हाल ही में एक उच्च न्यायलय ने एक निर्णय में टिप्पणी की "लिवइन रिलेशनशिप शादी जैसी सामाजिक संस्था को बर्बाद कर रहा है"
किसी भी मामले में जब न्याय का द्वार खटखटाया जाता है तो उसमे मामले की कानूनी पड़ताल करना और क़ानून के दायरे में फैसला प्राप्त करना ही अपेक्षित होता है। लेकिन न्याय की पीठ पर बैठे लोग हैं तो इंसान ही, इंसान होने के नाते उनकी व्यक्तिगत रुचियाँ और धारणाएं भी होंगी। लेकिन एक अच्छा न्यायाधीश वही है जो अपने निर्णयों को व्यक्तिगत रुचियों और धारणाओं से प्रभावित न होने दे।
मेरी दृष्टि में माननीय न्यायाधीश द्वारा उपर्युक्त टिप्पणी बिलकुल अनावश्यक थी।
ऐसी अनेकों टिप्पणियां आप लोग भी सुनते रहे होंगे, जैसे राजस्थान के एक जज साहब ने एक बार मोर-मोरनी के गर्भ धारण के लिए एक हास्यास्पद और अनावश्यक टिप्पणी कर दी थी, मोरनी मोर के आंसू पी कर गर्भवती हो जाती है। चाहे ऐसा हो या न हो, ये लोगों का विश्वास हो सकता है लेकिन ये बिलकुल अनावश्यक टिप्पणी थी।
सर्वोच्च न्यायालय को सभी न्यायाधीशों को ऐसी सलाह जरूर देनी चाहिए कि वे अपनी व्यक्तिगत धारणाओं और रुचियों को न्यायिक कार्य में प्रकट होने से बचाएं।
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