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बिन पानी सब सुन

दुनिया भर की सभ्यताओं का विकास जल स्रोतों ( नदियों, झीलों, बड़े तालाबों, और समुद्र के तटों) के आसपास हुआ है। मनुष्य के लिए जल कितना महत्वपूर्ण है, ये इसी  एक बात से स्पष्ट हो जाता है। 

बिन पानी सब सून। 

लेकिन इस पानी को सबसे ज्यादा  बर्बाद भी मनुष्य ही करता है। नदियों और तालाबों व् झीलों और समुद्र तटों के जल को सबसे ज्यादा प्रदूषित भी मनुष्य ही करता है।  गाँवों में कुंवों पर पनिहारियाँ लड़ा करती थीं, मुंबई जैसे महानगरों में सार्वजनिक नलो से पानी लेने के लिए लड़ते आज भी देखे जा सकते हैं। दिल्ली में पानी की कमी होने पर टैंकरों से पानी की आपूर्ति के समय भी पानी की लूट के नज़ारे मिल जाते हैं। 

लेकिन पानी को बर्बाद करना और प्रदूषित करना बदस्तूर जारी है। मेरे अपने गाँव में बहुत से घरों में झाड़ू नाम का यंत्र दिखाई नहीं देगा। क्योंकि उनके घर में सबमर्सिबल पम्प लगा है  जो बिजली आते ही चालू हो जाता है। उस पम्प की मदद से पानी की धार से घर की गंदगी बुहार दी जाती है , घर में भैंस आदि पशुओं को पहले कभी एक बाल्टी पानी में सावधानी से नहला दिया जाता था एक मग  की मदद से।  और अब उसी भैंस को पाइप की धार से घंटे भर में कितना पानी बहा कर नहलाया जाता है। 

मैंने एक दो लोगों को टोका भी तो वो कहते हैं कि जब पानी ख़तम हो जाएगा तो जहां सारा गाँव शिफ्ट होगा वहीँ वो भी शिफ्ट हो जाएंगे।  लेकिन अपना तौर तरीका नहीं बदलना चाहते। 

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