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to allahaabaad and back to meerut

 दसवीं के बाद जब मैं ग्यारहवीं में आया तो बालैनी में मेरे सहपाठी रहे मेरे ही गाँव के बलवान सिंह, जिनकी यादव इंटर कॉलेज में फर्स्ट डिवीज़न आयी थी, उनको भी प्रेरणा मिली कि वे भी मेरठ उसी स्कूल में पढ़ेंगे, जिसमे मैं पढ़ रहा था, एक और हमारे ही गाँव के धर्मपाल यादव, जो कि मेरे सहपाठी रह चुके थे, वे भी मेरठ के बी ए वी कॉलेज के स्टूडेंट हो गए और मेरे साथी होस्टलर भी।

बलवान सिंह से मेरी दोस्ती बहुत लम्बी चली, जब तक कि अपने रिटायरमेंट से कुछ समय पहले लंग कैंसर से उसने दुनिया को अलविदा न कह दिया। लेकिन धर्मपाल तो कक्षा आठ में बालेनी में मेरा क्लास फेलो था और मेरी सबसे पहली कविता मैंने उसी पर लिखी थी , जिसमे लक्षणा शक्ति का प्रयोग करते हुए अपने पेन की चोरी का आरोप उस पर लगाया था , मेरे टीचर उस कविता का मर्म समझ गए थे और उन्होंने तलाशी में मेरा पेन धर्मपाल के बैग से बरामद कर लिया था। फिर मुझे पूछा कि क्या किया जाए , तो मैंने कहा, भूल चूक लेनी देनी, हो सकता है , गैर इरादतन ये पेन उसने अपने बैग में रख लिया हो इसलिए माफ़ किया जाए। तब हम दोस्त बन गए थे। लेकिन गाँव में एक कहावत है, बाण(आदत) वाले की बाण न जाए, कुत्ता मूते टांग उठाय। इसकी पुष्टि हुई, हॉस्टल में रहते हुए दो बार मेरी चोरी हुई, और मुझे शक धर्मपाल पर ही हुआ लेकिन मैंने कुछ कहा नहीं। मेरे शक की पुष्टि टीकरी गाँव के रणवीर शर्मा ने की जो धर्मपाल का दोस्त भी था, हॉस्टल में उसका रूम पार्टनर भी था। कई साल बाद रणवीर शर्मा मुझे बुलंदशहर में मिला और तब उसने पुरानी यादों के हवाले से उन दोनों चोरियों का जिक्र किया। धर्मपाल ग्यारहवीं में फ़ैल हो कर वापस गाँव चला गया। बलवान मेरे साथ बना रहा। हालांकि इंटरमीडिएट में वो फर्स्ट डिवीज़न से चूक गया। हम दोनों इंटरमीडिएट की परीक्षा के बाद इलाहबाद यूनिवर्सिटी गए। और साथ ही वापस भी आ ये।
बरुआ सागर के मेरे दोस्त प्रमोद कुमार अग्रवाल से पत्र व्यवहार चलता रहता था, उसने हाई स्कूल में यू पी बोर्ड की मेरिट लिस्ट में स्थान पाया था, और वो बरुआ सागर से झांसी गवर्नमेंट इंटर कॉलेज से इंटरमीडिएट करने गया था, वहां भी वो कॉलेज का टोपर बना और बोर्ड की मेरिट में एक दो स्थान से चूक गया, उसने ही बताया कि उसका इरादा अब इलाहबाद यूनिवर्सिटी से बी.एस सी करने का है, और प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी करने का भी है। मैं बहुत महत्वकांक्षी कभी नहीं रहा। मैं सोचता था कि अगर मुझे टाइपिंग आ जाए तो कम से कम तहसील या कचेहरी में टाइपिंग से भी पैसा कमाया जा सकता है। मैंने टाइपिंग हिंदी और अंग्रेजी की सीख ली जो मुझे बाद में मेरी सरकारी नौकरी में बहुत काम आयी मेरा गणित और अंग्रेजी इस स्तर की हो चुकी थी कि मैं छोटी क्लास के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर भी गुजारा कर सकता हूँ। लेकिन प्रमोद से प्रेरित हो कर हमने भी इलाहबाद का रुख कर लिया। संयोग से मेरे पिता तब इलाहबाद के थाना पूरामुफ्ती में इंचार्ज थे। इलाहबाद में हमारा सपना थोड़ा चूर हुआ कि हम तीनों को मेरिट के हिसाब से अलग अलग हॉस्टल मिले। प्रमोद को AN Jha हॉस्टल मिला, मुझे GN jha हॉस्टल मिला और बलवान को हॉलैंड हॉल मिला। तो मित्रों को साथ रहने का मौका नहीं मिला। मेरा पार्टनर बना मुझ से एक साल सीनियर लेकिन ड्राप कर के बी.एस सी प्रथम वर्ष में ही रुका हुआ देवपाल गंगवार। वो शुरू शुरू में मुझे अजीब लगा, हर समय किताबों में और खास तौर पर इंग्लिश की डिक्शनरी में डूबा हुआ रहता था। लेकिन उसका अध्ययन गज़ब का था , उसे कोर्स की किताबों में कोई रूचि नहीं थी बाकी सब किताबों में थी।
मुझे पहली बार अश्लील रैगिंग का पता उसी विश्विद्यालय में चला। लेकिन मुझे रोज रोज इस रैगिंग का सामना नहीं करना पड़ा। एक बहुत सीनियर छात्र थे लाल दिनेश कुमार सिंह। लॉ के छात्र थे और देवपाल के भी मित्र थे उन्होंने अन्य सीनियर लड़कों को कह दिया कि रात को इस कमरे का दरवाजा नहीं खुलवाना है। लेकिन पहले दिन तो रैगिंग हो ही चुकी थी।
वहां की एक बात बहुत याद आती है , वहां सर पर खोमचा रख कर एक बूढा हलवाई आता था, उसके गुलाब जामुन बहुत अच्छे होते थे। हमें पता चला कि उसका लड़का आईएएस है , हमने पूछा चाचा, आप अब क्यों ये काम करते हो तो उसने बहुत अच्छा जबाब दिया , कि जिस काम के जरिये उसने बच्चे को काबिल बनाया उसे तब तक नहीं छोडूंगा, जब तक मेरा शरीर साथ देगा।
छमाही परीक्षा बीत गयी, बहुत अच्छे नंबर तो नहीं आये लेकिन बुरे भी नहीं थे। हॉस्टल वर्गीकरण ने मेरे और प्रमोद के बीच की दूरी बढ़ा दी थी, हमारे सेक्शंस भी अलग थे। प्रमोद को उसके साथी किताबी कीड़ा कहने लगे थे। और हम खेल का मैदान ढूंढते फिरते थे। बास्केट बॉल और बैडमिंटन हमने ये दो कोर्ट ढूंढ लिए थे और नित्य वहां जाने लगे थे।
यहाँ की एक घटना भी सदा याद रहेगी। बलवान को उसके हॉस्टलर्स ने होली के मौके पर भांग पिला दी। वो एक बार रोना शुरू हुआ तो उसका रोना ही बंद नहीं हुआ। चौबीस घंटे बाद उसका रोना रुका, जब उस पर भांग का नशा कम हुआ। सालाना परीक्षा में केमिस्ट्री सेकंड के पेपर से पहले दिन मुझे खुनी दस्त लग गए और मैं वो पेपर नहीं दे पाया , कुछ फ़ूड पोइज़निंग जैसा हुआ, बाजारू खाने से। गर्मियों की छुट्टियां हुईं हम गाँव वापस आ गए। और दोनों के घर वालों, यानि उसके पिता जी और मेरे दादा दादी ने हमारे स्वास्थ्य को देखकर चिंता व्यक्त की , हमने भी कह दिया कि हमें वहां का खाना बिलकुल पसंद नहीं आया। बात सही भी थी। पश्चिमी उत्तरा प्रदेश और पूर्वांचल/अवध प्रदेश का खानपान में बहुत अंतर है। रही सही कसर हमारे रिजल्ट्स ने पूरी कर दी। मेरी केमिस्ट्री में सप्लीमेंट्री आयी। उन दिनों रिजल्ट कार्ड/डिग्री में ये उल्लेख किया जाता था कि अमुक ने सप्लीमेंट्री से उत्तीर्ण किया है। सप्लीमेंट्री एग्जाम की डेट आ गयी और हमें दादा दादी का सहारा मिल गया कि अब तुम इलाहबाद नहीं जाओगे।
तो इस प्रकार हमारा इलाहबाद से नाता टूट गया। जो केवल UPPSC की परीक्षाओं के समय ही दुबारा जुड़ पाया। हमारे पिता थोड़ा नाराज हुए लेकिन उन्होंने दादा दादी की बात का विरोध नहीं किया। और अपने प्रयासों से हमारे माइग्रेशन सर्टिफिकेट यूनिवर्सिटी से निर्गत करा कर हमें डाक से भिजवा दिए और हम मेरठ कॉलेज के स्टूडेंट बन गए जहां कभी हमारे पिताश्री पढ़ा करते थे।

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