वास्तव में चेतना ही सारी सृष्टि का मूल है। समस्त जड़ पदार्थ (जो प्रत्यक्ष में जड़ प्रतीत होते हैं) में भी चेतना है, यह विज्ञान प्रमाणित कर चुका है। हर जड़ पदार्थ जिन अणुओं / परमाणुओं से बना है, उनमें भी भीतर ही भीतर गति होती रहती है। परमाणुओं और अणुओं का संयोग होता रहता है, नए यौगिक बनते रहते हैं। गति का मापन केवल परिवर्तन के माध्यम से होता है। इसका सीधा सा तात्पर्य है कि चेतना का प्रभाव निरंतर परिवर्तन है। अगर परिवर्तन नहीं होगा तो हम चेतना को नाप नहीं पाएंगे।
समस्त ब्रह्माण्ड में हर पिंड, चाहे वो इलेक्ट्रॉन जितना सूक्ष्म पिंड हो या किसी गृह या आकाशगंगा जैसा कोई विशाल पिंड, सभी गतिमान हैं और परिवर्तन के अधीन हैं। इसलिए आप भी चाहे अनचाहे परिवर्तन के अधीन हैं। एक शिला जो नदी के बीच में खड़ी है, देखने में अडिग लग सकती है, परिवर्तन से अप्रभावित लग सकती है। लेकिन जो लोग जानते हैं कि रसरी आवत जात से सिल पर पडत निसान, वे ये भी जानते हैं कि बहती हुई जल धारा नदी में खड़ी शिला को भी धीरे धीरे चिकना कर रही है , धीरे धीरे सरका रही है। हमारे भूमण्डल पर तैरते हुए द्वीप और महाद्वीप भी एक विशालकाय शिलाएं ही हैं जो परस्पर टकराती हैं और भूकंप लाती हैं, नयी पर्वत मालाओं को जन्म देती हैं।
जब सब कुछ परिवर्तनशील ही है तो हम अपने विचारों को परिवर्तन के लिए क्यों नहीं तैयार करते। सुखी रहने के लिए जड़ता छोड़नी ही होगी। परिवर्तन का सदा स्वागत कीजिये। खुद में भी परिवर्तन के लिए तैयार रहिये।
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