पहली पारी अक्टूबर २००६ में समाप्त हो जाने के बाद।
धीरे धीरे लोगों का संवेदना प्रकट करने आने वालों का सिलसिला ख़त्म हुआ। और अब हम तीन प्राणी मैं, मेरा मंझला बेटा अमित, जो उस समय IIT रूडकी से बी.टेक (इलेक्ट्रॉनिक्स) करने के बाद नॉएडा स्थित एक साउथ अफ्रीकन सॉफ्टवेयर कंपनी में काम कर रहा था, और सबसे छोटा बेटा क्षितिज जो डीपीएस वसुंधरा में ११वीं में पढ़ रहा था, रह गए।मैंने ड्यूटी ज्वॉइन कर ली और दो दिन में ही मुझे समझ आ गया कि सुबह कार से गाजियाबाद से मुरादाबाद और शाम को मुरादाबाद से गाजियाबाद मेरे लिए ड्राइव करना संभव नहीं है।शारीरिक थकान और आर्थिक नुक्सान ने मुझे बाध्य किया कि मैं रेलवे पास बनवा लूँ। दैनिक यात्रियों के लिए मुझे रेलवे मासिक पास का महत्त्व समझ में आ गया। लेकिन कुछ दिनों में ही मुझे (दो महीने में ही) ये व्यवस्था त्यागनी पड़ी क्यूंकि मेरे अपनी आइडेंटिटी छिपा कर द्वितीय श्रेणी के भीड़ भरे डिब्बे में रोज रोज यात्रा करना, संभव नहीं रहा. कुछ दैनिक यात्रियों ने मुझे पहचान लिया कि मैं मुरादाबाद में संयुक्त विकास आयुक्त हूँ। और ये मेरे पद की गरिमा के अनुकूल नहीं था। ये पद की गरिमा भी अजीब चीज है, लोगों को जबरदस्ती ढोनी पड़ती है। मुझे समझ नहीं आता कि लोग सेवा निवृत्ति के बाद भी अपने पद को क्यों ढोते रहते हैं और अपनी नेम प्लेट और विजिटिंग कार्ड पर भूतपूर्व या रिटायर्ड के बाद पदनाम लिखवा लेते हैं।
लेकिन सिर्फ सोने के और बच्चों के लिए खाना बनाने की कवायद के लिए मेरी दो महीने की ये यात्रा निरर्थक नहीं गयी। बच्चे मेरा इंतजार करते और मेरे साथ किचन में हाथ बंटाते। फ्लैट की सफाई और कपडे धोने जैसे काम भी वो दोनों बखूबी करने लगे थे. दो महीने में वे दोनों अपनी पसंद का खाना बनाना भी अच्छे से सीख गए थे।
मैंने विकल्प के तौर पर एक टिफिन सप्लायर भी लगाया लेकिन टिफिन का खाना बच्चों को पसंद नहीं आया और ज्यादातर दिनों में मुझे टिफिन ज्यूँ का त्यूं रखा मिलता था, तो ये विकल्प भी रद्द करना पड़ा।
दो महीनों में दोनों बेटे लगभग आत्मनिर्भर हो गए और मैंने फिर अपना रेलवे पास renew नहीं कराया और केवल साप्ताहिक रूप से घर आने लगा, घर आने के मतलब अतिरिक्त व्यस्तता था। लेकिन बच्चों के साथ आसानी से बीत जाता था सप्ताहांत।
लेकिन वर्किंग डेज में दिन तो दफ्तर और दौरों में कट जाता था, लेकिन रातों की नींद गायब हो गयी थी, अब मुझे अपने इस अशांत होते मन का हल ढूंढना था। लैपटॉप खोल लेता, कुछ ऑफिसियल काम निपटा लेता और फिर गूगल न्यूज़ देखता। गूगल सब जानता है बहुत पहले से जानता है कि किसे किस चीज की तलाश है। मुझे शांति की तलाश थी। तो एक दिन मुझे मिला एक शब्द समूह "Ambassador of Peace " उस पर क्लिक किया तो मिला एक ग्रुप जो ऑरकुट नामक सोशल वेबसाइट पर Cas नाम की एक ऑस्ट्रेलियाई नागरिक ने बना रखा था। इसकी पोस्ट पढ़ीं तो मैंने भी इसे ज्वाइन कर लिया।
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