हमारे बच्चे जिन्हें हम बड़े लाड प्यार से पालते हैं उनकी हर जरूरत का ध्यान रखते हैं, बीमार हो कर भी हम कभी उनके सामने लाचार या असहाय नहीं प्रदर्शित करते। हर संकट को मैनेज करके उनके सामने एक आदर्श स्थापित करते हैं , तो हमारे बच्चों की नज़र में हम दुनिया के सबसे अच्छे माँ या सबसे अच्छे बाप बन जाते हैं।
हमारे बच्चों को लगता है कि हम जीवन भर उनके लिए उसी प्रकार प्रोटेक्शन देते रहेंगे जैसे देते आये हैं, हम उनकी नज़र में साहसी, आत्मनिर्भर, खुद्दार, जूझने वाले बन जाते हैं जो किसी भी मुसीबत का सामना आसानी से कर लेता है।
लेकिन समय तो अपना असर दिखाता है। हम बूढ़े हो जाते हैं , परिस्थितियों वश हमारे बच्चे उस समय तक दूर हो चुके होते हैं लेकिन उनकी नज़र में हम अभी भी आत्मनिर्भर, साहसी, खुद्दार और कुशल प्रबंधक बने रहते हैं और केयरिंग भी।
इसलिए यदि कभी हमारे बच्चों को कभी अपने पारिवारिक दिक्क्तों में (अपने बच्चे पालने में, घर की देखभाल में , अपनी नौकरी के समय प्रबंधन में) हमारी याद आती है तो सिर्फ इसीलिए कि उन्हें अभी भी हमारी क्षमताओं पर भरोसा ज्यों का त्यों बना हुआ है, उन्होंने हमारा असहाय, बीमार, लाचार स्वरुप न तो देखा है और न उसकी वे कल्पना कर पाते हैं। अगर वो हमें मिलने नहीं आते या फोन नहीं करते तो हमें समझ लेना चाहिए कि उनकी जिंदगी ठीक से कट रही है। लेकिन जब भी उन्हें कोई दिक्कत आएगी तो उसके समाधान के लिए वे हमारी तरफ ही देखेंगे, क्योंकि उन्हें बचपन से यही आदत हमने डाली है।
इसके विपरीत जो बच्चे परिवार में अशांति देखते हैं, हिंसा देखते हैं, क्रूरता देखते हैं उनकी नज़र में माता या पिता में से कोई एक जरूर दोषी के रूप में स्थापित हो चूका होता है. वे मन ही मन उस वातावरण से दूर भागने की कल्पनाएं करते रहते हैं और जब उन्हें मौका मिलता है तो वे उस माहौल से दूर हो भी जाते हैं हमेशा के लिए। इतना अवश्य होता है कि ऐसे बच्चे अगर मातापिता में से किसी एक को पीड़ित मानते हैं तो उनके प्रति सहानुभूति बनाये रखते हैं और उन्हें संरक्षण देने की चेष्टा भी करते हैं।
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