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Dirty Journalism

ये गलत पत्रकारिता है कि बलात्कार जैसे जुर्म से पीड़ित या जुर्म  करने वाले अत्याचारी की जाति या धर्म या उसकी राजनैतिक विचारधारा का उल्लेख किया जाए। 
हर धर्म, हर जाति, हर राजनैतिक दल में आपराधिक मानसिकता के लोग हो सकते हैं। जब कोई कहता है कि अमुक जाति की लड़की के साथ बलात्कार हुआ, अपराधी अमुक जाति के बताये जाते हैं। तो ऐसा कहने वाले लोग चाहे वो पत्रकार हों, पुलिस या प्रशासनिक अधिकारी हों या राजनेता हों, मुझे वे सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने वाले नजर आते हैं। ऐसे लोग जातिगत, सम्प्रदायगत, और राजनीतिगत वैमनस्य बढ़ाने का सामाजिक और राष्ट्रीय  अपराध करते हैं और सत्ताधारी दल जो चाहे २०१४ से पहले के हों या बाद के, ऐसे अपराध को नजरअंदाज करते हैं। 
मेरी राय है कि प्रिंट मीडिया और दृश्य श्रव्य मीडिया, तथा राजनेताओं और पुलिस व् प्रशासनिक अधिकारीयों को इस बात का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए कि घटना का प्रस्तुतीकरण किस प्रकार किया जाए ताकि अपराधी को किसी वर्ग का समर्थन न मिले, किसी वर्ग को अपमानित न महसूस होना पड़े। 
जातीय और सांप्रदायिक हिंसा को छोड़ कर ज्यादातर अपराध व्यक्तिगत होते हैं लेकिन पत्रकार उन्हें गलत नीयत से सनसनीखेज बना देते हैं। 
उदाहरण स्वरुप -
ब्राह्मण की लड़की का हिसार में अपहरण, बलात्कार और हत्या। ये घटना किसी व्यक्तिगत दुश्मनी की हो सकती है या किसी बीमार मस्तिष्क वाले किसी पुरुष द्वारा अवसर पा कर किया गया अपराध हो सकता है। लड़की ब्राह्मण थी, इसलिए उसका बलात्कार हुआ हो, ये लगभग असंगत लगता है, वह लड़की थी बस यही बताना काफी था, हिसार में एक लड़की का अपहरण, बलात्कार और हत्या। केवल यह शीर्षक काफी था। 
दलित महिला के साथ सामूहिक बलात्कार। केवल दलित होने के कारण उसका बलात्कार हुआ हो, ये बिलकुल भी जरुरी नहीं, लेकिन समाचार को मसालेदार बनाने के लिए इसमें दलित शब्द जोड़ दिया गया, फिर बसपा के नेताओं के बयान और इंटरव्यू प्रकाशित / प्रसारित होते हैं, और बलात्कारियों को किसी उच्च जाति का बताया जाता है, फिर उस जाति की पंचायतों में बलात्कारियों के पक्ष में बैठकें और बयान आते हैं। 
कश्मीर में एक घुमन्तु परिवार की किशोरी लड़की के साथ हुए बलात्कार में तो बलात्कारियों/बलात्कार के आरोपियों के पक्ष में दलगत झंडों के साथ जुलुस निकाले गए थे। 
ऐसे अधिकतर मामलों में वास्तविक अपराधियों को बचाव का मौका मिल जाता है, पुलिस किसी तरह केस को बंद करने में जुट जाती है, कई बार फर्जी लोगो को आरोपी बता कर जेल भेज दिया जाता है, कई बार उन्हें पुलिस से बच भागने में मुठभेड़ में मार दिया जाता है और मामला समाप्त हो जाता है. असली अपराधी बच जाता है। 
इसलिए पत्रकारों सहित सभी बयानबाजों को पुलिस को सही जांच करने देना चाहिए, और अपराधियों को बच निकलने के लिए प्रकशित बयानों की ओट में बच निकलने का मौका नहीं देना चाहिए। 

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