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भाषा पर मेरी पकड़

 हमारे एक प्रतिष्ठित पत्रकार श्री शम्भुनाथ शुक्ल जी , बड़े बिंदास किस्म के व्यक्ति हैं, उनसे बहतु कुछ सीखने को मिलता है, अभी हाल ही में उन्होंने विभिन्न भाषाओं पर अपनी पकड़/समझ पर एक पोस्ट डाली तो मुझे भी लगा कि ये विषय भी अच्छा है, और उनसे प्रेरित होकर मैं भी आज भाषा सम्बन्धी अपनी समझ के बारे में ये पोस्ट लिखने का साहस कर रहा हूँ। 

मेरा जन्म हस्तिनापुर और कुरुक्षेत्र के बीच स्थित वार्नावृत (आजकल इसे बरनावा कहते हैं) के आसपास के क्षेत्र में हुआ था, इस इलाके की भाषा खड़ी हिंदी में भी सबसे खड़ी मानी जाती है। साधारण बातचीत में भी लोग ऐसे बात करते हैं कि सुनने वाला यही समझे कि ये लड़ रहे हैं। इसका एहसास मुझे दो बार हुआ। एक बार इलाहाबाद विश्विद्यालय में जब रैगिंग के दौरान मुझे से अपने इलाके की बोली में बात करने को कहा गया और दूसरे जब मेरी पत्नी ने मेरे गाँव में पहली बार हम लोगों को हाई टोन  में बात करते सुना और घबरा गयी। 

तो तात्पर्य ये कि मैं हिंदी भाषी हूँ और हिंदी की खड़ी बोली को ठीक से समझता हूँ। लखनऊ, बलिया, इलाहाबाद, कानपूर, इटावा, झांसी, आगरा, हाथरस, मुरादाबाद आदि स्थानों पर भी सेवाकाल में रहने का अवसर मिला है, इसलिए हिंदी की अन्य शाखाओं जैसे, अवधी , भोजपुरी , बुंदेलखंडी, ब्रजभाषा को भी समझ लेता हूँ। हमारे पूर्वज राजस्थान के अलवर जिले से हरियाणा के गुरुग्राम और बाद में मेरठ में प्रवासित हुए तो हमारे गाँव की बोली में राजस्थानी, हरियाणवी शब्दों की बहुतायत थी।  थी इसलिए कह रहा हूँ कि समय के साथ वैवाहिक संबंधों के कारण उसमे बहुत बदलाव आ चुका है , हमारे गाँव में बुलंदशहर अलीगढ़ की इतनी बहुएं आ चुकी हैं कि उन्होंने या उनकी संतानों ने भाषा को काफी बदल दिया है। 

मुझे हिंदी में एम् ए  करने का भी मौका मिला तो साहित्यिक हिंदी मुझे अच्छे से समझ आ जाती है। संस्कृत मैं उतनी ही समझता और बोल सकता हूँ , जितनी बारहवीं की हिंदी थर्ड पेपर तक में आती थी। हाँ, संधि विच्छेद करके लिखी हुई संस्कृत का अर्थ या अनर्थ लगा सकता हूँ।  मैंने कक्षा ५ तक का कोर्स शौकिया तौर पर उर्दू में भी किया और गुरुमुखी भी काम चलाऊ सीखी, सीखने का ये शौक बांग्ला तक भी गया।  लेकिन उर्दू, गुरुमुखी और बांगला में लिखी लिपि को पढ़ने में मुझे ऐसा ही समय लगता है जैसे किसी छोटे बच्चे को क ल म कलम पढ़ने में लगता है। 

लेकिन उर्दू मुझे बोली के रूप में पसंद है किन्तु जैसे हिंदी को संस्कृतनिष्ठ बनाने वाले उसे कठिन बना देते हैं , ऐसे ही उर्दू को भी फ़ारसी अरबी शब्दों से समृद्ध करने वालों की कोशिश उर्दू को भी कठिन बना देती है वरना उर्दू बड़ी मीठी जबान लगती है। 

अंग्रेजी हमारे जमाने में कक्षा ६ से शुरू होती थी तो उसमे शुरू में हमारा हाथ तंग था। लेकिन कई अच्छे शिक्षकों ने हमें ये भाषा अच्छे से सीखा दी। लेकिन हम सोचते हिंदी में थे और फिर उसे अंग्रेजी में ट्रांसलेट करते थे, तो इसमें वक़्त लगता था। अधिकारी बनने के बाद हमें एक्सपोज़र मिला तो विदेशियों से भी बात करने का मौका मिला और बाद में हमारा वास्ता ऑरकुट और फेसबुक के माध्यम से बहुत से विदेशी मित्रों से पड़ा जो केवल अंग्रेजी में ही पोस्ट या सन्देश भेज और समझ सकते थे।  उनकी वजह से हमने अंग्रेजी में लिखना शुरू किया। वैसे प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी के समय हम अंग्रेजी में निबंध लिखने लगे थे। और कम्पटीशन सक्सेस रिव्यु नामक अंग्रेजी मासिक पत्रिका में Indian Economy पर हमारा एक लेख पुरुस्कृत श्रेणी में प्रकाशित भी हुआ था। लेकिन अंग्रेजी में फ्लुएंटली बोलने की शुरुआत हमारे बेटों और बाद में हमारी वर्तमान पत्नी के कारण हुई। ये लोग अनुवाद नहीं करते बल्कि अंग्रेजी में ही सोचते और बोलते थे तो धीरे धीरे हमने उनकी बातों में त्वरित प्रतिक्रिया देने में अंग्रेजी में बोलना (बिना अनुवाद किये) सीख लिया। 

पत्नी की मातृ भाषा पुर्तगाली है इसलिए ससुराल में बिताये कुछ दिनों में हमने नमस्कार, धन्यवाद जैसे कामचलाऊ शब्दों के पुर्तगाली अनुवाद को सीख लिया। यद्यपि स्टेला ने हिंदी ज्यादा अच्छे से सीख ली है हम उतने अच्छे से पुर्तगाली सीखने में दिलचस्पी ही नहीं ले रहे। हाँ अगर किसी मजबूरी में हमें ब्राजील रहना पड़ता तो शायद हम भी पुर्तगाली सीख गए होते। अच्छा हुआ जो ऐसी कोई मजबूरी हमारी नहीं रही। 

तो मित्रों भाषा के सम्बन्ध में हमारी पकड़ और समझ बस इतनी सी है। हिंदी सर्वोपरि। 

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