आम तौर पर जब भी किसी न्यायालय, विशेषकर सर्वोच्च न्यायालय से कोई निर्णय आता है तो परंपरागत रूप से सभी, और विशेषकर उच्च पदासीन लोग अपनी प्रतिक्रिया यही कहा कर देते हैं कि "हम न्यायालय के आदेश/निर्णय का सम्मान करते हैं।" लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तो विकास पुरुष हैं, वे परम्पराओं को तोड़ने का साहस रखते हैं। इसलिए उन्होंने कहा," जो लोग आज इलेक्टोरल बांड्स की व्यवस्था को गलत बताकर खुश हो रहे हैं, जल्द ही पछतायेंगे। "
अब उनका ये सन्देश किस के लिए है और किस भावना से जारी किया गया है , ये तो वही जानें। लेकिन कुछ भक्त टाइप लोग इसे याचिका डालने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं / प्रशांतभूषण जैसे वकीलों, न्यायालय में निर्णय देने वाली बेंच के सदस्यों, यहाँ तक कि मुख्य न्यायाधीश को भी सम्बोधित मान रहे हैं और इंतजार कर रहे हैं कि भगवान राम के तरकश से तीर किस पर चलेगा।
मुख्य न्यायाधीश एक वक्तव्य में खुद कह चुके हैं कि जब न्यायालय कोई निर्णय जारी करता है तो वह निर्णय पब्लिक प्रॉपर्टी बन जाता है। और जनता को उस निर्णय की समीक्षा करने, उस पर अपनी राय देने का हक़ होता है। निर्णय का पालन करना अपरिहार्य है। उसका पालन न करना अवमानना की श्रेणी में आता है लेकिन उस निर्णय पर कोई टिप्पणी करना हर नागरिक का अधिकार है, प्रतिकूल टिप्पणी को अवमानना नहीं माना जा सकता।
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