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सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया का निर्णय समलैंगिक विवाह पर

समलैंगिक विवाह पर भारत के सर्वोच्च न्यायलय ने ३-२ के बहुमत से सहमति देने से इंकार कर दिया। मैं इस फैसले का पुरजोर समर्थन करता हूँ, यद्यपि मैं किन्ही भी दो वयस्कों को बिना विवाह के साथ रहने को उनका निजी अधिकार मानता हूँ। किसी भी वयस्क युगल को साथ रहने पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है, इस सम्बन्ध में सर्वोच्च न्यायलय पहले ही समलैंगिक यौन संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर चुका है। साथ रहने को विवाह का नाम देना क्यों जरुरी है। आजकल तो वैसे ही बहुत से युवक युवती लिवइन रिलेशनशिप में रह लेते हैं और उनके इस लिवइन रिलेशन को सर्वोच्च न्यायलय ने स्वीकार किया है। बच्चा गोद लेने के लिए भी समलैंगिक जोड़ों को अधिकार देने की याचिका भी सुना है कि रद्द कर दी गयी है। यूँ तो एकल पैरेंट को भी बच्चा गोद लेने की , विशेष परिस्थिति में अनुमति दी जाती है , लेकिन समलैंगिकों को बच्चा गोद लेने का अधिकार देने का मतलब गोद लिए जाने वाले बच्चे के साथ ये एक जबरन अन्याय होगा। क्योंकि वो समलैंगिक संबंधों को बचपन से देखेगा और उस वातावरण में उस तरह से विकसित नहीं होगा यदि वह ऐसे माँ बाप द्वारा गोद लिया जाए जो समलैंगिक नहीं हैं। 

विवाह नामक संस्था या कॉन्ट्रैक्ट किसी भी धर्म में पुरुष और स्त्री के परस्पर परिवार बढ़ाने के लिए सृजित की गयी है। इस संस्था को किसी की अनावश्यक कारण से क्षीण नहीं किया जाना चाहिए। जिसे साथ रहना हो रहें कौन रोकता है, साथ रहने को विवाह का नाम देना क्यों जरुरी है। 

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