहारा ढूंढने के लिए ससुराल याद आई, तो मेरे पापा अपने एक दोस्त के साथ अपनी ससुराल चले गए , उनको भरोसा था कि उनका दोस्त भी उनकी ससुराल की सम्पन्नता से इम्प्रेस हो जायेगा। ससुराल में अचानक पहुंचे पापा और उनके दोस्त को देखकर मेरे मामा / नाना लोग चकित तो हुए लेकिन उन्होंने उनके लिए नया बिस्तर लगाया , साफ़ सुथरी नयी चादरें बिछाई, अच्छे भोजन व्यंजनों से आवभगत भी की। लेकिन पापा अपनी जरूरत का इजहार नहीं कर पा रहे थे , उनका स्वाभिमान उन्हें रोक रहा था। सुबह हुई तो वो यह फैसला कर के कि कुछ नहीं माँगना है, जल्दी से तैयार हो कर चल दिए ताकि अपने कॉलेज समय से पहुँच सकें और अपने प्रोफेसर से बात कर सकें। उधर वे थोड़ी देर से खड़े हुए बस स्टॉप पर बस का इंतजार कर ही रहे थे, कि तभी मामा जी यानि मेरे पापा के साले साहब अपने छोटे भाई के साथ वहां पहुँच गए। पापा ने उन्हें बता दिया कि कॉलेज समय से पहुँचने के लिए उन्हें जल्दी निकलना था, इसलिए बिना आप लोगों को डिस्टर्ब किये चले आये। मामा जी ने उनसे कहा कि कोई बात नहीं, जैसी आपकी मर्जी , लेकिन आप अपने बैग खोल कर दिखाइए , आपके बिस्तर पर बिछाई हुई चादरें बिस्तर पर नहीं मिल रही हैं। पापा को गुस्सा फूट पड़ा , क्या हमें चोर समझ रहे हो। मामा जी ने आग में घी डाल दिया, अरे भाई भूल चूक से आपके कपड़ों के साथ क्या पता बैग में रखी गयी हों, और मजाक में ये भी कह दिया, वैसे आये तो चोरों की तरह ही हो, चुपके से, वरना कायदे से विदाई उपहार वगैरह लेकर आते। अब तो ज्वालामुखी फट पड़ा। साले का मजाक जीजा बर्दाश्त नहीं कर पाए। उन्होंने बैग मामा के मुंह पर दे मारा और बिना बैग के ही बस आते ही उसमे सवार हो कर चले आये। उसके बाद मेरे पापा कभी ससुराल नहीं गए।
अब गुस्से का दूसरा चरण यानि पिछली कथा से आगे - जबलपुर से माँ और हम बच्चे मामा के साथ मामा के घर पहुँच गए, वहां हमें एक नन्ही सी ताजा सी ममेरी बहन को पैदा होते हमने देखा, मतलब होते हुए तो नहीं , होने के तुरंत बाद हमने देखा। एक सप्ताह के बाद माँ ने जिद्द की कि उन्हें गाँव पहुंचा दिया जाए। काश उन्होंने जबलपुर जाने की जिद्द की होती तो शायद मामा हमें जबलपुर भी पहुंचा देते, लेकिन माँ को तो गाँव की बहुत याद आया करती थी , तो उनका इरादा गाँव में कुछ दिन रूककर जबलपुर जाने का था, उसके लिए उन्होंने चाचा जी से बात की तब उन्हें पता चला कि उनके पास पापा की चिट्ठी आयी थी जिसमे चेतावनी लिखी थी कि ख़बरदार कोई हम लोगों को लेकर जबलपुर आया तो ! चाचा लोग तो पहले से ही पापा से बहुत डरते थे। इस प्रकार हमारा जबलपुर का छोटा सा स्टे अंतिम स्टे बन कर रह गया। "
"घोस्ट कथा - ४
पता नहीं सचमुच पापा को मुझ से प्यार था या कोई और कारण था, कि अगले साल की गर्मियों की छुट्टियों में वे गाँव आये, और घर के बाहर ही घर के बाहरी कमरे में मुझे बुलाया और कहा कि जो भी तुम्हारे पहनने के कपडे हों वो एक बैग में रख लेना, और कल मैं तुम्हारा एक बढ़िया स्कूल में दाखिला करवाने चलूँगा। उन्होंने न भाइयों को देखा, और न माँ से बात की , लेकिन माँ का भेजा हुआ खाना खाया, पता नहीं सचमुच उसमे कुछ गड़बड़ थी या उन्हें खाना खाने के बाद पता चला कि खाना माँ ने बनाया है, क्यों उनके लिए खाना लेकर तो चाचा जी आये थे जब मैं उनके पास बैठी थे , तो उन्होंने खाने की उल्टी कर दी, और चाचा से बोले कि जल्दी से गांव में जो भी डॉक्टर हो, जल्दी बुलाओ। डॉक्टर आया, उसने दवा दे दी , उलटी बंद हो गयी. ये उनका नाटक था या सचमुच खाना दूषित था ,ये हमें कभी पता नहीं चला , लेकिन मुझे विश्वास है कि खाना दूषित नहीं था , क्योंकि वही खाना घर में हम बच्चों ने और माँ ने भी खाया था, और हमें कोई उलटी नहीं आयी। सुबह हुई, पापा ने कुछ नहीं खाया और ये तक कह दिया कि ये औरत मुझे मारना चाहती है।
वो मुझे लेकर एक पर्वतीय प्रदेश के एजुकेशन हब कहे जाने वाले शहर में एक कॉलेज में ले गए, उस कॉलेज की प्राचार्या शायद उनकी जान पहचान की थी , उन्होंने बड़े आदर से हमें बैठाया , मुझे भी बड़े प्यार से बात की, समझाया, और मेरा एडमिशन कक्षा ६ में कर लिया। घर से , माँ से अपने भाइयों से सबसे दूर इतनी छोटी सी उम्र में मुझे एक अनजान जगह छोड़ कर मेरे पापा मुझ से हाथ छुड़ा कर जब चले तो मैं फूट फूट कर रोई। उनके जाने के बाद थोड़ी देर तो प्रिंसिपल मुझे प्यार से समझाती रहीं लेकिन जब एक बार वो गरजी तो मेरी सिट्टी पिट्टी गुम हो गयी और मेरी रुलाई एक दम से रुक गयी। न पढ़ने में मन लगता , न खाना अच्छा लगता था, वहां की हॉस्टल की वार्डेन उदार थी और छात्राओं का ध्यान रखती थी. एक सप्ताह बाद मैंने ढंग से खाना शुरू किया, और पढ़ना भी शुरू किया। जबलपुर में पापा द्वारा कराई गई पढ़ाई यहाँ काम आई और मुझे अच्छे छात्रों में गिना जाने लगा. वहां मेरी कई सहेलियां बन गयीं। ये महाविद्यालय स्नातक स्तर तक का था और इसमें कक्षा ६ से केवल लड़कियों को प्रवेश दिया जाता था। अब तो ये पोस्टग्रेजुएट कॉलेज है और बहुत तरह के नए नए कोर्स इसमें शुरू हो चुके हैं।
धीरे धीरे मेरा मन यहाँ रम गया। गर्मियों के एक महीने की छुट्टी में गाँव जाती और माँ के साथ समय बिताती , मुझे लेने के लिए हमेशा मेरे चाचाओं में से कोई आ जाता था और उनमे से ही कोई महीने भर बाद वापस छोड़ जाता था। बरस दर बरस बीतते गए। मुझे घर जाने का साल भर में एक बार ही मौका मिलता था, तब माँ भरपूर लाड लड़ा लेती थी, लेकिन फिर भी मुझे अब अपना नया ठिकाना, नया शहर , नए दोस्तों में ही मन लगने लगा था, इसलिए केवल माँ से बिछड़ते समय थोड़ी देर के लिए उदासी आती थी और थोड़ी देर में सब ठीक हो जाता था। मेरे पापा मुझे लेने केवल एक बार आये, वो भी तब जब उन्हें मुझे शादी के मंडप में बिठाने का फ़र्ज़ पूरा करना था।"
"घोस्ट कथा -५
आपको क्या लग रहा है कि मेरे पापा कोई गैर जिम्मेदार आदमी थे, हरगिज नहीं , वे कई विषयों में मास्टर्स डिग्री प्राप्त कर चुके थे, पी एच डी कर चुके थे, उस समय मेरे गाँव ही नहीं आस पास के गाँवों में और कहें तो कई कई कोस तक हमारे बिरादरी में उनसे ज्यादा पढ़ा लिखा नहीं था, लेकिन मेरे पापा सिर्फ स्वाभिमानी ही नहीं थे, जैसा कि उन्होंने अपने ससुराल में हुए अपमान की प्रतिक्रिया में प्रकट भी कर दिया था, लेकिन उन्हें अपनी पढ़ाई का घमंड भी था और इस घमंड में वे गाँव की चौपाल पर अपनी बिरादरी को गाली भी देते थे, यद्यपि ये उनका तरीका उन लोगों को शिक्षा के प्रति जागरूक करने का था। वे चाहते थे कि उनके गाँव और बिरादरी के लोग अपने ऊपर लगे हुए पिछड़ेपन के दाग को मिटायें, और इसके लिए वे हर उस व्यक्ति की मदद करने को तैयार रहते थे, जो शिक्षा के प्रति अपना लगाव प्रदर्शित करे। उन्होंने मुझे दूर पढ़ने इसलिए भेजा क्योंकि आस पास के विद्यालयों में लड़कियों के लिए कोई ढंग का स्कूल था ही नहीं , दूसरा वे मुझे गाँव के माहौल से दूर रखना चाहते थे, जब मेरे भाई पढ़ने लायक हुए तो उन्हें भी गाँव से काफी दूर अलग अलग शहरों के बेहतर स्कूलों में हॉस्टल में पढ़ने भेज दिया। मेरे ताऊ का लड़का जो उम्र में मुझ से कुछ ही घंटे छोटा था, उसे उन्होंने एम् ए , पी एच डी कराने में पूरा सहयोग दिया, जबकि मेरे ताऊ उसे अपने साथ खेती में जोड़ना चाहते थे , और अपने छोटे भाइयों की भी शिक्षा का पूरा प्रबंध किया, और सभी को इस योग्य बना दिया कि सब के सब अध्यापक बन गए, और हमारा परिवार मास्टरों का परिवार कहा जाने लगा। उन्होंने गाँव के पास ही निजी जमीन पर लोगों से चंदा इकठ्ठा करके एक इंटर कॉलेज स्थापित करवा दिया, इस कॉलेज ने गाँव ने शिक्षा की बयार बहा दी, सब लोग कम से कम इंटर तक तो पढ़ने ही लगे. मेरे चाचा इस विद्यालय में प्रवक्ता भी रहे और प्रिंसिपल भी, मेरे ताऊ का लड़का भी सरकारी कॉलेज में प्रिंसिपल हुआ, मेरे छोटे चाचा भी केंद्रीय विद्यालय में टीचर बने, मेरे ताऊ के दो और लड़के भी शिक्षक बन गए। बाद में मेरे दोनों भाई, दोनों भाभियाँ भी केंद्रीय विद्यालय में टीचर बनी। ये सब मैं इसलिए बता रही हूँ कि कहीं आप मेरे पापा को कठोर निर्दयी न समझ लें, वो जिद्दी थे , जो ठान लेते थे कर लेते थे. बस मुझे उनसे एक शिकायत रही कि वे क्षमाशील नहीं थे, क्योंकि शायद उनका बचपन कठिनाई में बीता था और बहुत अवरोधों के बाद ही वे शिक्षा प्राप्त कर पाए थे, दादा जी से लड़भिड़ कर। मझे उनसे डर तो लगता था लेकिन उनके प्रति सम्मान और प्यार भी बहुत था और है , क्योंकि उन्होंने हमारे परिवार को और परिवार के बाहर के भी प्रतिभावान युवाओं को आगे बढ़ने में बहुत मदद की, वे शिक्षा के प्रति पूरे जीवन भर समर्पित रहे। दूसरी शिकायत ये रही कि वे माँ और बच्चों के प्रति बहुत कठोर रहे , बरसों तक मेरे अलावा किसी से उन्होंने बात तक नहीं की। और मुझे एक दिन उनके सामान में एक पुस्तक दिखी "सुल्ताना डाकू " उस पर मैंने अपने पापा का नाम छपा देखा तो मुझे गर्व हुआ कि वो लेखक भी थे, उसे पढ़ कर पता चला कि नजीबाबाद के इस कुख्यात डाकू की जीवनी पर उपन्यास भी लिखा गया है और वो लेखक मेरे पापा हैं। "
तो आज की ये कथा घोस्ट ने अपने पापा की छवि पर पड़ी धुल को साफ़ करने के लिए बताई।
"घोस्ट कथा - ६
मेरे हॉस्टल और स्कूलिंग का खर्चा मेरे पापा सीधे प्रिंसिपल महोदया के पास मनीऑर्डर से भिजवा देते थे, मेरी सभी आर्थिक जरूरतों के बारे में मुझे कोई चिंता नहीं करनी पड़ती थी, लेकिन मुझे बाजार जाने की अनुमति नहीं थी , हम केवल किसी प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए ही बाहर निकलते थे और अध्यापिका की निगरानी में ही बाहर जाते थे और उन्हीं के साथ वापस आते थे, वह कॉलेज एक तरह से जेल जैसा था, सब कुछ अनुशासन में था, सीनियर लड़कियां , जूनियर्स से जरूर कपडे धोने जैसी कुछ सेवा करवा लेती थीं, और इसे वार्डन की मौन स्वीकृति मिली हुई थी। अधिकतर शिक्षिकाएं, या तो अविवाहित थीं , या तलाकशुदा या विधवा थीं, प्रिंसिपल का स्टेटस हमें कभी स्पष्ट नहीं हो सका कि वे तलाकशुदा थीं या विधवा? ? उनकी दो बेटियां थीं और दोनों ही विवाहित थीं, वे कभी कभी अपनी माँ से मिलने आ जाती थीं और तब वे हॉस्टल में भी आती थीं और हमें अच्छी लगती थीं, आधुनिक थीं , विचारों से भी और पहनावे से भी। मुझे अपने पिता के मेरी माँ से किये जाने वाले बर्ताव और कॉलेज की शिक्षिकाओं के स्टेटस और उनकी पुरुषों के बारे में राय से शादी नामक संस्था में कोई रूचि नहीं रह गयी थी, और मैं चाहती थी कि किसी तरह अपनी पढ़ाई पूरी करके नौकरी करूँ और फिर अपनी माँ और अपने भाइयों का ध्यान रखूँ। यद्यपि पापा मेरी ही तरह मेरे भाइयों की पढ़ाई की भी उचित व्यवस्था करके उन्हें भी हॉस्टल युक्त अच्छे स्कूलों में भेज चुके थे, और माँ अपना गुजारा गाँव की जमीन में चाचा जी की मदद से खेती करवा कर, कर ले रही थीं , शुरू के कुछ वर्षों तक मेरे मामा लोग भी माँ की मदद करते रहे लेकिन धीरे धीरे उनका संपर्क साल में एक दो बार भैया दूज या रक्षाबंधन तक ही सीमित रह गया, माँ का भी मायके जाना कम होता गया। लेकिन गर्मियों की छुटियों में मैं , दोनों भाई और माँ खूब अच्छे से समय बिताते थे, लेकिन खेती की आमदनी से सिर्फ माँ का ही काम चल पाता था और हम तीनों के लिए माँ अधिक कुछ नहीं कर पाती थी सिर्फ खाना , घी दूध से छका देती थी।
किसी ने माँ के कान भरे कि मेरे पापा ने अपनी कार्यस्थल पर कोई दूसरा विवाह कर लिया है, तो डरते डरते माँ ने चाचा से कहा कि इस बारे में कुछ पता लगाए, लेकिन वे अपने भाई के खिलाफ जासूसी के लिए तैयार नहीं हुए, फिर उन्होंने अपने भाई यानि मामा जी से कहा तो उन्होंने भी बहुत रूचि नहीं दिखाई। इस लिए वो मन मसोस कर रह गयीं। इस बात का खुलासा बहुत बाद में हुआ कि ये अफवाह हमारे परिवार से ईर्ष्या रखने वाले गाँव के लोगों ने ही फैलाई थी और इस में तनिक भी सच्चाई नहीं थी।
पढ़ते पढ़ते हम स्नातक भी हो गए, अब समस्या थी कि मैं और पढ़ना चाहती थी, और हमारे कॉलेज में ग्रेजुएशन तक की ही शिक्षा थी, शहर का सबसे बड़ा कॉलेज डी ए वी पो ग्रे कॉलेज था, वहां सहशिक्षा थी, और हॉस्टल में सीटें काम थीं और डिमांड ज्यादा। एक समस्या ये भी थी कि पापा मुझे अंग्रेजी में एम् ए कराना चाहते थे और मैं अंग्रेजी से घबराती थी। ग्रेजुएशन में वैसे तो मेरी प्रथम श्रेणी आयी थी लेकिन अंग्रेजी में तो जैसे तैसे पास ही हो पायी थी। इस में मेरी मदद की मेरे पापा की मुंह बोली बहन मेरी प्रिंसिपल ने. पापा ने उनसे थोड़ी जिरह तो की , कि अंग्रेजी में जॉब का स्कोप ज्यादा है, हिंदी, संस्कृत या राजनीतिशास्त्र में उतना नहीं है। लेकिन प्रिंसिपल ने कहा कि संस्कृत में निष्णात होगी तो जॉब की गारंटी उनकी है। और मैंने संस्कृत में MA में प्रवेश ले लिया, प्रिंसिपल ने मुझे हॉस्टल में रहने की अनुमति देने के बदले मुझे कक्षा ८ तक की छात्रों के पढ़ाने की शर्त रखी जो मैंने तुरंत मान ली, पापा भी दमयंती कपूर, यानि एक अनुशासन प्रिय प्रिंसिपल के संरक्षण में हॉस्टल में रहने की सुविधा को देखा मान गए।
घोस्ट कथा- ७
पापा मुझ से संतुष्ट थे, लेकिन मुझ से छोटे भाई ने उनकी उम्मीदों पर तब पानी फेर दिया जब वह बोर्ड इंटरमीडिएट की परीक्षा में फ़ैल हो गया , पापा के दरबार में माफ़ी तो थी ही नहीं , उसे हॉस्टल से निकाल कर गाँव पहुंचवा दिया , ये कहकर पढ़ना हो पढ़ो , न पढ़ना हो अपनी खेती बाड़ी सम्भालो , और उस से पल्ला झाड़ लिया। भाई गाँव माँ के पास पहुँच गया. इस से उन दोनों को एक दुसरे का साथ मिल गया लेकिन पढ़ना तो था ही , चाचा जी वाले स्कूल में ही एडमिशन ले लिया और वहीँ से इंटरमीडिएट करके ग्रेजुएशन के लिए गाँव के पास के जिला मुख्यालय के बड़े कॉलेज में एडमिशन ले लिया। गाँव से बस पकड़ कर शहर पढ़ने जाता रहा।
मैं पहली बार अपने ९ वर्ष के कठोर अधिवास से बाहर आयी तो बहुत अच्छा लगा। वहां मेरी तीन सबसे प्रिय सहेलियां थीं, उनमे से एक अपनी छोटी बहन(इसलिए वह भी सहेली जैसी हुई ) के साथ वहां पढ़ती थी, वे किसी फौजी अफसर की बेटी थीं , उनके पिता जीवित नहीं थे, माँ शायद पेंशन पाती थी और वही उनका खर्चा उठाती थी। मेरी सहेली की अंग्रेजी (फौजी) माहौल से आने के कारण बचपन से ही अच्छी थी , उतनी है अच्छी जितनी मेरी संस्कृत अच्छी थी। उसने अपनी माँ को बुलवा कर प्रिंसिपल से बात करवाई, और उसे भी उन्हीं शर्तों पर हॉस्टल में रहने की अनुमति मिल गयी और उसने डी ए वी में MA इंग्लिश में एडमिशन ले लिया। अब हम दोनों साथ साथ हॉस्टल से जाती, साथ साथ वापस आती और शाम को हॉस्टल में छोटी लड़कियों को एक्स्ट्रा क्लास के रूप में शिक्षा देती। प्रिंसिपल भी थोड़ी सुरक्षा से निश्चिन्त हो गयी कि उनके हॉस्टल की साथ साथ दो लड़कियां DAV जाती हैं और साथ ही वापस आती हैं। मेरी तीसरी सहेली की पढ़ाई ग्रेजुएशन के बाद बंद हो गयी , क्योंकि उसके परिवार की स्थिति अच्छी नहीं थी , पिता गुजर चुके थे, कई भाई बहन थे , बड़ा भाई छोले भठूरे का खोखा लगाता था। उसकी माँ छोले भठूरे बनाती थी और वह बस दुबारा गर्म करके बेचता था। लेकिन उसके खोखे पर भीड़ रहती थी। मैंने और मेरी सहेली बिमला ने कई बार मुफ्त में / दोस्ती में वहां छोले भठूरे खाए। वहां एक हैंडसम लड़का भी अक्सर आता था, और हम से बात करने की कोशिश करता था, हम रेस्पॉन्ड नहीं करते थे। एक दिन उसने कहा कि आप लोग कमला की क्लास फेलो हो क्या ? कमला तो हमारी तीसरी सहेली थी , जिसकी पढ़ाई छूट गयी थी , तब हमें पता चला कि वह कमला (जो कि हमारे पुराने कालेज की डे स्कॉलर थी , का दोस्त था और उसी से मिलने के बहाने के लिए उसके भाई के ठेले पर छोले भठूरे खाने आता था। कमला भी भाई के पीछे खोखे में बैठी उसे देखती रहती थी। खैर हमने मामला समझ लिया और उनकी मदद करने के गरज से उससे बात करने लगे, उसका नाम सतीश था। धीरे धीरे वह हमारा दोस्त बन गया लेकिन मैं जल्द ही सतर्क हो गयी क्योंकि उसने कमला के बजाय मेरे चक्कर ज्यादा लगाने शुरू कर दिए , अब वह हमें छोले भठूरे के खोखे के बजाये हमारे DAV के गेट पर इंतजार करता मिलता। मैंने उसकी शिकायत कमला से कर दी और फिर उनमे क्या हुआ ये तो नहीं पता, लेकिन हमारा पीछा उसने छोड़ दिया। हमारे एक हैंडसम टीचर भी पढ़ाते पढ़ाते मुझे पर चॉक फेंक कर मारने का बहाना ढूंढते थे। लेकिन मुझे पारिवारिक कारणों से शादी प्रेम जैसे मामलों मे कोई रूचि ही नहीं थी। बहुत डरपोक थी मैं।
घोस्ट कथा -८
" थोड़ा फास्फोरवर्ड कर देते हैं। मैं शादी के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं थी, लेकिन पापा ने धमका कर मुझे शादी के लिए तैयार कर लिया और तब मैं DAV से ही MA कर चुकने के बाद बी . एड कर रही थी। मध्यसत्र में ही मेरी शादी की तारिख आ गई. अक्टूबर १९७७ में सगाई हुई , आजकल की पीढ़ी के लोगों को ये बाद अजीब लगेगी कि सगाई कार्यक्रम के लिए लड़की की उपस्थिति अनिवार्य नहीं होती थी. लड़की के भाई , पिता , चाचा , यहाँ तक कि उनके कोई दूत (जैसे पंडित और नाइ ) भी जाकर वरपक्ष में लड़की की सगाई कर आते थे। मेरी सगाई में भी मेरे पापा अपने भाइयों और मेरे भाई , और अपने कुछ रिश्तेदारों को लेकर वरपक्ष के घर गए थे। लेकिन मेरे पापा ने एक आयोजन अपनी प्रिंसिपल दीदी के कार्यालय में भी इस सगाई से पंद्रह दिन पहले किया था, जिसमे वरपक्ष के लोग मुझे देखने आये थे और मुझे भी अपने होने वाले दूल्हे से कुछ मिनट अकेले में बात करने का मौका दिया था। जो उन दिनों आम बात नहीं थी। "
चलिए अब तो अधिकतर लोग जान ही गए हैं कि इस कहानी की सूत्रधार जो कथा की नायिका भी है, मेरी पत्नी वन्दना ही है। इस प्रसंग को मैं पहले अपनी शादी की घटना पर एक लम्बी पोस्ट डाल चुका हूँ , कि कैसे मेरे पापा ने मेरे ससुर जी को उनके रूखे और अव्यवहारिक बर्ताव के कारण रिजेक्ट कर दिया था और हमारी शादी की बात ख़त्म ही हो गयी थी , लेकिन मेरे एक डायलाग और मम्मी के समर्थन 'इसमें लड़की की क्या गलती है' से मेरे पापा ने मुंह सुजाये सुजाये शादी की सहमति दे दी थी , क्योंकि लड़की तो उन्हें भी बहू के रूप में पसंद आई थी .
हाँ तो वापस आते हैं घोस्ट के बयान पर -
" उस दिन जब वे लोग मुझे देखने आने वाले थे , मेरी एक टीचर और मेरी सहेली विमला ने मुझे सजाया , संवारा, और साड़ी पहनाई , और मेरे साथ ही मेरे अगल बगल रहते हुए मुझे प्रिंसिपल ऑफिस के रिटायरिंग रूम में ले गयीं , जिसमे सोफे पड़े हुए थे, सोफों पर तीन महिलाऐं , दो युवक और एक प्रौढ़ दंपत्ति बैठे थे। मैं नजरें झुकाए थी , बिलकुल पुरानी हिंदी फ़िल्मी दृश्य की तरह। मैं तब तक नजरें झुकाए बैठी रही जब तक कि प्रिंसिपल साहिबा ने सब को सम्बोधित करते हुए कहा कि चलिए मैं आप लोगों को अपना कॉलेज दिखाती हूँ , तब तक राजेन्द्र और वन्दना आपस में कुछ बात कर लेंगे। मेरे पापा तो उस कक्ष में घुसे ही नहीं और पूरे समय बाहर ही घूमते रहे। उन के जाने के बाद मैंने नजरें उठाई और ठीक से अपने होने वाले दूल्हे की तरफ देखा। मुझे वह हैंडसम लगा, उसने बात करने की शुरुआत की- क्या आप इस शादी के लिए तैयार हैं। मैंने कहा कि अभी तो तैयार नहीं हूँ , और चाहती हूँ कि कुछ महीनों के लिए शादी टाल दी जाए क्योंकि मैं बी एड पूरा करना चाहती हूँ। तो उसने कहा= कि शादी टालने का कोई और कारण भी हो तो वह भी निस्संकोच बता दीजिये क्योंकि संभव है कि इस उम्र और कॉलेज के माहौल में किसी से प्रेम भी एक कारण हो सकता है , मैं कोई बहाना बना कर शादी से मना कर दूंगा, और आपका यदि कोई प्रेम है , तो उसे किसी से प्रकट नहीं करूंगा , फिर जब आप चाहें तब जिस से चाहें शादी कर लेना , क्योंकि मुझे भी शादी की कोई जल्दी नहीं है , मैं भी प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी कर रहा हूँ।= मैंने कहा, नहीं , मैं प्रेम व्रेम के चक्कर में नहीं पड़ती , लेकिन मैं भी जॉब तो करना चाहती हूँ , पढ़ाई पूरी करने के बाद , शादी में मेरी भी दिलचस्पी नहीं है। हम ज्यादा बात नहीं कर पाए थे कि लोग फिर से कमरे में आ गए। इसके बाद ज्यादा बातें नहीं हुईं , प्रौढ़ व्यक्ति जो बाद में मेरे प्यारे ससुर जी बने, ने ठीक है जी , अब हम लोग चलते हैं , जल्दी सूचित करते है, कहा और उठ लिए। उनके उठते ही बाकी लोग भी चल दिए। मैं भी अपनी सहेली के साथ अपने हॉस्टल के कमरे में पहुँच कर ऐसे लम्बे लम्बे सांस लेने लगी जैसे बड़ी मेहनत का काम कर के आई हूँ। "
घोस्ट कथा - ९
"पीछे की घटनाएं तो मुझे बाद में पता चलीं कि शादी कैसे रद्द होते होते तय हो ही गयी , लेकिन शादी से पहले मैंने हिम्मत करके एक चिट्ठी पापा को लिख दी थी , कि पापा जी , मैं चाहती थी कि अभी मेरी शादी एक साल टाल दी जाए , अभी मैं २२ की ही तो हूँ। मैं भूल गयी थी कि हमारी बिरादरी और गाँव में तो १८ साल होते ही लड़की को विदा करने की कोशिश होती थी , मैंने घुमा फिर कर यह भी जता दिया था, कि शिक्षक से बेहतर नौकरी वाला लड़का ढूंढते तो और अच्छा होता। पापा का एक गरमागरम जबाब आया- मैंने दुनिया देखी है , लड़का आज शिक्षक है लेकिन मुझे पूरा विश्वास है कि वह जल्द ही एक अफसर बनेगा, उसमे बहुत प्रतिभा है और शिक्षक भी रहा तो भी वह तुम्हारे लिए बहुत अच्छा पति सिद्ध होगा , और अंत में एक धमकी भी लिख दी , अच्छे लड़के आसानी से नहीं मिलते , अगर ये रिश्ता हाथ से निकल गया तो तू मेरा मरा मुंह देखेगी । . इसके बाद तो मुझे चुपचाप शादी ही कर लेनी थी , और कोई सवाल की गुंजाइश ही नहीं छोड़ी थी. मुझे लेने पापा शादी से एक सप्ताह पहले आ गए , मेरे साथ मेरी दो सहेलियां भी चलना चाहती थीं , थोड़ी सी आनाकानी के बाद पापा ने उन्हें भी साथ चलने की अनुमति दे दी। लेकिन पापा मुझे गाँव नहीं लाये , बल्कि मुरादाबाद के हमारे एक रिश्तेदार के घर ले गए। वहां बातों बातों में मैंने जिक्र किया कि मैं स्कूटर चलाना सीखना चाहती हूँ। पापा के पास एक स्कूटर था वे मुझे उस पर बैठा कर शॉपिंग के लिए ले कर गए थे , तभी मैंने मौका देखकर अपनी ये इच्छा कह दी। पापा ने प्यार जताते हुए कहा कि मैं सीखा भी देता और तुझे शादी पर स्कूटर दहेज़ में भी देता लेकिन राजेन्द्र तो दहेज़ के नाम से चिढ़ता है और फिर उन्होंने बाजार से आकर मुझे वो चिट्ठी दिखाई जो राजेन्द्र यानि मेरे होने वाले दूल्हे ने उन्हें लिखी थी, मैंने इतने सुन्दर हस्तलेख में इतने सुलझी हुई भाषा में लिखी चिट्ठी को देखकर थोड़ी सी प्रसन्नता तो पाई लेकिन मेरे मन में अब तक देखी हुई शादियों और दहेज़ चर्चा के आधार पर जो छवि अपनी शादी के समय मिलने वाले उपहारों की बनाई थी , उसको जरूर धक्का लगा। अपने दूल्हे पर थोड़ा गर्व तो थोड़ा गुस्सा भी आया, कि मेरे उपहारों पर कुठाराघात कर दिया। एक आशंका ये भी जगी कि पता नहीं उस घर में जाकर दहेज़ के बारे में क्या सुनने को मिले ।
सादे ढंग से शादी हुई, मुझे डर लगा रहा कि कोई बखेड़ा न खड़ा हो जाए, हमारे रिश्तेदारों ने सारा इंतजाम अच्छे से किया था। मेरी माँ भी गाँव से वहीँ आ गयी थी. मुझे बाद में समझ में आया कि पापा ने मेरी शादी गाँव में अपने घर से क्यों नहीं की, कारण छोटा सा था कि उनके भीतर कहीं कोई हीन ग्रंथि थी और वह वर पक्ष को गाँव का अपना कच्चा छप्पर वाला घर नहीं दिखाना चाहते थे, या दूसरे अर्थों में कहें कि खुद को शहरी लाइफ स्टाइल का जताना चाहते थे। मेरे साथ मेरी सहेलियां भी मेरी ससुराल गयीं। और ऐसा मेरे पापा की फरमाइश पर हुआ, ये भी पापा ने मुझे बता दिया कि वो चाहते थे कि मेरी सहेलियां मेरी ससुराल को देखें। ससुराल निश्चय ही हमारे घर से बहुत बेहतर स्थिति में थी और सबसे अच्छी बात मुझे ये लगी कि मैं एक भरेपूरे परिवार में आई थी जिसमे मेरे ४ देवर और एक ननद थी , ननद शादी शुदा थी और नन्दोई भी ससुराल पक्ष में बहुत घुले मिले थे, दादा थे, दादी नहीं थीं। कई दिनों तक तो मुझे समझ ही नहीं आया कि इनके परिवार में कितने लोग हैं , बहुत बड़ा घर था दर्जन भर कमरे थे और सब भरे हुए थे। काफी आधुनिक सुविधाएं थीं. मेरे पति के दोस्त और देवर के दोस्त भी सपत्नीक वहां ठहरे हुए थे, इसलिए मैं भ्रमित रही. बाद में राजेंद्र ने मुझे बताया कि ये दम्पति भी हमारे घर के सदस्य जैसे ही हैं और अक्सर यहाँ लम्बे समय तक ठहर जाते हैं, उन्हें उचित आदर देना।
पहली रात मैं डरी हुई थी , पहली बार पापा और भाइयों से भिन्न किसी पुरुष के साथ मैं एक कमरे में और एक बिस्तर पर थी, जब राजेन्द्र कमरे में आये तो मैं बैठी हुई थी, तो उन्होंने मुझ से बहुत शालीनता से बात की और मुझे उपहार में एक पुस्तक दी, लेकिन वह अंग्रेजी में थी, और कहा कि घबराना नहीं , जब तक तुम कम्फर्टेबल महसूस नहीं करोगी, मैं तुम्हें नहीं छुऊंगा। हम दोनों एक पलंग पर जरूर थे लेकिन दो अलग अलग रजाई में थे. मैं उचटी उचटी नींद में सोई, और अज्ञात आशंका में रही. सुबह दिन निकलने से पहले ही घर में खटर पटर की आवाज सुनकर नीचे मम्मी के पास चली गयी. उन्होंने बिलकुल बेटी जैसा प्यार दिया और पूछा , खाना बनाना आता है , मैंने कहा नहीं, तो उन्होंने कहा कि कोई बात नहीं , मैं सब सिखा दूँगी। धीरे धीरे दो दिनों में मेहमान और दोस्त लोग चले गए और मेरी सहेलियां भी चली गयीं । तब मैंने देवरों और एक मात्र प्यारी सी ननद, जो खुद BA की छात्र थी, और नन्दोई जो LLM के अंतिम वर्ष में थे, या शायद कर चुके थे, लेकिन नौकरी के लिए प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी कर रहे थे, के साथ जो समय बिताया , उसने शादी, परिवार, जैसे विषयों पर मेरी धारणा को बिलकुल बदल दिया। मेरे दिमाग में अपने परिवार अपने रिश्तेदारों के संबंधों से तुलना करने के लिए एक बिलकुल अलग तरह का परिवार मेरे सामने था , और मैं उस परिवार का हिस्सा थी। मुझे लगने लगा कि मैं इस परिवार की धुरी हूँ , सब मेरे आगे पीछे घुमते रहते। राजेन्द्र गाँव से २३ किमी दूर मेरठ शहर में प्रवक्ता थे। वहां उन्होंने एक घर किराये पर लिया हुआ था, सारे भाई बहन , ननद नन्दोई, सब उसी में रह कर पढ़ रहे थे। अगले सप्ताह मैं भी सबके साथ शहर चली गयी।
वहां सब लोग मिलकर घर के सारे काम कर लेते, जिसको जो समय मिलता उसी में सब मदद के लिए उपलब्ध रहता। अच्छी बात ये थी कि सब को सब काम आते थे, खाना बनाने से लेकर सफाई तक। सबसे ज्यादा सीखने के लिए मैं ही थी , क्योंकि मुझे पहले ये सब करने का मौका ही नहीं मिला था। इतना प्यार और सहयोग मेरी कल्पना से परे था।
वह उस वर्ष की आखरी तारीख थी, शादी के २४ दिन बीत चुके थे, रात को देर तक हम लोग गप्पें मारते रहे, फिर जब हम सोने के लिए अपने कमरे में गए, तब राजेंद्र ने मुझे एक सूट उपहार दिया, और कहा कि नया साल आने वाला है , ये तुम्हारा उपहार। आज मुझे भी उस पर भरपूर प्यार, और प्यार ही नहीं, उसके संयम पर श्रद्धा उत्पन्न हुई. मैंने कहा कि आज मेरी तरफ से आपको नए साल पर उपहार यही है कि अब आप मुझे छू सकते हो। "
घोस्ट कथा - १०
" विंटर वेकेशंस समाप्त हो गयी थी , मेरी बी एड की कक्षाएं शुरू हो रही थी, इसलिए मैंने राजेन्द्र से कहा और वो मुझे वापस देहरादून छोड़ आये. लेकिन देहरादून में मेरा मन क्लास में बैठे बैठे अपने पति , देवर , मम्मी ननद के बारे में सोचने लगता और तुलना करने लगता। फिर मुझे लगता कि अगर मैं शादी न करने की जिद पकड़े रहती तो क्या क्या खोती। मेरी शारीरिक उपस्थिति और मानसिक अनुपस्थिति को मेरे टीचर नोटिस कर लेते, उन्होंने मेरी तरफ कुछ कहना चाहते थे कि मेरी सहेली जो अब मेरे ही साथ बी एड में भी थी , पहले ही बोल पडी, सर बेचारी की शादी हो गयी। फिर तो क्लास के लोगों ने मेरी चिढ ही बना ली, जब भी खोई खोई दिखाई देती, कोई न कोई कह देता, बेचारी की शादी हो गयी।
उन दिनों फोन तो थे नहीं, मतलब मोबाइल फोन नहीं थे , और व्यक्तिगत संदेशों के लिए चिट्ठियां ही एक सहारा थीं। मेरे हॉस्टल के पते पर राजेन्द्र की चिट्ठियां करीब करीब रोज आने लगीं, जिस दिन नहीं आती थी, उस दिन खराब रहता। डाकिया भी, टीचर्स और सहेलियां सब राजेन्द्र की चिट्ठियों को हैंडराइटिंग से ही पहचान लेते, दो तीन सहेलियां तो उन्हें पढ़ने की भी जिद करतीं और मैं उन्हें पढ़वा भी देती थी , वे प्रेमपत्र की तरह ही होती थीं , बहुत शुद्ध हिंदी में कविता जैसा सुख देने वालीं। लगता था जैसे कोई हिंदी साहित्य का विद्वान लिख रहा हो। एक आध पात्र अंग्रेजी में भी आया , जो मुझे लगा कि केवल इम्प्रैशन जमाने के लिए लिखा गया होगा, या फिर मेरी सहेली को इम्प्रेस करने के लिए। मुझे पापा की बात अब सही लगने लगी थी कि शायद मुझे इससे अच्छा पति नहीं मिलता। लेकिन दो महीने बीत जाने के बाद भी उन्होंने मुझ से मेरी किसी आर्थिक जरूरत की बात भी नहीं पूछी तो मुझे लगा कि इतनी मामूली सी बात उसे क्यों नहीं समझ आ रही कि मैं किसी जॉब में नहीं हूँ स्टूडेंट हूँ, मुझे पैसों की जरूरत होगी। लेकिन मैं अपनी तरफ से कुछ लिखना नहीं चाह रही थी. फिर भी एक दिन मैंने एक छोटी सी चिट्ठी लिखी , जब कि मैं सिर्फ इकतरफा चिट्ठियों का ही आनंद ले रही थी , जबाब नहीं देती थी। मैंने चिट्ठी में लिखा कि क्या आप समय निकाल कर देहरादून आ सकते हैं। और चौथे दिन राजेन्द्र मेरा इंतजार मेरे हॉस्टल पर करते मिले, जब मैं कॉलेज से लौट कर आयी। उन्हें देखते ही मेरी रुलाई फूट पड़ी, और मैं उनसे लिपट कर खूब रोई। वो पूछते रहे और मेरी सहेलियां कमरे से बाहर निकल गयीं। फिर मैंने घर परिवार के लोगों के बारे में पूछा। फिर पूछा कि मेरी याद आती है, वो बोले रोज चिट्ठियों से यही तो जताता हूँ। फिर बोले, कोई ख़ास बात थी जो मुझे बताना चाहती थी ? मैंने कहा कि क्या आप कुछ पैसे दे सकते हैं , मुझ पर उधार चढ़ गया है, मेस का भुगतान नहीं हुआ है और सहेली के भी कुछ पैसे उधार चढ़ गए हैं, तो वे बोले कि क्या पापा पैसे नहीं भेजते। मैंने कहा कि अब वह क्यों भेजेंगे। तब भेद खुला -- मेरे पापा ने राजेन्द्र से कह दिया था कि वन्दना को बी एड कराना मेरी जिम्मेदारी है, वो फिजूल खर्च है उसे पैसे मत भेजना। जब कि मुझे पापा ने कह दिया था कि अब शादी के बाद तुम से मैं मुक्त हुआ, तुम अब राजेन्द्र की जिम्मेदारी हो। अजीब है न, मेरे पापा ने फिर सिद्ध कर दिया कि वे अपने किस्म के अकेले ही पिता हैं। खैर राजेंद्र ने कहा कि अभी तो मैं नहीं लाया हूँ , तुमने चिट्ठी में बताया होता तो इंतजाम करके लाता, और वो वापस लौट गए। मैं फिर उदास हो गयी और सोचती रही, कि अब क्या होगा लेकिन वो चार दिन बाद फिर वापस आये। उन्होंने अपनी मोटर साइकिल बेच दी थी मुझे तनाव से मुक्त करने के लिए। "
घोस्ट कथा - ११
"मेरी शादी के समय मेरा सबसे छोटा देवर सैनिक स्कूल में घोडा खाल में कक्षा ८ में पढ़ रहा था। यह एक प्रतिष्ठित स्कूल था, और शादी के समय विंटर वेकेशन में गाँव आया हुआ था। लेकिन उसने मम्मी जी को घोड़ाखाल के बारे में बड़ी नकारात्मक बातें , अध्यापकों की सख्ती और भोजन की गुणवत्ता पर कहीं , और उन्हें पटा लिया कि अब वो वापस घोड़ाखाल नहीं जायेगा। जबकि वह वहां तीन साल से पढ़ रहा था, और इस स्कूल में एडमिशन एक कठिन प्रतियोगी परीक्षा के द्वारा होता था, राजेन्द्र ने बताया था कि उसके एडमिशन के लिए उसने और मेरे सबसे बड़े देवर अजय ने बहुत मेहनत की थी। लेकिन मम्मी जी ने कह दिया तो कह दिया कि वो अब घोड़ाखाल नहीं जायेगा। लेकिन मम्मी जी का विरोध तो राजेन्द्र कर ही नहीं सकते थे, उनके आदर्श बेटे थे, लेकिन उनका जो रूप मैंने उस दिन देखा तो मैं डर गयी। मेरे मन में अभी ताजा ताजा जो एक आदर्श छवि अपने पति की बन रही थी, उस में दरार पड़ गयी , उन्होंने लात घूंसो से अपने सबसे छोटे भाई की पिटाई कर दी। ऐसा लगा जैसे उनका कोई बड़ा सपना चूर चूर हो गया था। बदले में मम्मी जी ने एक कपडे धोने वाली थपकी उठाई और राजेन्द्र जी की पिटाई कर दी। ये सब मेरे लिए अप्रत्याशित था. मैंने अकेले में उनसे एक वादा लिया कि भविष्य में वे कभी किसी भाई की पिटाई नहीं करेंगे। पहले तो उन्होंने कहा कि अरे ऐसी कोई बात नहीं, पापा तो साथ रहते नहीं हैं , भाइयों को अनुशासन में रखने की जिम्मेदारी मेरी ही है , सीरियस मत लो, सारे भाई कई बार पिट चुके हैं. लेकिन मेरे इंसिस्ट करने पर उन्होंने मुझे वादा कर लिया।
अगले दिन सब कुछ नार्मल था, कोई किसी पर गुस्सा नहीं था, सब कुछ नार्मल जैसे कुछ हुआ ही न हो , मुझे ये भी अजीब लगा क्योंकि इस घर में ये सब क्या है, पिट जाते हैं फिर भी भैया का पूर्वत: आदर करते हैं , भैया भी पूर्वतः स्नेह जताते हैं। देखा, प्रवीण यानि सबसे छोटे देवर को तैयार किया जा रहा है, उन्हें मेरठ में सेंट मेरी स्कूल में मिड सेशन में दाखिला कराने लेकर जा रहे हैं राजेन्द्र जी। उनके लिए ये कठिन नहीं था क्योंकि वे स्वयं सेंट जोसफ में लेक्चरर थे।
मुझे ख़ुशी है कि उन्होंने मुझ से किया हुआ वादा निभाया। और इस परिवार में मेरा सफल दखल था, जिसके लिए मम्मी जी ने बाद में मुझे शाबाशी दी, कि तूने तो मेरे लाडले का गुस्सा ही ठंडा कर दिया।
कुछ दिनों तक* वह मेरा सबसे लाडला देवर भी रहा, क्योंकि वह मेरे छोटे भाई का हम उम्र था. उससे बड़ा देवर मेरे पहले भाई का हम उम्र था। और मैं अपने सबसे बड़े देवर से सिर्फ दो सप्ताह बड़ी थी। तो हम सब में बहुत प्यार और अच्छा तालमेल रहा. कुछ दिनों तक* क्यों कहा , ये भी आपको बाद में पता चल जाएगा।
मेरा बी एड पूरा हो गया था, और मैं स्थाई रूप से मेरठ आ गयी। खर्च अधिक था और आमदनी कम। इस से निपटने के लिए राजेन्द्र कभी सस्ते मकान ढूंढते , कभी अतिरिक्त आय के लिए ट्यूशन पकड़ते। तभी एक अच्छी बात ये हुई कि इन दोनों बड़े भाइयों के प्रतियोगिता परीक्षाओं के सकारात्मक परिणाम आने शुरू हुए. बड़े देवर यानि अजय को उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के मुख्यालय में ही नौकरी मिल गयी, और नन्दोई को भी एक मिल में श्रम अधिकारी की नौकरी मिल गयी, और राजेन्द्र को BDO का पद ऑफर हुआ और वे ट्रेनिंग में चले गए, जाने से पहले मुझे गाँव छोड़ गए, गर्मियों की छुट्टियां ख़त्म हो गयी थी. सेंट मेरी से निकाल कर प्रवीण को भी बालेनी के इंटर कॉलेज में कक्षा ९ में प्रवेश दिला दिया गया। अनिल IIT रुड़की में थे। तीसरे देवर जिन्हें सब मुन्ना कहते थे, इंटर करके गाँव आ गए और डे स्कॉलर के रूप में ग्रेजुएशन में दाखिला ले लिया। इस प्रकार मेरठ हम सब से छूट गया। "
घोस्ट कथा - १२
" अब मैं राजेन्द्र को राजी कहने लगी थी (अकेले में ) , वो मेरी हर बात पे राजी जो हो जाता था, मैंने नोटिस किया था कि वो मम्मी जी , रेखा बहन जी (मेरी प्यारी ननद ) और मैं, हम तीन की हर बात मान लेता था। यानि वो महिलाओं के प्रति ज्यादा ही उदार था। बाकी लोग उसकी हर बात मान लेते थे। राजी की ट्रेनिंग के समय मैं मम्मी जी के पास गाँव में थी तो मेरी भी ट्रेनिंग चल रही थी , गाँव के सभी तरह के घरेलू बहुओं वाले कामों की अच्छी ट्रेनिंग मम्मी जी ने मुझे दे दी , मम्मी मुझे मजाक में कहती थी, जा मैंने तुझे एम् एड करवा दी। लेकिन मैं थक बहुत जाती थी. और मुझे देहरादून के आराम के दिन याद आते थे। मजेदार बात ये कि मुझे मायके की याद नहीं आती थी , जब मैं पहले पहल देहरादून गयी ही तब मुझे अपने गाँव की याद आती थी , और जब मैं ससुराल में आ गयी तो मुझे देहरादून की याद आती थी। सबसे कठिन काम मुझे मक्का या बाजरे की रोटी बनाना लगा, लेकिन अभ्यास से ये भी सीख ही लिया। दही बिलोना थोड़ा मेहनत का काम था, लेकिन वर्जिश हो जाती थी, तब तक बिजली की मशीनें अधिक प्रचलित नहीं थी , जबकि इस घर में बिजली तो थी लेकिन सिर्फ रौशनी और पंखे चलाने के लिए. कपडे भी हाथ से धुलते थे।
ट्रेनिंग ख़त्म होते ही राजी गाँव आये। मम्मी ने कहा कि इसकी भी ट्रेनिंग ख़त्म हो गई है, अब इसे अपने साथ ले जा , राजी को बुलंदशहर जिले में गुलावठी विकासखंड के खंड विकास अधिकारी की पहली पोस्टिंग मिली थी। मम्मी जी की बात सुनकर मेरा मन भीतर ही भीतर प्रफुल्लित था लेकिन मुसीबतें मेरा इंतजार कर रही थीं। अभी तक मेरठ में और गाँव में मुझे बसी बसाईं गृहस्थी मिली थी, सब कुछ पहले से सुसज्जित था। मुझे केवल इस को इस्तेमाल करना था लेकिन अब आगे मुझे गृहस्थी खुद बसानी थी। मम्मी जी ने या किसी ने भी मुझ से शादी के दहेज़ के बारे में कोई बात कभी नहीं की थी, अड़ोस पड़ोस की महिलाऐं घर आती थीं और अगर दहेज़ के बारे में कुछ पूछती थी तो मम्मी जी खुद ही उनसे निपट लेती थी , बात मुझ तक नहीं आती थी। मुझे पता भी नहीं था कि मैं अब जहां जाने वाली थी , वहां क्या सामान है और क्या नहीं। इसलिए मैंने मम्मी जी से कुछ मांग भी नहीं की , और मैं और राजी, बस अटैची में जरूरत भर के कपडे आदि लेकर गुलावठी पहुँच गए. वहां सरकारी आवास था, लेकिन उसमे न कोई फर्नीचर , न पलंग , न चूल्हा, न बर्तन।
यहाँ से भविष्य के एक रिश्ते की नींव पडी। उस आफिस में एक ADO थे जो राजी के गाँव के पास के ही गांव के रहने वाले थे और किसी कृषि विपणन सहकारी समिति के MD भी थे, उन्हें पता चला कि साहब सपत्नीक आ गए हैं तो उन्होंने एक तखत और अपने घर से कुछ और सामान भिजवा दिया। राजी तो आते ही अपने ऑफिस में बिजी हो गए और मेरी खातिरदारी में आसपास रहने वाली स्टाफ की पत्नियां लग गयीं। शाम को जब राजी घर आये तो अपने साथ एक १३ बत्ती वाला केरोसिन का स्टोव और कुछ बर्तन लाए , थोड़ी देर में चपरासी राशन का थैला भी लेकर आ गया. ADO साब का लाया हुआ सामान राजी ने वापस ले जाने को कहा तो तखत को छोड़कर बाकी सामान तो वापस चला गया, लेकिन ADO साब ने तखत को तब तक रखने को कहा जब तक पलंग नहीं आ जाता। नौबत जमीन पर सोने की थी, शायद क्योंकि राजी सभी निजी सामान वापस करने पर जिद पकडे थे. ADO साब भांप गए तो बोले कि साहब तखत सरकारी है स्टोर में फालतू ही रखा था , जब आप का पलंग आ जाएगा , वापस स्टोर में रखवा दीजियेगा , मेरा नहीं है। इस प्रकार उस दिन वो तखत रहा और शायद दो तीन दिन और रहा , जब तक दो फोल्डिंग पलंग नहीं आ गए। वैसे वो इतना बड़ा तो था कि हम दोनों उस पर आराम से सो सके थे, डबल बेड से कुछ ही कम रहा होगा।
हर महीने थोड़ा थोड़ा सामान जुटता रहा और गृहस्थी बस्ती गयी। पहले दिन ADO साब की सदाशयता ने उन्हें हमारे नजदीक ला दिया। उनकी पत्नी और बच्चे भी मेरे पास आने लगे , हालांकि मेरे पतिदेव यानि राजी को वे पसंद नहीं थे और न उनका अधिक हम लोगों से घुलना मिलना, क्योंकि वे अधीनस्थ अधिकारी को अपनी नजदीकी का लाभ उठाने की प्रवृति से सशंकित थे। जो भी हो, उन ADO साब की बड़ी बेटी एक दिन मेरी भाभी बनने वाली थी।
घोस्ट कथा - १३
यहां यानि गुलावठी में मेरे साथ मेरा सबसे लाडला देवर भी अगले सत्र में पढ़ने के लिए आ गया. उसने कक्षा १० में DN इंटर कॉलेज में एडमिशन ले लिया। इस से मेरा मन थोड़ा अच्छे से लगने लगा, क्योंकि राजी तो सरकारी काम काज में बहुत बिजी रहते थे, और थके हारे और कभी कभी तनाव में भी रहते थे। लेकिन धीरे धीरे उनकी तारीफों का जिक्र मुझ तक पहुँच जाता था, कभी कभी अखबारों में भी उनका नाम छपता था, तो मुझे गर्व होता था। लोग उनसे मिलने आने लगे। फ़ूड फॉर वर्क और बायो गैस नामक कार्यक्रमों में उनके कार्य को देखने के लिए दिल्ली, लखनऊ और पडोसी जिलों के अफसर और मीडिया के लोग आने लगे. राजी आगंतुकों को चाय पिलाने या कभी भोजन के लिए भी वे घर पर ले आते थे, जो मुझे असुविधाजनक लगता था. लेकिन ये इतनी बार होने लगा कि फिर मुझे इसकी आदत सी पड़ गयी. मेरी ससुराल की सैंकड़ों लड़कियां या सैंकड़ों लड़के गुलावठी के आसपास के गाँवों में ब्याहे गए थे, गांव में तो सब एक दुसरे के भाई बंधू ही होते हैं तो यहाँ चारों और रिश्ते दार बहुत थे. वे गाहे बगाहे घर आ जाते, मुझे ये समझ नहीं आता था कि किससे घूंघट करना है किससे नहीं। गाँव के घर में तो मुझे आजादी थी, वहां कोई घूंघट प्रथा नहीं थी, लेकिन लोक लिहाज से मम्मी जी ने कह रखा था कि घर से बाहर निकलो तो मुख्य सड़क तक पहुँचने तक घूंघट कर लिया करो, मैं इसका पालन भी करती थी, लेकिन यहाँ क्या करूँ, और करूँ तो उनकी जलपान सेवा कैसे करूँ। राजी ने समस्या हल कर दी ये कहकर कि यहाँ तुम किसी की रिश्तेदार नहीं हो , एक अफसर की बीवी ही, विनम्रता बरतो, यथा सम्भव आदर सत्कार करो, लेकिन घूंघट की जरूरत नहीं। रिश्तेदार शुरू शुरू में तो किसी न किसी काम में फेवर करने की आस लेकर ही आते थे लेकिन जब उन्होंने देखा कि यहाँ सब एक ही पैमाने से नापे जाते हैं तो आना कम हो गया। हमारे रिश्तेदारों में से एक दो को छोड़कर बाकि सब ने समझ लिया की राजी एक निष्पक्ष अधिकारी है और सही काम में किसी को कोई दिक्कत नहीं होगी और गलत काम में किसी की मदद भी नहीं हो पाएगी। जो एक दो नहीं समझे वो आज तक उनकी बुराई करने से नहीं चूकते।
कुछ कथित(दूर के ) रिश्तेदारों ने महीने महीने अपनी लड़कियों को परीक्षा केंद्र गुलावठी पड़ने के कारण परीक्षा देने के लिए भेजा, जिनको मैंने हर तरह की सुविधा उपलब्ध कराइ, और उन नाशुक्रों ने कभी पलट कर दोबारा मिलने की या धन्यवाद देने की औपचारिकता भी नहीं निभाई। इसका मुझे अफ़सोस होता है कि लोग ऐसा कैसे कर लेते हैं।
राजी रोज प्रवीण को रात में पढ़ाते भी थे, और उसका सुफल ये मिला कि उसने बोर्ड एग्जाम में अपने स्कूल को टॉप किया। लेकिन वो ऐसी उम्र में था जब हार्मोन्स अपना असर दिखा रहे थे, तो उसने एक पड़ोस में रहने वाले अधिकारी की बेटी को कोई चिट्ठी लिख कर दे दी , लड़की में अभी हार्मोन्स का असर शुरू नहीं हुआ था , उसने वो चिट्ठी अपने पापा को दे दी , और उसके पापा ने वो चिट्ठी राजी को दे दी। भेद खुलने पर प्रवीण घबरा गया और उसने छुट्टी मिलते ही गांव जाकर मम्मी से शिकायत की, कि वह अब गुलावठी नहीं रहेगा, भैया पीटते हैं , और भाभी बासी खाना खिलाती है। तो जब हम लोग गांव गए तो मम्मी का मूड ऑफ था , बात खुली तो मेरा दिल टूट गया, जिस देवर को मैं सबसे लाडला मानती थी , जिसे सगे भाई जैसा प्यार करती थी , उसने पीठ पीछे मेरी झूठी शिकायत की. इस समय के लिए मैंने अपनी कहानी में पहले बताया था कि कुछ दिनों तक* वह मेरा लाडला देवर था।
गुलावठी में पापा जी, रेखा बहन जी, का जल्द जल्द आना जाना बना रहता था क्योंकि वे दोनों बुलंदशहर में रह रहे थे। पापा जी की नियुक्ति बुलंदशहर में थी और नन्दोई जी भी बुलंदशहर के पास ही एक फैक्ट्री में थे। इस प्रकार काफी व्यस्त और अच्छा समय बीत रहा था। इन्हीं दिनों मुझे ठीक उस दिन जब अमेरिका का एक सैटेलाइट लैब जिसे स्काईलैब का नाम दिया गया था, दुर्घटना ग्रस्त हो कर धरती पर गिरा, मुझे ईश्वरीय पुरुस्कार मातृत्व के रूप में मिला। बुलंदशहर के सरकारी अस्पताल में मेरी अमूल्य ख़ुशी मेरे पहले बेटे के रूप में मुझे मिली।
घोस्ट कथा - १४
घर परिवार में अगली पीढ़ी का पहला आगमन हुआ था. बड़ा उल्लास था, सब लोग वहां यानि गुलावठी में उस सरकारी आवास में इकठ्ठा हुए। ये आवास बहुत छोटा था मात्र दो कमरों का। दर असल, गुलावठी शहर से बाहर एक निर्जन सरकारी भूमि पर २५ साल पहले ये विकासखंड परिसर बनाया गया था, जिसमे BDO आवास, ADOs के आवास, बाबुओं, चपरासी आदि के आवास बनाये गए थे। लेकिन बताया जाता है कि चौधरी चरण सिंह के मुख्यमंत्री काल में लगभग आधे विकासखंड बंद कर दिए गए थे, क्योंकि वे एक ईमानदार मुख्यमंत्री थे और ब्लॉक्स को भ्र्ष्टाचार का अड्डा कहा जाता था। उन बंद विकासखंडों में से एक गुलावठी भी था। तो सरकार ने इन भवनों को त्याज्य मान लिया था। उसी अवधि में गुलावठी में टेलीफोन एक्सचेंज खुला तो टेलीफोन विभाग को अपने कार्यालय के लिए एक भवन की जरूरत पड़ी तो राज्य सरकार ने BDO आवास को उन्हें दे दिया। बाद में ब्लॉक्स की बहाली हुई लेकिन वह भवन केंद्र सरकार से राज्य सरकार वापस न ले सकी, तभी से BDO एक ADO आवास में रहते आये थे। स्टाफ की कमी थी, तो सारे क्वार्टर्स भरे हुए नहीं थे। तो बड़े बाबू ने एक रास्ता निकाला कि एक खाली पड़े आवास को खुलवा दिया और साफ़ सफाई करा कर इस्तेमाल लायक करवा दिया। परिवार जनों को ठहरने के लिए साधन हो गया। कई दिनों तक लोगों का आनाजाना बना रहा। मेरी सेवा के लिए रेखा बहन जी, मम्मी जी, थे। उनके लौट जाने के बाद मेरी माँ भी आईं।
एक पड़ोस के गाँव से (गुलावठी के पास ) एक बुआ जी का आवागमन इन दिनों शुरू हुआ. राजी उन्हें बुआ जी कहते थे, लेकिन वे राजी की हमउम्र ही थी। गाँव में कभी इनके दर्शन नहीं हुए थे और न इनका जिक्र आया था। राजी ने बताया कि वे बचपन में हमारे गांव में ही अपनी नानी के यहाँ रहती थी, यद्यपि वे रिश्ते में बुआ जी लगती थी, लेकिन उनकी सहेली थी।
घर के सब लोग उन्हें ओमी नाम से पुकारते थे. वे राजी को और मुझे भी बहुत लाड लड़ाती थी। शुरू शुरू में मैं कुछ सशंकित हुई, लेकिन धीरे धीरे दोनों (राजी और ओमी ) के बीच के स्वभाव को समझ कर नि:शंक हो गयी, और वे मेरे घोस्ट रूप धारण करने तक मेरी घनिष्ठ बनी रही।
एक दिन एक भयंकर भूल मुझ से हो गयी। मैं दोपहर में घर में अकेली थी , किसी ने दरवाजा खटखटाया, मैंने खोला तो एक व्यक्ति ने कहा कि साहब ने ये आपको देने के लिए कहा है, मैंने उसके हाथ से वो लिफाफा ले लिया और जहाँ राजी अपने ऑफिस के कागज़ रखते थे वहां रख दिया। राजी आये तो मैं उन्हें बताना भूल गयी। लेकिन रात को सोने से पहले उन्होंने उस लिफ़ाफ़े को देखा तो खोला तो उसमें एक सौ नोटों की गड्डी थी, उन्होंने मुझ से पूछा तो मुझे याद आया कि कोई लड़का आया था और उसने कहा कि आपने भिजवाया है तो मैंने रख लिया। राजी ने पूछा कि उस लड़के को पहचानती हो, मैंने कहा नहीं। तो राजी नाराज हुए, कि कोई मुझे फंसा कर जेल भिजवा दे तो तुम्हे कैसा लगेगा, मैं घबरा गयी , तब राजी ने बताया कि ऐसी साजिशें लोग करते हैं, सोचो कि अभी पुलिस आकर मेरे घर की तलाशी ले तो इस के बारे में क्या कोई तुम्हारी बात मानेगा। इतनी बड़ी रकम कहाँ से आयी। उन दिनों दस हजार रूपये बड़ी रकम मानी जाती थी। मेरी धड़कन तेज हो रही थी, वो शांत रहा लेकिन बोलै चलो अभी चलो, कुछ ही कदम पर एक बड़ा मंदिर था, हम वहां गए , अन्धेरा हो चूका था आरती वगैरा सब हो चुके थे, मंदिर लगभग सुनसान था। राजी ने वो गड्डी मुझे दी कि जाओ दानपात्र में डाल आओ। दानपात्र की दरार में गड्डी घुसी ही नहीं और मैं जल्दी से उसके ऊपर ही रख कर भाग आई। मेरी साँस अभी भी तेज चल रही थी। अब मुझे अपने सोते हुए बच्चे की याद आयी और मैं तेजी से सीधे वहीँ पहुंची और उस सोते हुए बेटे को उठा कर सीने से चिपका लिया। मैंने कसम खाई कि अब से किसी अनजान से ऐसा धोखा कभी नहीं खाऊँगी। राजी शायद सोचते रहे कि ऐसा करने वाला कौन हो सकता है। वो करवटें बदलते रहे। "
घोस्ट कथा - १५
भाई और माँ आये तो, मेरा मन हुआ कि वे ज्यादा दिन रुकें , लेकिन माँ तो बिलकुल नहीं रुकना चाहती थी, अनुराग को अपनी क्लासेज मिस होने की चिंता थी। तो मैंने फरमाइश की कि क्या मैं कुछ दिनों के लिए इनके साथ चली जाऊं। राजी तो राजी थे, मान गए। और हम नन्हें से बच्चे के साथ अपने माँ भाई के साथ चले गए। वे लोग तब मुरादाबाद के एक गंदे से मोहल्ले (सस्ता होने के कारन) चाऊ की बस्ती में रहते थे। एक कमरे का मकान था, लेकिन मकानमालिक अच्छे लोग थे , परिवार की तरह रहते थे। अनुराग हिन्दू कॉलेज से पोस्ट ग्रेजुएशन कर रहा था। छोटा भाई इंटर मेडिएट में पारकर में पढता था।
एक दिन मैं माँ के साथ बाजार में चूड़ियां खरीद रही थी, बेटे को मकान मालकिन के सुपुर्द कर के आई थी। अचानक से बाजार में भगदड़ मच गयी दुकाने फटाफट बंद होने लगीं। चूड़ी वाला भी शटर गिराने लगा, हमने कहा कि अरे चूड़ी तो पसंद कर लेने दो। उसने कहा जान बचाओ और भागो , जान बचे तो फिर चूड़ी पहनते रहना। अफरा तफरी में हम जैसे तैसे घर पहुंचे। वहां भी डर पहुँच चुका था। कुछ और किराए दार थे जो अपने गांव भागने की तयारी कर रहे थे। हमें भी कुछ नहीं सूझा हम पाँचों भी तुरंत मुख्य सड़क पर पहुंचे और ठाकुरद्वारा जाने वाली एक बस में चढ़ गए और फिर आगे चौराहे पर बस बदल कर गाँव पहुँच गए। अगस्त १९८० के भयंकर हिन्दू मुस्लिम दंगे मुरादाबाद में भड़के थे। जिसमे सैंकड़ों लोग मारे गए थे। "
इस घटना पर मैं यानि घोस्ट लेखक अपनी बात जोड़ता हूँ, अगले दिन अखबारों में मुरादाबाद में लगे कर्फ़यू की खबर पढ़ कर मैं चिंतित हुआ और कम्युनिकेशन का कोई साधन न होने के कारन वंदना और अपने बेटे की फ़िक्र में उन्हें ढूंढने मुरादाबाद पहुँच गया। कई जगह पुलिस वालों के रोकने पर किसी तरह उन्हें समझा बुझा कर, अपने पद का परिचय दे कर चाऊ की बस्ती में पहुंचा, जहाँ पता चला कि वे लोग गांव गए हैं, लेकिन गांव पहुंचे हैं या नहीं इसकी पुष्टि नहीं हो सकी. तो मेरी फ़िक्र बढ़ी और मैं पैदल कई किलोमीटर चल कर कर्फ़यू में किसी तरह बचता बचाता ठाकुरद्वारा मोड़ पर पहुँच गया और वहां से मुझे अपनी ससुराल की तरफ जाने वाली बस मिल गयी। यह मेरी पहली ससुराल यात्रा बड़ी डरावनी रही। रास्ते में खास कर रामगंगा में कई लाशों को मैंने देखा।
मुझे ससुराल में देखकर उन्हें और उन्हें सही सलामत देखकर मुझे आश्चर्य मिश्रित हर्ष हुआ, और फिर मैं वन्दना और अपने बेटे नामित को लेकर वाया ठाकुरद्वारा , बिजनौर, मेरठ होते हुए वापस गुलावठी २४ घंटे बाद पहुंचा।
घोस्ट कथा - १६
एक रात राजी करीब ११ बजे उठे और बोले कि मैं एक ज़रूरी काम से जा रहा हूँ ,दरवाजा बंद कर लो, मैंने कहा कि कहाँ , वो बोले कि यहीं शहर में , लौट के बताता हूँ । क़रीब ३ बजे लौटे । मैं जगी रही । लौटे तो आकर कुछ लिखा पढ़ी करने लगे और मैं निश्चिंत सो गई । सुबह मैंने पूछा तो उन्होंने बताया कि एक रेड मारने गया था , रात एक नक़ली खाद का कारखाना पकड़ा है, मैंने पूछा कौन कौन साथ था । बोले कोई नहीं । मैंने पूछा कि अकेले? बोले क्योंकि स्टाफ़ पर भरोसा नहीं था, कई बार प्लान बनाया था लेकिन हर बार प्लान लीक हो जाता था, लगता है कि कोई स्टाफ़ में ही उनसे मिला हुआ है। मैंने कहा कि आप अकेले नहीं है , पत्नी है, बेटा है , इनके बारे में सोच लिया करो , ऐसा खतरा उठाना ठीक नहीं . बोले सॉरी काम की धुन में, ये भूल गया था , आगे से ध्यान रखूँगा । फिर मैंने पूछा कि क्या सफलता मिली । उन्होंने कहा कि —जबरदस्त सफलता मिली । किसी को ये अंदाजा नहीं था कि मैं अकेला हूँ । गोदाम में मज़दूर टाइप के लोग थे , मुझे देखते ही भाग गए । संयोग से उधर से SO गुलावठी की जीप गश्त पर थी, मैंने हाथ दिया और उन्होंने मुझे पहचान लिया , फिर उन्होंने वायरलेस पर संदेश भेजकर गोदाम पर फोर्स बुला ली । आदमी कोई हाथ नहीं आया , एक ट्रक भरा हुआ तथा बोरी सिलने की मशीनें , सैंकड़ों बोरे सब जब्त करवा करवठाने जमा कराने और गोदाम सील कराने में इतना वक्त लग गया. जानती हो, SO कौन है, यशपाल यादव। ----
यशपाल का जिक्र अभी कुछ दिन पहले ही राजी ने मुझ से किया था और बताया था कि वह राजी के पापा के मित्र और सीनियर साधो सिंह का बेटा था। साधो सिंह पुलिस विभाग में एक प्रतिष्ठित अधिकारी थे, और राजी एक पापा के लिए वे आदर्श थे। मुझे तसल्ली हुई कि एक परिचित अधिकारी लोकल पुलिस में है तो हमारी सुरक्षा की ज्यादा चिंता नहीं। लेकिन अगले ही दिन दफ्तर में एक काण्ड हो गया। एक युवा कोंग्रेसी नेता ने राजी से उनके दफ्तर में बदतमीजी कर दी, और राजी संयम नहीं रख सके और उन्होंने दफ्तर में ही उस नेता की धुनाई कर दी, दफ्तर के और लोगों ने भी हाथ साफ कर लिए। शोर सुनकर थोड़ी देर बाद आस पास रहने वाले कर्मचारी और परिजन भी दफ्तर पहुँच गये, और उन्ही में से एक पड़ोसन महिला ने आकर मुझे किस्सा सुनाया, तो मुझे अच्छा नहीं लगा, थोड़ी देर में राजी घर आये साथ में SO यशपाल भी थे, दफ्तर में पुलिस लग गयी थी. मामला नेता जी का था, अब नेता जी के पक्ष के लोग और उनके विरोधी दोनों की भीड़ जमा हो गयी। यशपाल ने भरोसा दिलाया कि भाभी जी चिंता मत करिये , भाई साहब की सुरक्षा मेरी जिम्मेदारी है, ऐसी तैसी नेता जी की। यशपाल तो चले गए, राजी घर पर ही रुक गए। मैंने फिर इन्हें समझाया कि आप अब पब्लिक लाइफ में हैं , पब्लिक सर्वेंट हैं, ये कॉलेज लाइफ वाली जिंदगी नहीं है, गुस्सा करना छोड़िये । इन्होने मुझ से सॉरी कहा और कहा कि आगे से ध्यान रखेंगे।
२४ घंटे भी नहीं बीते थे कि अगली रात को हम सोये हुए थे, कि अचानक बेटा रोने लगा शायद उसका पेशाब निकल गया था, तो मैं और राजी उठे, लाइट जलाते ही, कमरे के बाहर भगदड़ सी सुनाई दी , राजी के पास बन्दूक थी, और खतरा भांप कर उसे लोड करके बिस्तर के पास रख कर ही सोए थे। उसने दरवाजा खोलने से पहले बन्दूक उठा ली और दरवाजा खोलते ही एक फायर भी कर दिया। तीन लोग पीछे के दरवाजे को खुला छोड़ कर भागते दिखाई दिए , लेकिन न पहचाने जा सके और न उन पर कोई गोली लगी , क्योंकि गोली उन पर निशाना लगा कर नहीं चलाई गयी थी। हमारे बराबर के कमरे की खिड़की उखाड़ कर अलग रख दी गयी थी और शायद उस कमरे की तरफ से घुसने ही वाले थे कि बेटा रो पड़ा था, वरना उस दिन कुछ भी हो सकता था। अब मैं बहुत डरने लगी थी। मैंने इनसे ट्रांसफर कराने के लिए कोशिश करने को कहा, लेकिन ये नहीं माने, इनकी क्षेत्र में लोकप्रियता बढ़ती जा रही थी और तत्कालीन जिलाधिकारी जावेद उस्मानी राजी को बहुत सम्मान देते थे , उन्होंने इस घटना के बाद रिवाल्वर का एक लाइसेंस भी इन्हें दे दिया, लेकिन ये रिवाल्वर तत्काल खरीद नहीं पाए, लेकिन प्रचार ये हो गया कि BDO साब के पास बन्दूक और रिवाल्वर दोनों है, रिवाल्वर वे हर समय साथ रखते हैं , जो कि सच नहीं था। "
घोस्ट कथा - १७
"कभी कभी बड़ी विचित्र बातें अनायास ही हो जाती हैं. चोर खुद पकड़ में आ जाता है। एक रात हम बैठे बात कर रहे थे, बिजली गयी हुई थी , कमरे में लैंप जल रहा था। दरवाजे पर हलकी सी आवाज हुई , मैंने कहा कि कोई है, राजी बोले कुत्ता होगा, एक कुत्ता हमारे दरवाजे पर बनी सीढ़ी के स्टेप्स पर आ कर बैठ जाता था, इसीलिए राजी ने ये अंदाजा लगाया। लेकिन बाहर से आवाज आयी, हाँ जी मैं ही हूँ। मेरी और राजी की एक साथ हंसी छूट गयी, मैंने दरवाजा खोला और मैं हँसते हँसते अंदर दूसरे कमरे में चली गयी। दरवाजे पर एक ADO साब खड़े थे जिन्हें लोग गुप्ता जी कहते थे, और उन्होंने बाहर शायद सुनाई पड़ा कि गुप्ता होगा , जिसके जवाब में वे बोल पड़े कि हाँ जी मैं ही हूँ। राजी ने जाहिर नहीं होने दिया कि उन्होंने "कुत्ता होगा " कहा था। गुप्ता जी ने भेद खुद ही खोल दिया, पूछने लगे, सर दो दिन पहले कोई लड़का आया था आपका घर पूछ रहा था, शायद कोई डाक लाया था, उसके हाथ में एक लिफाफा भी था। मिला क्या ? राजी के स्वर में तल्खी आते देख मैं कमरे में वापस आई, और मैंने गुप्ता जी से कहा कि साहब का मूड ठीक नहीं है, कल ऑफिस में बात कर लीजियेगा। गुप्ता जी अनमने से चले गए , जाते जाते बोले , तबियत ठीक न हो तो डॉक्टर को बुलवाऊं। मैंने कहा कि प्लीज आप जाइये, सुबह ऑफिस में मिल लीजियेगा।
आप भी समझ गए होंगे, कि वो लिफाफा जिसके बारे में किसी और को कुछ पता नहीं था, वो गुप्ता जी को पता था, यही वो स्टाफ था जो कृषि विभाग का था, और रासायनिक उर्वरकों के विक्रेताओं उत्पादकों से मिला हुआ था और किसानों को नकली खाद बिकवाने का दोषी था. राजी बहुत अपसेट हुए, और अगले दिन उन्होंने जिलाधिकारी जावेद उस्मानी, जो खुद भी बहुत ईमानदार अफसर थे, से मिल कर सारी बात बताई। जिलाधिकारी ने जिला कृषि अधिकारी को बुलाकर गुप्ता जी को जिला मुख्यालय पर बुलवा लिया। इस प्रकार ब्लॉक ऑफिस में राजी का रुतबा कायम हो गया कि इनके साथ रहना हो तो मेहनत औरईमानदारी से काम करना होगा। ऐसी कई घटनाएं हैं जो लिखी जा सकती हैं लेकिन वो नीरसता ही पैदा करेंगी, इसलिए उनकी विभागीय बातों पर और चर्चा नहीं करूंगी कि कब कैसे किस किस स्टाफ को उन्होंने सही रस्ते पर ला दिया।
एक नए विभाग और एक नए स्टाफ का जिक्र जरूर करूंगी, क्योंकि वह मेरे जीवन का हिस्सा बना । प्रौढ़ शिक्षा विभाग। ये नया नया खुला था और इसका एक अफसर जिले स्तर पर तैनात हुआ और दो दो सुपरवाइजर की पोस्ट ब्लॉक स्तर पर बनाई गयी. इन्हीं में से एक पोस्ट पर कमलेश त्यागी नामकी एक खूबसूरत लड़की गुलावठी में तैनात हुई। उसके ओफ़्फ़िए में जोइनिंग करने पर राजी उसे घर ले कर आ गए और मुझ से परिचय करवाया कि ये मिस त्यागी हैं , आज ही सुपरवाइजर प्रौढ़ शिक्षा के पद पर इस ब्लॉक में तैनात हुई है. और खुद इतना बता कर वापस ऑफिस चले गए। मैंने आपको बताया था कि महिलाओं के प्रति राजी कुछ ज्यादा ही उदार रहते रहे हैं. लेकिन एक जवान खूबसूरत लड़की को घर ले कर आना मुझे कुछ अटपटा लगा। खैर हमने काफी देर बात की, तो मुझे पता चला कि वह मेरठ की है, और मेरठ कालेज के पास ही उसका घर है, मेरे मन में तरह तरह की बातें घूमने लगीं, कि राजी भी मेरठ कालेज में पढ़े हैं, कहीं ये दोनों पहले से परिचित तो नहीं। उसने ये भी बताया कि विभाग अभी अभी खुला है और अभी और नियुक्तियां भी होनी हैं , इस बात को सुनकर मेरे मन में इच्छा जगी कि क्यों न मैं भी इस पद के लिए आवेदन करूँ। तो मैंने और ज्यादा जानकारी लेने के लिए उस लड़की से खूब घुलमिलकर बातें कीं। वह बहुत मधुर भाषी थी, और फिर वो मेरे घरेलू काम में भी हाथ बंटाने लगी, पहली ही मुलाक़ात में उसका इतना घुल मिल जाना अच्छा भी लग रहा था और संदेह भी बढ़ा रहा था। खैर उसका पहला दिन था, और शाम होते ही वह छुट्टी का एक आवेदन देकर चली गयी कि वह तीन दिन बाद अपने सामान के साथ आ जाएगी। मैंने पूछा कि वह कहाँ ठहरी है तो उसने बताया कि अभी तो कहीं नहीं ठहरी , सीधे मेरठ से आई थी , लेकिन सर बहुत अच्छे हैं उन्होंने पास में ही एक क्वार्टर खाली है, वह मुझे अलॉट कर दिया है। मैंने ऊपरी तौर पर कहा कि चलो ये तो बहुत अच्छा हुआ , आप पडोसी बन जाएंगी। लेकिन मन ही मन संदेह के बादल घुमड़ते रहे। "
घोस्ट कथा - १८
" हमें गुलावठी में रहते हुए चौथा साल चल रहा था। बेटा ब्लॉक ऑफिस के सामने बने एक नए स्कूल मॉडर्न अकादमी के प्ले स्कूल में प्रारम्भिक शिक्षा के लिए जाने लगा। इस स्कूल को एक युवा दंपत्ति ने खोला था जो बहुत मेहनती और बच्चों के प्रति प्यार रखने वाला था। वे बच्चों को प्रोत्साहित करने के कोई मौके नहीं चूकते थे. नमित को कभी पेन्सिल , कभी कोई बैलून उसके किसी भी छोटे मोठे अचीवमेंट पर इनाम दे देते थे। इस प्रकार नमित को स्कूल जाना अच्छा लगने लगा। नमित के चाचा लोग, अक्सर गुलावठी आते रहते और अपना पूरा लाड नमित पर लड़ाते। बेचारे को सब पढ़ाने को लगे रहते, वो छोटी सी उम्र में ही अपने चाचाओं के अनुकरण में एक धीर गंभीर अनुशासित बच्चा बन कर रह गया, उसके साथ सब टोका टोकी करते , नहीं ये मत करो, वो मत करो , गन्दी बात।
उधर मेरा छोटा भाई पारकर में फेल हो गया, और वह पता नहीं किस डर से, अपना एक बैग लेकर बिना टिकट मुरादाबाद से हापुड़ तक रेल से और हापुड़ से गुलावठी पैदल १६ किमी चल कर पूछतापाछता एक दिन हमारे यहाँ आ धमका। उसने रो रो कर जाने क्या क्या कहा, मैं उसे चुप कराती रही और दिलासा देती रही, कि फ़िक्र मत करो, अब तुम यहीं रहो। मैंने पूछा कि माँ को पता है कि तुम मेरे पास आये हो, उसने कहा कि हाँ बता कर आया हूँ। आगे की पढ़ाई उसने फिर हमारे साथ रहकर पूरी की, उसके बारे में इतना ही बताना काफी है कि वह बाद में अंग्रेजी में एम् ए और बी एड करके ही पापा के पास गया और उनकी गाइडेंस में केंद्रीय विद्यालय में अध्यापक बन गया, पापा ने उसके लिए एक अच्छे परिवार की अच्छी लड़की का रिश्ता लिया, उनका विवाह कराया। वह लड़की भी केंद्रीय विद्यालय में अंग्रेजी की ही अध्यापक बनी और अब दोनों नौकरी के अंतिम चरण में देहरादून में हैं, उनके एक प्यारा सा बेटा है जो आजकल अमेरिका में पोस्टग्रेडुएशन कर रहा है।
बीच में मायके का अनायास जिक्र आ गया. छोटे भाई की शादी बड़े भाई की शादी के बाद ही हुई लेकिन बड़े भाई की शादी का एक अलग नाटक है , उसे कभी फिर बताऊंगी। अब जब मायके का जिक्र आ ही गया है तो ये भी बता दूँ कि मेरी माँ सदा परित्यक्ता का ही जीवन बिताती रही और उसके बच्चों को भी पिता का प्यार और सहारा बहुत सीमित और अल्पावधि के लिए ही मिला। मैं उस दिन अपने पति राजी के प्रति कृतज्ञ हो गयी जब मुझे पता चला कि माँ को हर साल ६ साड़ियां मेरे पापा के नाम से चुपके से पार्सल भिजवाने वाला मेरे पापा नहीं बल्कि मेरा राजी था। मेरी माँ अपनी देह छोड़ने से तीन महीने पहले तक मेरे पास थी, और मेरे बड़े बेटे की बहू पसंद कर गयी थी, लेकिन वो अपने धेवते की शादी नहीं देख पाई थी, उससे पहले ही दिवंगत हो गयी थी, उनके दिवंगत होने के बाद ही मेरे पापा ने अपने बेटों से सशर्त सम्बन्ध वापस जोड़े और शर्त ऐसी कि मेरा मायका और मेरे बच्चों का ननिहाल सदा के लिए छूट गया। मैं .... छोड़िये मैं भावुक हो रही हूँ। अभी इतना ही। "
घोस्ट कथा - १९
"गुलावठी में रहते हुए चौथा साल चल रहा था, मुझे स्थानीय डॉक्टर ने रोज अधिक से अधिक टहलने की सलाह दी थी , अरे नहीं , मैं मोटी या शुगर पेशेंट नहीं थी , मैं गर्भवती थी. एक दिन मैं शाम को राजी के साथ ब्लॉक कैंपस में टहल रही थी, तो मुझे हल्का हल्का दर्द शुरू हुआ, मैंने कहा कि चलो घर चलते हैं, हम घर आये, तो मैंने कहा कि किसी डॉक्टर को बुला लो, शायद बुलंदशहर जिला अस्पताल जाना पड़े (जहाँ नमित पैदा हुआ था ). राजी एक लोकल लेडी डॉक्टर के पास गए और आधा घंटा में उसे लेकर आ गए, लेकिन तब तक तो मैं दुसरे बेटे की माँ बन चुकी थी। ईश्वर की मुझ पर बड़ी कृपा रही कि दोनों बेटे बड़ी आसानी से बिना ऑपरेशन हो गए, और मुझे अधिक कष्ट नहीं उठाना पड़ा।
तब तक राजी अपने विभाग और अपने अधिकारीयों और अपने क्षेत्र के ग्राम वासियों में बहुत लोकप्रिय हो चुके थी, दूसरे बेटे की खबर फैलने पर बधाई देने वालों का तांता लग गया, इस समय घर परिवार और मित्रों के अलावा, ग्राम प्रधान लोग, नेता लोग सब मुझे बधाई देने आये, सबसे नया एक सम्बन्ध जुड़ा गुलावठी के एक बहुत बड़ी डेरी के मालिक वेदराम नागर से। उनमें गज़ब का वात्सल्य था, आज उनकी डेरी के उत्पाद पारस नाम से बिकते हैं, उन्होंने मुझ से कहा कि तू मेरी बेटी है, मेरे सिर्फ अब तक ६ बेटे थे आज से सातवीं बेटी है तू। एक अनजान व्यक्ति से ऐसे शब्द मुझे पहले कभी सुनने को नहीं मिले थे. राजी के पापा जी मुझे बेटी कहते थे, मेरे पापा ने सदा मेरा नाम लिया। उन्होंने कहा कि तेरे दोनों बच्चों के लिए मेरी निजी देशी गाय का दूध मैं भिजवाऊंगा, और उसके बाद जब तक हम गुलावठी में रहे, हमें देसी गाय का एक किलो दूध बिना एक पैसा खर्च किये मिलता रहा। वे बहुत सक्षम संपन्न व्यक्ति थे, उनका कोई स्वार्थ हम लोगों से सिद्ध नहीं होता था, और राजी का स्वभाव भी किसी की मदद लेने का या किसी को फेवर करने का नहीं था, इसलिए आदतन राजी ने चौधरी वेदराम से भी इस पर थोड़ा सा विरोध तो किया लेकिन उन्होंने मेरे सामने एक बाप की तरह डांट दिया, मुझे डर था कि राजी उखड न जाए, लेकिन इस बार राजी ने कोई विरोध नहीं किया , ये राजी में बड़ा बदलाव था।
ऐसा ही एक और शख्स गुलावठी में था जिसका जिक्र करना जरुरी समझती हूँ, बल्लीमल। धोती कुरता वाले एक लाला जी, विकास खंड परिसर में केवल एक हैंडपंप था, सरकारी। सब उसी से पानी लेते थे। शहर से बाहर होने के कारण कोई पाइप लाइन वाटर सप्लाई वहां नहीं थी। जमीन पर्याप्त थी लेकिन पानी के अभाव में कोई पेड़ पौधा पनप नहीं पाता था। वो हमारे छोटे बेटे के जन्म पर बधाई देने आये. और उन्होंने उस कैंपस की दुर्दशा देखकर पूछा कि क्या यहाँ पानी की व्यवस्था नहीं है। फिर उन्होंने अपने स्रोतों से वहां एक बोरिंग करा दिया और एक मोटर लगवा दी। उस एक उपहार ने गुलावठी विकासखंड कैंपस में अगले तीन सालों में पूरी हरियाली ला दी। मैंने अपने घर के पीछे क्यारियां भी बनवा लीं और उनमे किचन गार्डन बना कर खूब सब्जियां खाईं और बांटी , देखादेखी और अधिवासियों ने भी अपने अपने घर के आसपास सब्जियां और फुलवारी लगाईं। और गुलावठी विकासखंड का परिसर जिले के आदर्श परिसर में शुमार हो गया। लोग निःस्वार्थ मदद के लिए तत्पर रहते हैं, ये मैंने महसूस किया, बस उन्हें कोई पात्र व्यक्ति मिल जाए।
उधर मेरा लखनऊ से इंटरव्यू कॉल आ गया, अरे शायद मैं बताना भूल गयी कि मैंने नए नए खुले विभाग में ब्लॉक स्तर के पर्यवेक्षक पद के लिए आवेदन कर दिया था। और आसानी से मेरा चयन हो गया लेकिन मुझे सहारनपुर में योगदान के लिए आदेश मिला, मैं तो सोच रही थी कि गुलावठी में ही एक पद रिक्त है, तो यहीं नौकरी मिल जाएगी। राजी मुझे लेकर जिला प्रौढ़ शिक्षा अधिकारी ढौंढियाल सर से मिले, उन्होंने सलाह दी कि आप पहले जहाँ का आदेश है वहां ज्वाइन कर लो, फिर ट्रांसफर की एप्लीकेशन दे देना, दम्पत्ति आधार पर आसानी से हो जाएगा।
बड़े बेटे को संभालने के लिए परिवार जनों की मदद ली और हम सहारनपुर पहुंचे। हमारे सारे डाक्यूमेंट्स एक बड़े एनवेलप में थे, जो मैंने संभाल कर अपनी पास रखे हुए थे। और एक हैंड बैग था। मेरी लापरवाही से एनवेलप बस में ही छूट गया और हम ज्वाइन करने जिला प्रौढ़ शिक्षा अधिकारी के पास पहुंचे तो हमारे पास कुछ था ही नहीं जिस के आधार पर हम नौकरी ज्वाइन करते। उन्होंने कहा कि अपॉइंटमेंट लेटर की तो चिंता मत कीजिये, उसकी कॉपी तो हमारे पास है, लेकिन अपने शैक्षणिक प्रमाण पत्र तो आपको लाने ही होंगे। मैं तो हिम्मत हार गई लेकिन राजी ने मन बना लिया कि काम कैसे करना है, पहले हम देहरादून गए, वहां से कुछ सामग्री जुटाई, फिर हरिद्वार गुरुकुल कांगड़ी विश्विद्यालय गए , वहां से ग्रेजुएशन स्तर तक के कागज़ जुटाए, फिर हम गढ़वाल विश्विद्यालय श्रीनगर गए लेकिन वहां उन्होंने कह दिया कि MA और बी . एड की डुप्लीकेट डिग्री मिलने में टाइम लगेगा, और वे डाक से हमारे पते पर भेज देंगे। गए थे एक दिन के लिए और लौटे तीन दिन बाद और वो भी खाली हाथ। दस दिन बाद डाक से गढ़वाल से भी कागज़ आ गए। राजी ने कहा कि चलो फिर सहारनपुर चलते हैं तो मैंने मना कर दिया कि बड़े झंझट हैं पता नहीं ट्रांसफर करा पाएंगे या नहीं, बच्चे छोटे हैं, केवल गुलावठी में तो नौकरी कर सकती हूँ बाकि दूर नहीं। तो मामला टाल दिया गया। अब तक गुलावठी में तैनात कमलेश त्यागी मेरी अच्छी मित्र बन चुकी थी, उसने कहा कि आपको आसानी से नौकरी मिल गई है इसलिए आप इसकी कद्र नहीं कर रही , आपको ज्वाइन करना चाहिए, आगे शायद चयन भी आसानी से न हो पाए। मुझे बात जमी, लेकिन मैं राजी से और बच्चों से दूर जाने की सोच नहीं सकती थी. मैंने उस से कहा कि मुझे अपने डिस्ट्रिक्ट बॉस से मिलवा दो, वो मुझे लेकर ढौंढियाल साब के पास गयी, मैंने पूरा घटनाक्रम उन्हें बताया। उन्होंने कहा कि चलो मैं देखता हूँ कि क्या कुछ हो सकता है।
और मेरी किस्मत अच्छी है या लोग बहुत अच्छे हैं, ढौंढियाल साब ने मेरा ट्रांसफर खुद करा लिया और मुझे गुलावठी में ही पोस्टिंग भी दे दी , इस सब काम में लगभग दो महीने लग गए।
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मेरे द्वारा लिखी "घोस्ट कथा सीरीज" के पाठकों ने कुछ जिज्ञासा और कुछ टिप्पणियां की हैं. इसलिए मैं यहां कुछ स्पष्टीकरण दे रहा हूं।
१- इसमें मेरी स्वर्गीय पत्नी वन्दना की आपबीती सुनाई गई है।
२- इसमें कल्पना का कोई सहारा नहीं लिया गया है। सब कुछ सच है, लेकिन संभव है कि यदि कहीं किसी तारीख या वर्ष का उल्लेख हुआ हो तो वह एक दो नंबर आगे पीछे हो सकता है।
३- इस कहानी का उद्देश्य जीवन की सच्चाई सामने लाना है, न कि किसी का चरित्र हनन करना । इस कहानी में कुछ लोगों को नायिका के पिता (संत यादव) का चरित्र नाटकीय लग सकता है। लेकिन उन्हें नजदीक से जानने वाले लोग उनके बारे में पुष्टि कर सकते हैं कि बहुत ज्ञानी भी थे और बहुत अहंकारी भी, तथा पत्नी के प्रति निष्ठुर भी। रामगंगा बिहार में वे संचेतना विद्यालय नाम से एक विद्यालय भी छोड़ गए थे, अब पता नहीं कि वह अभी भी चलता है या बंद हो गया।
४- उनका गांव डूंगरपुर है जो रामपुर जिले की सीमा पर है। उन्होंने जो माध्यमिक विद्यालय डूंगरपुर के पास बनवाया था, वह उनके गांव के पास मानपुर में आज भी है।
५- उन्होंने अपने भाइयों को पढ़ने के लिए गाली दे देकर प्रेरित किया। उनके एक भाई गजराम सिंह मानपुर इंटर कॉलेज के प्रिंसिपल से रिटायर हुए। उनके एक भाई जगदीश और उसकी पत्नी केंद्रीय विद्यालय से रिटायर हुए। उनके एक भतीजे डूंगरपुर में बसंतसिंह मेमोरियल इंटर कॉलेज आज भी चला रहे हैं। उनके एक भतीजे मुरादाबाद के एक इंटर कॉलेज के प्रिंसिपल पद से रिटायर हुए और मानसरोवर में रहते हैं। उनके बेटे डिप्टी डायरेक्टर शिक्षा दिल्ली से रिटायर हुए, उनके दूसरे बेटे केंद्रीय विद्यालय देहरादून से रिटायर हुए। उनकी दो पुत्र वधुएं अभी भी केंद्रीय विद्यालय में सेवा रत हैं। तात्पर्य ये कि अपने परिवार और बंधु बांधवों को पिछड़ेपन से निकालने में संत यादव के योगदान को कम नहीं आंका जा सकता।
६- विषम परिस्थितियों में भी उनके तीनों बच्चों ने संघर्षपूर्ण जीवन जीते हुए भी सफलता पाई और अगली पीढ़ी को प्रेरणा दी जिसके फलस्वरूप संत जी के पोते और धैवते आज विदेश तक पहुंचे, जिसे आजकल सफलता का मानक माना जाने लगा है। इसके लिए वे बच्चे बधाई के पात्र हैं।
कहानी के काफी राज खुल चुके हैं इसलिए अभी इस सीरीज को विराम देता हूं, लेकिन घोस्ट अपनी बची हुई जिंदगी की बातें बताने फिर आयेगी।
इंटरवल के बाद ---
घोस्ट कथा - २०
प्रौढ़ शिक्षा के सुपरवाइजर के रूप देखे जाने कुछ अनुभव।
मुझे विकासखंड गुलावठी में ही प्रौढ़ शिक्षा के सुपरवाइजर की तैनाती मिल गयी , इसका श्रेय , अब तक मेरी सहेली बन चुकी पहली सुपरवाइजर कमलेश त्यागी, जिला प्रौढ़ शिक्षा अधिकारी बुलंदशहर श्री ढौंढियाल और थोड़ा सा राजी को भी जाता है। अगर राजी मेरे डाक्यूमेंट्स की दूसरी कॉपी बनवाने हरिद्वार और श्रीनगर (गढ़वाल ) जाने का थैंकलेस जॉब न करते तो मैं ये नौकरी तो क्या आगे भी कोई नौकरी न कर पाती, और अगर मेरे पापा को पता चलता कि मैंने अपने सारे शैक्षणिक प्रमाणपत्र खो दिए हैं तो पता नहीं वो मुझे क्या क्या नहीं कहते। न मैंने और न घर के और किसी सदस्य ने उन तक ये बात पहुँचने दी, कभी भी।
थोड़े दिनों बाद एक और सुपरवाइजर की तैनाती गुलावठी ब्लॉक में हो गयी, वह एक अनुभवी ग्राम विकास अधिकारी (पुरुष ) था , लेकिन सुपरवाइजर पद चूँकि ADO लेवल का था, तनख्वाह भी ग्रामविकास अधिकारी से अधिक थी , तो उसने डेपुटेशन लेकर ये पद ज्वाइन किया था। तो अब हम तीन लोगों में विकासखंड के ४७ ग्राम पंचायतें बाँट लीं , हमने उसे भैया भैया कह कर दूर के गाँव लेने के लिए उसे मना लिया और पास के तीस गाँव मैंने और कमलेश ने बाँट लिए। हमारा बॉस (परियोजना अधिकारी) सिकंदराबाद ब्लॉक में बैठता था, उसके पास गुलावठी और सिकंदराबाद दो ब्लॉक का चार्ज था। तो हमें पन्द्रहवें दिन सिकंदराबाद जाना पड़ता था। यद्यपि हम पर पंद्रह पंद्रह गाँव थे, चौहान साब (पुरुष सुपरवाइजर ) के पास १७ गांव थे, लेकिन मैं और कमलेश एक दुसरे के गाँवों में जोड़ी में ही जाते थे और एक टीम की तरह काम करते थे, यानि तीस के तीस गावों के हर प्रौढ़ शिक्षा केंद्र के बारे में हम दोनों ही पूरी खबर रखते थे और सभी अनुदेशकों को पहचानते थे, उनकी मीटिंग भी हम साझे में ही लेते थे। इसलिए हम जब चाहे आपस में छुट्टी भी एक दुसरे को दे देते थे , बिना अपने परियोजना अधिकारी को बताये। बहुत अच्छा समय कटा. कमलेश स्वभाव और परिश्रम में मुझ से २१ ही थी, और मुझ से सुन्दर भी , ये सुंदरता ही मुझ में संदेह पैदा कर देती थी, कि कहीं राजी इस की और आकर्षित न हो जाए, और मुझे कई बार लगा भी कि वे दोनों एक दुसरे की तरफ आकर्षित हैं। लेकिन मैं और कमलेश घर हो या बाहर साथ ही रहते , साथ घर के सारे काम करते , वह मेरे बच्चों के पालन पोषण में भी मदद करती। बस रात को वह अपने क्वार्टर में चली जाती थी. एक बार राजी लखनऊ में किसी मीटिंग में गए थे और कमलेश अपने घर मेरठ गयी थी, लेकिन वह अगले दिन ऑफिस नहीं आयी , और दो दिन तक नहीं आयी , राजी को भी लखनऊ जाने से वापस आने पर दो दिन तो लग ही जाते थे, तो मेरे मन में भय छा गया कि कहीं दोनों ही तो लखनऊ नहीं गए हैं। मैं राजी के लौट आने पर भी गुमसुम रही तो राजी ने मेरे तबियत के बारे में पूछा। मैंने डरते डरते कहा कि मुझे आपकी चिंता हो जाती है, जब आप बाहर होते हो , आप के साथ कौन कौन था? राजी ने कहा बहुत सारे अफसर थे, मैंने पूछा कहाँ ठहरे थे, उसने कहा, ठहरने का क्या सवाल , सुबह ट्रैन पहुंची , दिन भर मीटिंग , शाम को फिर वापसी की ट्रैन। जब तीसरे दिन कमलेश आई , तो कमजोर लग रही थी, मैंने पूछा दो दिन क्यों नहीं आई , उसने कहा क्यों पी ओ साब ने पूछा था क्या, मैने कहा नहीं, बोली मुझे बुखार आ गया था। मुझे में ये असुरक्षा की भावना मेरे माता पिता के बीच के तनावपूर्ण संबंध के कारण गहरे घर कर गई थी और इसीलिए मैं शादी भी नहीं करना चाहती थी. मैंने अपने आप को समझाने की कोशिश की, कि मुझे राजी पर शक नहीं करना चाहिए, वह सिर्फ अपने स्वभाव के कारण कमलेश ही नहीं सभी से सॉफ्टली बात करता है।
हमें मासिक प्रगति सूचना एक चार्ट के रूप में बना कर पी ओ को हर महीने देनी होती थी, इस काम में कमलेश चौहान साब की मदद लेती थी , मुझे लगता है कि वह कमलेश को खुश रखने के लिए उसका बहुत सा काम कर देता था, लेकिन मेरे काम को करने में बहाने बाजी करता था। लेकिन सच्चाई यही है कि हम फील्ड वर्क तो अच्छे से कर लेते थे , लोगों को मोटिवेट करते थे, प्रौढ़ शिक्षार्थियों को केंद्र पर लाने में अनुदेशकों की मदद करते थे, लेकिन पेपर वर्क में हम चौहान साब का शोषण ही करते थे। अपना काम शायद ही हमने कभी खुद किया हो. अगर मेरा काम छूटा भी तो कमलेश ही कर देती थी, और कमलेश के काम के लिए तो चौहान साब सदा तैयार रहते थे। मुझे लगता है, दुसरे विकास खण्डों में भी यही ट्रेंड था, सब ने कोई न कोई पुरुष मददगार पकड़ रखा था।
इस नौकरी के दौरान कुछ खट्टे मीठे कड़वे अनुभव भी हुए, मेरी जानकारी में एक गांव भटौना का एक प्रकरण आया, जिसमे अनुदेशिका प्रधान जी की पुत्रवधू थी , वह गर्भवती थी , एक बार जब हम उसके केंद्र पर पहुंचे, आठ दस दिन में हमारा हर केंद्र पर चक्कर लग जाता था , तो लगा कि प्रसव कर चुकी है , उसका पेट पिचका हुआ था, लेकिन वो उदास थी, हमने पूछा क्या हुआ? बोली -लड़की हुई थी, मैंने कहा, हुई थी , मतलब? वह मेरे कान के पास मुंह करके रुआंसे स्वर में बोली सासु माँ ने मार दी। मैं शॉकड रह गयी, उसने हाथ जोड़कर कहा कि किसी से मत कहियेगा। हम दोनों तुरंत चले आये. आज से पहले ये बात मैंने किसी को नहीं कही, अब न तो प्रधान जी जीवित होंगे, और न उस अनुदेशिका की सासु माँ , लेकिन वह फुसफुसाती आवाज आज भी मेरे कानों में गूंजती है। आज जब महिला सशक्तिकरण चरम पर है, और लड़कियां खूब पढ़लिख रही हैं, पहलवानी भी करती हैं, फ़ौज में पुलिस में सब जगह दिखाई देती हैं, तो बड़ा संतोष होता है कि चलो अब कोई माँ बाप कन्या की हत्या शायद ही करने की सोचे, लेकिन ऐसा भी समय था।
घोस्ट कथा - २१
"राजी के ऑफिस में एक ADO कोआपरेटिव ट्रांसफर हो कर आए, उनको ADO टाइप मकान अलॉट किया वही , जो अब तक कमलेश त्यागी के नाम था, और कमलेश को एक सिंगल रूम वाला छोटा क्वार्टर अलॉट कर दिया गया, कमलेश कुछ खिन्न सी मेरे पास आई , बोली लगता है कि भाई साब मुझ से नाराज हैं , मेरा क्वार्टर छीन कर किसी दुसरे को दे दिया है। मैंने उसे तसल्ली दी , कि मैं बात करूंगी , यद्यपि मुझे पता था कि वह जो भी निर्णय लेते हैं , सोच समझ कर लेते हैं और फिर उसे आसानी से नहीं बदलते। लेकिन मैंने सिर्फ अपनी दोस्ती दिखाने के लिए कमलेश को ये बात कही। संयोग से उसी दिन गाँव से राजी के दादा जी आ गए, मुन्ना भैया उनको लेकर आये थे, मुन्ना भैया मेरे बहुत अच्छे दुसरे नंबर के देवर थे (वो अब इस दुनिया में नहीं हैं , लेकिन जो भी उनके संपर्क में आया होगा , उसे वे एके बहुत सहयोगी और मिलनसार, सेवाभाव से युक्त बताएगा , अनजान लोगों की मदद करने में भी वो पूरी तन्मयता दिखते थे ) , उन्होंने मुझे बताया कि कल मम्मी जी और पिता जी(उन्हें उनके सब पोते पिताजी ही कहते थे ) में कुछ बहस हो गयी, और पिता जी ने कहा कि मुझे राजा के पास छोड़ आओ , (वो मेरे राजी को राजा ) कहते थे। इसलिए उन्हें लाया हूँ. हमने, यानि मैंने और कमलेश ने मिलकर मुन्ना भैया और पिता जी के लिए बढ़िया खाना बनाया, खिलाया , और एक चपरासी को कहा कि साहब को जा कर बता दो कि पिताजी गांव से आये हैं। असल में हम दोनों को शाम को प्रौढ़ शिक्षा केंद्र के निरिक्षण के लिए निकलना पड़ता था, ज्यादातर हम एक घोड़ेतांगे से चले जाते थे, तो हम चाहते थे कि हमारे जाने से पहले राजी घर आ जाएं। और वो आ भी गए। मैंने कमलेश के सामने ही उनसे पूछा कि कमलेश का क्वार्टर क्यों बदल दिया। उन्होंने कहा कि ये तो सिंगल है एक कमरे के मकान में भी रह लेगी, बाकि रसोई , बाथरूम सब तो उसमे है ही , ADO जो आ रहे हैं, वो परिवार के साथ रहते हैं , हमारे हमउम्र हैं और उनके भी दो पुत्र हैं , हमारे बेटों की ही उम्र के। उन्होंने इतनी आसानी से ये बात समझा दी, मुझे ये तसल्ली हुई कि राजी के मन में कोई कमलेश का कोई विशेष दर्जा नहीं है और मुझे ज्यादा सशंकित होने की जरूरत नहीं है। फिर राजी ने कमलेश की तरफ मुखातिब हो कर कहा कि कोई परेशानी, उसने धीरे से कहा कि नहीं। उधर पिता जी ने राजी से कहा कि वो अब यहीं रहेंगे, कमलेश ने पूरा अपनत्व दिखाते हुए कहा कि हम दादा पोती एक साथ रहेंगे। और चपरासियों की मदद से उसी दिन कमलेश छोटे घर में राजी के दादा जी के साथ शिफ्ट हो गयी.
अगले दिन प्रताप सिंह वर्मा ADO सहकारिता , हमारे बगल वाले घर में अपना सामान ले आये, हमारे दोनों बेटों को अपने हम उम्र दोस्त मिल गए। प्रताप सिंह वर्मा हमारे तरह के कर्मचारी थे, यानि फील्ड वर्क में माहिर और लिखने पढ़ने में, स्टेटमेंट्स / प्रगति रिपोर्ट्स बनाने में फिसड्डी। तब हमें लगा कि महिलाऐं ही नहीं पुरुष भी कागजी काम के लिए दूसरों की मदद लेते हैं। इन ADO साब का भी हमारे जीवन में बहुत बड़ा रोल रहा है। इनसे हमारे पारिवारिक सम्बन्ध ऐसे बने जैसे वे राजी के सगे भाई ही हों, हम लोगों के परिवार के हर आयोजन में वे ऐसे रहे जैसे उनके ही परिवार का कार्यक्रम हो। बाद में वे गाजियाबाद में आवास विकास परिषद में आवास अधिकारी पद पर डेपुटेशन पर रहे, वहां २००३ में एक सहकारी आवास स्कीम निकली तो राजी उस समय मुजफ्फरनगर में तैनात थे, हमारा बड़ा बेटा अल्प समय के लिए कनाडा गया था और वहां से काफी बचत कर के लौटा था, तो प्रताप को तो घर की हर खबर रहती थी , एक दिन मुजफ्फरनगर आ धमके और मुझ से बोले कि भाई साहब से तो बात करना फिजूल है, लेकिन नमित जो कनाडा से बचा कर लाया है, वो पैसे मुझे दे दो, मुझे आप लोगों के लिए एक मकान बुक करना है , राजी ने नो कमेंट की स्थिति रखी. और इस प्रकार हमारा एक फ्लैट बुक हुआ जो बाद में मेरे और सबसे छोटे बेटे के तब काम आया, जब राजी के हर साल ट्रांसफर होने लगे।
बीच में कहानी फास्फोरवर्ड हो गयी , वापस लौटती हूँ। गुलावठी में हमें सातवां साल चल रहा था। तब मैंने कहा कि अब बच्चों की पढ़ाई के लिए कोई ढंग का स्थान ढूंढो , कोशिस करो कि किसी शहर मुख्यालय में बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ा सकें। राजी ने कहा कि मैं ट्रांसफर की न तो कोशिश करूंगा , और न गुलावठी में बने रहने के लिए मैंने कोई कोशिश की है। जब होगा तब हो जायेगा। मैंने फिर कहा कि इस छोटे से कसबे से कभी कहीं बाहर जा सकते हैं, तो राजी ने कहा बताओ कहाँ चलना चाहती हो, मैंने वैष्णो देवी जाने की इच्छा व्यक्त की. राजी ने छुट्टी अप्लाई कर दी। "
घोस्ट कथा - २२
"गुलावठी के इस कालखंड में मेरे सबसे बड़े देवर अजय जो मेरठ में हमारे साथ थे, और उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग में जिन्होंने UDC के रूप में सेवा आरम्भ की थी , कम्पटीशन देते रहे और एक दिन सब रजिस्ट्रार पद पर चयनित हो कर मुजफ्फरनगर में तैनात थे, मेरा सबसे छोटा देवर प्रवीण उनके पास रह कर ग्रेजुएशन कर चूका था, और मेरठ में एमएससी फिजिक्स कर रहा था, मेरा सबसे छोटा भाई गुलावठी से इंटर करने के बाद मेरठ कॉलेज से पोस्ट ग्रेजुएशन में था, मेरे बड़े देवर अजय की शादी दिल्ली के एक प्रतिष्ठित परिवार की लड़की से हो चुकी थी , वह खूब अच्छा सा दहेज़ भी लायी थी , यद्यपि मम्मी जी यानि राजी की मम्मी ने कभी मुझे दहेज़ के बारे में कुछ नहीं कहा, फिर भी उसका दहेज़ देखकर मेरे मन में हीन भाव आये बिना न रह सका। लेकिन सबसे अच्छी बात ये कि शादी के अवसर पर सारे रिश्तेदार , राजी के दोस्त लोग और उनकी पत्नियां , ननद नन्दोई के साथ साथ और भी कई नए परिवार जुटे और मुझे एक भरे पूरे परिवार की बड़ी बहू होने का एक अप्रतिम अनुभव हुआ। इतना सम्मान मैंने पहले किसी पारिवारिक वातावरण में नहीं देखा था। अजय की शादी में सब काम या तो मम्मी जी की अनुमति से हुए या फिर मेरी अनुमति से। इसी शादी में विराज , यानि मेरा भाई , प्रवीण यानि राजी का सबसे छोटा भाई, नरेश यानि अजय का साला , और अरुण यानि राजी के मामा जी का बड़ा लड़का (ये सारे हम उम्र थे)आपस में दोस्त बने और ऐसे दोस्त बने कि उनकी शरारतों के मुझे अपने जीते जी कई राज छिपाने पड़े। अब भी नहीं बताऊंगी , उन्होंने अपनी प्यारी बहन / भाभी से कसम ली थी। विराज और नरेश मुझे दीदी कहते थे और प्रवीण और अरुण भाभी। नरेश अब एक रियल एस्टेट व्यापारी है और अरुण ने सेना के कर्नल पद से रिटायरमेंट ले लिया है और अब एक बड़ी सिक्योरिटी एजेंसी का मालिक है।
ये चारों दोस्त अक्सर और गर्मियों की छुट्टी में तो जरूर गुलावठी में इकठ्ठा होते थे। मैंने विराज से कहा कि - माँ को ले आओ, क्यों कि मम्मी जी तो गाँव छोड़ कर आएंगी नहीं (वैसे भी वो ज्यादा अनुशासन प्रिय थीं इसलिए चारों लड़के उनसे डरते थे) , और यहाँ पंद्रह दिन मस्ती काटो , पिता जी (राजी के दादा जी)का ध्यान रखना, वैसे कमलेश भी रहेगी। हम लोग वैष्णो देवी जा रहे हैं, पंद्रह दिन में लौटेंगे। -
राजी के मामा जी आर्मी में कर्नल थे और उन दिनों जम्मू के पास नगरोटा में पोस्टेड थे। राजी ने उन्हें अपना प्रोग्राम चिट्ठी से सूचित कर दिया था। संयोग से मेरे पापा भी नगरोटा में ही केंद्रीय विद्यालय के प्रिंसिपल थे। हमें जम्मू रेलवे स्टेशन पर मामा जी की भेजी आर्मी जीप मिली और हम दोनों और हमारे दोनों बच्चे बड़े आराम से नगरोटा कैंट पहुँच गए। मामी जी कड़क आर्मी ऑफिसर वाइफ थी, मुझे उनसे थोड़ा डर लगा था लेकिन व्यवहार में वे बहुत अच्छी थी और राजी को तो बचपन से ही बहुत प्यार करती थी, इसलिए मैं भी उस प्यार की भागीदार बन गयी। मामा जी ने मेरे पापा को भी फोन से बता दिया कि राज (मामा जी, मम्मी जी और उनके कई दोस्त राजी को राज ही कहते थे ) और वंदना बच्चों सहित आये हैं। तो अगले दिन शाम को पापा जी हमसे मिलने आये और उन्होंने कई वर्षों बाद अपनी बेटी को और पहली बार अपने दो दो धेवतों को देखा। उन्हें नमित में अपने आप की झलक दिखाई दी, और वो उसकी बुद्धि से प्रभावित् दिखे। बोले ये तो मुझ पे गया है। मैंने मन ही मन कहा, आप जैसा न बन जाए। उसकी पढ़ाई के बारे में पूछने लगे, मैंने कहा कि अभी तो ऐसे ही मामूली स्कूल में डाल रखा है, सोच रहे हैं कि कहीं अच्छी जगह ट्रांसफर हो जाए तो किसी अच्छे स्कूल में डालें। उन्होंने डपट दिया, ये क्या डालें डालें लगा रखा है, स्कूल कोई कूड़े दान है, या तुम्हारा बेटा कोई सामान है। फिर अपने आप बोले कि मैं इसका एडमिशन अपने स्कूल में कर लेता हूँ , इसे यहीं छोड़ जाना। मैं तो डर गई। बात बदल कर भ्रमण / टूर प्रोग्राम पर आ गई।
अगले दिन मामा जी ने हमें आर्मी जीप से ही कटरा भेजा और वहां पहले से हमारे लिए VIP व्यवस्था करा रखी थी, देवी दर्शन हुए, राजी को इन देवी देवताओ में आस्था नहीं है लेकिन उन्होंने इस धार्मिक यात्रा में हमारा साथ दिया। वापस नगरोटा आ गए। बातों बातों में उन्होंने बताया कि अरुण(राजी के मामा का लड़का ) ने उनके ही केंद्रीय विद्यालय से इंटर पास किया है और वो उनका प्रिय शिष्य था।
हम कुछ दिन वहां रूककर वापस गुलावठी आ गए , पापा जी ने हमसे उस दौरान तीन बार मुलाकात की और अपना स्कूल दिखाया, एक दिन अपने घर पर खाना भी खिलाया।
और जब हम लौट कर आये तो आते ही पहली खबर मिली, कि राजी का ट्रांसफर बुलंदशहर विकास खंड में हो गया है। और गुलावठी के प्रधानों ने एक ज्ञापन उसका ट्रांसफर रुकवाने के लिए जिलाधिकारी को दे रखा है, बड़े बाबू ने बताया कि प्रमुख जी के साथ प्रधानों का डेलीगेशन डीएम से मिला था तो उन्होंने कहा है कि जब बी डी ओ छुट्टी से लौट आएं तो उन्हें भेजना।
मैंने राजी से कहा कि अब आप क्या करोगे, उसने कहा वही जो पहले कहा था, ट्रांसफर रोकने को नहीं कहूंगा। "
घोस्ट कथा - २३
"मैंने बताया था न कि गुलावठी से राजी ने सरकारी विभाग में पहली बार नौकरी शुरू की थी और पहली ही पोस्टिंग उसकी एक ही ब्लॉक में इतनी लम्बी रही , जो आम तौर पर सरकारी सेवा में और ऐसे पद पर अधिक लम्बी नहीं होती, तो इस पोस्टिंग ने बहुत ज्ञान , अनुभव , सम्बन्ध हम लोगों को दिए।
सरसरी तौर पर नजर डालें तो इस विकास खंड में पोस्टिंग के दौरान कई बहुत अच्छे लोगों से हमारे सम्बन्ध स्थाई तौर पर बने। यहाँ रहते हुए मुझे नौकरी के अच्छे बुरे परिणाम समझने का मौका भी मिला , चूँकि मैंने तीन साल तक यहाँ वेतन पाया तो मेरे मन से दहेज़ न लाने की हीन भावना भी निकल गयी, क्योंकि मैंने वह सारा पैसा गृहस्थी के सामान जोड़ने में ही खर्च किया। मेरठ में राजी के एक घनिष्ठ मित्र दिनेश सक्सेना थे तो यहाँ उन्हें अपने से वरिष्ठ एक और बहुत अच्छे अफसर के के सक्सेना का साथ और मार्गदर्शन मिला, जो लगभग हर सप्ताह हमारे घर आ जाते थे , उस समय वो शिकारपुर विकासखंड के बी डी ओ थे, और अपने काम और ईमानदारी के लिए बहुत लोकप्रिय थे। गुलावठी के क्षेत्र पंचायत प्रमुख मौदूद अली भी राजी को बहुत सम्मान देते थे क्योंकि वो खुद भी बहुत ईमानदार थे। इसके अलावा दिल्ली दूरदर्शन के एक फोटोग्राफर और एक वरिष्ठ वैज्ञानिक कृषि विभाग भारत सरकार का बहुत बार हमारे घर आना हुआ करता था जिनके लिए मैं लंच डिनर बनाती थी, जबकि वे अपने सरकारी काम से कोई डॉक्यूमेंट्री बायोगैस पर बनाने आते थे, उनसे अच्छी दोस्ती हो गयी थी और हम भी दिल्ली उनके घर उनके निमंत्रण पर गए थे। बड़े धूमधाम से हम लोगों की विदाई हुई और हम बुलंदशहर शिफ्ट हो गए। मेरा छोटा बेटा भी खूब बातें बनाने लगा था। हमारे शिफ्ट होने के दिन सामान उत्तर रहा था तो के के सक्सेना पूछने आए कि कोई मदद चाहिए तो बताएं , तो मेरे छोटे बेटे ने उनसे बड़े तपाक से कहा-भाई साब अब हमारा तबादला बुलंदशहर हो गया है। मात्र ३ साल के बेटे से ऐसा डायलॉग सुनकर हम सब की हंसी छूट गयी थी , के के भाई साहब उस बात को याद करके अपने जीवन के अंतिम दिनों तक अमित को छेड़ते रहते थे।
बुलंदशहर का ऑफिस एग्रीकल्चर स्कूल कैंपस में था , और यहां का मकान भी काफी बड़ा था। गुलावठी में सीखी हुई किचेन गार्डनिंग यहाँ बहुत काम आयी, खूब खाली जमीन थी जिस पर मैंने बहुत सब्जियां उगाईं, यहाँ खूब हरियाली थी, पानी की भी कमी नहीं थी।
संयोग से बुलंदशहर विकासखंड में भी प्रमुख महेश कुमार सिंह एक ईमानदार नेता थे इसलिए राजी की उनसे भी अच्छी पटरी बैठ गयी।
लेकिन जिला मुख्यालय का दफ्तर होने के कारण इनकी व्यस्तता बढ़ गयी थी , गुलावठी पोस्टिंग के दौरान पी एल पूनिया , जावेद उस्मानी , बी एस लाली इनके जिलाधिकारी रहे जो राजी को उसके कार्यों के कारण बहुत पसंद करते थे , लेकिन इनके बुलंदशहर आने पर जिलाधिकारी भी ट्रांसफर हो गए और नए अधिकारी को लोगों को समझने में टाइम तो लगता ही है। जिले के विभागीय अधिकारी और जिलाधिकारी मुख्यालय के बी डी ओ से कुछ अधिक चापलूसी की उम्मीद करते हैं, ये परंपरा है। तो ऐसे ही किसी बात पर राजी के बॉस जो नए नए आये थे, उखड गए. हमारे आवास के सामने ही प्रसार प्रशिक्षण केंद्र के प्राचार्य रहते थे, वो शाम को बाहर प्रांगण में राजी के साथ बैठे बैठे चाय पी रहे थे, राजी ने उनसे उस दिन की घटना उनसे शेयर कर दी , तो उन्होंने कहा कि प्रसार प्रशिक्षण केंद्र पर काम करना चाहोगे, राजी मूलतः एक अध्यापक तो थे ही, तो उन्होंने हाँ कर दी, प्राचार्य जी ने एक डी ओ पत्र लिखकर अपने स्टेनो को लखनऊ भेज दिया और तीन दिन बाद राजी का ट्रांसफर आर्डर BDO बुलंदशहर से प्रसार प्रशिक्षण अधिकारी बुलंदशहर पद के लिए लेकर वो आ गया।
तब तक राजी के बॉस को अपने स्रोतों से राजी की कार्यशैली और कार्य क्षमता का पता चल चूका था, उनके पास आर्डर की कॉपी आई तो वो हमारे घर आ गए। एक तरह से उन्होंने तीन दिन पहले हुए संवाद के लिए उन्होंने अफ़सोस व्यक्त किया और ब्लॉक न छोड़ने के लिए कहा। लेकिन राजी ने उन्हें कहा, सर उस दिन आपने हमारी चाय ठुकरा दी थी, आज तो पी लीजिये। मैं चाय लेकर आई , उन्होंने पी और अंत में राजी , प्राचार्य जी और राजी के बॉस कोमल राम में यह तय हुआ कि प्रसार प्रशिक्षण अधिकारी का पद ज्वाइन करने के बाद भी वो BDO बुलंदशहर भी बने रहेंगे। बाद में पता चला कि इस निर्णय के पीछे प्रमुख महेश कुमार सिंह का हाथ था जो कोमल राम पर नाराज हो कर आए थे कि आपने हमारे एक अच्छे अफसर को हमसे दूर कर दिया। आप सोच रहे होंगे कि मैं अपने पति के गुणगान कर रही हूँ, लेकिन मैंने ये भी तो बताया कि ईमानदारी के चक्कर में वे थोड़े रूड व्यवहार भी कर बैठते थे, जिस से कई बार उनके अपने अधिकारीयों से सम्बन्ध बिगड़ जाते थे, लेकिन उनकी किस्मत अच्छी रही कि किसी भी अधिकारी ने उनका कोई नुक्सान नहीं किया। "
घोस्ट कथा - २४
राजी ने प्रसार प्रशिक्षण अधिकारी के पद पर योगदान कर लिया, और पुराने बॉस और नए बॉस की सहमति का सम्मान करते हुए जब तक कोई नए BDO की आमद जिले में न हो जाए , तब तक के लिए उस पद के दायित्व निभाने की भी सहमति दे दी। लगभग छह महीने में नया BDO आ गया और फिर राजी को उस दायित्व से मुक्ति मिल गयी। प्रशिक्षण केंद्र पर ग्राम विकास अधिकारी , सहायक विकास अधिकारी लोगों का प्रशिक्षण होता था, ज्यादातर रेफ्रेशर कोर्स के लिए दस दिन के बैच चलते थे, इसलिए ज्यादा काम नहीं था, हम दोनों काफी समय किचेन गार्डन में गुजारते थे।
इस बीच परिवार में कई नए घटनाक्रम हुए। मेरे देवर अजय की सब रजिस्ट्रार बुलंदशहर पद पर तैनाती हो गए , नन्दोई का चयन सीनियर मार्केटिंग इंस्पेक्टर पद पर बुलंदशहर के शिकारपुर में हो गयी। मेरे तीसरे देवर जो BTech और MBA करने के बाद बंगलौर में हीरो हौंडा के एरिया सेल्स मैनेजर बन गए थे, उन्होंने नौकरी छोड़ कर बुलंदशहर में ही मोटरसाइकिल का शोरूम खोल लिया। सबसे छोटा देवर केंद्रीय विद्यालय में दिल्ली में पीजीटी फिजिक्स के रूप में काम करने लगा. मुन्ना भैया का विवाह तो हमारे गुलावठी प्रवास के समय ही गुलावठी के पास के गाँव मोहाना के एक संभ्रांत परिवार की सबसे छोटी लड़की से हो गया, इस लड़की की खोज हमारे पड़ोस में रहने वाले ADO प्रताप सिंह ने ही की थी। गाँव हम लोग साल में तीन चार बार जाते थे, वहां मम्मी , मुन्ना और उसकी पत्नी अनीता रहते थे। तो कभी बुलंदशहर में तो कभी गांव में सारा परिवार इकठ्ठा होता रहता था और खूब एन्जॉय करते थे। उसी समय दो घटनाएं ह्रदय विदारक हुईं।
मुन्ना भैया और अनीता अपनी तीन साल की बेटी के साथ बुलंदशहर आ रहे थे , रस्ते में एक रात वे मोहना में रुके, फिर अगली सुबह वे वाया सिकंदराबाद बुलंदशहर के लिए निकले , लेकिन जब वे हमारे पास रट बिलखते पहुंचे तो उनकी गोदी में उनकी बेटी की लाश थी , वे बस में बैठने से पहले सिकंदराबाद में सड़क किनारे कुछ फल खरीद रहे थे, तभी कहीं से किसी तांगे को टुडे कर एक घोडा दौड़ता हुआ आया और सड़क किनारे खड़ी नन्ही बच्ची के सर पर एक टाप मार गया, सड़क और टाप के बीच नन्ही बच्ची का सर आ गया और उसने मौके पर ही दम तोड़ दिया।
दूसरी घटना में मेरी ननद सुबह सुबह नई कृत्रिम सिल्क की साडी पहन कर तैयार हुई कि भैया भाभी से मिलने जाऊंगी, जाने से पहले अपने पति के लिए टिफिन तैयार करने लगी, उसने गैस चूल्हा जलाकर जलती हुई माचिस की तीली नीचे गिरा दी , वो बुझी नहीं थी , और उसने साडी का निचला सिरा पकड़ लिया और वह भभक उठी . पूरी साड़ी उसके बदन से चिपक गयी। उसे राजी और उसके भाई पिता जीजा जी लेकर सफदरजंग दिल्ली गए लेकिन उन्हें बचाया न जा सका , उस समय उनके तीन छोटे छोटे बच्चे थे। ये बहुत बड़ी त्रासदी थी हमारे परिवार पर।
इन त्रासदियों के बीच ही एक बड़ी भूल मुझ से हुई , घर बड़ा होते हुए भी परिवार जनों और रिश्तेदारों के आवागमन से अव्यस्थित हो गया था, तो मैंने एक दिन सिरे से सफाई अभियान चलाया, उसमे राजी के कमरे से कुछ कॉपियां जिनमे वे अपनी कविताएं , और कहानिया लिख छोड़ते थे, भी रद्दी अखबारों के साथ एक ढेर में बरामदे में पहुँच गईं। अगले दिन बहुत सबेरे मैं मुंह अँधेरे उठी तो देखा कि बाहर आँगन में बैठे कुर्सी डाले राजी कुछ अखबार जला कर ताप रहे हैं , मैं वहां पहुंची तो देखा आग में वे कॉपियां भी पड़ी थीं. मैंने जल्दी जल्दी एक लकड़ी से से उन्हें निकलने की कोशिश की तो केवल एक कॉपी ही बचा पाई , जिसे बाद में हमारे के पारिवारिक दोस्त खुर्जा के ब्रह्म प्रकाश ने "अंजुरी भर गीत " नाम से पुस्तकाकार में छपवाया।
इसलिए मैं कभी कभी सोचती थी , कि इस आदमी में बहुत गुण हैं , लेकिन इसकी सनक का कोई भरोसा नहीं कि कब क्या कर बैठे। मैंने पूछा कि आपने ऐसा क्यों किया, क्यों जलाया, तो उन्होंने कहा कि जब तुमने इन्हें कबाड़े में डालने लायक मान लिया तो मैंने जला कर हाथ तापने लायक मान लिया। उनके इस अप्रत्याशित बर्ताव की शिकायत दबे दबे उनके स्टाफ के लोग भी करते थे और राजी से डरते थे। वे कहते थे कि साहब अच्छे हैं, इंटेलीजेंट हैं लेकिन कब क्या कर दें , कोई नहीं जानता।
मेरे पापा का एक पत्र मेरे नाम आया , उसमे नमित (प्रवेश मेरे बड़े बेटे ) का केंद्रीय विद्यालय नगरोटा से जारी एक स्कूल लिविंग सर्टिफिकेट था, और पत्र में लिखा था, बुलंदशहर में नया केंद्रीय विद्यालय खुल रहा है , इस सर्टिफिकेट के साथ वहां एडमिशन करा सकते हो , प्रिंसिपल कुछ आनाकानी करे तो मेरा ऑफिस का फोन नंबर ऊपर लिखा है, कहना है बात करना चाहे तो कर ले। हम जिला सोल्जर बोर्ड के भवन में दो महीने पहले ही खोले गए केंद्रीय विद्यालय गए, प्रिंसिपल से बात की, तो उन्होंने पूरे सत्कार के साथ हमें बैठाया , चाय पिलाई , हमारे बेटे का एडमिशन भी कर लिया। इस प्रकार हमारे बड़े बेटे का केंद्रीय विद्यालय में हुआ।
तभी उत्तर प्रदेश सरकार ने ग्रामीण आवास परिषद् का गठन किया और प्रत्येक जिले में आवासीय योजनाओं के लिए एक आवास विकास अधिकारी का कार्यालय स्थापित किया जिस पर स्थानीय व्यवस्था करने का निर्देश जिलाधिकारियों को दिया। उस से पहले हर जिले में जिला ग्राम्य विकास अभिकरण की भी स्थापना की जा चुकी थी। और के के सक्सेना, जो राजी के घनिष्ठ मित्र और मार्गदर्शक थे, को उस अभिकरण का अपर परियोजना निदेशक बना दिया गया था। उनकी सलाह पर कोमल राम एक बार फिर हमारे घर आये। और उन्होंने राजी से कहा कि वे आवास विकास अधिकारी के पद पर उन्हें लाना चाहते हैं और सहमति लेने आये हैं. राजी ने प्राचार्य महोदय को भी खबर करके घर पर बुलवा लिया और तीनों ने विचार विमर्श करके सहमति दे दी।
तीसरे दिन राजी को आवास विकास अधिकारी पद का नियुक्ति पत्र मिल गया और उसने नया पद , नया ऑफिस ज्वाइन कर लिया, हमें डीएम कॉलोनी में घर भी अलॉट हो गया और हम एग्रीकल्चर स्कूल कैंपस से डीएम कॉलोनी बुलंदशहर में शिफ्ट हो गए , हमारे घर के सामने ही के के सक्सेना का घर था, इसके बाद हम दोनों परिवारों में और घनिष्टता हो गयी। नए पद या नई योजना के कारण नहीं, बल्कि कोमलराम के अति विश्वास पात्र बन जाने के कारण राजी बहुत व्यस्त हो गए, उनका दफ्तर घर पर भी लगने लगा. उस दौरान बहुत से जिला स्तर के अधिकारी या तो ससपेंड हो जाते या ट्रांसफर करा कर चले जाते, कोमल राम बहुत अच्छे और ईमानदार और कर्मठ अफसर थे लेकिन अपने अधिकतर काम राजी पर डाल देते थे। एक समय तो राजी के पास ९ विभागों का कार्यभार आ गया था। राजी काम के भार से नहीं लेकिन अव्यवस्थाओं और भ्र्ष्टाचार से तंग आ कर खिन्न रहने लगे थे। एक बार तो उन्होंने वापस शिक्षक का जॉब लेने की सोची। लेकिन उनके पापा ने उनका हौसला बढ़ाया और कहा कि तुम कर सकते हो, सब सुधर जाएगा।
उनकी सनक का एक नमूना बताती हूँ , १९८९ में यानि आवास विकास अधिकारी बनने के दो महीने बाद , मैं फिर गर्भवती थी, हम तीसरा बच्चा नहीं चाहते थे, इसलिए मैंने ओमी बुआ जी के साथ एक लेडी डॉक्टर से संपर्क किया और उनकी सलाह पर एबॉर्शन कराने की सोची , मैं और बुआ जी ऑपरेशन रूम तक पहुँच गए, लेकिन फिर मैं डर गयी और ऑपरेशन टेबल से बीच में ही उठ कर बुआ जी के साथ वापस आ गयी. शाम को बुआ जी ने राजी को ये बात बता दी , उन्होंने कोई खास प्रतिक्रिया नहीं दी , बस इतना कहा कि अब जो आ रहा है उसे आने दो , आगे से ध्यान रखेंगे। उसके अगले दिन चुपचाप बिना किसी को कुछ भी बताये अपनी नसबंदी करवा आये, जिसका पता मुझे उनकी चाल देख कर दो दिन बाद चला। यानि वो अपने फैसले लेने से पहले किसी से सलाह मशविरा नहीं करते।
तीन वर्ष इस पद पर रहने के बाद, राजी का इस पद से रामपुर जिले में पुराने विभाग , ग्राम्य विकास में हो गया. मेरी सबसे छोटी चाची के जीजा जी (बाबू राम जी )उन दिनों, ग्राम्य विकास विभाग में मुख्यालय पर अपर आयुक्त प्रशासन पद पर तैनात थे, वे बुलंदशहर किसी जांच में आये थे, उन्हें मेरा पता था कि मैं भी बुलंदशहर में हूँ, राजी के मामा कर्नल साब के वे जवानी में साथी भी रह चुके थे, राजी उन्हें लंच पर घर ले आये। बातों बातों में मजाक में राजी ने उन्हें कहा, मामा जी, लगता है कि विभाग भूल गया है कि उनका एक अधिकारी एक ही जिले में १२, १३ साल से तैनात है, तो उन्होंने भी आश्चर्य किया कि क्या तुम्हें इस जिले में इतना समय हो गया है, क्या ट्रांसफर चाहते हो? राजी ने कहा कि आपकी मर्जी मैं तो जैसा यहाँ वैसा कहीं और। उस दिन की बात शायद उनको याद रही हो और उन्होंने ट्रांसफर सीजन आते ही पहली ही लिस्ट में राजी का ट्रांसफर रामपुर कर दिया। पूरे १३ साल तक हम इस जिले में रहे। लेकिन इस जिले का और अन्न जल हमारे भाग्य में बदा था।
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