सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

Life एंड Universe

एक नाभिक(nucleus) है, उसके चारों ओर कुछ सूक्ष्म पिंड चक्कर काट रहे हैं, उस चक्कर वाले रस्ते को ऑर्बिट कहते हैं। एक को अनेक से बदल दीजिये। अनेक नाभिक हैं, और हर नाभिक के चारों ओर अनेकों सूक्ष्म पिंड अलग अलग ओर्बिट्स में घूम रहे हैं। परमाणु से लेकर सूर्य तक के बारे में अभी तक लोग इस तथ्य को स्वीकार कर चुके हैं। लेकिन सूर्य भी तो किसी सिस्टम का हिस्सा है, उस सिस्टम को आप गैलेक्सी (आकाश गंगा )का नाम दे सकते हैं। वो गैलेक्सी एक अकेली गैलेक्सी नहीं हैं, ऐसी अनगिनत गैलेक्सीज हैं।  और हर गैलेक्सीज में असंख्य तारे हैं जैसे कि आकाश गंगा के अनगिनत तारों में से एक तारा सूर्य है। और हर तारे के चारों ओर घूमने वाले जाने कितने ग्रह हैं जैसे कि सूर्य के चारों और घूमने वाले पृथ्वी सहित कम से कम नौ ग्रहों की पहचान मनुष्य ने भी कर रखी है। हर ग्रह के चारों ओर भी कितने ही उपग्रह घूम रहे हैं. शनि ग्रह के उपग्रहों की तो सही से अभी गिनती भी नहीं हुई है। तो हर पिंड एक नाभिक है, उसके चारों ओर घूमने वाले अनेकों अन्य पिंड हैं। और ये सूक्ष्म स्तर पर हमारे ज्ञान की सीमा में परमाणु से लेकर सूर्य तक ही हमें ज्ञात है लेकिन न परमाणु अंत है और न सूर्य अंत है। ये सीमा हमारे ज्ञान की या हमारी इन्द्रियों की है। 

जीव क्या है ? जीव एक गति का नाम है, जीव अपने जैसे अन्य जीव पैदा करने की क्षमता का भी नाम है। जीव निरंतर ग्रोथ/विकास का भी नाम है, और जीव में ग्रोथ के एक शीर्ष तक पहुँचने के बाद ह्रासमान होने का भी गुण है। सृष्टि में जो कुछ भी हमारे संज्ञान में आ पाया है, वो सब गतिमान है, वो निरंतर विकासमान है, निरंतर ह्रासमान है और उस हर जिसे हम जड़ पदार्थ समझते हैं उसमे भी अपने जैसे पदार्थ को पैदा करने की क्षमता विद्यमान है, चाहे हम उसे जान पाए हों या न जान पाए हों, इस प्रकार यह समस्त सृष्टि ही जीव है। पैदा होने से समाप्त होने तक की यात्रा का नाम ही जीवन है। पैदा होना और समाप्त होना सबसे बड़ी भ्रांतियां हैं, क्यों कि न कुछ पैदा होता है, और न कुछ समाप्त होता है, एक बीज से पेड़ उगता है, पेड़ अपने समाप्त होने से पहले अनेकों बीज दे चुका होता है, यानि मृत्यु से पहले ही नया जीवन आरम्भ हो चुका होता है।  इस प्रकार सृष्टि में जीवन एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। और मृत्यु है ही नहीं, क्यों कि जब जीवन समाप्त होने से पहले ही ने जीवन को जन्म दे चुका तो मृत्यु है ही कहाँ। 

जीवन ही सत्य है और मृत्यु एक भ्रम है। लेकिन दीखता है किसी का सदा सदा के लिए विलुप्त हो जाना, इसका कारण भी हमारा भ्रम ही है। इसे हम विज्ञान में स्वरुप बदलने के सिद्धांत से समझ सकते हैं। जल ही वाष्प है, जल ही हिम है।  मिट्टी ही अधिक धूल है, मिटटी ही शिला है। तत्वों का संघटन ही यौगिक है, और उनका विघटन ही मिश्रण है।  

सृष्टि स्वचालित है। लेकिन मनुष्य अभी तक automatism के सिद्धांत को पचा ही नहीं पाया है। उसे गाडी चलती देखकर ये मानने की जरूरत महसूस होती है कि ड्राइविंग सीट पर कोई तो बैठा है। कोई तो गाडी चला रहा है। लेकिन नई पीढ़ी को स्वचालित मशीनों के बारे में और रोबोट्स के बारे में बेहतर जानकारी है। वो ऐसी मशीनों की कल्पना कर पा रहे हैं जहां मशीन अपने ऊर्जा/ईंधन के ख़त्म होने से पहले स्वयं ही चार्जिंग सेण्टर पर जा कर खुद को चार्ज कर लेती है। चार्ज होने के बाद फिर से अपने काम पर लग जाती है। खुद ही अपनी क्लीनिंग और खुद ही मेंटेनेंस कर लेती है। 

आदमी अगर सोचने लगे खुद अपने बारे में, या आय जीवों के बारे में कि ये कितनी अच्छी आटोमेटिक मशीन है, जो सांस ले रही है, उसमे से ऑक्सीजन ले रही है, अन्य फ्यूल के लिए शिकार कर रही है या, खेती कर रही है या जंगलों से से फलों की पिकिंग कर रही है।  प्रोसेसिंग के बाद उपयोगी पदार्थों को consume कर रही और अनुपयोगी पदार्थों का कचरा बाहर फेंक रही है। तो शायद उसे automatism सरलता से समझ में आ जाए, लेकिन वो मान कर चलता है कि इस सब को चलाने के लिए कोई रिमोट कण्ट्रोल है, जिसे कोई भगवान, खुदा, अल्लाह चला रहा है। और ड्राइविंग सीट पर बैठे व्यक्ति के हाथ में तो बहुत कुछ है न। बिना ड्राइवर की कार देखने के बाद शायद लोगों के विचारों में बदलाव आ जाए। 

फिलहाल तो इस सृष्टि के संचालक प्रभु श्री राम की जय बोल कर ही काम चलाना पड़ेगा। 









टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

युवा पीढ़ी पुरानी पीढ़ी से अलग ढंग से सोचती है

  कॉकरोच जनता पार्टी, युवा और लोकतंत्र में मेरा फिर जागता विश्वास काफी दिनों से मैं आज के युवाओं और उनकी समस्याओं को लेकर कुछ लिखने की सोच रहा था। कॉकरोच जनता पार्टी के नाम से शुरू हुए एक युवा आंदोलन ने मुझे इस विषय पर लिखने के लिए और अधिक प्रेरित किया। शायद इस विषय को देखने का मेरा नजरिया कुछ अलग है। मैंने अपने जीवन के पाँच वर्ष शिक्षक के रूप में बिताए हैं और उसके बाद लगभग 34 वर्ष प्रशासनिक सेवा में। इसलिए छात्र आंदोलनों को मैंने केवल अखबारों की खबरों के रूप में नहीं देखा। शिक्षक के रूप में छात्रों के बीच रहते हुए उनकी बेचैनी और उनके सपनों को समझने का अवसर मिला। बाद में प्रशासनिक सेवा में रहते हुए आंदोलनों का दूसरा पक्ष भी देखा—सरकार और प्रशासन के सामने खड़ी जनता, उनकी माँगें, उनका आक्रोश और कभी-कभी उस आक्रोश को नियंत्रित करने की प्रशासनिक मजबूरियाँ। किसानों के आंदोलन भी मैंने देखे हैं। किसान जब अपनी माँग लेकर सड़क पर आता है तो उसके पीछे केवल राजनीतिक विचारधारा नहीं होती। उसके पीछे उसकी जमीन, उसकी फसल, उसके परिवार और आने वाली पीढ़ी की चिंता होती है। प्रशासन के लिए वह कानून-व्यवस्थ...

सहअस्तित्व

  ये सृष्टि संतुलन और सह-अस्तित्व के कारण टिकी हुई है। इसमें हर जीव असंख्य जीवों के साथ सहअस्तित्व के कारण ही टिका हुआ है। मनुष्य शरीर में लगभग 39 ट्रिलियन (39 लाख करोड़) सूक्ष्म जीव (microorganisms) पाए जाते हैं। ये मुख्य रूप से बैक्टीरिया , वायरस , फंगस , और आर्किया होते हैं। इन्हें सामूहिक रूप से माइक्रोबायोम (Microbiome) कहा जाता है। जब जब प्रकृति में सह-अस्तित्व के समायोजन का संतुलन बिगड़ता है, बवंडर आ जाता है। आंधी, तूफ़ान, सुनामी, भूकंप, अतिवृष्टि, भूस्खलन ,  हिमस्खलन ऐसे प्राकृतिक बवंडर हैं जो हमें चौंका देते हैं। हमारे शरीर में भी ऐसे बवंडर होते रहते हैं। इन शारीरिक बवंडरों को हम रक्तचाप ,  ज्वर ,  एलर्जी ,  इन्फ्लमेशन, आदि नामों से जानते हैं।   समाज में भी जाने अनजाने ऐसे बवंडर उठते रहते हैं, उन्हें समाजशास्त्रियों ने आंदोलन ,  दंगे ,  हिंसा, युद्ध और क्रांति जैसे नाम दे रखे हैं। आखिर में जब सब संतुलित हो जाता है, सब में सामंजस्य हो जाता है ,  सब सहअस्तित्व को स्वीकार कर लेते हैं तो व्यक्ति ,  समाज और सृष्टि स्वस्थ हो जात...

एंगर मैनेजमेंट

“क्रोध” को हमारे संत महात्माओं ने छ: विकारों में गिना है। शेष पाँच विकारों के नाम हैं, काम, लोभ, मोह, भय और अहंकार। कुछ लोग पाँच विकार गिनाते हैं, वे अहंकार को विकारों में नहीं गिनते , अपितु अहं के पाँच दरबारियों के रूप में काम, क्रोध, लोभ, मोह और भय की गिनती करते हैं । कामना पूर्ण न हो तो क्रोध का जन्म होता है। हम चाहते हैं कि सब कुछ हमारे मन मुताबिक ही हो । मन मुताबिक न होने पर हमे क्रोध आ जाता है । लोभ पूरा न हो तब भी क्रोध आ सकता है। मोह भंग हो जाये तो भी क्रोध आ सकता है। कई बार कुछ खोने का भय प्रतिक्रियात्मक रूप में क्रोध की तरह व्यक्त हो जाता है। इस प्रकार पांचों विकार एक दूसरे को सपोर्ट करते हैं। आजकल विज्ञान का युग है और शरीर विज्ञान की एक शाखा में क्रोध का भी अध्ययन किया गया है, इसके अनुसार  क्रोध का मुख्य जनक अमिगडाला (Amygdala) नामक मस्तिष्क का भाग है। यह मस्तिष्क के लिम्बिक सिस्टम का हिस्सा है, जो हमारी भावनाओं और विशेष रूप से फाइट-या-फ्लाइट प्रतिक्रिया को नियंत्रित करता है। जब व्यक्ति किसी खतरे या तनाव का अनुभव करता है, तो अमिगडाला सक्रिय हो जाता है और शरीर में कई शा...