सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

अपने ग्राम वासियों से

प्रत्येक व्यक्ति की दिनचर्या राजनीतिक निर्णयों से प्रभावित होती ही है। राजनैतिक निर्णयों की लोग आलोचना भी करते पाए जाते हैं। लेकिन राजनीति में उतरने में अच्छे लोग ये कहकर संकोच करते हैं कि राजनीति गन्दी चीज है। अपवाद स्वरुप अरविन्द केजरीवाल सरीखे लोग भी हैं जो आशा जगाते हैं कि बिना गुंडों के, बिना गॉडफादर के, बिना स्थापित राजनैतिक दल की मदद के भी राजनीति में जगह बनायी जा सकती है।
राजनीति को गन्दी बताने वाले और वर्तमान राजनैतिक माहौल की आलोचना करने वालों को इस को साफ़ सुथरा बनाने की जिम्मेदारी उठानी चाहिए।
लोग कहते हैं कि हमें चुनाव में उतरे प्रत्याशियों में से ही तो चुनना पड़ता है, जब अच्छे लोग चुनाव में उतरते ही नहीं तो हमें मज़बूरन खराब प्रत्याशियों में  से ही किसी को चुनना पड़ता है.
इसलिए मैं आह्वान करता हूँ कि जो लोग खराब राजनैतिक माहौल और  खराब प्रत्याशियों की आलोचना  करते हैं, उन्हें या तो खुद चुनाव मैदान में उतरना चाहिए या फिर अच्छे लोगों को चुनाव मैदान में उतारने के लिए कोशिश करनी चाहिए।
बुराई करना आसान काम है और बुराई को दूर करने के लिए प्रयत्न करना और भी आसान काम है। सिर्फ अच्छे लोगों को प्रोत्साहित ही तो करना है।
अभी ग्राम पंचायत चुनावों में लगभग ७-८ महीने शेष हैं और आगामी चुनाव के लिए कुछ लोगों ने अपने आप को प्रत्याशी घोषित कर दिया है। कुछ प्रत्याशियों  ने तो दैनिक रूप से अपने अड्डे पर लोगों को शाम की दावत भी देना शुरू कर दिया है। और मज़ेदार बात ये है कि दावतें उड़ाने वाले लोग अलग से बात करने पर दावत देने वाले को घमंडी, शराबी, फेंकू और बद्तमीज, बेईमान कहने से परहेज भी नहीं करते।
नेता  की उम्र ४० - ५० वर्ष के बीच हो तो उस से उम्मीद की जा सकती है कि वो लोक कल्याण के लिए भाग दौड़ कर सकता है, नयी सोच का व्यक्ति होगा। जागरूक होगा, दुनिया में क्या चल रहा है उस बारे में जानकारी रखता होगा। युवाओं को संगठित करने में सक्षम होगा और संगठित युवाओं की ऊर्जा का उपयोग गाँव के कल्याण में कर सकेगा। युवाओं के लिए विकास और रोजगार के अवसर सृजित करने में पंचायत के संसाधनों का उपयोग करने सक्षम होगा।
सिर्फ शराब, दावतें या निजी लाभ  के लालच (मकान, किसान पेंशन, पट्टा, आंगनवाड़ी, आशा, रोजगार सहायक, शिक्षा मित्र) के आधार पर  किसी को प्रधान बनाने की तरफदारी करना चाहेंगे तो फिर आगामी ५ साल तक पछतायेंगे।
इसलिए ऐसा युवा व्यक्ति ढूंढिए जिसे न खुद कोई लालच हो और न वो किसी को कोई लालच देकर अपने पक्ष में वोट देने को कहे।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

सच्ची कहानी, नायिका की जुबानी

डिस्क्लेमर:- प्रस्तुत कहानी में संयोग से किसी की जिंदगी से कोई घटनाएं या नाम , मेल खा सकती हैं, दिए गए नाम और स्थान सब असल दुनिया में हैं, लेकिन जरुरी नहीं कि ये इस कहानी में लिखे पात्रों की असल जिंदगी हो। कहानी का उद्देश्य केवल आज के उत्तर भारत के गाँवों की महिलाओं के एक पहलू पर प्रकाश डालना है।  + "मैं तब सोलह बरस की थी, दसवीं की बोर्ड की परीक्षा सर पर थी।  गाँव में अडोसी पडोसी नहीं होते, बल्कि चाची ताई, भैया भाभी होते हैं। मतलब सब एक ही खानदान के लोग होते हैं तो रिश्तेदार ही होते हैं, शहर की तरह हम यहाँ किसी के नाम या पद से नहीं , रिश्ते से एक दूसरे से सम्बोधित करते हैं। तो ऐसे ही हमारी एक चाची थीं जो उम्र में मुझ से ४ या ५ साल बड़ी थीं, उनकी शादी को साल भर ही हुआ था. बड़ी हंसमुख थीं, मेरी उनसे खूब पटती  थी, वो मुझे चिड़िया बुलाती थीं क्योंकि मैं चिड़िया की तरह हर समय चूं चूं करती फुदकती फिरती थी, हालांकि मेरे पापा मुझे गुड़िया बुलाते थे, वैसे मेरा नाम सुषमा है। चाची जी की एक बड़ी बहन थीं जिनका बेटा हरी, चाची की ही उम्र का था, और  १२वीं में पढता था और उसके भी बोर्ड की प...

ghost story

Ghost का अर्थ भूत बताया जाता है, अंग्रेजी में इसे "जो वास्तव में अस्तित्व में नहीं है, या जो था पर अब नहीं है" के अर्थ में लिया जाता है। भूत को हिंदी में "बीता हुआ", या "अतीत" के अर्थ में लिया जाता है.   ghostwriting का भी चलन इन दिनों है। और इतना है कि अब इसके विज्ञापन भी आने लगे हैं कि अपनी कहानी ghostwriters से लिखवाइए। यानि कहानी के लिए बस कंटेंट आप उपलब्ध करा दीजिये और पैसा लेकर आपकी कहानी आपकी जुबानी भाषा और लेखन विशेषज्ञ लिख देंगे।   मेरे पास भी एक घोस्ट आया, यूँ कहिये कि मेरे एक प्रियजन ने मुझ से कहा कि क्या आप मेरी कहानी लोगों को बता सकते हैं, मैंने कहा कुछ दिलचस्प हुआ तो कोशिश करूंगा, लेकिन मैं कोई स्थापित लेखक नहीं हूँ और मैं कहानीकार के रूप में स्थापित भी नहीं, इसलिए किसी कुशल लेखक के पास क्यों नहीं करते, उसने कहा कि क्योंकि वे बड़े मंहगे हैं और मेरे पास देने को दमड़ी भी नहीं, और फिर मुझे जितना आप जानते हैं उतना मेरे परिवार के लोग भी नहीं जानते तो आप मेरी बात शायद बेहतर लिख सकें। और मैंने हाँ भर दी।   " मैं छोटी सी थी, गाँव में रहती थी ,...

व्यापार संसार को लील रहा है

सोशल मीडिया एक बहुत बड़ा मंच है। ये बड़ा इसलिए है कि यहां कोई भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पूरा पूरा लाभ उठा सकता है और उठा रहा है। इन मंचों के संचालकों ने आत्मानुशासन के लिए कुछ रेस्ट्रिक्शन्स रखी हुई हैं लेकिन ये रेस्ट्रिक्शन्स तभी काम में लाइ जाती हैं, जब कोई इन पर आपत्ति  दर्ज कराता है।  और ये जरुरी नहीं है कि हर आपत्ति पर मंच संचालक रेस्ट्रिक्शन लागू ही करे। कई बार उनका आपत्ति करने वाले को जवाब आता है कि उनके स्टैंडर्ड्स के अनुसार कंटेंट आपत्तिजनक नहीं पाया गया।  अब ये स्टैण्डर्ड कौन बनाता है। हर देश/प्रदेश/समाज के अपने अपने स्टैंडर्ड्स होते हैं, अपने अपने सामजिक नियम और परम्पराएं होती हैं। मंच संचालक जिस देश में बैठे हैं, वे उस देश के स्टैंडर्ड्स को दुनिया भर में थोप रहे होते हैं।  ये सांस्कृतिक आक्रमण/अतिक्रमण जैसा समझिये। अमेरिका में बैठे लोग अपने स्टैंडर्ड्स सारी दुनिया पर थोप रहे हैं क्यों कि फेसबुक, ट्विटर/x , व्हाट्सप्प, इंस्टाग्राम, टेलीग्राम सब का सञ्चालन अमेरिका से हो रहा है।  अच्छा लगता है कि हमें अपनी अभिव्यक्ति के लिए एक बड़ा मंच मिल जाता है और ...