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Be Positive 1

एक भावना है, जिसे दम्भ, अहंकार, घमंड, गर्व,  दर्प, मान, अभिमान कई नामों से जाना जाता है। कुछ लोग गर्व और अभिमान को सकारात्मक मानते हैं लेकिन सच्चाई यही है कि नाम कुछ भी हो,  इन सभी की अभिव्यक्ति, देर सबेर  उद्दंडता में ही होती  है, इस लिए ये एक नकारात्मक भावना है । इस भावना के कारण मनुष्य एकाकी हो जाता है, वह मित्र नहीं बना पाता, और जो मित्र या रिश्तेदार होते भी हैं, वे धीरे धीरे दूर होने लगते हैं, ये भावना जिस मनुष्य में होती है वह अपने आसपास के वातावरण को भी संक्रमित करती है। उस व्यक्ति के साथ रहने को विवश लोग भी उसी भावना से ग्रसित होने लगते हैं, इस प्रकार ये एक संक्रामक रोग की तरह हानिकारक है। बच्चों पर ऐसी भावना का प्रभाव सबसे ज्यादा पड़ता है क्योंकि उनका विवेक तब तक विकसित नहीं हुआ होता कि वे इस भावना को और इसके दुष्परिणामों को समझ सकें। वे केवल अनुकरण करना जानते हैं। उनकी शिक्षा का मूल आधार उस उम्र में निरीक्षण और अनुकरण ही होता है, इस लिए बच्चे अपने माता पिता का अनुकरण करते हुए इस भावना को अंगीकार कर लेते हैं, ऐसे बच्चों के कोई मित्र नहीं बन पाते । इस भावना से ग्रस्त व्यक्ति अपने बच्चों में इस भावना के रोपित होने पर प्रसन्न होता है और उसकी भावना और घनीभूत हो जाती है। थोड़ा बड़ा होने पर एक ही परिवार में दो या अधिक व्यक्तियों में इसी भावना के कारण परस्पर टकराव होता है और प्रत्येक व्यक्ति एकाकी हो जाता है। 

रूप का अहंकार, सुडौल-सशक्त शरीर का दम्भ, धन का घमंड, पद का गर्व, कुल का मान=अभिमान, इनमे से कोई भी स्थायी नहीं है. रूप और शरीर तो उम्र के साथ ढलता ही है, धन और पद भी सदा साथ नहीं रहते। और कुल, वंश, जाति किसी का ऐसा नहीं जिसमें बुरे और बदनाम लोग न हुए हों, किसी दिन कृष्ण के वंशजों को कंस के वंशज कहने वाला भी कोई मिल ही जाता है। 

इसलिए हे मित्रों, विनम्र रहिये मित्र बनाइये, बच्चों को भी मित्रता और सहयोग तथा आदर करना सिखाइये, सिखाइये मतलब कि आप जैसा करेंगे वैसा वो अनुकरण करेंगे। सामाजिक बनिए, सामाजिक सरोकारों में हिस्सा लीजिये, मिलजुल कर हम सब हर समस्या का समाधान कर सकते हैं. खुद को सर्वश्रेष्ठ और अन्य को हीन मान कर हम अकेले रह जाएंगे। और हम अपने बच्चों का भविष्य चौपट कर देंगे। 


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