"चुप बैठो"
अगर आप अपने बच्चों को ये निर्देश देने की आदत पाल बैठे हैं तो इसे तुरंत बदल डालिये। पहले हम बच्चे को बोलना सिखाते हैं। जब वो माँ , मामा, म्मा या पा, पापा बोलता है तो हम बहुत खुश होते हैं। हम बार बार उसे बोलने को प्रेरित करते हैं। फिर हम उसे दो पैरों पर चलना सिखाते हैं, ऊँगली पकड़ कर चलवाते हैं, मेज के सहारे से चलवाते हैं उसके लिए वॉकर, गडूलना लाते हैं, किसी प्रकार उसे चलने का अभ्यास करवाते हैं।
बच्चे जब बोलना और चलना सीख जाते हैं तो उनकी जिज्ञासा जागृत हो जाती है वो हर वस्तु को पहुँच में लाना चाहता है, हर शब्द को दोहराना चाहता है और जब वो आपकी तरह हर वस्तु तक पहुँच कर उसे पकड़ कर देखना चाहता है तो अपनी उपलब्धि पर बहुत प्रसन्न भी होता है। वो आपके शब्द दोहराता है। अगर आप गाली के शब्दों का प्रयोग करता है तो वो भी वैसा ही बोलता है या बोलने की कोशिश करता है। शुरू शुरू में आप को भी मजा आता है। लेकिन जैसे जैसे वो बड़ा होता जाता है , आपको उसका ज्यादा चलना और ज्यादा बोलना अखरने लगता है। तो आप की डांट के दो शब्द उसे हतप्रभ कर देते हैं, डरा देते हैं, यही वे शब्द हैं "चुप बैठो"
इन दो शब्दों से आप उसके व्यक्तित्व का विकास अवरुद्ध कर देते हैं। बड़े हो कर भी उसे यही शब्द सालते रहते हैं अनजाने ही वह ये समझने लगता है कि अधिक बोलना अशिष्टता है, फालतू चलना/घूमना आवारागर्दी है। और उसकी इस समझ के पीछे उसके मातापिता और शिक्षक ही होते हैं। जिन्हे अपने निजी कारणों से किसी का भी फालतू बोलना या फालतू घूमना पसंद नहीं होता। बच्चों के मन में बहुत प्रश्न होते हैं। माता पिता और शिक्षक की जिम्मेदारी है कि वे बच्चे की जिज्ञासा को शांत करें उनके प्रश्नों के उत्तर दें। लेकिन या तो उन्हें उन प्रश्नों के सही उत्तर पता ही नहीं होते अथवा उन्होंने यही सीखा होता है कि ये प्रश्न अनुचित हैं, अनुत्तरणीय है, इनके उत्तर नहीं दिए जाने चाहिए तो वो बच्चों को डांटने लगते हैं, चुप बैठो। कुछ लोगों को शोर पसंद नहीं होता तो वो इसी कारण से बच्चों को कहते हैं। चुप बैठो। लेकिन वे ये नहीं समझ/सोच पाते कि वो बच्चे के व्यक्तित्व में एक नकारात्मक गाँठ बाँध रहे हैं। वो भविष्य में भी जब उसे बोलना जरुरी होगा, तब भी चुप रहेगा और सोचेगा कि चुप रहने में ही भलाई है। एक चुप सौ बोलते को हरा सकता है। अपनी कमजोरियों को वो चुप रहकर छिपाना सीख जाता है। यद्यपि चुप रहने वाले लोगों की सफलता की कहानियां भी आपने सुन रखी होंगी, लेकिन सच्चाई से मुंह न मोड़ें तो आप मानेंगे कि बोलने वालों को अधिक सफलता मिलती आई है।
आप के पास किसी भी कारण से कोई शैक्षणिक डिग्री न भी हो तो भी आप बोलने के गुण के आधार पर सफल हो सकते हैं। बोलने वाला ही प्रवक्ता बनता है, बोलने वाला ही सेल्समेन हो सकता है , बोलने वाला ही पत्रकार, एंकर, डिबेटर, मोटिवेटर, गुरु, यूट्यूबर , और नेता बन सकता है। बोलने वाले के लिए बहुत स्कोप है बल्कि कहिये की स्कोप ही स्कोप है। डिग्रियों का क्या है, बोलने वालों को तो बड़ी बड़ी यूनिवर्सिटीज अपने मंच पर बुला कर मानद डॉक्टरेट प्रदान कर गौरवान्वित होती हैं हैं। ऐसे विषय की डिग्रियां भी प्रदान कर सकती हैं जिसमे पहले किसी को कोई डिग्री दी ही नहीं गयी हो।
यही बात फालतू घूमने के बारे में भी कही जा सकती है। फालतू घूमना बड़े साहस का काम है। दुनिया भर का इतिहास फालतू घूमने वालों ने ही रचा है। आप उन्हें तब तक आवारा कह सकते हैं जब तक उनकी उपलब्धियां प्रकाशित नहीं हो जातीं। दुर्गम स्थानों, दुर्गम मार्गों, दर्रों, समुद्री मार्गों, द्वीपों की खोज इन फालतू घूमने वालों ने , यायावरों/घुमक्क्ड़ों ने ही की है। फाहियान, ह्वेनसांग, कोलम्बस, वास्को डेगामा, रांगेय राघव सब घुमक्कड़ ही तो थे।
कम लिखे को ज्यादा समझना, आज से किसी को "चुप बैठो" मत कहना।
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