वैसे तो ये टॉपिक अब लिखने लायक नहीं रहा, मैंने सोचा था अब और नहीं। लेकिन आपका आग्रह नहीं ठुकरा सकता तो बता रहा हूँ।
मैंने बचपन से घर में अनेकों बार बहन का , माँ का , बुआ का, पत्नी का झुमका गुम होते देखा सुना है और मिलते हुए भी। अधिकाँशतः वो किसी न किसी बिस्तर में या बिस्तर के आस पास या कभी कभी बाथरूम में मिलता था।
सो मैंने लिख दिया था (अब तो वो टिप्पणी मैंने डिलीट कर दी) कि झुमका खोया है तो बिस्तर या बिस्तर के आसपास मिलेगा। बिस्तर किसी का भी हो सकता है। बिस्तर किसका हो सकता है ये झुमके की मालकिन बेहतर बता सकती है। ये बाद के दो वाक्य अनावश्यक थे इन्हे न लिखता तो बात आगे नहीं बढ़ती। या फिर और विस्तार से लिखता। बिस्तर पर बच्चे खेलते हैं माँ के गर्दन पर झूल जाते हैं, भाई बहन तकिया मार मार कर लड़ते हैं तो बच्चों के बिस्तर पर भी मिल सकता है। ..इतना और स्पष्ट कर दिया होता तो दुसरे अर्थ निकालने की जरूरत न पड़ती। लेकिन लघुकथा लिखते लिखते कुछ बाते पाठकों के अपने सोचने के लिए छोड़ देने की आदत पड गयी तो टिप्पणी को विस्तार जानबूझ कर नहीं दिया ताकि लोग अपने अपने हिसाब से खाली स्थान की पूर्ती कर लें। इसे मेरी शरारत कह सकते हैं। लेकिन मेरा इरादा किसी का चरित्र हनन करना नहीं था। मैं स्त्री की स्वतंत्रता का हामी हूँ। वो अपने झुमके की मालकिन है इसलिए वही बेहतर जान सकती है कि झुमका कहाँ खो सकता है। ये वाक्य मेरे फेमिनिस्ट होने के कारण उपजा। लेकिन भारतीय संस्कृति के रखवालों को ये संस्कृति के साथ साथ स्त्रियों की अस्मिता पर हमला लगा।
जब मुझे पता चला कि मेरी टिप्पणी लोगों को अश्लील और अशालीन लगी है तो मैंने उसे डेलीट कर दिया लेकिन तब तो वो संजय सिन्हा की पोस्ट का हिस्सा बन चुकी थी।
आशा है कि मेरी बात आप समझ गयी होंगी।
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