यूनिफार्म सिविल कोड भारत के संविधान के नीति निर्देशक सिद्धांतों में दिए गए संविधानिक वचन को निभाने के लिए लाना ही चाहिए। लेकिन भारत की विविधता को भी स्वीकार करना भारत के संविधान में ही वचनबद्धता है।
इसका सीधा सा उपाय ढूंढना पड़ेगा। जैसे कोई किसी भी विधि से किसी भी सामजिक रीति रिवाज से विवाह करे, लेकिन उस शादी/विवाह/मैरिज को सरकारी संस्था/विवाह अधिकारी के पास पंजीकरण कराया जाना अनिवार्य हो। केवल पंजीकृत विवाह को ही किसी भी कोर्ट में मान्य समझा जाएगा, अतः बिना पंजीकृत कराये, उस विवाह के विच्छेद यानि तलाक आदि का मामला अदालत में नहीं लाया जा सकेगा। सामाजिक संस्थाएं जो भी समाधान निकालेंगी, उनको चुनौती दिए जाने पर कोर्ट तभी दखल देगा जब विवाह पंजीकृत हुआ हो.
इसी प्रकार जब तक सम्पत्ति के विभाजन के सम्बन्ध में परिवार में सहमति है, तो सरकार उसमे कोई दखल नहीं दे। लेकिन यदि किसी पक्ष द्वारा सम्पत्ति पर अपना दावा पेश किया जाता है तो उत्तराधिकारियों का निर्धारण, बिना लिंगभेद के, बिना आयु और वैवाहिक स्टेटस में भेद के, किया जाएगा।
संतान पिता और माता दोनों की संपत्ति में उत्तराधिकार पाने का हकदार हो, और संतान को वैध या अवैध में न बांटा जाए। आज के युग में वैज्ञानिक विधियों से, यह निश्चित किया जा सकता है, कि अमुक व्यक्ति वास्तव में संतान है या नहीं। लेकिन बिना वसीयत के व्यक्ति की मृत्यु पर ही उत्तराधिकार का प्रश्न उठाया जाए. वसीयत को सर्वोच्च मूल्य दिया जाना चाहिए, वसीयत में व्यक्ति को धारित संपत्ति को किसी को भी हस्तांतरित करने का लिखित इच्छा प्रकट करने का अधिकार होना चाहिए। और ये वसीयत भी तभी मान्य हो जब इसे पंजीकृत कराया गया हो।
जो व्यक्ति अपने संप्रदाय/धर्म/जाति/कबीलों के नियमों में बंधे रहना चाहता है, उसमे सरकार कोई दखल नहीं दे, लेकिन अगर उसे भारत के संविधान के अंतर्गत गठित न्यायालयों में कोई न्याय माँगना होगा तो उसे विवाह, जन्म, मृत्यु, और संपत्ति/ वसीयत को पंजीकृत कराना अनिवार्य हो।
बस इतना सा यूनिफार्म सिविल कोड बना दो। और जीने दो लोगों को उनके हिसाब से.
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