सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

यूनिवर्सल सिविल कोड

 विवाह, तलाक़, संपत्ति का बँटवारा मुख्य रूप से ये तीन विषय है, जो सिविल कोड द्वारा निर्धारित होते हैं । किसी भी देश में अलग अलग पृष्ठभूमि के लोग रहते हैं। ये पृष्ठभूमि उनके धर्म, उनके पूर्वजों के मूल निवास, उनकी भाषा में लिखे गये साहित्य या उनकी भाषा में लिखे,रचे, बसे लोकगीतों से निर्धारित होती है।


जिन देशों ने अपना कोई राष्ट्रीय धर्म घोषित नहीं किया हुआ है, उनके नागरिकों को अपनी अपनी पृष्ठभूमि के अनुसार विवाह, तलाक़, संपत्ति विभाजन जैसे पारिवारिक मसलों को निपटाने की स्वतंत्रता प्राप्त है। 


जिन देशों ने स्वयं को इस्लामिक या ईसाई या किसी धर्म से संचालित घोषित किया हुआ है, उन देशों के नागरिक अपने पारिवारिक मामलों के लिए अपने राष्ट्रीय धर्म के रिवाजों, धर्मग्रन्थों  में वर्णित विधियों का ही पालन करते हैं।


भारत में अलग अलग राज्यों में, एक ही धर्म के लोग भी अलग अलग परंपराओं में अपने पारिवारिक मसलों का हल तलाश करते हैं। उदाहरण के लिए हरियाणा में पिता की मृत्यु के बाद पुत्र और पुत्री दोनों को विरासत में संपत्ति का समान अधिकार प्राप्त है लेकिन हरियाणा से सटे उत्तर प्रदेश में परंपरागत रूप से पुत्री को विरासत में संपत्ति प्राप्त नहीं होती। पुत्री चाहे तो इसके लिए संपत्ति में हिस्सा माँगने का मुक़दमा डाल सकती है और मुक़दमे के गुण दोष के आधार पर उसका निर्णय, पुत्री के पक्ष या विपक्ष में हो सकता है। हिंदुओं में भी मिताक्षरा और दायभाग दो प्रणालियों से महिलाओं का अधिकार निर्धारित होता रहा है। और ये भौगोलिक आधार पर भी भेदभावपूर्ण हैं।


अन्य धर्मों में भी इतने उपधर्म (संप्रदाय) हैं कि कौन से संप्रदाय में कौन से स्कूल ( विचारधारा) के अनुसार फ़ैसला किया जाएगा, इस के विवाद सामने आते ही रहते हैं। बरेलवी और देवबंदी विचारधाराओं के विवादों को मुस्लिम विद्वान जानते ही है । ईसाइयों में भी बहुत से सम्प्रदाय जैसे, कैथोलिक, प्रोटेस्टेंट,मेथोडिस्ट आदि हैं, सिक्खों में अकाली और निहंग, जैनियों में दिगंबर और श्वेतांबर तथा बौद्धों में हीनयान और महायान संप्रदायों के अपने अपने नियम क़ायदे हैं।


तो भारत जैसे देश में आसपास रहने वाले लोगों की परंपराएँ और रिवाज एक दूसरे को प्रभावित करती है। कई बार परंपराओं को लिंग , जाति आदि के आधार पर भेदभावपूर्ण भी पाया जाता है और मानवता के उच्च आदर्शों के विरुद्ध भी । स्त्रियों, बच्चों और नीची समझी जाने वाली जातियों के प्रति कुछ परंपराओं और रिवाजों को मानवता विरोधी कहा जाता है। विलोम विवाह और उससे उत्पन्न संतानों में प्रति समाज का रवैया निंदनीय भी होता है।


भारत का संविधान भारत के हर नागरिक की समानता, स्वतंत्रता , सम्मान और जीवन के अधिकार की संरक्षा करता है। इसलिए यदि कोई अपने समाज या संप्रदाय की परंपराओं के विरुद्ध अपने संवैधानिक अधिकारों को। अहल करने की आवाज़ उठाता है तो उसे विजय तो मिलती है, लेकिन उसे लंबी क़ानूनी लड़ाई लड़नी पड़ती है।


कुछ विद्वान जो भारत को एक रंगबिरंगा गुलदस्ता कहते हैं और विविधता में एकता को भारत की विशिष्टता बताते हैं , उन्हें आजकल ( जब यूनिफार्म सिविल कोड की बहस प्रचलित है) ये कहने में बिलकुल संकोच नहीं होगा कि सरकार को किसी सम्प्रदाय के पर्सनल क़ानून में छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए। लेकिन यदि भारत सरकार भारत को हिन्दू राष्ट्र घोषित करने से बचना चाहे तो भी, वह भारत के हर धर्म हर संप्रदाय के नागरिकों के जीवन, सम्मान, समानता और संपत्ति के अधिकार को संवैधानिक संरक्षण देने के लिये यूनिफार्म सिविल कोड लागू कर सकती है । ऐसे समान नागरिक संहिता का सभी लोग स्वागत करेंगे, सिवाय कुछ धर्माचार्यों के या कुछ पुरुष सत्तात्मक व्यवस्था के पोषकों के जो महिलाओं को पुरुष से हीन समझते हैं।


एकाधिक पति, या एकाधिक पत्नी रखना , बेटियों या पत्नियों को संपत्ति से बेदख़ल करना , एक पक्षीय तलाक़ का अधिकार पुरुष को प्राप्त होना, किसी बच्चे को अवैध संतान कहना आज के युग में क़तई उचित नहीं ठहराया जा सकता।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

सच्ची कहानी, नायिका की जुबानी

डिस्क्लेमर:- प्रस्तुत कहानी में संयोग से किसी की जिंदगी से कोई घटनाएं या नाम , मेल खा सकती हैं, दिए गए नाम और स्थान सब असल दुनिया में हैं, लेकिन जरुरी नहीं कि ये इस कहानी में लिखे पात्रों की असल जिंदगी हो। कहानी का उद्देश्य केवल आज के उत्तर भारत के गाँवों की महिलाओं के एक पहलू पर प्रकाश डालना है।  + "मैं तब सोलह बरस की थी, दसवीं की बोर्ड की परीक्षा सर पर थी।  गाँव में अडोसी पडोसी नहीं होते, बल्कि चाची ताई, भैया भाभी होते हैं। मतलब सब एक ही खानदान के लोग होते हैं तो रिश्तेदार ही होते हैं, शहर की तरह हम यहाँ किसी के नाम या पद से नहीं , रिश्ते से एक दूसरे से सम्बोधित करते हैं। तो ऐसे ही हमारी एक चाची थीं जो उम्र में मुझ से ४ या ५ साल बड़ी थीं, उनकी शादी को साल भर ही हुआ था. बड़ी हंसमुख थीं, मेरी उनसे खूब पटती  थी, वो मुझे चिड़िया बुलाती थीं क्योंकि मैं चिड़िया की तरह हर समय चूं चूं करती फुदकती फिरती थी, हालांकि मेरे पापा मुझे गुड़िया बुलाते थे, वैसे मेरा नाम सुषमा है। चाची जी की एक बड़ी बहन थीं जिनका बेटा हरी, चाची की ही उम्र का था, और  १२वीं में पढता था और उसके भी बोर्ड की प...

ghost story

Ghost का अर्थ भूत बताया जाता है, अंग्रेजी में इसे "जो वास्तव में अस्तित्व में नहीं है, या जो था पर अब नहीं है" के अर्थ में लिया जाता है। भूत को हिंदी में "बीता हुआ", या "अतीत" के अर्थ में लिया जाता है.   ghostwriting का भी चलन इन दिनों है। और इतना है कि अब इसके विज्ञापन भी आने लगे हैं कि अपनी कहानी ghostwriters से लिखवाइए। यानि कहानी के लिए बस कंटेंट आप उपलब्ध करा दीजिये और पैसा लेकर आपकी कहानी आपकी जुबानी भाषा और लेखन विशेषज्ञ लिख देंगे।   मेरे पास भी एक घोस्ट आया, यूँ कहिये कि मेरे एक प्रियजन ने मुझ से कहा कि क्या आप मेरी कहानी लोगों को बता सकते हैं, मैंने कहा कुछ दिलचस्प हुआ तो कोशिश करूंगा, लेकिन मैं कोई स्थापित लेखक नहीं हूँ और मैं कहानीकार के रूप में स्थापित भी नहीं, इसलिए किसी कुशल लेखक के पास क्यों नहीं करते, उसने कहा कि क्योंकि वे बड़े मंहगे हैं और मेरे पास देने को दमड़ी भी नहीं, और फिर मुझे जितना आप जानते हैं उतना मेरे परिवार के लोग भी नहीं जानते तो आप मेरी बात शायद बेहतर लिख सकें। और मैंने हाँ भर दी।   " मैं छोटी सी थी, गाँव में रहती थी ,...

व्यापार संसार को लील रहा है

सोशल मीडिया एक बहुत बड़ा मंच है। ये बड़ा इसलिए है कि यहां कोई भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पूरा पूरा लाभ उठा सकता है और उठा रहा है। इन मंचों के संचालकों ने आत्मानुशासन के लिए कुछ रेस्ट्रिक्शन्स रखी हुई हैं लेकिन ये रेस्ट्रिक्शन्स तभी काम में लाइ जाती हैं, जब कोई इन पर आपत्ति  दर्ज कराता है।  और ये जरुरी नहीं है कि हर आपत्ति पर मंच संचालक रेस्ट्रिक्शन लागू ही करे। कई बार उनका आपत्ति करने वाले को जवाब आता है कि उनके स्टैंडर्ड्स के अनुसार कंटेंट आपत्तिजनक नहीं पाया गया।  अब ये स्टैण्डर्ड कौन बनाता है। हर देश/प्रदेश/समाज के अपने अपने स्टैंडर्ड्स होते हैं, अपने अपने सामजिक नियम और परम्पराएं होती हैं। मंच संचालक जिस देश में बैठे हैं, वे उस देश के स्टैंडर्ड्स को दुनिया भर में थोप रहे होते हैं।  ये सांस्कृतिक आक्रमण/अतिक्रमण जैसा समझिये। अमेरिका में बैठे लोग अपने स्टैंडर्ड्स सारी दुनिया पर थोप रहे हैं क्यों कि फेसबुक, ट्विटर/x , व्हाट्सप्प, इंस्टाग्राम, टेलीग्राम सब का सञ्चालन अमेरिका से हो रहा है।  अच्छा लगता है कि हमें अपनी अभिव्यक्ति के लिए एक बड़ा मंच मिल जाता है और ...