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पुरुषों पर घरेलू हिंसा या बलात्कार के लिए क़ानून

 भारत में घरेलू हिंसा और यौन अपराधों से संबंधित अधिकांश कानूनों का फोकस महिलाओं की सुरक्षा पर है। हालांकि, यह कहना गलत होगा कि पुरुषों के लिए कोई संरक्षण या उपाय उपलब्ध नहीं है, परंतु मौजूदा कानूनों में विशेष रूप से पुरुषों को पीड़ित मानकर बनाए गए प्रावधानों की कमी है।घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 में महिलाओं को सुरक्षा दी जाती है और यह महिलाओं को पुरुषों के खिलाफ शिकायत दर्ज करने का अधिकार देता है। 

भारतीय  न्याय संहिता (BNS) में घरेलू हिंसा के मामले में विशेष रूप से पुरुषों को पीड़ित मानने वाले प्रावधान का अभाव है। महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाए गए घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 अब भी महिलाओं को घरेलू हिंसा से सुरक्षा प्रदान करता है। हालांकि, घरेलू हिंसा के मामलों में पुरुषों के लिए कोई विशेष प्रावधान न होने के कारण, पुरुष BNS के अन्य प्रावधानों का सहारा लेकर अपने उत्पीड़न की शिकायत दर्ज करा सकते हैं।
भारतीय न्याय संहिता, 2023 में धारा 69 और धारा 70 के अंतर्गत बलात्कार और यौन शोषण के मामले दर्ज किए जा सकते हैं, लेकिन यह विशेष रूप से महिलाओं पर होने वाले यौन अपराधों को कवर करता है। पुरुषों के खिलाफ यौन हिंसा के मामलों में पुरुषों के लिए विशेष प्रावधान की कमी है।
संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत हर नागरिक को समानता और जीवन का अधिकार दिया गया है। पुरुष यदि हिंसा या अन्य प्रकार के उत्पीड़न का सामना करते हैं, तो वे अपने मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर उच्च न्यायालय या सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर सकते हैं।भारतीय न्याय संहिता, 2023 के अंतर्गत पुरुष अपने खिलाफ होने वाले शारीरिक उत्पीड़न की शिकायत दर्ज करा सकते हैं। धारा 101 (जानबूझकर चोट पहुँचाना), धारा 103 (धमकी देना) और धारा 105 (अभद्र भाषा) के तहत पुरुष अपने उत्पीड़न के खिलाफ मामला दर्ज कर सकते हैं।
मानसिक उत्पीड़न के मामलों में, पुरुष भारतीय न्याय संहिता, 2023 की विभिन्न धाराओं के तहत शिकायत दर्ज कर सकते हैं, जैसे कि धारा 98 (दुर्व्यवहार) और धारा 99 (मानसिक प्रताड़ना) जो मानसिक उत्पीड़न को कवर करती हैं।
हालांकि भारतीय न्याय संहिता, 2023 में पुरुषों के खिलाफ घरेलू हिंसा और यौन अपराधों के मामले के लिए विशिष्ट प्रावधान नहीं हैं, लेकिन संविधान के तहत पुरुष अपने अधिकारों की रक्षा के लिए अदालत का सहारा ले सकते हैं। उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट में हाल के वर्षों में पुरुषों के अधिकारों पर चर्चा हुई है, और समानता के सिद्धांत के तहत इन मामलों पर ध्यान देने की आवश्यकता मानी गई है।
मैं इन सब से ये निष्कर्ष निकाल पाया हूँ कि पुरुष को अपने ही घर में अपने शरीर के विरुद्ध हुए अपराध में अपनी पत्नी पर अभियोग लगाने पर पुलिस कोई मदद नहीं करेगी। लेकिन उसे न्यायालय में अपने संवैधानिक अधिकारों के लिए गुहार लगाने का अधिकार अभी भी उसके पास शेष है। 
ये पुरुषों को महिलाओं से कमतर बनाता है। भले ही हम भारतीय समाज को पुरुष प्रधान समाज कहें लेकिन क़ानून महिलाओं की प्रधानता स्वीकार करता है। और अधिकतर मध्यम वर्गीय परिवारों में अब महिलाओं का वर्चस्व स्थापित हो गया है।   


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