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आप प्रतिक्रिया क्यों नहीं देते, क्योंकि आप वो हैं ही नहीं

 जो था नहीं उसे पूजा गया, जो है नहीं उसे पूछा गया

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रिपोर्टर उस आदमी से पूछ रहा था कि भाई, किसी शुक्ला जी ने आपके सिर पर पेशाब कर दिया तो आपको वो वीडियो देख कर बुरा नहीं लगा? 

“क्यों लगेगा? जब मैं वो हूं ही नहीं, जो वीडियो में है तो मुझे बुरा क्यों लगेगा?”

“आप वो नहीं हैं?”

“मुझे तो बिल्कुल याद नहीं कि वो मैं हूं या किसी ने मेरे सिर पर कभी पेशाब किया था।”

“फिर सरकार ने आपको अपने घर बुला कर आपके पांव पखारे। आपकी तस्वीर देश भर में जारी की गई। कहा गया कि अब सिर पर पेशाब का पाप धुल गया है। सुना कि आपको कुछ इनाम वगैरह भी मिला है। फिर वो क्या था?”

“साहब, हमें नहीं मालूम। वो तो एसपी साहब, कलेक्टर साहब ने मुझे बताया कि वो तुम्हीं हो जिसके सिर पर शुक्ला ने पेशाब किया था। तुम चलो सरकार के बंगले पर। तुम्हारा सम्मान किया जाएगा। तुम्हें इनाम मिलेगा। तुम मशहूर हो जाओगे, तो मैं चला गया।”

कमाल है, आदमी ही बदल दिया गया। और वाहवाही लूट ली गई?

सरकार के लिए कुछ भी बदल देना कौन-सी बड़ी बात है। 

छोड़िए ये तो उस युवक के एक टीवी इंटरव्यू का हिस्सा है, जिसे मध्य प्रदेश में सिर पर पेशाब कांड के बाद सकार ने घर बुला कर इज्जत बख्शी। 

अब बात ‘लॉ’ की परीक्षा में पूरा प्रश्न बदल देने की। 

मैंने कल लॉ की परीक्षा देने जाने से पहले आपको बताया था कि हमारे विश्वविद्यालय के सिलेबस के ‘अपकृत्य कानून’ में साल 2023 में उपभोक्ता संरक्षण नियम 1986 पढ़ाया गया। पूरे साल विद्यार्थी 1986 का कानून रटते रहे। कल मैंने अपनी चिंता भी जताई थी कि साल 2019 में ये कानून पूरी तरह बदल दिया गया था। बदल क्या दिया गया था, इस कानून को हटा कर उपभोक्ता संरक्षण कानून 2019 लागू कर दिया गया था। लेकिन यहां के पाठ्यक्रम बनाने वाले सोए रहे। सालों साल से सिलेबस और पाठ्यक्रम वही रहा। किसी को न चिंता हुई, न किसी ने पूछा कि भाई जो कानून ही खत्म हो गया है, उसकी पढ़ाई क्यों? मैंने तो चिंता भी जताई थी कि यही सिलेबस पढ़ कर कोई वकील और जज बनेगा तो किसी को क्या न्याय दिलाएगा?

मेरी चिंता हमेशा आम आदमी की चिंता होती है। मैं हमेशा सोचता हूं कि इतना बड़ा शिक्षा महकमा है राज्य में, लेकिन क्या कोई पूछने वाला नहीं?

मुझे तो लगता है कि इन विभागों के अधिकारियों के बीच आपस में कोई तालमेल ही नहीं है। 

सोचिए संजय सिन्हा ऐसा क्यों कह रहे हैं? 

बात ये है कि सिलेबस बनाने वाले कोई और परीक्षा में प्रश्न पूछने वालों में कोई ताममेल नही है। मेरे प्यारे परिजनों, कल लॉ के पेपर में प्रश्न पूछा गया कि 2019 के उपभोक्ता संरक्षण कानून की क्या खासियत है? सिलेबस में जो है ही नहीं, वो पूछा गया। पता नहीं कितने हज़ार विद्यार्थी इस परीक्षा में 1986 के कानून रट कर आए होंगे और उनसे अचानक पूछ लिया गया 2019 का कानून। कोई पूछे तो सही कि सिलेबस में जो अध्याय है ही नहीं, सिर्फ दो दिन पहले जारी एडमिट कार्ड पर उसे लिख कर प्रश्न पूछ लेना कितना बड़ा अपराध है? कितने विद्यार्थी उलझ कर रह गए। परीक्षा के बाद मैंने बहुत से विद्यार्थियों से पूछा कि आपको 2019 के कानून का पता था? 

लगभग सभी ने कहा, “नहीं पता था। हमने तो 1986 वाला कानून ही लिख दिया।” 

एक-दो होनहार छात्रों ने तो ये भी कहा कि सर, कानून तो 1986 वाला ही पूछा गया था, ये प्रश्नप्रत्र में प्रिंट गलत हो गया है।

अब मैं क्या कहता। सिर भी नहीं पीट सकता था। बस इतना ही कह सकता हूं कि इन्हीं में से बहुत से लोग आने वाले दिनों में राज्य में होने वाली जज की परीक्षा देंगे और हमारे आपके लिए न्याय करेंगे। उन्हें और कोई नियम भले न पता हो, पर ये घुट्टी उन्हें ट्रेनिंग में पिला दी जाएगी कि अगर किसी ने तुम पर प्रश्न उठा दिया तो तुम सीधे अदालत की अवमानना का मसला उठा कर प्रश्न पूछने वाले को जेल भेज देना। 

मुझे याद है कि पिछले साल मेरे सामने जब जिला अदालत की एक जज ने कहा था कि ईमेल पर किया गया करार करार होता ही नहीं है, तो मैं कराह कर रह गया था। उनसे कुछ पूछ नहीं पाया था। मेरे वकील ने कहा था संजय सिन्हा जी, आप वकालत पढ़ कर जज बन सकते हैं लेकिन जज से प्रश्न नहीं पूछ सकते हैं। 

मेरे प्यारे परिजनों, पेशाब कांड के बाद आदमी बदल गया। सिलेबस में सवाल बदल गया। 

हम तो चुप रहेंगे। बेचारे विद्यार्थियों के करीयर की चिंता हम क्यों करें?

जो था नहीं, उसे पूजा गया। जो है नहीं, उसे पूछा गया।

#SanjaySinha

#ssfbFamily

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