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नौकरानी से बुजुर्ग के प्यार पर संजय सिन्हा की कहानी

  संजय सिन्हा की आज की स्टोरी ने एक विषय चिंतन के लिए दे दिया। क्यूंकि ऐसी परिस्थिति में बूढ़े या प्रौढ़ अकेले रहने वाले बहुत से लोगों के सामने आ सकती है कि वे अकेले रहते हों, उनकी पत्नी गुजर चुकी हों और उनके बच्चे व्यवसायिक कारणों से, अपने पैरों चल कर उनसे कहीं दूर जा बस गए हों।
उनके घरेलू कामों में मदद के लिए (घर की साफ़ सफाई और खाना बनाना आदि) कोई महिला स्थाई या अस्थाई सहायक उन बुजुर्ग के घर आने लगे या आकर रहने लगे, ये कोई maid हो सकती है, कोई अडोसी पडोसी हो सकती है, कोई कमजोर आर्थिक  हालत वाली दूर की रिश्तेदार हो सकती है। रोज रोज संपर्क में आने पर दोनों एक दुसरे को पसंद करने लगें और इतना पसंद करने लगें कि एक दुसरे में अपना जीवन साथी ढूंढने लगें। सामान्य दशा में ऐसी सहायक उन बुजुर्ग से उम्र में तो निश्चय ही बहुत छोटी होगी क्यूंकि उनकी उम्र की महिला तो खुद घुटनों  और कमर के दर्द से पीड़ित होगी और खुद अपने लिए अपनी बेटी बहु या किसी और पर निर्भर हो चुकी होगी।
अगर ऐसे बूढ़े या बुजुर्ग, जो भी नाम उन्हें दिया जाए, सिर्फ उस सहायक के प्रति सद्भावना रखते हैं और वो सहायक भी सिर्फ उनकी लाचारी/मज़बूरी के कारण उनके प्रति दया रखती है तो दोनों एक दुसरे का बेहतर ख्याल रख सकते हैं। बुजुर्ग उसे अच्छे कपडे, या  जरुरत की और  वस्तुएं यदा कदा उपहार में दे सकते हैं, या उसकी पगार बढ़ा सकते हैं। और वो सहायक भी बुजुर्ग के घर की और दिल लगाकर देखभाल कर सकती है, नियत समय से अधिक समय दे सकती है, नए नए पकवान बना कर खिला सकती है, उनके कपडे  इस्तरी कर सकती है, यानी तय काम से ज्यादा काम करके अपनी दया या प्यार प्रकट कर सकती है।
संजय सिन्हा की कहानी के आज के पात्र अपनी सहायक से शादी कर लेते हैं। शादी क्यों की गयी, क्या प्यार प्रदर्शित करने या कृतज्ञता  जताने का यही एक उपाय उनके पास था। मेरी समझ में और शायद पाठकों में से अधिकाँश की समझ में शादी की जरूरत, केवल यौन सम्बन्ध स्थापित करने को सामाजिक और कानूनी मान्यता के लिए ही पड़ती है। भले ही आजकल लिवइन रिलेशनशिप के उदाहरण भी काफी देखने को मिलते हैं लेकिन लोगों की गॉसिपिंग की आदत होने और भद्र जनों को गोस्सिप्पिंग का विषय बनने में हिचक होने के कारण कोई बुजुर्ग व्यक्ति किसी घरेलू सहायक के साथ लिवइन रिलेशन  में रहना नहीं चाहता। महिलायें इस मामले और कठोर हैं, आधुनिक आत्मनिर्भर महिलाओं को छोड़ दें तो प्रायः सभी महिलायें लिवइन के बजाय शादी को पसंद करेंगी। तो न तो संजय सिन्हा की कहानी के पात्र बुजुर्ग और न उनकी सहायक लिवइन रिलेशन में रहना चाह पाते। तो केवल यौन समबन्ध ही इस शादी का एक मात्र कारण है, ऐसा मुझे लगा. अब इसके दो कारण हो सकते हैं कि वाकई दोनों में यौन सम्बन्ध की सहमति  होने से पहले दोनों में एक दुसरे के प्रति प्यार और परवाह पैदा हो चुके थे और इसलिए उन्होंने शादी का निर्णय ले लिया, या सहायक के मन में कोई योजना बन रही थी यौन के बदले अपना जीवन स्तर सुधारने की। दोनों ही दशाओं में बुजुर्ग केवल प्यार के वशीभूत नहीं थे, बल्कि यौनेच्छा के  दबाब में वो शादी करने को विवश हुए। सहायक महिला ने अगर दबाब न बनाया होता तो बुजुर्ग महोदय हरगिज़ न करते।
ये निष्कर्ष मैंने इसलिए निकाला कि अगर वो सचमुच उस महिला को प्यार करने लगे थे तो उन्हें उसके पूर्व परिचितों/मित्रों को भी उतने ही प्यार से अपना लेना चाहिए था। तब वो संजय सिन्हा से नहीं बल्कि गार्ड, सफाई वाला, ड्राइवर आदि से शिकायत करते, अरे भाई कभी कभी अपने जीजा जी की भी खैर खबर ले लिया करो। उन्हें दावत देते।
तब उंन्हे एक आदर्श व्यक्ति माना जाता। वो अपनी यौनेच्छा को प्यार का नाम देकर प्यार का अपमान कर रहे हैं और अपनी पत्नी के अतीत का भी अपमान कर रहे हैं। अगर किसी से प्यार करो तो उसे उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्व और उसके अतीत के साथ स्वीकार करो। महान बनना है तो पूरे महान बनो, आधे अधूरे महान बनने का दिखावा, आपको हंसी का पात्र बना कर छोड़ देगा।
शादी प्यार करने वालों में ही होनी चाहिए, और इसके लिए एक दुसरे को पूरी तरह जानना जरुरी है। जानने  के बाद भी आपका प्यार बरकरार है तो फिर उसका, उसके रिश्तेदारों का या दोस्तों का आर्थिक स्तर कोई मायने नहीं रखता।
बिना प्यार के शादी में बेमेल स्टेटस के कारण बहुत समस्याएँ आती हैं। शादी के बाद भी जीवन साथी से प्यार न पैदा कर सके तो शादी नर्क का द्वार हो जाती है। एक बार प्यार हो जाए, शादी से पहले या बाद में, तो जीवन साथी का हर दोष भी गुण बन जाता है, उसका फूहड़पण मासूमियत कहलाती है, उसकी गरीबी उसकी सादगी कहलाती है, और गरीबों के प्रति उसकी दया, का नाम मानवता बन जाता है। 

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