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एक देश एक साथ सारे चुनाव

 भारत एक देश है और एक देश में एक सरकार है तो हर पांच साल में चुनाव से सरकार चुन ही ली जाती है। पांच साल से पहले यदि सरकार गिर जाए और संसद उन्हीं चुने हुए सांसदों में से किसी एक को अपना बहुमत का नेता न चुन पाए तो मध्यावधि चुनाव की व्यवस्था भी संविधान ने कर राखी है। 

भारत एक संघ है, राज्यों का संघ। तो हर राज्य की भी एक सरकार है और उस सरकार का भी हर पांच साल में चुनाव करने की ठीक वैसी ही व्यवस्था है जैसी केंद्र की सरकार के लिए है। 

भारत सरकार में बैठे नेताओं को लगता है कि केंद्र सरकार और राज्य सरकारें के बीच नीतिगत और प्रणालीगत एक रूपता होनी चाहिए। यानि दोनों सरकारें एक ही पार्टी की होनी चाहिए तब ही विकास को गति मिलेगी और इसी लिए डबल इंजिन की सरकार का जुमला प्रचलन में आया। 

अब अगर केंद्र सरकार के गठन और राज्य सरकार के गठन के लिए चुनावों के समय में इतना अंतर हो कि राज्य सरकार के काम काज से या केंद्र सरकार के काम काज से मतदाता नाराज हो क्योंकि मतदाता तो दोनों सरकारों का एक ही है, तो वह कभी केंद्र की नीतियों से या राज्य की नीतियों या कामकाज से नाराज हो सकता है, तो वह अपनी नाराजगी सरकार के चयन के लिए मिले अवसर पर प्रकट कर सकता है। इस नाराजगी से बचने का उपाय है कि मतदाता से नाराजगी का अवसर ही छीन लिया जाए। 

देश एक बड़ी इकाई है , देश के सामने चुनौतियां या समस्याएँ राज्यों के सामने आने वाली समस्याओं या चुनौतियों से भिन्न होती हैं।  देश के सामने चुनौतियाँ हैं सीमाओं की रक्षा ,  विदेशी ताकतों द्वारा फैलाये जाने वाले आतंकवाद, देश में बने उत्पादों के लिए अंतर्राष्ट्रीय  बाजार ढूंढना, संचार, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय परिवहन/परिगमन, देश के अर्थव्यवस्था और मुद्रा को  मजबूत बनाना। इसके सामने राज्यों की चुनौतियाँ बहुत कमजोर हैं लेकिन ये कमजोर चुनौतियाँ आम जीवन को  सीधे प्रभावित करती हैं जबकि राष्ट्रीय चुनौतियाँ दूरगामी और धीरे धीरे प्रभावित करती हैं। मतदाता की नाराजगी राज्यों से अधिकतर होती है क्योंकि राज्यों के विषय उसे सीधे और तुरंत प्रभावित करते हैं।  इस प्रभाव को भोथरा करने के लिए हमारे वर्तमान प्रधानमन्त्री की रणनीति है कि मतदाताओं के सामने राष्ट्रीय मुद्दों पर एकजुटता बनाने का प्लान रखा जाए।  पडोसी देशों को शत्रु घोषित किया जाए, पड़ोसियों से देश को बाहरी और भीतरी ख़तरा  का व्यापक प्रचार किया जाए। अपने अतीत पर गर्व करना और अपने देश की संस्कृति को सर्वश्रेष्ठ और सर्वाधिक प्राचीन साबित करने तथा भारत को विश्वगुरु सिद्ध करके लोगों में आत्म गौरव का ऐसा नशा पैदा किया जाए कि लोग रोजमर्रा की समयसाओं और चुनौतियों को भूल जाएँ। 

इसलिए अब राज्यों के चुनाव के समय भी केंद्र सरकार के सभी मंत्रियों को निरंतर राज्यों में प्रचार के लिए भेजा जाता है तथा  स्वयं प्रधानमन्त्री भी सभी राज्यों ,  यहां तक कि स्थानीय निकायों के चुनावों में भी मुख्य प्रचारक की भूमिका में नजर आते हैं।  भारत में हर वर्ष कहीं न कहीं कोई न कोई चुनाव होता ही रहता है और कुछ नहीं तो खाली हुई सीटों के लिए  उपचुनाव तो जरूर हो रहा होता है। मतदाता में राष्ट्रीय भावना जागृत रहे इसलिए केंद्र सरकार और प्रधानमन्त्री  इन चुनावों में प्रचार में व्यस्त रहते हैं। इसके साथ ही एक दलील ये भी आती है कि चुनाव की घोषणा  के बाद आदर्श आचार संहिता लागू हो जाने से सरकारी मशीनरी निष्क्रिय हो जाती है और विकास कार्य ठप  पड़ जाते हैं। जबकि आदर्श आचार संहिता का मूल सिद्धांत इतना सा है कि जिस निर्वाचन क्षेत्र में चुनाव हो रहा  है उस में चुनाव काल (लगभग ४५ दिन ) में कोई नया निर्माण कार्य आरम्भ / घोषित नहीं किया जाएगा, कोई नयी  नीति मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए  घोषित नहीं की जायेगी। साथ ही इसमें ये भी स्पष्ट किया जाता है कि पुराने चल रहे कार्यों और नीतियों के कार्यान्यवन में कोई बाधा नहीं आएगी। लेकिन चुनाव प्रचार में केंद्रीय मंत्री परिषद् के सभी लोग अपना काम काज छोड़ कर प्रचार में उतरते हैं। वे अपने कार्यालय से दूर रहते हैं, नयी घोषणाओं से  परहेज करते हैं भले ही वे घोषणाएं उस निर्वाचन क्षेत्र से कोई सरोकार न रखती हों। इस प्रकार सरकार प्रचार  में व्यस्त होने के कारण स्वयं कामकाज ठप कर देती है। 

तो भले ही अनुचित कारण (अनावश्यक प्रचार ) से कामकाज ठप होता हो ,  लेकिन होता तो है ,  ये सच है। इसलिए अगर  सचमुच कामकाज की चिंता है न कि हर जगह अपने ही लोगों को सत्ता में लाने की , तो हर मंत्री / प्रधानमंत्री को  पार्टी प्रचार के कार्य में लगाने को प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। प्रचार के लिए पार्टी संगठन काम करे।  और मंत्री परिषद् के लोग सिर्फ जनसेवक (क्योंकि वे राजकोष से वेतन पाते हैं ) की भूमिका निभाए न कि पार्टी प्रचार की , तो कोई काम बाधित नहीं होंगे। केवल निर्वाचन क्षेत्र विशेष में नए उद्घाटन ४५ दिन के लिए बाधित रहेंगे।  

लेकिन मतदाता को मूल मुद्दों से भटकाने के लिए और सत्ता के हर विकेन्द्रित केंद्र पर अपने लोगों को बैठाने के लिए एक देश एक  चुनाव की व्यवस्था बहुत जरुरी है। विकास की रेल गाड़ी में एक ही कंपनी के बने हुए कई कई इंजिन लगेंगे तो  विकास की गाडी तेजी से पटरी पर दौड़ेगी। पटरी कमजोर हुई तो पटरी से उतर जाने का खतरा तो है लेकिन विकास के लिए इतना रिस्क तो लेना ही पड़ेगा ,  ड्राइवर और गार्ड दोनों के पास व्यापक अधिकार होंगे कि  वे किसी को भी कुचल सकें। 

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