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संदेश

भारत सरकार की CAA नियमावली

भारत में राज्यों को किसी को नागरिकता प्रदान करने का अधिकार नहीं है। नागरिकता प्रदान करना भारत सरकार का अधिकार है। इसलिए ममता बनर्जी का ये कहना कि वह बंगाल में CAA लागू नहीं होने देंगी, मूर्खतापूर्ण राजनैतिक बयानबाजी से अधिक कुछ नहीं है। भारत में कुछ पडोसी देशों से आये शरणार्थीगण को नागरिकता प्रदान करना भारत सरकार के चुनावी घोषणाओं का लंबित विषय था, जिसे उसने अब पूरा कर दिया। इसके राजनैतिक उद्देश्य कुछ भी हों लेकिन ये एक समस्या का समाधान है, इसलिए इसका स्वागत है। यद्यपि कुछ लोग दुष्प्रचार करेंगे कि ये एक संप्रदाय की नागरिकता छीनने की और पहला कदम है. लेकिन घोषित नागरिकता नियमावली केवल बाहर से आने वालों को नागरिकता देने की प्रक्रिया तय करती है न कि भारत में रह रहे भारत के पूर्व से नागरिकों के लिए। इसलिए भारतीय मुस्लिमों को ऐसे दुष्प्रचार के प्रभाव में नहीं आना चाहिए।  भारत का संविधान धर्म और जाति के आधार पर भेदभाव की अनुमति नहीं देता, इसलिए इस नियमावली/अधिनियम पर भेदभाव का आरोप भी लगेगा। अच्छा होता कि धार्मिक पहचान और कुछ देशों के नाम इस एक्ट / नियमावली में न होते और सिर्फ ये प्राविधा...

परिवर्तन ही सृष्टि का मूल स्वभाव है

वास्तव में चेतना ही सारी सृष्टि का मूल है। समस्त जड़ पदार्थ (जो प्रत्यक्ष में जड़ प्रतीत होते हैं) में भी चेतना है, यह विज्ञान प्रमाणित कर चुका है। हर जड़ पदार्थ जिन अणुओं / परमाणुओं से बना है, उनमें भी भीतर ही भीतर गति होती रहती है। परमाणुओं और अणुओं का संयोग होता रहता है, नए यौगिक बनते रहते हैं। गति का मापन केवल परिवर्तन के माध्यम से होता है। इसका सीधा सा तात्पर्य है कि चेतना का प्रभाव निरंतर परिवर्तन है। अगर परिवर्तन नहीं होगा तो हम चेतना को नाप नहीं पाएंगे।  समस्त ब्रह्माण्ड में हर पिंड, चाहे वो इलेक्ट्रॉन जितना सूक्ष्म पिंड हो या किसी गृह या आकाशगंगा जैसा कोई विशाल पिंड, सभी गतिमान हैं और परिवर्तन के अधीन हैं। इसलिए आप भी चाहे अनचाहे परिवर्तन के अधीन हैं। एक शिला जो नदी के बीच में खड़ी है, देखने में अडिग लग सकती है, परिवर्तन से अप्रभावित लग सकती है। लेकिन जो लोग जानते हैं कि रसरी आवत जात से सिल पर पडत निसान, वे ये भी जानते हैं कि बहती हुई जल धारा नदी में खड़ी शिला को भी धीरे धीरे चिकना कर रही है , धीरे धीरे सरका रही है। हमारे भूमण्डल पर तैरते हुए द्वीप और महाद्वीप भी एक विशालकाय शि...

किसानों से सहानुभूति रखिये

कुछ किसानों को आंदोलन में बड़े ट्रैक्टर्स या उम्दा कारों के साथ आते देख कर उनसे ईर्ष्या करने वालों को यह भी जानना जरुरी है कि २०२१ में हुए एक सर्वे के अनुसार भारत के अधिकतर किसानों की औसत आय १०२१८ रूपये प्रति माह है यानि १२२६१६ रूपये सालाना, जबकि भारत के लोगों की कुल औसत आय 138417 रूपए सालाना है. इस प्रकार  औसत किसान की औसत आय कुल भारतीयों की औसत आय से कम है।  क्या किसानों को समृद्ध और सुविधा संपन्न जीवन जीने का हक़ नहीं है? क्या उन्हें अपनी मेहनत का उचित मूल्य मांगने का हक़ नहीं है? आप प्रोसेस्ड फ़ूड खरीदते हैं, उसका मुनाफा प्रसंस्करण उद्योग में लगे उद्योगपतियों या फिर लॉजिस्टिक सेवा प्रदान करने वाली कंपनियों को होता है, किसान को क्यों नहीं होना चाहिए, दो रुपये का आलू जब चिप्स के पैकेट में बदलता है तो वह बीस रुपये का बिकता है। दस रुपये का गेहूं जब ब्रेड में बदल कर आपके पास पहुँचता है तो उसकी कीमत 50 रुपये हो जाती है। किसान और आपकी प्लेट के बीच चालीस रुपये कौन ले जाता है ? सोचिये और किसान की मांगों का समर्थन कीजिये। नहीं कर सकते तो कोई बात नहीं, कम से कम मंहगाई के लिए किसान को जिम...

Be Positive 1

एक भावना है, जिसे दम्भ, अहंकार, घमंड, गर्व,  दर्प, मान, अभिमान कई नामों से जाना जाता है। कुछ लोग गर्व और अभिमान को सकारात्मक मानते हैं लेकिन सच्चाई यही है कि नाम कुछ भी हो,  इन सभी की अभिव्यक्ति, देर सबेर  उद्दंडता में ही होती  है, इस लिए ये एक नकारात्मक भावना है । इस भावना के कारण मनुष्य एकाकी हो जाता है, वह मित्र नहीं बना पाता, और जो मित्र या रिश्तेदार होते भी हैं, वे धीरे धीरे दूर होने लगते हैं, ये भावना जिस मनुष्य में होती है वह अपने आसपास के वातावरण को भी संक्रमित करती है। उस व्यक्ति के साथ रहने को विवश लोग भी उसी भावना से ग्रसित होने लगते हैं, इस प्रकार ये एक संक्रामक रोग की तरह हानिकारक है। बच्चों पर ऐसी भावना का प्रभाव सबसे ज्यादा पड़ता है क्योंकि उनका विवेक तब तक विकसित नहीं हुआ होता कि वे इस भावना को और इसके दुष्परिणामों को समझ सकें। वे केवल अनुकरण करना जानते हैं। उनकी शिक्षा का मूल आधार उस उम्र में निरीक्षण और अनुकरण ही होता है, इस लिए बच्चे अपने माता पिता का अनुकरण करते हुए इस भावना को अंगीकार कर लेते हैं, ऐसे बच्चों के कोई मित्र नहीं बन पाते । इस भावना से...

किसान को सुनिए सरकार

दुनिया भर के आधा दर्जन से अधिक लोकतान्त्रिक देशों में किसान आंदोलनरत हैं और अपने ट्रैक्टर्स तथा अन्य उपकरणों के साथ, अपने परिवारों और चूल्हा चौके के साथ सड़कों पर हैं। लेकिन उन किसानों के साथ जैसा सुलूक भारत में हो रहा है, वैसा दुनिया में और कहीं नहीं हो रहा। किसान आंदोलनकारियों द्वारा पहले भी और अब भी जो प्रदर्शन किया है वह शांतिपूर्ण ही कहा जाएगा, हालांकि कभी कभी कुछ अराजक तत्व हर आंदोलन में घुस जाते हैं और कभी कभी सरकार रणनीति के तहत आंदोलनकारियों को बदनाम करने और आम जनता में आंदोलनकारियों के प्रति सहानुभूति को तोड़ने के लिए आंदोलनकारियों में छद्म उपद्रवी भी घुसा देती है।  आंदोलन अच्छा है या बुरा है, ये छोड़िये, आंदोलन की नौबत आती ही क्यों है।  किसान आंदोलन में प्रमुख मांग उनकी फसल का सही दाम मिलने, उपज की लागत कम करने के लिए इनपुट्स(बीज, उर्वरक, पेस्टीसिड्स, सिंचाई और डीजल व् बिजली ) की कीमतें नियंत्रित करने अथवा अनुदानित करने की ही रहती है। किसान बड़े गर्व से खाद्य सुरक्षा प्रदान करने के लिए अपनी पीठ ठोकती रहती है कि देश में किसी को भूखा नहीं रहने दिया जाता, देश के अस्सी करोड़...

Dirty Journalism

ये गलत पत्रकारिता है कि बलात्कार जैसे जुर्म से पीड़ित या जुर्म  करने वाले अत्याचारी की जाति या धर्म या उसकी राजनैतिक विचारधारा का उल्लेख किया जाए।  हर धर्म, हर जाति, हर राजनैतिक दल में आपराधिक मानसिकता के लोग हो सकते हैं। जब कोई कहता है कि अमुक जाति की लड़की के साथ बलात्कार हुआ, अपराधी अमुक जाति के बताये जाते हैं। तो ऐसा कहने वाले लोग चाहे वो पत्रकार हों, पुलिस या प्रशासनिक अधिकारी हों या राजनेता हों, मुझे वे सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने वाले नजर आते हैं। ऐसे लोग जातिगत, सम्प्रदायगत, और राजनीतिगत वैमनस्य बढ़ाने का सामाजिक और राष्ट्रीय  अपराध करते हैं और सत्ताधारी दल जो चाहे २०१४ से पहले के हों या बाद के, ऐसे अपराध को नजरअंदाज करते हैं।  मेरी राय है कि प्रिंट मीडिया और दृश्य श्रव्य मीडिया, तथा राजनेताओं और पुलिस व् प्रशासनिक अधिकारीयों को इस बात का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए कि घटना का प्रस्तुतीकरण किस प्रकार किया जाए ताकि अपराधी को किसी वर्ग का समर्थन न मिले, किसी वर्ग को अपमानित न महसूस होना पड़े।  जातीय और सांप्रदायिक हिंसा को छोड़ कर ज्यादातर अपराध व्यक्तिगत होते हैं ले...

Keep quiet

"चुप बैठो"  अगर आप अपने बच्चों को ये निर्देश देने की आदत पाल बैठे हैं तो इसे तुरंत बदल डालिये। पहले हम बच्चे को बोलना सिखाते हैं। जब वो माँ , मामा, म्मा या पा, पापा बोलता है तो हम बहुत खुश होते हैं। हम बार बार उसे बोलने को प्रेरित करते हैं। फिर हम उसे दो पैरों पर चलना सिखाते हैं, ऊँगली पकड़ कर चलवाते हैं, मेज के सहारे से चलवाते हैं उसके लिए वॉकर, गडूलना लाते हैं, किसी प्रकार उसे चलने का अभ्यास करवाते हैं।  बच्चे जब बोलना और चलना सीख जाते हैं तो उनकी जिज्ञासा जागृत हो जाती है वो हर वस्तु को पहुँच में लाना चाहता है, हर शब्द को दोहराना चाहता है और जब वो आपकी तरह हर वस्तु तक पहुँच कर उसे पकड़ कर देखना चाहता है तो अपनी उपलब्धि पर बहुत प्रसन्न भी होता है। वो आपके शब्द दोहराता है। अगर आप गाली के शब्दों का प्रयोग करता है तो वो भी वैसा ही बोलता है या बोलने की कोशिश करता है। शुरू शुरू में आप को भी मजा आता है। लेकिन जैसे जैसे वो बड़ा होता जाता है , आपको उसका ज्यादा चलना और ज्यादा बोलना अखरने लगता है। तो आप की डांट के दो शब्द उसे हतप्रभ कर देते हैं, डरा देते हैं, यही वे शब्द हैं "चुप ब...

Life एंड Universe

एक नाभिक(nucleus) है, उसके चारों ओर कुछ सूक्ष्म पिंड चक्कर काट रहे हैं, उस चक्कर वाले रस्ते को ऑर्बिट कहते हैं। एक को अनेक से बदल दीजिये। अनेक नाभिक हैं, और हर नाभिक के चारों ओर अनेकों सूक्ष्म पिंड अलग अलग ओर्बिट्स में घूम रहे हैं। परमाणु से लेकर सूर्य तक के बारे में अभी तक लोग इस तथ्य को स्वीकार कर चुके हैं। लेकिन सूर्य भी तो किसी सिस्टम का हिस्सा है, उस सिस्टम को आप गैलेक्सी (आकाश गंगा )का नाम दे सकते हैं। वो गैलेक्सी एक अकेली गैलेक्सी नहीं हैं, ऐसी अनगिनत गैलेक्सीज हैं।  और हर गैलेक्सीज में असंख्य तारे हैं जैसे कि आकाश गंगा के अनगिनत तारों में से एक तारा सूर्य है। और हर तारे के चारों ओर घूमने वाले जाने कितने ग्रह हैं जैसे कि सूर्य के चारों और घूमने वाले पृथ्वी सहित कम से कम नौ ग्रहों की पहचान मनुष्य ने भी कर रखी है। हर ग्रह के चारों ओर भी कितने ही उपग्रह घूम रहे हैं. शनि ग्रह के उपग्रहों की तो सही से अभी गिनती भी नहीं हुई है। तो हर पिंड एक नाभिक है, उसके चारों ओर घूमने वाले अनेकों अन्य पिंड हैं। और ये सूक्ष्म स्तर पर हमारे ज्ञान की सीमा में परमाणु से लेकर सूर्य तक ही हमें ज्ञात ...

लिंग और वर्ग के आधार पर कानूनों में भेदभाव असंवैधानिक हैं

भारत में ऐतिहासिक सामाजिक परिस्थितियों के उद्धरण देकर भारत में बहुत से क़ानून बनाये गए हैं जो मनुष्य मनुष्य में जाति और लिंग के आधार पर भेद भाव करते हैं। महिलाओं और कथित दलित वर्ग को सदा से पीड़ित पक्ष की तरह प्रस्तुत करने का फैशन सा बन गया है। इन बेचारों के साथ सदियों से होते आ रहे अन्याय से मुक्त करना एक बहुत अच्छा सामाजिक आंदोलन हो सकता था जो अभी तक नहीं हो पाया है। लेकिन इनकी अत्यधिक संख्या को वोट बैंक समझने वाले हमारे नेता इनको लुभाने के लिए या इनके दबाब में आकर ऐसे क़ानून बना देते हैं जिनसे ऐसा लगता है कि जैसे सदियों से इनके पूर्वजों पर जो अत्याचार पुरुष या सवर्णों ने किये हैं उनका बदला अत्याचारियों के उत्तराधिकारियों से लेने की व्यवस्था कर दी गयी है। जैसे एक भेड़िया और एक मैमने की कहानी में सुना जाता है कि मैं तुझे इस लिए खाऊंगा कि तेरे दादा ने मेरे दादा को गाली दी थी।  आज कथित दलित वर्ग या किसी महिला की और से यदि पुलिस में शिकायत की जाए कि अमुक व्यक्ति ने उसे गाली दी, या उसकी और गन्दा इशारा किया या थप्पड़ दिखाया तो पुलिस की पहली जिम्मेदारी है कि महिला एयर दलित वर्ग के व्यक्ति की...

युद्ध और हिंसा कैसे समाप्त हो

संसार में समस्त युद्ध समाप्त किये जा सकते हैं लेकिन वर्चस्व को सहन करने की क्षमता विकसित करना कठिन है। असंभव तो नहीं।  पति पत्नी में से एक को दूसरे का वर्चस्व स्वीकार कर लेना चाहिए।  या फिर अपने अपने वर्चस्व के एरिया निर्धारित कर लेने चाहिए। अपने एरिया से बाहर पर वर्चस्व करने की चाह से ही युद्ध होते हैं चाहे वो किसी भी देश धर्म के भूगोल या इतिहास में ढूंढ कर देख लो।  सब को अपने भले बुरे का पता है , हम दूसरों का भला करने की फर्जी ख्वाइश के चलते भी दूसरों के जीवन में दखल देने की कोशिश करते हैं जो दूसरे को बुरा लगता ही लगता है , वो मेरे ढंग से रहे, वो मेरे ही धर्म को माने मेरी ही भाषा बोले, मेरी पसंद की ही पोशाक पहने, मेरे पसंद का ही खाये। सारे झगड़ों की जड़ ये मेरी पसंद का दूसरों पर थोपना ही तो है। सारे धर्म के लोग अपनी अपनी पसंद का ही पहनावा या खान पान रखते हों , ये बिलकुल भी जरुरी नहीं क्यों कि उन का मन तो है कि वे वेस्टर्न स्टाइल में जिए लेकिन मुल्लाओं का डर , पंडितों का डर , पादरियों का डर उन्हें वैसा करने नहीं देता।  मेरे घर में झगडे बिलकुल बंद हो चुके हैं , क्योंकि...

सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया का निर्णय समलैंगिक विवाह पर

समलैंगिक विवाह पर भारत के सर्वोच्च न्यायलय ने ३-२ के बहुमत से सहमति देने से इंकार कर दिया। मैं इस फैसले का पुरजोर समर्थन करता हूँ, यद्यपि मैं किन्ही भी दो वयस्कों को बिना विवाह के साथ रहने को उनका निजी अधिकार मानता हूँ। किसी भी वयस्क युगल को साथ रहने पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है, इस सम्बन्ध में सर्वोच्च न्यायलय पहले ही समलैंगिक यौन संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर चुका है। साथ रहने को विवाह का नाम देना क्यों जरुरी है। आजकल तो वैसे ही बहुत से युवक युवती लिवइन रिलेशनशिप में रह लेते हैं और उनके इस लिवइन रिलेशन को सर्वोच्च न्यायलय ने स्वीकार किया है। बच्चा गोद लेने के लिए भी समलैंगिक जोड़ों को अधिकार देने की याचिका भी सुना है कि रद्द कर दी गयी है। यूँ तो एकल पैरेंट को भी बच्चा गोद लेने की , विशेष परिस्थिति में अनुमति दी जाती है , लेकिन समलैंगिकों को बच्चा गोद लेने का अधिकार देने का मतलब गोद लिए जाने वाले बच्चे के साथ ये एक जबरन अन्याय होगा। क्योंकि वो समलैंगिक संबंधों को बचपन से देखेगा और उस वातावरण में उस तरह से विकसित नहीं होगा यदि वह ऐसे माँ बाप द्वारा गोद लिया जाए जो समलैंगिक नहीं हैं।...
दुनिया भर की सभ्यताओं का विकास जल स्रोतों ( नदियों, झीलों, बड़े तालाबों, और समुद्र के तटों) के आसपास हुआ है। मनुष्य के लिए जल कितना महत्वपूर्ण है, ये इसी  एक बात से स्पष्ट हो जाता है।  बिन पानी सब सून।  लेकिन इस पानी को सबसे ज्यादा  बर्बाद भी मनुष्य ही करता है। नदियों और तालाबों व् झीलों और समुद्र तटों के जल को सबसे ज्यादा प्रदूषित भी मनुष्य ही करता है।  गाँवों में कुंवों पर पनिहारियाँ लड़ा करती थीं, मुंबई जैसे महानगरों में सार्वजनिक नलो से पानी लेने के लिए लड़ते आज भी देखे जा सकते हैं। दिल्ली में पानी की कमी होने पर टैंकरों से पानी की आपूर्ति के समय भी पानी की लूट के नज़ारे मिल जाते हैं।  लेकिन पानी को बर्बाद करना और प्रदूषित करना बदस्तूर जारी है। मेरे अपने गाँव में बहुत से घरों में झाड़ू नाम का यंत्र दिखाई नहीं देगा। क्योंकि उनके घर में सबमर्सिबल पम्प लगा है  जो बिजली आते ही चालू हो जाता है। उस पम्प की मदद से पानी की धार से घर की गंदगी बुहार दी जाती है , घर में भैंस आदि पशुओं को पहले कभी एक बाल्टी पानी में सावधानी से नहला दिया जाता था एक मग  की मदद स...

भाषा पर मेरी पकड़

 हमारे एक प्रतिष्ठित पत्रकार श्री शम्भुनाथ शुक्ल जी , बड़े बिंदास किस्म के व्यक्ति हैं, उनसे बहतु कुछ सीखने को मिलता है, अभी हाल ही में उन्होंने विभिन्न भाषाओं पर अपनी पकड़/समझ पर एक पोस्ट डाली तो मुझे भी लगा कि ये विषय भी अच्छा है, और उनसे प्रेरित होकर मैं भी आज भाषा सम्बन्धी अपनी समझ के बारे में ये पोस्ट लिखने का साहस कर रहा हूँ।  मेरा जन्म हस्तिनापुर और कुरुक्षेत्र के बीच स्थित वार्नावृत (आजकल इसे बरनावा कहते हैं) के आसपास के क्षेत्र में हुआ था, इस इलाके की भाषा खड़ी हिंदी में भी सबसे खड़ी मानी जाती है। साधारण बातचीत में भी लोग ऐसे बात करते हैं कि सुनने वाला यही समझे कि ये लड़ रहे हैं। इसका एहसास मुझे दो बार हुआ। एक बार इलाहाबाद विश्विद्यालय में जब रैगिंग के दौरान मुझे से अपने इलाके की बोली में बात करने को कहा गया और दूसरे जब मेरी पत्नी ने मेरे गाँव में पहली बार हम लोगों को हाई टोन  में बात करते सुना और घबरा गयी।  तो तात्पर्य ये कि मैं हिंदी भाषी हूँ और हिंदी की खड़ी बोली को ठीक से समझता हूँ। लखनऊ, बलिया, इलाहाबाद, कानपूर, इटावा, झांसी, आगरा, हाथरस, मुरादाबाद आदि स्थानो...

Knowledge is One, people see it divided

भारत सहित बहुत से देशों में , ज्ञान को विभाजित करके देखने की प्रथा सी बन गयी है। आर्ट स्ट्रीम, साइंस स्ट्रीम, मैथमेटिक्स स्ट्रीम, बायो स्ट्रीम, मेडिकल साइड, इंजीनियरिंग साइड, वगैरा वगैरा नाम से बच्चों को विषय चुनने के लिए दिए जाते हैं। जब कि ज्ञान एक समुच्चय है सब का मिला जुला। लेकिन अफ़सोस हमारे देश में तो विषय भेद भी लिंग भेद और व्यवसाय भेद यहाँ तक कि आर्थिक स्तर के भेदभाव का शिकार होते हैं। व्यक्ति कितना भी मेधावी हो लेकिन अगर वो गरीब है तो वो डॉक्टर बनने या इंजिनियर बनने की सोच भी नहीं सकता। कोचिंग व्यवसाय में भी इतनी मुश्किलें हैं कि कोचिंग कराने वाले भी छात्र की आर्थिक हैसियत को ध्यान में रखकर उसे सलाह देते हैं कि वो पुलिस में सिपाही, या फ़ौज का सिपाही बनने की तैयारी करे या क्लेरिकल जॉब को अपना सपना बनाये। गाँव में रहने वाले अधिकांश युवा बड़ा सपना इसीलिए नहीं देख सकते कि उनके घरवाले आर्थिक रूप से सक्षम नहीं हैं।  गाँवों में जो लोग दसवीं पास कर लेते हैं ( यद्यपि विषयों का चयन कक्षा ९ से ही शुरू हो जाता है और अधिकांश लड़कियों को गणित के लिए अक्षम मान कर उन्हें कक्षा ९ में गणित से द...

माता-पिता और बच्चे

हमारे बच्चे जिन्हें हम बड़े लाड प्यार से पालते हैं उनकी हर जरूरत का ध्यान रखते हैं, बीमार हो कर भी हम कभी उनके सामने लाचार या असहाय नहीं प्रदर्शित करते। हर संकट को मैनेज करके उनके सामने एक आदर्श स्थापित करते हैं , तो हमारे बच्चों की नज़र में हम दुनिया के सबसे अच्छे माँ या सबसे अच्छे बाप बन जाते हैं।  हमारे बच्चों को लगता है कि हम जीवन भर उनके लिए उसी प्रकार प्रोटेक्शन देते रहेंगे जैसे देते आये हैं, हम उनकी नज़र में साहसी, आत्मनिर्भर, खुद्दार, जूझने वाले बन जाते हैं जो किसी भी मुसीबत का सामना आसानी से कर लेता है।  लेकिन समय तो अपना असर दिखाता है।  हम बूढ़े हो जाते हैं , परिस्थितियों वश हमारे बच्चे उस समय तक दूर हो चुके होते हैं लेकिन उनकी नज़र में हम अभी भी आत्मनिर्भर, साहसी, खुद्दार और कुशल प्रबंधक बने रहते हैं और केयरिंग भी।  इसलिए यदि कभी हमारे बच्चों को कभी अपने पारिवारिक दिक्क्तों में (अपने बच्चे पालने में, घर की देखभाल में , अपनी नौकरी के समय प्रबंधन में) हमारी याद आती है तो सिर्फ इसीलिए कि उन्हें अभी भी हमारी क्षमताओं पर भरोसा ज्यों का त्यों बना हुआ है, उन्होंने हमा...

न्यायालयों की टिप्पणियां

 हाल ही में एक उच्च न्यायलय ने एक निर्णय में टिप्पणी की "लिवइन रिलेशनशिप शादी जैसी सामाजिक संस्था को बर्बाद कर रहा है" किसी भी मामले में जब न्याय का द्वार खटखटाया जाता है तो उसमे मामले की कानूनी पड़ताल करना और क़ानून के दायरे में फैसला प्राप्त करना ही अपेक्षित होता है। लेकिन न्याय की पीठ पर बैठे लोग हैं तो इंसान ही, इंसान होने के नाते उनकी व्यक्तिगत रुचियाँ और धारणाएं भी होंगी। लेकिन एक अच्छा न्यायाधीश वही है जो अपने निर्णयों को व्यक्तिगत रुचियों और धारणाओं से प्रभावित न होने दे।  मेरी दृष्टि में माननीय न्यायाधीश द्वारा उपर्युक्त टिप्पणी बिलकुल अनावश्यक थी।  ऐसी अनेकों टिप्पणियां आप लोग भी सुनते रहे होंगे, जैसे राजस्थान के एक जज साहब ने एक बार मोर-मोरनी के गर्भ धारण के लिए एक हास्यास्पद  और अनावश्यक टिप्पणी कर दी थी, मोरनी मोर के आंसू पी कर गर्भवती हो जाती है। चाहे ऐसा हो या न हो, ये लोगों का विश्वास हो सकता है लेकिन ये बिलकुल अनावश्यक टिप्पणी थी।  सर्वोच्च न्यायालय को सभी न्यायाधीशों को ऐसी सलाह जरूर देनी चाहिए कि वे अपनी व्यक्तिगत धारणाओं और रुचियों को न्यायिक क...

आप प्रतिक्रिया क्यों नहीं देते, क्योंकि आप वो हैं ही नहीं

 जो था नहीं उसे पूजा गया, जो है नहीं उसे पूछा गया ———————————————————— रिपोर्टर उस आदमी से पूछ रहा था कि भाई, किसी शुक्ला जी ने आपके सिर पर पेशाब कर दिया तो आपको वो वीडियो देख कर बुरा नहीं लगा?  “क्यों लगेगा? जब मैं वो हूं ही नहीं, जो वीडियो में है तो मुझे बुरा क्यों लगेगा?” “आप वो नहीं हैं?” “मुझे तो बिल्कुल याद नहीं कि वो मैं हूं या किसी ने मेरे सिर पर कभी पेशाब किया था।” “फिर सरकार ने आपको अपने घर बुला कर आपके पांव पखारे। आपकी तस्वीर देश भर में जारी की गई। कहा गया कि अब सिर पर पेशाब का पाप धुल गया है। सुना कि आपको कुछ इनाम वगैरह भी मिला है। फिर वो क्या था?” “साहब, हमें नहीं मालूम। वो तो एसपी साहब, कलेक्टर साहब ने मुझे बताया कि वो तुम्हीं हो जिसके सिर पर शुक्ला ने पेशाब किया था। तुम चलो सरकार के बंगले पर। तुम्हारा सम्मान किया जाएगा। तुम्हें इनाम मिलेगा। तुम मशहूर हो जाओगे, तो मैं चला गया।” कमाल है, आदमी ही बदल दिया गया। और वाहवाही लूट ली गई? सरकार के लिए कुछ भी बदल देना कौन-सी बड़ी बात है।  छोड़िए ये तो उस युवक के एक टीवी इंटरव्यू का हिस्सा है, जिसे मध्य प्रदेश में सिर ...

अरे सत्ताधारियों , मतदाताओं का अपमान मत करो

 भारत के मतदाता अंधे और बहरे समझ लिए गए हैं।  उन्हें बताया जाता है कि कांग्रेस एक परिवार की पार्टी है, इस परिवारवादी को भ्रष्टाचार का भी स्रोत बताया जाता है।  भारत के लोग नहीं जानते कि बीजेपी में कोई नेता ऐसा भी हो सकता है, जिसके माता, पिता, बहन, भाई, पति, पत्नी आदि कोई भी रिश्तेदार राजनीती में हो, क्योंकि बीजेपी तो परिवारवाद के विरुद्ध है।  भारत के लोग नहीं जानते कि इलेक्टोरल बांड की व्यवस्था ऐसी बनायी गयी है कि कोई भी कम्पनी कितना भी चंदा किसी पार्टी को दे सकती है और उसे उस पार्टी का नाम या दी गयी धनराशि प्रकट नहीं किया जाएगी। भारत के लोग नहीं जानते कि देश के एक अकेले बीजेपी दल को अन्य सभी दलों को कुल मिले चंदे से तीन गुने से भी अधिक चंदा मिलता है। और भारत के लोग ये भी नहीं जानते कि सत्ताधारियों को मिलने वाला चंदा कोई कम्पनी क्यों देती है और बदले में क्या पाती है। 

नेपोटिस्म इन इंडिया

 क्या भारतीय उपमहाद्वीप में आप किसी व्यक्ति को परिवारवाद से मुक्त मान सकते हैं? क्या इस उप महाद्वीप में भ्रष्टाचार वास्तव में कोई मुद्दा है? क्या इस महाद्वीप में स्त्री हो या पुरुष, बेटा , बहु, सास ससुर, दामाद, भाई बहन, अडोसी पडोसी सब एक दूसरे की तुष्टिकरण के लिए संकल्पबद्ध नहीं ? मोदी जी पता नहीं क्यों भारतीय मानसिकता को नहीं समझ पा रहे हैं? असल में वो सीधे सीधे नाम लेने से बचते हैं, वो कहना ये चाहते हैं कि नेहरू, इंदिरा, राजीव, और अब राहुल को पार्टी में मुख्य चेहरा समझने वाली पार्टी यानि कांगेस एक परिवार की पार्टी है, और भ्रष्टाचार तथा मुस्लिमों और दलितों को तुष्टिकरण की नीतियों से रिझा कर बरसों से सत्ता पर काबिज रही है।  इसलिए मोदी जी के अनुयायी गण  भ्रमित न हों, उन्हें बीजेपी में शामिल नेताओं के परिवारवादी होने, या भ्रष्ट होने अथवा अपने वोटबैंक के लिए तुष्टिकरण की नीतियां अपनाने में कोई ऐतराज न था और न होगा।  उनके भाषणों से कुछ विरोधी लोग बेकार ही चिल पों मचाने लगते हैं, इसलिए मैंने उनको समझने के लिए ये पोस्ट लिख दी है। आप जब चाहे बीजेपी ज्वाइन कर लें, आप से नहीं...

यूनिफार्म सिविल कोड बनाम हिन्दू कोड बिल

१९५५ में हिन्दू कोड बिल पारित होने से पहले के हिन्दू परिवारों में पुरुषों को बहुपत्नी रखने पर कोई प्रतिबंध नहीं था। हिन्दू कोड बिल को तैयार करने में डॉक्टर भीम राव आंबेडकर की बड़ी भूमिका रही थी, उन्होंने स्वयं हिन्दू धर्म में खुद पर और अनेकों महिलाओं पर हुए भेदभाव को महसूस किया था इसलिए वे इसमें बड़े बदलाव के पक्षधर थे, लेकिन हिन्दू महासभा और कांग्रेस के भी कई वरिष्ठ नेता डॉ  आंबेडकर द्वारा प्रस्तावित हिन्दू कोड बिल के विरोध में थे. डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद, श्यामा प्रसाद मुखर्जी , सरदार पटेल, इस विरोध में अधिक मुखर थे और जवाहर लाल नेहरू इस कोड के पक्ष में होते हुए भी सबको साथ लेकर चलने की कोशिश में इस कोड को थोड़ा कमजोर रखने के पक्ष में थे इस बात से नाराज डॉ आंबेडकर ने कानून मंत्री के पद से इस्तीफ़ा भी दे दिया।  आज यूनिफार्म सिविल कोड की चर्चा जोर पकड़ रही है, नेहरू की ही तरह मोदी जी की भी परीक्षा है, हिन्दू कोड बिल की चर्चा ने हिन्दुओं के कमजोर वर्ग यानि महिलाओं और दलितों में नेहरू की लोकप्रियता बढ़ा दी थी, और पहले आम चुनाव में उन्हें इतना मजबूत नेता बना दिया था कि उन्होंने हिन्दू क...

विभिन्न पर्सनल लॉ को डिस्टर्ब किये बिना

 यूनिफार्म सिविल कोड भारत के संविधान के नीति निर्देशक सिद्धांतों में दिए गए संविधानिक वचन को निभाने के लिए लाना ही चाहिए।  लेकिन भारत की विविधता को भी स्वीकार करना भारत के संविधान में ही वचनबद्धता है।  इसका सीधा सा उपाय ढूंढना पड़ेगा। जैसे कोई किसी भी विधि से किसी भी सामजिक रीति रिवाज से विवाह करे, लेकिन उस शादी/विवाह/मैरिज को सरकारी संस्था/विवाह अधिकारी के पास पंजीकरण कराया जाना अनिवार्य हो। केवल पंजीकृत विवाह को ही किसी भी कोर्ट में मान्य समझा जाएगा, अतः बिना पंजीकृत कराये, उस विवाह के विच्छेद यानि तलाक आदि का मामला अदालत में नहीं लाया जा सकेगा। सामाजिक संस्थाएं जो भी समाधान निकालेंगी, उनको चुनौती दिए जाने पर कोर्ट तभी दखल देगा जब विवाह पंजीकृत हुआ हो. इसी प्रकार जब तक सम्पत्ति के विभाजन के सम्बन्ध में परिवार में सहमति है, तो सरकार उसमे कोई दखल नहीं दे। लेकिन यदि किसी पक्ष द्वारा सम्पत्ति पर अपना दावा पेश किया जाता है तो उत्तराधिकारियों का निर्धारण, बिना लिंगभेद के, बिना आयु और वैवाहिक स्टेटस में भेद के, किया जाएगा।  संतान पिता और माता दोनों की संपत्ति में उत्तराधिक...

आदमी बदल गया तो क्या हुआ

रिपोर्टर उस आदमी से पूछ रहा था कि भाई, किसी शुक्ला जी ने आपके सिर पर पेशाब कर दिया तो आपको वो वीडियो देख कर बुरा नहीं लगा?  “क्यों लगेगा? जब मैं वो हूं ही नहीं, जो वीडियो में है तो मुझे बुरा क्यों लगेगा?” “आप वो नहीं हैं?” “मुझे तो बिल्कुल याद नहीं कि वो मैं हूं या किसी ने मेरे सिर पर कभी पेशाब किया था।” “फिर सरकार ने आपको अपने घर बुला कर आपके पांव पखारे। आपकी तस्वीर देश भर में जारी की गई। कहा गया कि अब सिर पर पेशाब का पाप धुल गया है। सुना कि आपको कुछ इनाम वगैरह भी मिला है। फिर वो क्या था?” “साहब, हमें नहीं मालूम। वो तो एसपी साहब, कलेक्टर साहब ने मुझे बताया कि वो तुम्हीं हो जिसके सिर पर शुक्ला ने पेशाब किया था। तुम चलो सरकार के बंगले पर। तुम्हारा सम्मान किया जाएगा। तुम्हें इनाम मिलेगा। तुम मशहूर हो जाओगे, तो मैं चला गया।” कमाल है, आदमी ही बदल दिया गया। और वाहवाही लूट ली गई? सरकार के लिए कुछ भी बदल देना कौन-सी बड़ी बात है। ये  उस युवक के एक टीवी इंटरव्यू का हिस्सा है, जिसे मध्य प्रदेश में सिर पर पेशाब कांड के बाद सकार ने घर बुला कर इज्जत बख्शी।  #SanjaySinha #ssfbFamily

यूनिवर्सल सिविल कोड

 विवाह, तलाक़, संपत्ति का बँटवारा मुख्य रूप से ये तीन विषय है, जो सिविल कोड द्वारा निर्धारित होते हैं । किसी भी देश में अलग अलग पृष्ठभूमि के लोग रहते हैं। ये पृष्ठभूमि उनके धर्म, उनके पूर्वजों के मूल निवास, उनकी भाषा में लिखे गये साहित्य या उनकी भाषा में लिखे,रचे, बसे लोकगीतों से निर्धारित होती है। जिन देशों ने अपना कोई राष्ट्रीय धर्म घोषित नहीं किया हुआ है, उनके नागरिकों को अपनी अपनी पृष्ठभूमि के अनुसार विवाह, तलाक़, संपत्ति विभाजन जैसे पारिवारिक मसलों को निपटाने की स्वतंत्रता प्राप्त है।  जिन देशों ने स्वयं को इस्लामिक या ईसाई या किसी धर्म से संचालित घोषित किया हुआ है, उन देशों के नागरिक अपने पारिवारिक मामलों के लिए अपने राष्ट्रीय धर्म के रिवाजों, धर्मग्रन्थों  में वर्णित विधियों का ही पालन करते हैं। भारत में अलग अलग राज्यों में, एक ही धर्म के लोग भी अलग अलग परंपराओं में अपने पारिवारिक मसलों का हल तलाश करते हैं। उदाहरण के लिए हरियाणा में पिता की मृत्यु के बाद पुत्र और पुत्री दोनों को विरासत में संपत्ति का समान अधिकार प्राप्त है लेकिन हरियाणा से सटे उत्तर प्रदेश में परंप...

समलैंगिकता और विवाह पर प्रचलित बहस

 समलैंगिकता और विवाह  सर्वोच्च न्यायालय में उपर्युक्त विषय पर बहस के कारण यह विषय अन्य मंचों पर भी बहस के केंद्र में आ गया है. प्रचलित कानून, संविधान, धर्म और समाज इन चार के नजरिए से इस पर चर्चा की जा सकती है. इस समय भारत में प्रचलित कानून केवल विपरीत लिंगियों को ही विवाह की अनुमति देता है. इसीलिए कानून में संशोधन की मांग होमोसेक्सुअल तथा उभय लिंगियों द्वारा की गई है. कानून बनाने का अधिकार संसद के पास है और कानून की संविधान सम्मत समीक्षा का अधिकार न्यायालय के पास . संविधान लोगों को, विशेषकर वयस्क लोगों को साथ रहने, और वैयक्तिक गोपनीयता को सुरक्षा का अधिकार देता है. इस नाते कोई भी दो या अधिक वयस्क समलिंगी, उभयलिंगी यदि साथ रहना चाहें तो इसमें कोई बाधा नहीं है. बाधा उनके साथ रहने को विवाह का नाम देने पर है . विवाह एक सामाजिक संस्था है और अनेकों धार्मिक क्रिया कलापों में इस संस्था के कारण संबंधित लोगों के कर्तव्य और अधिकार वर्णित किए गए हैं. इनमें दो पक्ष पुरुष और स्त्री के रूप में इंगित हैं. सर्वोच्च न्यायालय में बहस इसे किस नतीजे पर ले जाएगी, ये देखना दिलचस्प होगा.

Caste system in India is a curse

 जाति क्या होती है, क्यों होती है, भारतीय उपमहाद्वीप के बाहर भी होती है क्या? वर्ण के बारे में भी हमें भ्रम होता रहा है। वर्णभेद को हम कलर डिस्क्रिमिनेशन समझते हैं। श्वेत वर्ण, गौर वर्ण, श्याम वर्ण, ताम्रवर्ण, रक्तवर्ण, पीतवर्ण - ऐसे लोग दुनिया के अलग अलग देशों में पाए जाते हैं। बाद में लोगों ने समझाया कि पश्चिमी जगत के रेसिज्म और भारत के वर्णभेद में अंतर है। भारत के वर्ण कथित ईश्वर के अलग अलग अंगों से उत्पन्न नस्लों को कहा जाता है, जिन्हें अलग अलग कार्य करने का निर्देश ईश्वर से ही प्राप्त है। किसी को सिर्फ मुंह और जबान चलाना है। किसी दूसरे को हाथ पैर यानी लात घूंसे चलाने है। किसी तीसरे को बस पेट भरना है और ला ला करना है और चौथे वर्ण को बाकी तीन के फैलाए रायते को समेटना है। चलो रंगभेद या वर्णभेद आधा अधूरा समझ लें या बिना समझे ही हां में हां मिला दें। लेकिन जातियां - इन्हें समझना मेरे तो बस की बात नहीं । कोई बता रहा था कि पैतृक व्यवसाय को औलादों द्वारा अपनाने से जातियां बन गईं। अब समस्या ये है कि व्यवसाय निरंतर बढ़ते जा रहे हैं और जातियों की सीमा, आई मीन, संख्या सरकार ने गजट से निर...

स्त्री पुरुष संबंधों पर एक मित्र को जवाब

इस संसार में देखे और भोगे हुए यथार्थ पर बहुत कुछ लिखने का मन है  आपकी एक पुरानी पोस्ट में कई बातों पर लिखने का मन है, और पोस्ट पर एक कॉमेंट पर आपकी प्रतिक्रिया देखकर भी चकित हूँ। १.पुरातन संस्कृति में boyfriend girlfriend से भी ख़राब relationship के उदाहरण मिल जाएँगे। राजा या राजकुमार शिकार खेलने गए, कोई वनबाला भा गयी, गंधर्व विवाह किया, कुछ दिन वहीं गुज़ारे, गर्भवती स्थिति में छोड़ कर राजा या राजकुमार अपने राज्य/राजधानी लौट गए। विवाहित होते हुए भी, किसी की लड़की भगा लाए, नई को पटरानी बना दिया, पुरानियों को उस की नौकरानी की तरह रखा। २. गंधर्व विवाह, तामस विवाह जैसे विवाह, अवैध सम्बन्धों को मान्यता देने की मनुस्मृति के क़ानून की विधि थी। ३. Breakup तब भी होते थे, पत्नी ( वैध या अवैध) को राजा छोड़ देता था, और उसे अपने पिता के घर/ गुरु के आश्रम में जीवन काटना पड़ता था। ४. तिजोरी ख़ाली होने की बात भी हास्यास्पद लगी, प्यार हो या वीर्य ये न समाप्त होने वाले ख़ज़ाने हैं। कोई भी संसार में ऐसा नहीं है, जो केवल एक से प्यार करे और दूसरे से इसलिए न कर पाए कि तिजोरी ख़ाली हो गयी है। न ही ऐसा है...

Apps जी का जंजाल

बहुत से Apps आप से मांग करते हैं कि आप अपने कांटेक्ट लिस्ट तक उनकी पहुँच को allow कीजिए, कुछ आपकी लोकेशन जानना चाहते हैं। और ऐसी मांग करते समय उनकी दलील होती है कि इस प्रकार वो आपकी बेहतर सेवा कर पाएंगे।  सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग भी आम आदमी, गरीब आदमी की बेहतर सेवा के नाम पर आप को नए नए उपहार योजनाओं और कानूनों के नाम पर देना जारी रखते हैं जबकि असलियत में वो उपहार अप्रत्यक्ष रूप से उनके प्रायोजकों के हित में होते हैं। सारी बीमा योजनाएं लोगों को नुक्सान से बचाने के नाम पर जारी की जाती हैं और इनसे धन बढ़ता है केवल बीमा कंपनियों का और उन कंपनियों में काम करने वाले प्रस्तावक, सर्वेयर, आदि का। बूँद बूँद से उनका घड़ा तो भर जाता है और आपकी पसीने की बूंदे कब आपको डिहाइड्रेट कर गयीं आपको पता भी नहीं चलता।  आपके कांटेक्ट  लिस्ट, आपके मूवमेंट्स, आपके फोटो एल्बम, आपके मैसेज बॉक्स, आपकी लोकेशन और आपकी इंटरनेट सर्फिंग सब कुछ आपके फोन में installed Apps के माध्यम से ये इनफार्मेशन , एकत्र करने वाली कंपनियों के पास पहुँच  जाती हैं।और इसके आधार पर आपके और आपके मित्रों को मित्रता ...

नौकरानी से बुजुर्ग के प्यार पर संजय सिन्हा की कहानी

  संजय सिन्हा की आज की स्टोरी ने एक विषय चिंतन के लिए दे दिया। क्यूंकि ऐसी परिस्थिति में बूढ़े या प्रौढ़ अकेले रहने वाले बहुत से लोगों के सामने आ सकती है कि वे अकेले रहते हों, उनकी पत्नी गुजर चुकी हों और उनके बच्चे व्यवसायिक कारणों से, अपने पैरों चल कर उनसे कहीं दूर जा बस गए हों। उनके घरेलू कामों में मदद के लिए (घर की साफ़ सफाई और खाना बनाना आदि) कोई महिला स्थाई या अस्थाई सहायक उन बुजुर्ग के घर आने लगे या आकर रहने लगे, ये कोई maid हो सकती है, कोई अडोसी पडोसी हो सकती है, कोई कमजोर आर्थिक  हालत वाली दूर की रिश्तेदार हो सकती है। रोज रोज संपर्क में आने पर दोनों एक दुसरे को पसंद करने लगें और इतना पसंद करने लगें कि एक दुसरे में अपना जीवन साथी ढूंढने लगें। सामान्य दशा में ऐसी सहायक उन बुजुर्ग से उम्र में तो निश्चय ही बहुत छोटी होगी क्यूंकि उनकी उम्र की महिला तो खुद घुटनों  और कमर के दर्द से पीड़ित होगी और खुद अपने लिए अपनी बेटी बहु या किसी और पर निर्भर हो चुकी होगी। अगर ऐसे बूढ़े या बुजुर्ग, जो भी नाम उन्हें दिया जाए, सिर्फ उस सहायक के प्रति सद्भावना रखते हैं और वो सहायक भी सि...

अपने ग्राम वासियों से

प्रत्येक व्यक्ति की दिनचर्या राजनीतिक निर्णयों से प्रभावित होती ही है। राजनैतिक निर्णयों की लोग आलोचना भी करते पाए जाते हैं। लेकिन राजनीति में उतरने में अच्छे लोग ये कहकर संकोच करते हैं कि राजनीति गन्दी चीज है। अपवाद स्वरुप अरविन्द केजरीवाल सरीखे लोग भी हैं जो आशा जगाते हैं कि बिना गुंडों के, बिना गॉडफादर के, बिना स्थापित राजनैतिक दल की मदद के भी राजनीति में जगह बनायी जा सकती है। राजनीति को गन्दी बताने वाले और वर्तमान राजनैतिक माहौल की आलोचना करने वालों को इस को साफ़ सुथरा बनाने की जिम्मेदारी उठानी चाहिए। लोग कहते हैं कि हमें चुनाव में उतरे प्रत्याशियों में से ही तो चुनना पड़ता है, जब अच्छे लोग चुनाव में उतरते ही नहीं तो हमें मज़बूरन खराब प्रत्याशियों में  से ही किसी को चुनना पड़ता है. इसलिए मैं आह्वान करता हूँ कि जो लोग खराब राजनैतिक माहौल और  खराब प्रत्याशियों की आलोचना  करते हैं, उन्हें या तो खुद चुनाव मैदान में उतरना चाहिए या फिर अच्छे लोगों को चुनाव मैदान में उतारने के लिए कोशिश करनी चाहिए। बुराई करना आसान काम है और बुराई को दूर करने के लिए प्रयत्न करना और भी आसान ...
आधे दिन हों आधी रात  आधी चुप्पी आधी बात  आधा आधा सब बाटेंगे  खुशियां हों या संघात।  कम खाएंगे कम बोलेंगे  अपने अपने गम खोलेंगे 

एक पर्दा है नियति का, जिसे कहते हैं काश

  "काश" शब्द यूँ तो एक सामान्य शब्द है, लेकिन इसे ख़ास बना दिया, फेसबुक पर बहुतों के चहेते  एक लेखक संजय सिन्हा ने। उन्होंने एक लेखमाला अपनी पोस्ट्स के रूप में चलाई जिसमे उन्होंने अपने फेसबुक मित्रों, जिन्हे वो अपना SSFB परिवार कहते हैं, में से नित्य दो मित्रों का परिचय शेष मित्रों से कराने का एक सिलसिला शुरू किया।  आज मुझे महसूस हो रहा है कि ये संजय सिन्हा की ऐसी ईजाद है कि हर व्यक्ति को कल, आज और कल के बीच पड़े पर्दों को को हटा कर देखने से पता चलेगा कि अगर उनके जीवन के कल, आज और कल के बीच पड़े "काश" नाम के पड़े पर्दों को हटा कर देखें तो उनके वर्तमान और उनके भविष्य के जीवन की पूरी रूपरेखा ही बदल जायेगी।  संजय सिन्हा परिवार में एक से एक अच्छे पत्रकार, कवि, लेखक, कलाकार, विद्वान् शामिल हैं मैं उन से आग्रह करता हूँ कि वे अपने अपने काश के परदे को हटा कर कल्पना के कैनवास पर अपने बदले हुए जीवन चरित्र को उकेरने की कोशिश करें तो इस परिवार को बड़ी रोचक जानकारियां मिलेंगे जो कइयों के जीवन को प्रभावित और प्रेरित करेंगी।  सोचिये कि काश संजय सिन्हा के भाई का आकस्मिक परलोकगमन न ह...
 वैसे तो ये टॉपिक अब लिखने लायक नहीं रहा, मैंने सोचा था अब और नहीं।  लेकिन आपका आग्रह नहीं ठुकरा सकता तो बता रहा हूँ।  मैंने बचपन से घर में अनेकों बार बहन का , माँ का , बुआ का, पत्नी का झुमका गुम होते देखा सुना है और मिलते हुए भी। अधिकाँशतः वो किसी न किसी बिस्तर में या बिस्तर के आस पास या कभी कभी बाथरूम में मिलता था।  सो मैंने लिख दिया था (अब तो वो टिप्पणी मैंने डिलीट कर दी) कि झुमका खोया है तो बिस्तर या बिस्तर के आसपास मिलेगा। बिस्तर किसी का भी हो सकता है। बिस्तर किसका हो सकता है ये झुमके की मालकिन बेहतर बता सकती है। ये बाद के दो वाक्य अनावश्यक थे इन्हे न लिखता तो बात आगे नहीं बढ़ती। या फिर और विस्तार से लिखता। बिस्तर पर बच्चे खेलते हैं माँ के गर्दन पर झूल जाते हैं, भाई बहन तकिया मार मार कर लड़ते हैं तो बच्चों के बिस्तर पर भी मिल सकता है। ..इतना और स्पष्ट कर दिया होता तो दुसरे अर्थ निकालने की जरूरत न पड़ती। लेकिन लघुकथा लिखते लिखते कुछ बाते पाठकों के अपने सोचने के लिए छोड़ देने की आदत पड गयी तो टिप्पणी को विस्तार जानबूझ कर नहीं दिया ताकि लोग अपने अपने हिसाब से खाली स्था...

निष्पक्षता

भारत ही नहीं दुनिया भर में लोग वैज्ञानिक घटनाओं के बारे में बहुत जागरूक नहीं हैं इसलिए जो बात उनकी समझ से परे होती है, उसे वो चमत्कार बताने लगते हैं, जबकि लोगों को चमत्कार से बहकाने वाले लोग सीधे सीधे रसायन या भौतिक विज्ञान के प्रयोगों का सहारा लेकर वो चमत्कार करते हैं।  इसी प्रकार मनोरोग और मनोचिकित्सा के बारे में भी पिछड़े देशों में जानकारी और जागरूकता का अभाव पाया जाता है। किसी को मनोचिकित्सक के पास ले जाने की बात कहो तो तुरंत मरीज स्वयं या उसके घर वाले कड़ी प्रतिक्रिया देते हैं - हमें पागल समझ रखा है क्या? जैसे हम अपने हर अंग के लिए विशेषज्ञ चिकित्सक के पास जाते हैं, जैसे त्वचा विशेषज्ञ, दन्त विशेषज्ञ, पेटरोग विशेषज्ञ, ई एन टी विशेषज्ञ, urologist , हृदयरोग विशेषज्ञ आदि, मष्तिस्क और स्नायुतंत्र भी हमारे शरीर का अंग है, उसमे कोई विकार आने पर हमें इनके विशेषज्ञ के पास जाना ही चाहिए।  भूत प्रेत दिखना, वहम होना, क्रोध अधिक आना, चिंताग्रस्त रहना, कानों में  विचित्र आवाजे सुनाई देना जो औरों को न सुनाई देती हों, एक ही काम को बार बार करना, किसी अनहोनी की आशंका में जीना, ऊंचाई या...
पहली पारी अक्टूबर २००६ में समाप्त हो जाने के बाद।  धीरे धीरे लोगों का संवेदना प्रकट करने आने वालों का सिलसिला ख़त्म हुआ। और अब हम तीन प्राणी मैं, मेरा मंझला बेटा अमित, जो उस समय IIT रूडकी से बी.टेक (इलेक्ट्रॉनिक्स) करने के बाद नॉएडा स्थित एक साउथ अफ्रीकन सॉफ्टवेयर कंपनी में काम कर रहा था, और सबसे छोटा बेटा क्षितिज जो डीपीएस वसुंधरा में ११वीं में पढ़ रहा था, रह गए।मैंने ड्यूटी ज्वॉइन कर ली और दो दिन में ही मुझे समझ आ गया कि सुबह कार से गाजियाबाद से मुरादाबाद और शाम को मुरादाबाद से गाजियाबाद मेरे लिए ड्राइव करना संभव नहीं है।शारीरिक थकान और आर्थिक नुक्सान ने मुझे बाध्य किया कि मैं रेलवे पास बनवा लूँ। दैनिक यात्रियों के लिए मुझे रेलवे मासिक पास का महत्त्व समझ में आ गया। लेकिन कुछ दिनों में ही मुझे (दो महीने में ही) ये व्यवस्था त्यागनी पड़ी क्यूंकि मेरे अपनी आइडेंटिटी छिपा कर द्वितीय श्रेणी के भीड़ भरे डिब्बे में रोज रोज यात्रा करना, संभव नहीं रहा. कुछ दैनिक यात्रियों ने मुझे पहचान लिया कि मैं मुरादाबाद में संयुक्त विकास आयुक्त हूँ। और ये मेरे पद की गरिमा के अनुकूल नहीं था। ये पद की गर...

Positive Thoughts, Stress Management and Personality Development

सकारात्मक सोच,  तनाव प्रबंधन और व्यक्तित्व विकास  व्यक्तित्व क्या है ? प्रत्येक व्यक्ति विशिष्ट है, कोई भी दो व्यक्ति एक जैसे नहीं हैं। दो व्यक्ति देखने में, डील डौल में वेशभूषा में, एक जैसे लग सकते हैं फिर भी उनके बोलचाल में, उनके लहजे में अंतर आप ढूंढ ही लेंगे।अगर कोई हूबहू किसी दुसरे व्यक्ति की नक़ल भी कर ले तो भी किसी विषय पर दो व्यक्तियों के आप विचार जानने की कोशिश करें तो उनके विचारों में, उनके ज्ञान के स्तर में, उनकी रुचियों, उनकी धारणाओं में और उनके व्यवहार में आप अंतर जरूर पाएंगे।  ये जो अंतर है ये ही प्रत्येक व्यक्ति को विशिष्ट बनाता है। हर व्यक्ति की अपनी विशिष्टता ही  उसका व्यक्तित्व है।  लेकिन क्या प्रत्येक व्यक्ति अपनी विशिष्टताओं  के बारे में जागरूक है। हमारे सामाजिक ढांचे में एक गुण या कुछ लोग इसे अवगुण भी कह सकते हैं कि हमारे माता पिता और हमारे गुरुजन भी व्यक्ति को एक बने बनाये पैटर्न के रूप में ढालना चाहते हैं, वे व्यक्ति/बच्चों की विशिष्टताओं को जानने या समझने की चेष्टा शायद ही करते हैं। उनके सामने कुछ आदर्श पहले से मौजूद ...