"चुप बैठो" अगर आप अपने बच्चों को ये निर्देश देने की आदत पाल बैठे हैं तो इसे तुरंत बदल डालिये। पहले हम बच्चे को बोलना सिखाते हैं। जब वो माँ , मामा, म्मा या पा, पापा बोलता है तो हम बहुत खुश होते हैं। हम बार बार उसे बोलने को प्रेरित करते हैं। फिर हम उसे दो पैरों पर चलना सिखाते हैं, ऊँगली पकड़ कर चलवाते हैं, मेज के सहारे से चलवाते हैं उसके लिए वॉकर, गडूलना लाते हैं, किसी प्रकार उसे चलने का अभ्यास करवाते हैं। बच्चे जब बोलना और चलना सीख जाते हैं तो उनकी जिज्ञासा जागृत हो जाती है वो हर वस्तु को पहुँच में लाना चाहता है, हर शब्द को दोहराना चाहता है और जब वो आपकी तरह हर वस्तु तक पहुँच कर उसे पकड़ कर देखना चाहता है तो अपनी उपलब्धि पर बहुत प्रसन्न भी होता है। वो आपके शब्द दोहराता है। अगर आप गाली के शब्दों का प्रयोग करता है तो वो भी वैसा ही बोलता है या बोलने की कोशिश करता है। शुरू शुरू में आप को भी मजा आता है। लेकिन जैसे जैसे वो बड़ा होता जाता है , आपको उसका ज्यादा चलना और ज्यादा बोलना अखरने लगता है। तो आप की डांट के दो शब्द उसे हतप्रभ कर देते हैं, डरा देते हैं, यही वे शब्द हैं "चुप ब...