सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

परिवर्तन ही सृष्टि का मूल स्वभाव है

वास्तव में चेतना ही सारी सृष्टि का मूल है। समस्त जड़ पदार्थ (जो प्रत्यक्ष में जड़ प्रतीत होते हैं) में भी चेतना है, यह विज्ञान प्रमाणित कर चुका है। हर जड़ पदार्थ जिन अणुओं / परमाणुओं से बना है, उनमें भी भीतर ही भीतर गति होती रहती है। परमाणुओं और अणुओं का संयोग होता रहता है, नए यौगिक बनते रहते हैं। गति का मापन केवल परिवर्तन के माध्यम से होता है। इसका सीधा सा तात्पर्य है कि चेतना का प्रभाव निरंतर परिवर्तन है। अगर परिवर्तन नहीं होगा तो हम चेतना को नाप नहीं पाएंगे। 
समस्त ब्रह्माण्ड में हर पिंड, चाहे वो इलेक्ट्रॉन जितना सूक्ष्म पिंड हो या किसी गृह या आकाशगंगा जैसा कोई विशाल पिंड, सभी गतिमान हैं और परिवर्तन के अधीन हैं। इसलिए आप भी चाहे अनचाहे परिवर्तन के अधीन हैं। एक शिला जो नदी के बीच में खड़ी है, देखने में अडिग लग सकती है, परिवर्तन से अप्रभावित लग सकती है। लेकिन जो लोग जानते हैं कि रसरी आवत जात से सिल पर पडत निसान, वे ये भी जानते हैं कि बहती हुई जल धारा नदी में खड़ी शिला को भी धीरे धीरे चिकना कर रही है , धीरे धीरे सरका रही है। हमारे भूमण्डल पर तैरते हुए द्वीप और महाद्वीप भी एक विशालकाय शिलाएं ही हैं जो परस्पर टकराती हैं और भूकंप लाती हैं, नयी पर्वत मालाओं को जन्म देती हैं। 
जब सब कुछ परिवर्तनशील ही है तो हम अपने विचारों को परिवर्तन के लिए क्यों नहीं तैयार करते। सुखी रहने के लिए जड़ता छोड़नी ही होगी। परिवर्तन का सदा स्वागत कीजिये। खुद में भी परिवर्तन के लिए तैयार रहिये। 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

युवा पीढ़ी पुरानी पीढ़ी से अलग ढंग से सोचती है

  कॉकरोच जनता पार्टी, युवा और लोकतंत्र में मेरा फिर जागता विश्वास काफी दिनों से मैं आज के युवाओं और उनकी समस्याओं को लेकर कुछ लिखने की सोच रहा था। कॉकरोच जनता पार्टी के नाम से शुरू हुए एक युवा आंदोलन ने मुझे इस विषय पर लिखने के लिए और अधिक प्रेरित किया। शायद इस विषय को देखने का मेरा नजरिया कुछ अलग है। मैंने अपने जीवन के पाँच वर्ष शिक्षक के रूप में बिताए हैं और उसके बाद लगभग 34 वर्ष प्रशासनिक सेवा में। इसलिए छात्र आंदोलनों को मैंने केवल अखबारों की खबरों के रूप में नहीं देखा। शिक्षक के रूप में छात्रों के बीच रहते हुए उनकी बेचैनी और उनके सपनों को समझने का अवसर मिला। बाद में प्रशासनिक सेवा में रहते हुए आंदोलनों का दूसरा पक्ष भी देखा—सरकार और प्रशासन के सामने खड़ी जनता, उनकी माँगें, उनका आक्रोश और कभी-कभी उस आक्रोश को नियंत्रित करने की प्रशासनिक मजबूरियाँ। किसानों के आंदोलन भी मैंने देखे हैं। किसान जब अपनी माँग लेकर सड़क पर आता है तो उसके पीछे केवल राजनीतिक विचारधारा नहीं होती। उसके पीछे उसकी जमीन, उसकी फसल, उसके परिवार और आने वाली पीढ़ी की चिंता होती है। प्रशासन के लिए वह कानून-व्यवस्थ...

सहअस्तित्व

  ये सृष्टि संतुलन और सह-अस्तित्व के कारण टिकी हुई है। इसमें हर जीव असंख्य जीवों के साथ सहअस्तित्व के कारण ही टिका हुआ है। मनुष्य शरीर में लगभग 39 ट्रिलियन (39 लाख करोड़) सूक्ष्म जीव (microorganisms) पाए जाते हैं। ये मुख्य रूप से बैक्टीरिया , वायरस , फंगस , और आर्किया होते हैं। इन्हें सामूहिक रूप से माइक्रोबायोम (Microbiome) कहा जाता है। जब जब प्रकृति में सह-अस्तित्व के समायोजन का संतुलन बिगड़ता है, बवंडर आ जाता है। आंधी, तूफ़ान, सुनामी, भूकंप, अतिवृष्टि, भूस्खलन ,  हिमस्खलन ऐसे प्राकृतिक बवंडर हैं जो हमें चौंका देते हैं। हमारे शरीर में भी ऐसे बवंडर होते रहते हैं। इन शारीरिक बवंडरों को हम रक्तचाप ,  ज्वर ,  एलर्जी ,  इन्फ्लमेशन, आदि नामों से जानते हैं।   समाज में भी जाने अनजाने ऐसे बवंडर उठते रहते हैं, उन्हें समाजशास्त्रियों ने आंदोलन ,  दंगे ,  हिंसा, युद्ध और क्रांति जैसे नाम दे रखे हैं। आखिर में जब सब संतुलित हो जाता है, सब में सामंजस्य हो जाता है ,  सब सहअस्तित्व को स्वीकार कर लेते हैं तो व्यक्ति ,  समाज और सृष्टि स्वस्थ हो जात...

एंगर मैनेजमेंट

“क्रोध” को हमारे संत महात्माओं ने छ: विकारों में गिना है। शेष पाँच विकारों के नाम हैं, काम, लोभ, मोह, भय और अहंकार। कुछ लोग पाँच विकार गिनाते हैं, वे अहंकार को विकारों में नहीं गिनते , अपितु अहं के पाँच दरबारियों के रूप में काम, क्रोध, लोभ, मोह और भय की गिनती करते हैं । कामना पूर्ण न हो तो क्रोध का जन्म होता है। हम चाहते हैं कि सब कुछ हमारे मन मुताबिक ही हो । मन मुताबिक न होने पर हमे क्रोध आ जाता है । लोभ पूरा न हो तब भी क्रोध आ सकता है। मोह भंग हो जाये तो भी क्रोध आ सकता है। कई बार कुछ खोने का भय प्रतिक्रियात्मक रूप में क्रोध की तरह व्यक्त हो जाता है। इस प्रकार पांचों विकार एक दूसरे को सपोर्ट करते हैं। आजकल विज्ञान का युग है और शरीर विज्ञान की एक शाखा में क्रोध का भी अध्ययन किया गया है, इसके अनुसार  क्रोध का मुख्य जनक अमिगडाला (Amygdala) नामक मस्तिष्क का भाग है। यह मस्तिष्क के लिम्बिक सिस्टम का हिस्सा है, जो हमारी भावनाओं और विशेष रूप से फाइट-या-फ्लाइट प्रतिक्रिया को नियंत्रित करता है। जब व्यक्ति किसी खतरे या तनाव का अनुभव करता है, तो अमिगडाला सक्रिय हो जाता है और शरीर में कई शा...