सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

किसान को सुनिए सरकार

दुनिया भर के आधा दर्जन से अधिक लोकतान्त्रिक देशों में किसान आंदोलनरत हैं और अपने ट्रैक्टर्स तथा अन्य उपकरणों के साथ, अपने परिवारों और चूल्हा चौके के साथ सड़कों पर हैं। लेकिन उन किसानों के साथ जैसा सुलूक भारत में हो रहा है, वैसा दुनिया में और कहीं नहीं हो रहा। किसान आंदोलनकारियों द्वारा पहले भी और अब भी जो प्रदर्शन किया है वह शांतिपूर्ण ही कहा जाएगा, हालांकि कभी कभी कुछ अराजक तत्व हर आंदोलन में घुस जाते हैं और कभी कभी सरकार रणनीति के तहत आंदोलनकारियों को बदनाम करने और आम जनता में आंदोलनकारियों के प्रति सहानुभूति को तोड़ने के लिए आंदोलनकारियों में छद्म उपद्रवी भी घुसा देती है। 

आंदोलन अच्छा है या बुरा है, ये छोड़िये, आंदोलन की नौबत आती ही क्यों है। 

किसान आंदोलन में प्रमुख मांग उनकी फसल का सही दाम मिलने, उपज की लागत कम करने के लिए इनपुट्स(बीज, उर्वरक, पेस्टीसिड्स, सिंचाई और डीजल व् बिजली ) की कीमतें नियंत्रित करने अथवा अनुदानित करने की ही रहती है। किसान बड़े गर्व से खाद्य सुरक्षा प्रदान करने के लिए अपनी पीठ ठोकती रहती है कि देश में किसी को भूखा नहीं रहने दिया जाता, देश के अस्सी करोड़ लोगों को मुफ्त राशन सरकार उपलब्ध कराती है। लेकिन इस खाद्य सुरक्षा का स्रोत क्या है, खेत में उगने वाला गेंहू, चावल, दालें, तिलहन, गन्ना। और देश की बढ़ती हुई बेरोजगारी के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में युवकों को मजबूरन खेती करनी पड़ रही है, मजबूरन इसलिए कह रहा हूँ कि यदि किसी भी युवक को दुनिया में कहीं भी रोजगार की उम्मीद दिखाई देती है तो वो वैध या अवैध तरीके से वहां उस रोजगार को अपनाने के लिए तैयार बैठा है। चाहे वो तंजानिया, नाइजीरिया, जैसे गरीब देश हों या अरब, इजराईल, अमेरिका, कनाडा या कोई और अमीर देश। मजबूरबन इसलिए भी कि भारत में अधिकतर किसानों के पास एक एकड़ से दो एकड़ के बीच ही कृषि भूमि है, कुछ थोड़े से किसानों के पास १० से १८ एकड़ तक ही कृषि भूमि है, जिनकी संख्या १ प्रतिशत से भी कम है। १० एकड़ से कम भूमि के कृषकों का जीवन किसी नौकरी पेशा चपरासी के जीवन से भी बदतर है। इसलिए किसानों के बच्चे, अगर फ़ौज या पुलिस में सिपाही नहीं बन पाते तो वे रेलवे की चतुर्थ श्रेणी के पदों के लिए भी लाखों की संख्या में आवेदन करते हैं जबकि रिक्तियां मात्र कुछ हजार ही होती हैं। जो भी कहीं नौकरी पा गया, वो अगर संभव हो तो शहर में ही बस जाना चाहता है, अनेकों फौजी रिटायरमेंट यानि पंद्रह वर्ष की सेवा के बाद, बिजली घरों या बड़े बड़े माल या सोसाइटीज में गार्ड की नौकरी करना बेहतर समझते हैं, बनिस्बत गाँव में अपने छोटे से खेत में किसानी करने के। 

किसान पूरे देश के लिए खाद्यान्न उगाता है, लेकिन ये कोई एहसान करने के लिए ऐसा नहीं करता, उसे जिन्दा रहने और अपने परिवार को  पालने के लिए खेती करनी पड़ रही है। लेकिन सोच कर देखिये, अगर शहर में रहने वालों को और प्रोसेसिंग उद्योग चलने वाले उद्योग पतियों को सब्जियां न मिलें, ,मसाले,अनाज न मिले, दूध न मिले तो क्या ये जोमाटो, स्विग्गी, बिग बास्केट, अमेज़ॉन फ्रेश, रिलायंस फ्रेश ब्रेड, पिज़्ज़ा, मोमोज़ , चीज़ , मेयोनीज आपके घर पहुंचा पाएंगे। इसलिए उत्पादक को अगर खुश नहीं रख पाएंगे तो आप भी खुश नहीं रह पाएंगे। 

दुनिया के ७७ प्रतिशत लोग टर्शरी सेक्टर यानि सर्विस सेक्टर में काम करते हैं, १४ प्रतिशत लोग उद्योगों में लगे हुए हैं। मात्र ९ प्रतिशत लोग ही प्राइमरी सेक्टर यानि कच्चे माल का उत्पादन करते हैं। किसान इन कच्चे माल के उत्पादकों का सबसे बड़ा हिस्सा हैं। किसान खेतों, वनों और पशुओं के साथ जीता है और उसका जीवन बहुत कठिन है। विज्ञान का लाभ उसे भी मिला है, मशीनों का उपयोग वो भी करने लगा है. लेकिन अभी भी वह तुलनात्मक दृष्टि से गैर कृषि कार्यों में लगे लोगों की तुलना में संपन्न नहीं कहा जा सकता। किसान ही खेती की उपज का मूल्य न मिलने या खेतों में पर्याप्त मजदूरी न मिल पाने के कारण शहरों में आकर झुग्गी झोपड़ी में रहने को विवश होता है , 

अगर किसान के बारे में सरकारों ने चिंता नहीं की तो खेती छोड़ छोड़ कर लोग शहरों में आएंगे। काम उन्हें वहां भी नहीं मिलेगा। तब वे लूटपाट करेंगे। मरता क्या न करता की तर्ज पर उनके अराजक हो जाने का खतरा नज़र आता है मुझे। इसलिए प्राइमरी सेक्टर को सम्भालिये सरकार। केवल कलम चलाने से भूख नहीं मिट  सकती, न ही भाषणों और टीवी चॅनेल्स पर बहस करने से  और न ही सोशल मीडिया  पर आपके कंटेंट पर अधिक लाइक या कमैंट्स और विज्ञापन मिलने से। पेट भरने के लिए भोजन ही चाहिए, जो किसान ही उपलब्ध कराता है। 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

सच्ची कहानी, नायिका की जुबानी

डिस्क्लेमर:- प्रस्तुत कहानी में संयोग से किसी की जिंदगी से कोई घटनाएं या नाम , मेल खा सकती हैं, दिए गए नाम और स्थान सब असल दुनिया में हैं, लेकिन जरुरी नहीं कि ये इस कहानी में लिखे पात्रों की असल जिंदगी हो। कहानी का उद्देश्य केवल आज के उत्तर भारत के गाँवों की महिलाओं के एक पहलू पर प्रकाश डालना है।  + "मैं तब सोलह बरस की थी, दसवीं की बोर्ड की परीक्षा सर पर थी।  गाँव में अडोसी पडोसी नहीं होते, बल्कि चाची ताई, भैया भाभी होते हैं। मतलब सब एक ही खानदान के लोग होते हैं तो रिश्तेदार ही होते हैं, शहर की तरह हम यहाँ किसी के नाम या पद से नहीं , रिश्ते से एक दूसरे से सम्बोधित करते हैं। तो ऐसे ही हमारी एक चाची थीं जो उम्र में मुझ से ४ या ५ साल बड़ी थीं, उनकी शादी को साल भर ही हुआ था. बड़ी हंसमुख थीं, मेरी उनसे खूब पटती  थी, वो मुझे चिड़िया बुलाती थीं क्योंकि मैं चिड़िया की तरह हर समय चूं चूं करती फुदकती फिरती थी, हालांकि मेरे पापा मुझे गुड़िया बुलाते थे, वैसे मेरा नाम सुषमा है। चाची जी की एक बड़ी बहन थीं जिनका बेटा हरी, चाची की ही उम्र का था, और  १२वीं में पढता था और उसके भी बोर्ड की प...

ghost story

Ghost का अर्थ भूत बताया जाता है, अंग्रेजी में इसे "जो वास्तव में अस्तित्व में नहीं है, या जो था पर अब नहीं है" के अर्थ में लिया जाता है। भूत को हिंदी में "बीता हुआ", या "अतीत" के अर्थ में लिया जाता है.   ghostwriting का भी चलन इन दिनों है। और इतना है कि अब इसके विज्ञापन भी आने लगे हैं कि अपनी कहानी ghostwriters से लिखवाइए। यानि कहानी के लिए बस कंटेंट आप उपलब्ध करा दीजिये और पैसा लेकर आपकी कहानी आपकी जुबानी भाषा और लेखन विशेषज्ञ लिख देंगे।   मेरे पास भी एक घोस्ट आया, यूँ कहिये कि मेरे एक प्रियजन ने मुझ से कहा कि क्या आप मेरी कहानी लोगों को बता सकते हैं, मैंने कहा कुछ दिलचस्प हुआ तो कोशिश करूंगा, लेकिन मैं कोई स्थापित लेखक नहीं हूँ और मैं कहानीकार के रूप में स्थापित भी नहीं, इसलिए किसी कुशल लेखक के पास क्यों नहीं करते, उसने कहा कि क्योंकि वे बड़े मंहगे हैं और मेरे पास देने को दमड़ी भी नहीं, और फिर मुझे जितना आप जानते हैं उतना मेरे परिवार के लोग भी नहीं जानते तो आप मेरी बात शायद बेहतर लिख सकें। और मैंने हाँ भर दी।   " मैं छोटी सी थी, गाँव में रहती थी ,...

व्यापार संसार को लील रहा है

सोशल मीडिया एक बहुत बड़ा मंच है। ये बड़ा इसलिए है कि यहां कोई भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पूरा पूरा लाभ उठा सकता है और उठा रहा है। इन मंचों के संचालकों ने आत्मानुशासन के लिए कुछ रेस्ट्रिक्शन्स रखी हुई हैं लेकिन ये रेस्ट्रिक्शन्स तभी काम में लाइ जाती हैं, जब कोई इन पर आपत्ति  दर्ज कराता है।  और ये जरुरी नहीं है कि हर आपत्ति पर मंच संचालक रेस्ट्रिक्शन लागू ही करे। कई बार उनका आपत्ति करने वाले को जवाब आता है कि उनके स्टैंडर्ड्स के अनुसार कंटेंट आपत्तिजनक नहीं पाया गया।  अब ये स्टैण्डर्ड कौन बनाता है। हर देश/प्रदेश/समाज के अपने अपने स्टैंडर्ड्स होते हैं, अपने अपने सामजिक नियम और परम्पराएं होती हैं। मंच संचालक जिस देश में बैठे हैं, वे उस देश के स्टैंडर्ड्स को दुनिया भर में थोप रहे होते हैं।  ये सांस्कृतिक आक्रमण/अतिक्रमण जैसा समझिये। अमेरिका में बैठे लोग अपने स्टैंडर्ड्स सारी दुनिया पर थोप रहे हैं क्यों कि फेसबुक, ट्विटर/x , व्हाट्सप्प, इंस्टाग्राम, टेलीग्राम सब का सञ्चालन अमेरिका से हो रहा है।  अच्छा लगता है कि हमें अपनी अभिव्यक्ति के लिए एक बड़ा मंच मिल जाता है और ...