अभी दो दिन पूर्व मैंने भी पहलगाम की दुर्घटना पर गुस्से में प्रतिक्रिया दी थी। लेकिन आज मैं शांत मन से सोच पा रहा हूँ कि विवेकपूर्ण प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिए, गुस्सा एक भावुक वातावरण पैदा करता है, नकारात्मक वातावरण। लेकिन आज मैं इस पर गहराई से अपना विमर्श कर सकता हूँ।
इस घटना को अंजाम देने वालों का उद्देश्य क्या था ? अगर ये मैं और आप सोच पाएं तो हम ये भी पहचान पाएंगे कि इस घटना को अंजाम देने वाले लोग कौन थे? कौन हैं वो लोग, जिन्हें इस घटना के परिणामों से लाभ होने की संभावना हो सकती है। क्या कोई कश्मीरी मुस्लिम इस से लाभान्वित हो सकता है? पिछले पांच वर्षों में कश्मीर में जैसी शांति और पर्यटन का विकास हुआ है , कश्मीरी लोगों की पर्यटन से आय में वृद्धि हुई है उससे इतना तो समझ में आता है कि पर्यटन से लाभ कमाने वाले आम कश्मीरी तो ऐसी घटना को अंजाम नहीं दे सकते जो उनकी रोजी रोटी पर खतरा पैदा कर दे।
सिरफिरे ब्रैनवॉश कर दिए गए ऐसे लोग, जिनके दिमाग में ये भर दिया गया हो कि गैर मुस्लिमों की हत्या एक सबाब का काम है और ऐसा करने से इस्लाम में उन्हें जन्नत का हकदार माना जाएगा,भी जन्नत और हूरों को लाभ के रूप में पाने के लालच में ऐसा कर सकते है. अगर ऐसे सिरफिरों ने ये काम किया है तो हमारी प्रतिक्रिया बहुत सोच समझ कर व्यक्त होनी चाहिए क्योंकि पागलों और अज्ञानियों के कृत्यों पर हम अगर ऐसी प्रतिक्रिया दे बैठे जिस से आम लोगों और समझदार लोगों का भी नुक्सान हो तो हम में और उन पागलों में क्या अंतर रह जाएगा।
लेकिन जैसी तैयारी और प्लानिंग के साथ ये घटना की गयी , उसको कोई पागल सिरफिरा तो नहीं कर सकता। इसलिए अधिक सम्भावना है कि यह काम किसी संगठित संस्था का है , जिसका उद्देश्य भारत और कश्मीर के एकीकरण में दरार डालना है, कश्मीरियों की खुशहाली जिन्हें हजम नहीं हो रही और जो भारत में रहने वाले हिन्दुओ और मुस्लिमों के बीच की खाई को और चौड़ा करना चाहते हैं। भारत में पहले से राजनीतिक कारणों से हिन्दू बनाम मुस्लिम के बीच खाई पैदा करने की तैयारियां चलती रही हैं, इसका लाभ भी कुछ राजनैतिक दल उठाते रहे हैं लेकिन वे राजनैतिक दल कश्मीर में न तो प्रभावशाली है और न ही उन्हें वहां इस प्रकार की घटना से कोई लाभ मिल सकता है, इसलिए ये मूर्खतापूर्ण कल्पना करना कि भारत के किसी राजनैतिक दल ने हिन्दू मुस्लिम खाई को चौड़ा करने के लिए ऐसी घटना प्रायोजित की होगी, व्यर्थ है। जैसे अमेरिका पर ११ सितम्बर को घटित ट्विन टावर अटैक का आरोप लगाना मूर्खता है कि उसने मुस्लिमों को बदनाम करने के लिए और ओसामा बिन लादेन पर घातक हमला करने का बहाना ढूंढने के लिए स्वयं ट्विन टावर अटैक किया था। इसी प्रकार कुछ विपक्षियों द्वारा बीजेपी पर ऐसा आरोप लगाना भी महामूर्खता है।
अब शक की सुई घूम कर जा टिकती है पाकिस्तानी सेना, पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी ISI और सरकारी शह पर पल रहे आतंकी संगठन लश्कर ए तैयबा पर। पाकिस्तानी सेना बलूचिस्तान में हुई घटनाओं के कारण बदनामी झेल रही है और वह लोगों का ध्यान लगभग भुला दिए गए कश्मीर की तरफ मोड़ कर उस बदनामी से ध्यान भटकाना चाहती है.लश्करे तैयबा POK में अब कमजोर पड़ रहा है और फिर से लाइमलाइट में आना चाहता है. ISI भी कश्मीर मुद्दे को जिन्दा रखना चाहता है और उसे भारत में कश्मीर के स्थायी विलय के बाद आई खुशहाली बिल्कुल पसंद नहीं आ रही है। इस लिए अधिक सम्भावना है कि ये घटना पाकिस्तानी सेना,ISI और लश्कर की मिलीजुली संयुक्त परियोजना हो। इसलिए भारत सरकार द्वारा अब तक गुस्से में जो प्रतिक्रिया दी है, वह भावनात्मक रूप से देश में हिन्दू मुस्लिम एकता, और कश्मीरियों की भारतीयता के संवर्धन के लिए तो अच्छी है लेकिन उसमे पाकिस्तान में सरकार और वहां की सेना के प्रति उबल रहे जनता के गुस्से को भारत के पक्ष में मोड़ने के अवसर को भी खो दिया है। मेरी निजी राय है कि भारत POK में चल रहे आतंकी अड्डों पर सर्जिकल स्ट्राइक करे तो ये एक सही कदम होगा, लेकिन सिंधु नदी का पानी रोक कर या पाकिस्तानियों का चिकित्सा वीसा जैसे वीसा को भी रद्द करके हम एक अमानवीय चेहरा प्रस्तुत कर रहे हैं.
उनका उद्देश्य कश्मीर के पर्यटन उद्योग को नुक्सान पहुंचाना भी प्रतीत होता है। इसके लिए सकारात्मक कदम होगा कि भारत सरकार और जम्मू कश्मीर सरकार पर्यटक स्थलों और पर्यटकों की सुरक्षा पर विशेष ध्यान दे और कश्मीरियों और भारतियों को भरोसा दिलाये कि उनको आतंकियों से पूर्ण सुरक्षा दी जाएगी। तब हम आतंकियों के इस उद्देश्य को असफल कर पाएंगे। इस समय देश में कोई हिन्दू मुस्लिम खाई को भरने की जरूरत है न कि उसे और चौड़ा / गहरा करने की।
कॉकरोच जनता पार्टी, युवा और लोकतंत्र में मेरा फिर जागता विश्वास काफी दिनों से मैं आज के युवाओं और उनकी समस्याओं को लेकर कुछ लिखने की सोच रहा था। कॉकरोच जनता पार्टी के नाम से शुरू हुए एक युवा आंदोलन ने मुझे इस विषय पर लिखने के लिए और अधिक प्रेरित किया। शायद इस विषय को देखने का मेरा नजरिया कुछ अलग है। मैंने अपने जीवन के पाँच वर्ष शिक्षक के रूप में बिताए हैं और उसके बाद लगभग 34 वर्ष प्रशासनिक सेवा में। इसलिए छात्र आंदोलनों को मैंने केवल अखबारों की खबरों के रूप में नहीं देखा। शिक्षक के रूप में छात्रों के बीच रहते हुए उनकी बेचैनी और उनके सपनों को समझने का अवसर मिला। बाद में प्रशासनिक सेवा में रहते हुए आंदोलनों का दूसरा पक्ष भी देखा—सरकार और प्रशासन के सामने खड़ी जनता, उनकी माँगें, उनका आक्रोश और कभी-कभी उस आक्रोश को नियंत्रित करने की प्रशासनिक मजबूरियाँ। किसानों के आंदोलन भी मैंने देखे हैं। किसान जब अपनी माँग लेकर सड़क पर आता है तो उसके पीछे केवल राजनीतिक विचारधारा नहीं होती। उसके पीछे उसकी जमीन, उसकी फसल, उसके परिवार और आने वाली पीढ़ी की चिंता होती है। प्रशासन के लिए वह कानून-व्यवस्थ...
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें