भारत के मतदाता अंधे और बहरे समझ लिए गए हैं। उन्हें बताया जाता है कि कांग्रेस एक परिवार की पार्टी है, इस परिवारवादी को भ्रष्टाचार का भी स्रोत बताया जाता है। भारत के लोग नहीं जानते कि बीजेपी में कोई नेता ऐसा भी हो सकता है, जिसके माता, पिता, बहन, भाई, पति, पत्नी आदि कोई भी रिश्तेदार राजनीती में हो, क्योंकि बीजेपी तो परिवारवाद के विरुद्ध है। भारत के लोग नहीं जानते कि इलेक्टोरल बांड की व्यवस्था ऐसी बनायी गयी है कि कोई भी कम्पनी कितना भी चंदा किसी पार्टी को दे सकती है और उसे उस पार्टी का नाम या दी गयी धनराशि प्रकट नहीं किया जाएगी। भारत के लोग नहीं जानते कि देश के एक अकेले बीजेपी दल को अन्य सभी दलों को कुल मिले चंदे से तीन गुने से भी अधिक चंदा मिलता है। और भारत के लोग ये भी नहीं जानते कि सत्ताधारियों को मिलने वाला चंदा कोई कम्पनी क्यों देती है और बदले में क्या पाती है।
डिस्क्लेमर:- प्रस्तुत कहानी में संयोग से किसी की जिंदगी से कोई घटनाएं या नाम , मेल खा सकती हैं, दिए गए नाम और स्थान सब असल दुनिया में हैं, लेकिन जरुरी नहीं कि ये इस कहानी में लिखे पात्रों की असल जिंदगी हो। कहानी का उद्देश्य केवल आज के उत्तर भारत के गाँवों की महिलाओं के एक पहलू पर प्रकाश डालना है। + "मैं तब सोलह बरस की थी, दसवीं की बोर्ड की परीक्षा सर पर थी। गाँव में अडोसी पडोसी नहीं होते, बल्कि चाची ताई, भैया भाभी होते हैं। मतलब सब एक ही खानदान के लोग होते हैं तो रिश्तेदार ही होते हैं, शहर की तरह हम यहाँ किसी के नाम या पद से नहीं , रिश्ते से एक दूसरे से सम्बोधित करते हैं। तो ऐसे ही हमारी एक चाची थीं जो उम्र में मुझ से ४ या ५ साल बड़ी थीं, उनकी शादी को साल भर ही हुआ था. बड़ी हंसमुख थीं, मेरी उनसे खूब पटती थी, वो मुझे चिड़िया बुलाती थीं क्योंकि मैं चिड़िया की तरह हर समय चूं चूं करती फुदकती फिरती थी, हालांकि मेरे पापा मुझे गुड़िया बुलाते थे, वैसे मेरा नाम सुषमा है। चाची जी की एक बड़ी बहन थीं जिनका बेटा हरी, चाची की ही उम्र का था, और १२वीं में पढता था और उसके भी बोर्ड की प...
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